एक बेहतरीन कोर्टरूम ड्रामा और सामाजिक सोद्दैश्यता के मामले में हिंदी फिल्मों मेंपिछला सबसे लोकप्रिय संदर्भ बिंदु है 'दामिनी'. राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशितइस फिल्म में मीनाक्षी शेषाद्रि, सनी देओल, ऋषि कपूर, अमरीश पुरी ने प्रमुख किरदारनिभाए थे. कहानी दामिनी नाम की महिला की थी जो गरीब परिवार से है और अमीर घर केबेटे की बहू बनती है. होली पर एक दिन घर का छोटा बेटा दोस्तों के साथ मिलकर नौकरानीसे रेप करता है. दामिनी ये देख लेती है और तमाम नैतिक-सामाजिक-पारिवारिक दबावों केबावजूद सच के साथ खड़ी होती है, उस असहाय लड़की को न्याय दिलाने के लिए. उस न्याय कोदिलाने के लिए जिसे लेकिन न्यायपालिका भी इतनी गंभीर नहीं है. अनिल कपूर की 'मेरीजंग' भी नए दौर की एक अन्य मनोरंजक प्रस्तुति थी.अब पिंक आई है.इसका निर्माण किया है शूजीत सरकार ने जिन्होंने इससे पहले 'विकी डोनर' और 'पीकू'जैसी उत्कृष्ट फिल्मों का निर्देशन किया है. दोनों न सिर्फ मनोरंजक थीं बल्किसामाजिक सोद्दैश्यता से भरपूर थीं. 'पिंक' का निर्देशन उन्होंने बंगाली फिल्मकारअनिरूद्ध रॉय चौधरी से करवाया है. अनिरूद्ध बहुत काबिल आर्टिस्ट हैं. उन्होंने ही2008 में 'अंतहीन' बनाई थी जिसे चार नेशनल अवॉर्ड प्राप्त हुए थे. 'पिंक' मेंअमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, पीयूष मिश्रा, अंगद बेदी, विजय वर्मा, कीर्ति कुलहरी औरधृतिमान चैटर्जी प्रमुख भूमिकाओं में हैं. कहानी रेप की है. एक युवती (तापसी)उत्पीड़ित होती है लेकिन लड़के (अंगद, विजय) ताकतवर परिवारों से हैं. एक जगह वे कहतेभी दिखते हैं, "अब तेरा कांड होगा". कोर्ट में उनका केस एक खतरनाक वकील (पीयूष) लड़रहे हैं और लड़कियों के साथ हैं दीपक जी (अमिताभ). हालांकि ट्रेलर में वे जिस तरह सेसवाल पूछते हैं उससे वे विरोधी वकील ज्यादा लगते हैं. लेकिन यही कोई रोचक मोड़ होसकता है. या ट्रेलर में सस्पेंस देने के लिए एडिटिंग इस तरह से की गई है.अमिताभ के पात्र को बाइपोलर डिसऑर्डर है. कुछ वैसा ही जैसा मशहूर टीवी-सीरीज'होमलैंड' में सीआईए एजेंट कैरी मेथीसन के पात्र को होता है. इस डिसऑर्डर की वजह सेसीरीज में एक ग़जब विरोधाभास बना रहता है जो एक अनिश्चितता को अपरिवर्तनीय रखता है.और यही कर पाना नए दौर में एंटरटेनमेंट को परिभाषित करने वाल है.कहानी में कुछ ऐसा पेंच भी है कि ये लड़कियां कुछ छुपा रही हैं. इसी से उनका बचाव करपाना कठिन होता है. फिल्म में दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं. पहला है, कोर्टरूमड्रामा. राजधानी समेत देश भर में लाखों ऐसे मामले हैं जिनमें प्रभावी लोग पैसों केबल पर महंगे वकील करके छूट जाते हैं. कुछ फिल्म सितारों के मामलों में हालिया समयमें हमने देखा है कि कैसे उनके वकीलों की फीस करोड़ों रुपयों में रही हैं. वे वकालतके ऊंचे और महंगे संस्थानों में पढ़े हैं तो अपने कस्टमर को रिजल्ट भी तो लाकरदिखाएंगे. ऐसे में जो पीड़ित पक्ष है, अगर वो गरीब है तो न्याय की संभावना क्षीण होजाती है. ये कहानी उसी डिबेट को आगे ले जा सकती है कि हमारी कहानियों में अंत कैसेहोता है. साथ ही यह भी कि इस कोर्टरूम ड्रामा में निर्देशक ने क्या कलात्मक कुशलतालगाई है. दूसरा है, महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध. रेप के मामलों में छह दशक से हमअपनी फिल्मों में देख रहे हैं कि कैसे पीड़ितों से सवाल पूछे जाते हैं और वेशर्मिंदा होती हैं. अपनी देह के बारे में बात करके. कुछ यूं महसूस करवाया जाता हैकि जैसे उनकी इज्जत चली गई हो. इस दौरान अदालत में भी बर्ताव गरिमामय नहीं होता. येफिल्म 2016 की न्याय व्यवस्था पर इस लिहाज से क्या बात करेगी ये देखना दिलचस्पहोगा. दो मौकों पर ट्रेलर झकझोरता है. जब पिंक रंग के साथ लिखा पोस्टर उभरता है. येरंग महिलाओं का द्योतक है और इसमें हाथ बने हैं जो कैद में हैं. इस रंग की कैद मेंऔर इस कैद से आजाद होने और इस रंग को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है. जब अमिताभ कापात्र युवती से पूछता है, "उस वक्त आपने ये क्या संकेत दिया कि इस वक्त मैं सेक्समें इंटरेस्टेड नहीं हूं." ये काफी महत्वपूर्ण लाइन है. विषय-वस्तु, आज के समय केसंदर्भों और निर्देशन के लिहाज से पिंक संभावना भरी लग रही है. सभी लोगों का अभिनयसधा हुआ है. जैसे, तापसी दो जगह दिल्ली की लड़की के तौर पर एक विशेष एक्सेंट लातीहैं. बच्चन बेहद अनुशासित हैं. बाइपोलर डिसऑर्डर को वे कैसे दिखाते हैं इसका इंतजारहै. 'दामिनी' और 'मेरी जंग' में ग्रे शेड वाले वकील के रोल में अमरीश पुरी पत्थरमें तलवार घोंप गए. 'पिंक' में ऐसे विरोधी वकील के रूप में पीयूष मिश्रा से कद्दावरकोई मिल नहीं सकता था. वे प्रभावी हैं.ट्रेलर स्पष्ट है, उधेड़बुन में भी रखता है और सबकुछ उजागर भी नहीं होने देता. आहटहै कि पिंक 2016 की बेस्ट फिल्मों में से एक हो सकती है.https://www.youtube.com/watch?v=AL2TShb6fFs&feature=share