ख्यात ('प्र' और 'कु' अपने हिसाब से लगा लीजिए) मनोवैज्ञानिक फ़्रायड ने कभी कहा थाकि 'झूठ में एक चुम्बकीय नकारात्मक ताक़त होती है, और अक़्सर फ़ौलादी लोग इससे चिपकेपाए जाते हैं'.अब इसका मतलब भी अपने हिसाब से समझ लीजिए. प्रधानमंत्री मोदी ने हालही में एक इंटरव्यू दिया, जो उनके हिसाब से गैर-राजनैतिक था. लेकिन बातें ऐसी कहींकि मिस्टर खिलाड़ी अक्षय कुमार हर जवाब पर चकरघिन्नी बनकर लोट-पोट होने लगते थे.तमाम फ़ौलादी बातों से भरा हुआ इंटरव्यू .बस आप तो जुगाड़ सुन लो मोदीजी के - अब इसी इंटरव्यू से एक फ़ौलादी बात निकलती है जो सटाक से मैग्नेटिक फ़ील्ड की तरफ़निकल गई. बात ये थी कि खिलाड़ी कुमार ने मोदी के फ़ैशन सेन्स की पहले तारीफ़ की. फिरपूछा 'क्या ये फ़ैशन आपने ख़ुद से किया है या किसी को ...? (फ़िल इन दीब्लैंक्स) क्योंकि आगे बोलने नहीं दिया अक्षय कुमार को. मोदी जी ने सवाल की तारीफ़करते हुए जवाब दिया-"मेरी दूसरी छवि मेरी इन कपड़ों की दुनिया को लेकर बनाई गई है. दर-असल क्या है किछोटे बैग में मेरी जिंदगी थी. इसी में अपना सामान रखा करता था. और कपड़े मैं ख़ुदधोता था, सीएम बना तब तक मैं अपने कपड़े खुद धोया करता था, फिर मैने सोचा कि लंबीबांह वाले कुर्ते की वजह से मुझे ज्यादा कपड़े धोने पड़ते हैं. दूसरा कि पूरी बांहवाला कुर्ता मेरे बैग में ज्यादा जगह लेता है. तो मैंने खुद ही अपने कुर्ते की बांहकाट दी थी, जो बाद में फैशन बन गया" अब मोदी जी के इसी शॉट को इंडियन एक्सप्रेसअख़बार ने कैच कर लिया, वो भी बाउंड्री पर. वैसे ही जैसे RCB और Kings XI Punjabवाले मैच में गेल भाई साब लपक लिए गए थे. लगना था सिक्स, हो गया विकेट. मोदी जी नेकहा कि जब तक मुख्यमंत्री नहीं बना, तब तक अपने कपड़े ख़ुद ही धोता था. बात सुनने मेंभौत हार्ड है . लेकिन अख़बार का कहना है कि मोदी जी ने फ़ैक्ट छुपाया है.झोल कहां है वो समझिए अब-इसको ऐसे समझिए कि मोदी पहली बार मुख्यमंत्री बने 2001 में. तब मुख्यमंत्री केशुभाईपटेल के गिरते स्वास्थ्य की वजह से मोदी मुख्यमंत्री बने. यानि अक्षय को दिएइंटरव्यू के हिसाब से मोदी 2001 तक अपने कपड़े धोते रहे होंगे. लेकिन इंडियनएक्सप्रेसकी रिपोर्ट बताती है कि ऐसा है नहीं भाई साहब .2001 की बात छोड़िए, मुख्यमंत्री बनने के बहुत पहले 1970 के दशक में जब मोदीराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के फ़ुल-टाइम प्रचारक थे, तब भी मोदी के पास अपना एक धोबीथा. नाम था चांद मोहम्मद .तब मोदी गोधरा में रहते थे, और गोधरा के ही चांद मोहम्मद ने बतौर धोबी मोदी के कपड़ेतक़रीबन दस साल तक धोए.1970 के दौरान आरएसएस के प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी और उनके धोबी चांद मोहम्मद(तस्वीर साभार: इंडियन एक्सप्रेस)इंडियन एक्सप्रेस की इसी रिपोर्ट में कहा गया कि साल 2008 में बतौर मुख्यमंत्रीमोदी एक सद्भावना रैली कर रहे थे. ये रैली 'गोधरा काण्ड' के बाद सामाजिक सद्भाव केलिए हो रही थी. उस रैली में गोधरा के चांद मोहम्मद को मोदी ने विशेष आमंत्रण दियाथा. अपने 62वें जन्मदिन पर मोदी ने 72 घंटों का उपवास रखा था. इसी के बाद चांदमोहम्मद गोधरा में ख़ासे लोकप्रिय हुए थे.एक सभा में जब मोदी ने चांद मोहम्मद को 5 लाख रुपये का चेक सौंपा तो उन्होंने इसेलेने से मना कर दिया. बदले में चांद मोहम्मद ज़मीन का एक टुकड़ा चाहते थे, जिसपर वोअपना घर बना सकें. मोदी तुरंत मान गए और मंच से ही अधिकारियों को प्रक्रिया पूरीकरने को कहा.साल 2017 में चांद मोहम्मद ने दिल का दौरा आने के बाद वड़ोदरा के एक अस्पताल मेंआख़िरी सांस ली. अंत में फ़ल बेचकर गुज़ारा कर रहे चांद मोहम्मद उस ज़मीन का न्यूनतममूल्य नहीं चुका पाए जो 2008 में उन्हें देने की बात चली थी. एक टूटे हुए झोपड़े मेंचांद ने अपने आख़िरी दिन गुज़ारे.76 साल के चांद मोहम्मद ने वड़ोदरा में आख़िरी सांस ली. (तस्वीर साभार: इंडियनएक्सप्रेस)ख़ैर अब प्रधानमंत्री मोदी ने क्या सोचकर ख़ुद को ही ख़ुद का धोबी और दर्जी बता दिया,ये मिर्ज़ा ग़ालिब से पूछें तो बेहतर होगा. उन्होंने ही कहा था कि 'हर एक बात पे कहतेहो तुम, कि तू क्या है ? तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है'बहरहाल ग़ालिब और मोदी जी का इंटरव्यू, दोनों जा चुके हैं. आप अगली ख़बर की तरफ़ बढ़िएऔर ये वीडियो देखिए.बुजुर्ग ने समझाया नरेंद्र मोदी का सबसे बुरा और सबसे अच्छा काम