The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • News
  • america secret bioweapon experiments cia accused robert malone explained

CIA बना रही जैविक हथियार... कोविड वैक्सीन बनाने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक का बड़ा दावा

Bioweapon Technology: अमेरिका के चर्चित इम्यूनॉलजिस्ट डॉ. रॉबर्ट मलोन ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA पर बायोवेपन (जैविक हथियार) बनाने का आरोप लगाया है. इस बात में कितनी सच्चाई है? और बायोवेपन क्या होता है? सब जानते हैं.

Advertisement
america biowepon iran war trump cia accused
अमेरिकी वैज्ञानिक ने CIA पर बायोलॉजिकल हथियार बनाने का आरोप लगाया. (फोटो- सांकेतिक/ITG)
pic
लल्लनटॉप
9 मार्च 2026 (अपडेटेड: 9 मार्च 2026, 03:29 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच 10 दिन से जंग जारी है. ट्रंप ने अपने बयान में कहा है कि ये जंग कुछ हफ्ते और चलेगी. ऐसे में कई सवालों के बीच एक नया सवाल पैदा हो गया है. ‘क्या अमेरिका बायोलॉजिकल वेपन तैयार कर रहा है?’ ये सवाल खड़ा किया है अमेरिका के ही रहने वाले नामी बायोकेमिस्ट ने. उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA पर बायोवेपन (जैविक हथियार) बनाने का आरोप लगाया है. इस बात में कितनी सच्चाई है? और बायोवेपन क्या होता है? बारी-बारी से समझते हैं. 

दरअसल, अमेरिका के चर्चित इम्यूनॉलजिस्ट डॉ. रॉबर्ट मलोन का कहना है कि CIA चुपके से बायोवेपन यानी जैविक हथियार बना रही है. ये वही इम्यूनॉलजिस्ट हैं जिन्हें कोविड-19 वायरस के खिलाफ mRNA वैक्सीन डेवेलप करने का बड़ा क्रेडिट मिला था. एक लेख में उन्होंने दावा किया कि सरकार के डिक्लासिफाइड दस्तावेज उन्होंने देखे हैं. लेकिन पहले ये जान लेते हैं कि जैविक हथियार होता क्या है?

बायोवेपन कैसे तैयार होता है?

बायोलॉजिकल माने जो किसी जीव से बना हो. जैसे फैक्ट्री में बंदूक तैयार किए जाते हैं वैसे ही लेबोरेटरी में ये हथियार तैयार किए जाते हैं. हथियार का काम क्या होता है ये बताने की ज़रूरत नहीं है. लैब में वायरस, बैक्टीरिया, फंगाई जैसे माइक्रोब तैयार किए जाते हैं. 

ये ऐसे केमिकल्स पैदा करते हैं जो इंसानों के लिए जहर का काम करते हैं. कई बार ऐसे कीड़े भी तैयार किए जाते हैं जो किसी बीमारी को फ़ैलाने का काम करें. मतलब बंदूक की जगह कोई जीव और बारूद की जगह जहर. बायोवेपन बनाने में खर्च कम लगता है मगर नुकसान लंबे समय तक रहता है. 

Image embed
CIA laboratory. (फोटो-cia.gov.in) 
मलोन ने क्या दावा किया?

डॉ. मलोन के मुताबिक अमेरिका में ऐसा ही किया गया है. उन्होंने कोल्ड वॉर के वक्त के बायोलॉजिकल वेपन्स प्रोग्राम के डेटा को भी स्टडी किया है. रिपोर्ट के मुताबिक़, डॉ. मलोन का कहना है कि कोल्ड वॉर के दौरान एक Project 112 चलाया जा रहा था. ये बायोलॉजिकल वेपन्स प्रोग्राम था. इसके जरिए वैज्ञानिक ये पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि कैसे बीमारी वाले कीटाणु फैलाने के लिए कीड़ों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

एक उदाहरण से समझते हैं कि ये काम कैसे करता है. आपने शायद किलनी के बारे में सुना होगा. कुत्तों, मवेशियों को लगने वाला एक तरह का कीड़ा होता है. अंग्रेजी में इसको Tick कहते हैं. डॉ. मलोन ने बताया है कि 1960 के दशक में अमेरिका के कनेक्टिकट राज्य में एक फेडरल लैब के पास बड़ी संख्या में ticks छोड़े गए थे. बाद में यहीं पर इनसे होने वाली बीमारी Lyme Disease सबसे पहले पाई गई थी.

लेकिन ये टिक्स ऐसे ही नहीं छोड़ दिए गए थे. जैसे जीपीएस होता है, आपकी लोकेशन बताता है. वैसे ही इन टिक्स में रेडियोऐक्टिव कार्बन 14 चिपका दिया गया था. इससे वैज्ञानिक इन ticks के मूवमेंट को ट्रेस कर सकते थे.

पहले भी ऐसा हुआ है?

डॉ. मालोन से पहले भी साल 2025 में अमेरिकी कांग्रेस ने इससे जुड़ी जांच की मांग की थी. कांग्रेस ने सवाल किया था कि क्या फेडरल एजेंसियां बीमारी फैलाने वाले इन कीड़ों को युद्ध में इस्तेमाल करने के लिए एक्सपेरिमेंट कर रही हैं? सरकारी एजेंसियों ने तब इन आरोपों को खारिज कर दिया था.

अमेरिका के अलावा उसके दोस्त इज़रायल पर भी ऐसे आरोप लगे हैं. 1948 में अरब-इजरायल युद्ध के दौरान Operation Cast thy Thread छेड़ रखा था. इस सीक्रेट ऑपरेशन का मकसद था अरब जाने वाले पानी के स्रोतों में टाइफॉइड फैलाने वाले बैक्टिीरिया को छोड़ना. मैसेच्युसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के एक रिसर्चर ने बताया है कि ये ऑपरेशन इजरायल के आलाकमान की निगरानी में चल रहा था.

कौन बना सकता है ये हथियार?

बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेन्शन 1972 में तैयार किया गया एक समझौता है. इसके तहत बायोलॉजिकल या टॉक्सिन वेपन्स को डिवेलप करने, बनाने, ट्रांसफर या इकट्ठा करने और इस्तेमाल करने पर रोक लगाई गई है. भारत इस समझौते को साइन कर चुका है. वहीं इजरायल ने बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेन्शन को भी साइन नहीं किया है.

हालांकि, कौन इस समझौते का पालन नहीं कर पा रहा है, ये मालूम करना मुश्किल है. कई बार लैब्स का एक्सेस नहीं मिलता तो कई बार वैज्ञानिक रिसर्च का सैन्य इस्तेमाल छिपा लिया जाता है. बायोवेपन का इस्तेमाल नैतिकता पर भी सवाल खड़े करता है, क्योंकि इसका इम्पैक्ट सिर्फ शारीरिक नहीं साइकोलॉजिकल भी होता है.  

(लेखक-शताक्षी अस्थाना)

वीडियो: दुनियादारी: हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत को डुबाकर अमेरिका ने भारत को उकसाया?

Advertisement

Advertisement

()