अमेरिका जिस 82nd एयरबोर्न डिवीजन को ईरान भेज रहा, उसके कारनामे बहुत बड़े हैं
अमेरिका की इस एलीट फोर्स का इतिहास शानदार रहा है. अमेरिका जब-जब मुश्किल मोर्चे में फंसा, उसने 82nd एयरबोर्न को ही याद किया है. इस डिविजन का गठन 25 अगस्त 1917 को हुआ. तब प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था. लेकिन इसे साल 1942 में एयरबोर्न (पैराशूट डिवीजन) में बदला गया. इसके बाद ही इसकी असल पहचान बनी.

मिडिल ईस्ट में जंग को महीना भर होने को है. लेकिन लड़ाई रुकने के आसार नहीं दिख रहे. पिछले दिनों दोनों पक्षों के बातचीत की मेज पर आने की खबर भी आई. लेकिन ईरान अमेरिका की शर्तों से मुतमईन नहीं नजर आ रहा. इस बीच खबर आई है कि अमेरिका अपनी सबसे घातक सैन्य टुकड़ी को ग्राउंड पर उतारने जा रहा है. अमेरिकी रक्षा विभाग, पेंटागन अपनी 82nd एयरबॉर्न डिवीजन के करीब 2 हजार पैराट्रूपर्स को मिडिल ईस्ट भेज रहा है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 82nd एयरबोर्न डिवीजन एक इन्फैंट्री यानी पैदल सेना की डिवीजन है. ये इमीजिएट रिस्पॉन्स फोर्स का हिस्सा हैं. इन्हें 18 घंटे के भीतर दुनिया के किसी भी कोने में तैनात किया जा सकता है. इस डिवीजन का हेडक्वार्टर नॉर्थ कैरोलाइना के फोर्ट लिबर्टी में स्थित है. ये पैराशूट असॉल्ट यानी हवा से जमीन पर हमले के लिए जाने जाते हैं. ये दुर्गम से दुर्गम इलाकों में पैराशूट लैंडिंग कर सकते हैं. इनको सेफ लैंडिंग जोन की जरूरत नहीं होती. ये विमान से हजारों फीट की ऊंचाई से कूदते हैं. पैराशूट खोलते हैं और जमीन पर उतरकर टारगेट को अटैक करते हैं.
इनके पास बेहद एडवांस्ड और हल्के हथियार होते हैं. जिसके चलते ये तेजी से मूव करते हैं. इनका इस्तेमाल दुश्मन के अहम ठिकानों (जैसे एयरफील्ड, कम्युनिकेशन सेंटर और सप्लाई चेन) पर कब्जा करने के लिए किया जाता है. ये अपने पीछे आ रही अमेरिकी सेना और भारी हथियारों के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार करते हैं.
यह डिवीजन स्टैंडर्ड इन्फैंट्री वेपन, एंटी आर्मर सिस्टम और पोर्टेबल कम्युनिकेशन इक्विपमेंट से लैस होती है. जरूरत पड़ने पर ये लाइट इन्फैंट्री और हल्के लड़ाकू विमानों का भी इस्तेमाल करते हैं. इनकी ट्रेनिंग ऐसी होती है कि ये किसी भी अनजान जगह पर आसानी से मोर्चा ले सकते हैं.
अमेरिका की इस एलीट फोर्स का इतिहास शानदार रहा है. अमेरिका जब-जब मुश्किल मोर्चे में फंसा, उसने 82nd एयरबोर्न को ही याद किया है. इस डिविजन का गठन 25 अगस्त 1917 को हुआ. तब प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था. लेकिन इसे साल 1942 में एयरबोर्न (पैराशूट डिवीजन) में बदला गया. इसके बाद ही इसकी असल पहचान बनी.
द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर की सेना को छकाया
साल 1944 में फ्रांस को हिटलर की सेना के कब्जे से छुड़ाने में इस डिवीजन ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई. 6 जून 1944 को इनको फ्रांस के नॉर्मंडी में एयरड्रॉप किया गया. अमेरिकी नौसेना के पहुंचने से पांच घंटे पहले 12 हजार पैराट्रूपर्स दुश्मन के इलाके में उतरे. इनका काम था पुलों और सड़कों पर कब्जा करना, ताकि सेना के भीतर आने का रास्ता साफ हो सके. इन्होंने जर्मनी सेना की सप्लाई लाइन काट दी. बिना रुके 33 दिनों तक मोर्चे पर डटे रहे. आखिरकार नाजी जर्मनी को पीछे हटना पड़ा.
सद्दाम हुसैन के खिलाफ ऑपरेशन
साल 1991 के खाड़ी युद्ध और 2003 में इराक पर हमले में भी इनकी भूमिका सबसे अहम रही. एयरबोर्न डिवीजन ने सद्दाम हुसैन को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया. उन्होंने बेहद फुर्ती से घुसपैठ करके उनका कम्युनिकेशन सिस्टम तबाह कर दिया. इराक के प्रमुख शहरों पर कंट्रोल करने में इनकी भूमिका सबसे अहम रही. इन्होंने 100 घंटे की लड़ाई में अमेरिका को फतेह दिला दी.
काबुल में रेस्क्यू ऑपरेशन
अगस्त 2021. अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से वापस लौट रही थी. तालिबान ने तेजी से देश पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया था. काबुल में अफरातफरी की स्थिति बन गई. उस मुश्किल वक्त में हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को सुरक्षित रखने, वहां से हजारों नागरिकों को निकालने और रेस्क्यू ऑपरेशन को कवर देने का जिम्मा 82nd एयरबोर्न डिवीजन ने ही संभाला था.
82nd एयरबोर्न डिवीजन का एक ही नियम है, उनके लिए कोई नियम नहीं. उनको ऑपरेट करने के लिए किसी एयरबेस या बंदरगाह की जरूरत नहीं. दुर्गम पहाड़ी इलाके या बियाबान भी उनके लिए मुश्किल टारगेट नहीं. ये आसमान से लैंडिंग कर दुश्मनों को चौंका देते हैं. ट्रेनिंग ऐसी कि रात के अंधेरे में भी लैंडिंग सटीक होती है. एडवांस्ड पैराशूट, नाइट विजन और ड्रोन से लैस ये टुकड़ी युद्ध लड़ने के बजाय युद्ध का परिणाम तय करने में यकीन रखती है. अब देखना है कि ईरान में ये क्या तीर मार पाते हैं!
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