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'नाजियों को भी इससे बेहतर ट्रीटमेंट मिला', डिपोर्टेशन पर ट्रंप को कोर्ट ने फटकारा

वेनेजुएला के नागरिकों के निर्वासन मामले में अमेरिका की कोर्ट ने डॉनल्ड ट्रंप को फटकार लगाई है. जज ने कहा कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अमेरिकियों ने नाजियों के साथ भी इससे अच्छा व्यवहार किया था.

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Donald Trump
डॉनल्ड ट्रंप
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राघवेंद्र शुक्ला
25 मार्च 2025 (Published: 09:20 AM IST)
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अमेरिका के प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप (Donald Trump) को डिपोर्टेशन के एक मामले में फेडरल जज (Federal Judge) ने लताड़ दिया है. मामला वेनेजुएला के नागरिकों से जुड़ा है, जिन्हें बीते दिनों ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग का सदस्य बताकर अमेरिकी सरकार ने निर्वासित कर दिया था. उन्हें एल सल्वाडोर की हाई सिक्योरिटी जेल भेजा गया था. हालांकि, मामले में न तो उनके अपराध के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी दी गई और न ही उन्हें अपने आरोपों पर सफाई देने का मौका ही दिया गया था. 

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला कोर्ट में था जिसकी सुनवाई के दौरान अमेरिकी फेडरल जज पेट्रीशिया मिलेट भड़क गईं. ट्रंप सरकार को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिकियों ने दूसरे विश्व युद्ध के समय नाजियों के साथ भी इससे अच्छा बर्ताव किया था.

क्या है मामला?
15 मार्च 2025 की बात है. अल सल्वाडोर के राष्ट्रपति नायब बुकेले ने ‘एक्स’ पर एक वीडियो शेयर किया था. वीडियो में पुलिस की कड़ी सुरक्षा में अपराधी की तरह दिखने वाले कुछ लोगों को जहाज में सवार किया जा रहा था. इससे पहले उनके सिर मुडवाए गए. हाथ पीछे बांध दिए गए. बताया गया कि ये वेनेजुएला के खतरनाक अपराधी और ‘ट्रेन डी अरागुआ’ (Tren de Aragua) गैंग के सदस्य हैं. उन्हें अमेरिका से निर्वासित कर एल सल्वाडोर की हाई सिक्योरिटी जेल भेजा जा रहा है. एल सल्वाडोर की राजधानी सैन सल्वाडोर से 75 किमी दूर जंगल में बनी CECOT जेल में इन्हें रखा जाएगा. वेनेजुएला के इन नागरिकों पर 1798 एलियन एनमीज़ एक्ट (AEA) का इस्तेमाल किया गया था, जो इससे पहले सिर्फ 3 बार प्रयोग में लाया गया था. 1812 के युद्ध में और प्रथम-द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान.

यह कानून युद्धकाल में दुश्मन देशों के नागरिकों के निर्वासन की इजाजत देता है. अमेरिका और वेनेजुएला में न तो कोई जंग छिड़ी है और न ही किसी तरह के विश्व युद्ध जैसी परिस्थिति ही दुनिया में दिखाई दे रही है. ऐसे में ट्रंप सरकार के इस कानून के उपयोग पर बवाल मचा हुआ है. निर्वासन का यह काम जिस दिन हुआ, उसी दिन वॉशिंगटन डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेम्स बोसबर्ग ने ट्रंप सरकार के आदेश पर अस्थायी रोक (Restraining Order) लगा दी थी और AEA कानून के तहत निर्वासन रोक दिया था. फिर भी विमान उड़े और वेनेजुएला के नागरिकों का निर्वासन हुआ.

ट्रंप प्रशासन के न्याय विभाग (Justice Department) ने निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की. सोमवार को यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स के तीन न्यायाधीशों की एक बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. अटॉर्नी ड्रीव एनसाइन (Justice Department) ने कोर्ट में दलील दी कि लोअर कोर्ट का निर्वासन रोकने का आदेश राष्ट्रपति के अधिकारों में अनुचित हस्तक्षेप है, लेकिन जज पेट्रीशिया मिलेट ने इस तर्क को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि आदेश में राष्ट्रपति के अधिकारों पर सवाल नहीं उठाया गया, बल्कि मुद्दा ये है कि प्रवासियों को सुनवाई का मौका क्यों नहीं दिया गया?

बराक ओबामा की सरकार में नियुक्त की गईं जज मिलेट ने इस दौरान सरकार के लिए कठोर लहजे का भी प्रयोग किया. उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय तो नाजियों को भी सुनवाई का अधिकार मिला था. लेकिन इन प्रवासियों को कोई मौका नहीं दिया गया. 

मिलेट ने तर्क दिया, 

'आप लोग तो मुझे भी उठाकर विमान में फेंक सकते थे. यह सोचकर कि मैं ट्रेन डे अरागुआ की सदस्य हूं. और तो और, मुझे इसका विरोध करने का कोई मौका भी नहीं दिया जाता.'

क्या हैं आरोप?
ट्रंप प्रशासन ने दावा किया कि निर्वासित किए गए प्रवासी वेनेजुएला के कुख्यात 'ट्रेन डी अरागुआ' गिरोह के सदस्य थे. हालांकि, उनके वकीलों ने जो दावा किया है, वो अमेरिकी सरकार के एक्शन पर गंभीर सवाल खड़े करता है. वकीलों ने कहा कि आरोपी प्रवासी पूरी तरीके से निर्दोष थे और केवल उनके ‘टैटू’ के आधार पर उन्हें टारगेट किया गया. मामले में ‘अमेरिकी सिविल लिबर्टीज यूनियन’ (ACLU) ने कोर्ट में केस दायर किया. इसके वकील ली गेलेंट ने अदालत में बताया कि सरकार ने AEA जैसे कानून का गलत प्रयोग किया है और सामान्य आव्रजन प्रक्रिया (Immigration Proceedings) को दरकिनार करने की कोशिश की है. गेलेंट ने कहा कि अगर निचली अदालत के फैसले को हटाया गया तो सरकार फिर से निर्वासन शुरू कर देगी और लोग एल सल्वाडोर की खतरनाक जेलों में बिना किसी सुनवाई के बंद कर दिए जाएंगे.

ट्रंप की प्रतिक्रिया और विवाद
बता दें कि ट्रंप सरकार के इस फैसले और कोर्ट के आदेश पर अमेरिका में घमासान मचा है. संवैधानिक संकट की स्थिति आने की भी आशंका है. निचली अदालत के जस्टिस बोसबर्ग ने सोमवार को 37 पन्नों का एक आदेश जारी कर कहा था कि निर्वासित किए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पहले सुनवाई का अधिकार मिलना चाहिए. ये वही बोसबर्ग हैं, जिनकी ट्रंप से बिल्कुल नहीं बनती. ट्रंप इससे पहले उनकी न सिर्फ आलोचना कर चुके हैं बल्कि उनके खिलाफ महाभियोग की भी मांग कर चुके हैं. उनकी मांग पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने  ट्रंप की आलोचना भी की थी. इस संवेदनशील मामले को लेकर कानूनी विशेषज्ञों को आशंका है कि अगर ट्रंप प्रशासन अदालत के आदेश को अनदेखा करता है, तो यह एक गंभीर संवैधानिक संकट को जन्म दे सकता है.

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