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Trailer: अमिताभ बच्चन की ज़ोरदार-करारी 'पिंक', आएगा मजा!

इसमें आहट है कि ये 2016 की बेस्ट फिल्मों में हो सकती है.

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9 अगस्त 2016 (अपडेटेड: 9 अगस्त 2016, 11:21 AM IST)
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"पिंक" के ट्रेलर में अमिताभ बच्चन.
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एक बेहतरीन कोर्टरूम ड्रामा और सामाजिक सोद्दैश्यता के मामले में हिंदी फिल्मों में पिछला सबसे लोकप्रिय संदर्भ बिंदु है 'दामिनी'. राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित इस फिल्म में मीनाक्षी शेषाद्रि, सनी देओल, ऋषि कपूर, अमरीश पुरी ने प्रमुख किरदार निभाए थे. कहानी दामिनी नाम की महिला की थी जो गरीब परिवार से है और अमीर घर के बेटे की बहू बनती है. होली पर एक दिन घर का छोटा बेटा दोस्तों के साथ मिलकर नौकरानी से रेप करता है. दामिनी ये देख लेती है और तमाम नैतिक-सामाजिक-पारिवारिक दबावों के बावजूद सच के साथ खड़ी होती है, उस असहाय लड़की को न्याय दिलाने के लिए. उस न्याय को दिलाने के लिए जिसे लेकिन न्यायपालिका भी इतनी गंभीर नहीं है.
अनिल कपूर की 'मेरी जंग' भी नए दौर की एक अन्य मनोरंजक प्रस्तुति थी.

अब पिंक आई है.

इसका निर्माण किया है शूजीत सरकार ने जिन्होंने इससे पहले 'विकी डोनर' और 'पीकू' जैसी उत्कृष्ट फिल्मों का निर्देशन किया है. दोनों न सिर्फ मनोरंजक थीं बल्कि सामाजिक सोद्दैश्यता से भरपूर थीं. 'पिंक' का निर्देशन उन्होंने बंगाली फिल्मकार अनिरूद्ध रॉय चौधरी से करवाया है. अनिरूद्ध बहुत काबिल आर्टिस्ट हैं. उन्होंने ही 2008 में 'अंतहीन' बनाई थी जिसे चार नेशनल अवॉर्ड प्राप्त हुए थे. 'पिंक' में अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, पीयूष मिश्रा, अंगद बेदी, विजय वर्मा, कीर्ति कुलहरी और धृतिमान चैटर्जी प्रमुख भूमिकाओं में हैं. कहानी रेप की है. एक युवती (तापसी) उत्पीड़ित होती है लेकिन लड़के (अंगद, विजय) ताकतवर परिवारों से हैं. एक जगह वे कहते भी दिखते हैं, "अब तेरा कांड होगा". कोर्ट में उनका केस एक खतरनाक वकील (पीयूष) लड़ रहे हैं और लड़कियों के साथ हैं दीपक जी (अमिताभ). हालांकि ट्रेलर में वे जिस तरह से सवाल पूछते हैं उससे वे विरोधी वकील ज्यादा लगते हैं. लेकिन यही कोई रोचक मोड़ हो सकता है. या ट्रेलर में सस्पेंस देने के लिए एडिटिंग इस तरह से की गई है. pink5 pink7

अमिताभ के पात्र को बाइपोलर डिसऑर्डर है. कुछ वैसा ही जैसा मशहूर टीवी-सीरीज 'होमलैंड' में सीआईए एजेंट कैरी मेथीसन के पात्र को होता है. इस डिसऑर्डर की वजह से सीरीज में एक ग़जब विरोधाभास बना रहता है जो एक अनिश्चितता को अपरिवर्तनीय रखता है. और यही कर पाना नए दौर में एंटरटेनमेंट को परिभाषित करने वाल है.

कहानी में कुछ ऐसा पेंच भी है कि ये लड़कियां कुछ छुपा रही हैं. इसी से उनका बचाव कर पाना कठिन होता है. फिल्म में दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं. पहला है, कोर्टरूम ड्रामा. राजधानी समेत देश भर में लाखों ऐसे मामले हैं जिनमें प्रभावी लोग पैसों के बल पर महंगे वकील करके छूट जाते हैं. कुछ फिल्म सितारों के मामलों में हालिया समय में हमने देखा है कि कैसे उनके वकीलों की फीस करोड़ों रुपयों में रही हैं. वे वकालत के ऊंचे और महंगे संस्थानों में पढ़े हैं तो अपने कस्टमर को रिजल्ट भी तो लाकर दिखाएंगे. ऐसे में जो पीड़ित पक्ष है, अगर वो गरीब है तो न्याय की संभावना क्षीण हो जाती है. ये कहानी उसी डिबेट को आगे ले जा सकती है कि हमारी कहानियों में अंत कैसे होता है. साथ ही यह भी कि इस कोर्टरूम ड्रामा में निर्देशक ने क्या कलात्मक कुशलता लगाई है. दूसरा है, महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध. रेप के मामलों में छह दशक से हम अपनी फिल्मों में देख रहे हैं कि कैसे पीड़ितों से सवाल पूछे जाते हैं और वे शर्मिंदा होती हैं. अपनी देह के बारे में बात करके. कुछ यूं महसूस करवाया जाता है कि जैसे उनकी इज्जत चली गई हो. इस दौरान अदालत में भी बर्ताव गरिमामय नहीं होता. ये फिल्म 2016 की न्याय व्यवस्था पर इस लिहाज से क्या बात करेगी ये देखना दिलचस्प होगा. दो मौकों पर ट्रेलर झकझोरता है. जब पिंक रंग के साथ लिखा पोस्टर उभरता है. ये रंग महिलाओं का द्योतक है और इसमें हाथ बने हैं जो कैद में हैं. इस रंग की कैद में और इस कैद से आजाद होने और इस रंग को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है. pin5 जब अमिताभ का पात्र युवती से पूछता है, "उस वक्त आपने ये क्या संकेत दिया कि इस वक्त मैं सेक्स में इंटरेस्टेड नहीं हूं." ये काफी महत्वपूर्ण लाइन है. विषय-वस्तु, आज के समय के संदर्भों और निर्देशन के लिहाज से पिंक संभावना भरी लग रही है. सभी लोगों का अभिनय सधा हुआ है. जैसे, तापसी दो जगह दिल्ली की लड़की के तौर पर एक विशेष एक्सेंट लाती हैं. बच्चन बेहद अनुशासित हैं. बाइपोलर डिसऑर्डर को वे कैसे दिखाते हैं इसका इंतजार है. 'दामिनी' और 'मेरी जंग' में ग्रे शेड वाले वकील के रोल में अमरीश पुरी पत्थर में तलवार घोंप गए. 'पिंक' में ऐसे विरोधी वकील के रूप में पीयूष मिश्रा से कद्दावर कोई मिल नहीं सकता था. वे प्रभावी हैं.

ट्रेलर स्पष्ट है, उधेड़बुन में भी रखता है और सबकुछ उजागर भी नहीं होने देता. आहट है कि पिंक 2016 की बेस्ट फिल्मों में से एक हो सकती है.

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