सरकार के कानूनी सलाहकार बोले- हर बात के अंत में ‘इंसानों की ज़िंदगी’ लाकर उसे ‘नाटकीय’ मत बनाइए
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता बोले, किसी को 3 की ज़रूरत, तो 5 घंटे ऑक्सीजन दी जा रही है.
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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (बाएं) ने अदालत के सामने कहा कि हर वाक्य के अंत में ‘इंसानों की ज़िंदगी’ जैसी बातें लाकर उसे नाटकीय नहीं बनाना चाहिए. (फोटो- PTI)
देश में Covid-19 के बढ़ते मामलों के बीच मेडिकल ऑक्सीजन की लगातार किल्लत बनी हुई है. राजधानी दिल्ली में हालात ख़ासे ख़राब हैं. दिल्ली हाई कोर्ट में इस किल्लत और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर याचिका भी लगी हुई है. याचिका पर 26 अप्रैल को जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस रेखा पल्ली की बेंच ने सुनवाई की.
Bar and Bench की ख़बर के मुताबिक- केंद्र सरकार की तरफ से पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत के निर्देश से केंद्र को ये अधिकार रहना चाहिए कि अगर राज्यों के पास अतिरिक्त ऑक्सीजन बच रही है तो उसे केंद्र वापस लेकर किसी अन्य ज़रूरतमंद राज्य को दे सके.
मेहता ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरफ से उद्योगपति सज्जन जिंदल को लिखे एक ख़त का भी ज़िक्र किया. कहा कि इसमें दिल्ली सरकार की तरफ से टैंकर और ऑक्सीजन मांगे गए हैं. मेहता का कहना था कि ये काम केंद्र सरकार के माध्यम से होना चाहिए वरना व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी. वो बोले कि राज्य सरकारें टैंकर की मांग कर सकती हैं, लेकिन ऑक्सीजन उन्हें केंद्र के माध्यम से ही लेनी चाहिए और जो ऑक्सीजन बचे, वो भी केंद्र को वापस करनी चाहिए.
इस पर दिल्ली सरकार की तरफ से मौजूद वकील राहुल मेहरा ने कहा कि अगर केंद्र के पास अतिरिक्त ऑक्सीजन है और राज्य को जानकारी मिलती है कि किसी प्लांट में भी ऑक्सीजन मौजूद है तो जाहिर तौर पर वे केंद्र से कहेंगे कि दिल्ली की ऑक्सीजन उसे वापस कर दी जाए. इसी तीखी बहस के बीच SG मेहता एक ऐसी टिप्पणी भी कर गए, जो सुनने में संवेदनहीन लग सकती है. ख़ासकर इस महामारी के दौर में. वो बोले –
मेहता इससे पहले बोले –
मेहता ने कहा कि इस समय ऑक्सीजन के नपे-तुले इस्तेमाल पर जोर देने की ज़रूरत है. बोले –
इन सब बातों के बीच मेहता की ‘इंसानों की ज़िंदगी’ वाले बयान के लिए आलोचना भी हो रही है. इससे पहले 22 अप्रैल को भी सुनवाई में वो कुछ ऐसा बोल गए, जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता. उन्होंने कहा था कि- एक नाख़ुश गर्लफ्रेंड की तरह एक-दूसरे पर आरोप लगाने की बजाय हम दोनों (केंद्र और राज्य) को ज़िम्मेदार की तरह काम करना चाहिए.
वैसे अंत में एक बात, सॉलिसिटर जनरल के लिए, इस वक़्त इकलौती गैर-नाटकीय बात यही हो रही है कि 'इंसानों की ज़िंदगी' जा रही है. आपकी बातें, तर्क, दलीलें, आंकड़े, सफाई-बचाव, पैंतरे मिलकर इस बात को नहीं बदल सकते कि 'इंसानों की ज़िंदगी' जा रही है. सनद रहे, वक़्त पर काम आवे.

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