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अकबरुद्दीन ने कोसते हुए जो कहा है, उसमें नरेंद्र मोदी का फायदा छिपा है

ऐसे दुश्मन हों, तो दोस्त की जरूरत किसे है.

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3 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 4 जुलाई 2017, 05:42 AM IST)
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AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी के भाई और विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी को एक बार फिर जनता-मंच-माइक का डेडली कॉम्बिनेशन मिल गया. एक जनसभा में. फिर क्या, लाउड-स्पीकर से खून आना बचा था बस. सोशल मीडिया पर अकबरुद्दीन का वीडियो छाया हुआ है. सुना, तो सोचा ये हमारे तक ही सीमित क्यों रहे. तो लीजिए, गौर फरमाइए अकबरुद्दीन क्या कह रहे हैं और उनकी बातों पर हम क्या कह रहे हैं-

# ऐ विश्व हिंदू परिषद वालो, ऐ बजरंग दल वालो, ऐ नरेंद्र मोदी सुन ले, ये मुल्क तेरे बाप की जागीर नहीं है.

- जी दुरुस्त फरमाया. ये मुल्क किसी के बाप की जागीर नहीं है. ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनके पिताजी दामोदरदास मूलचंद मोदी ने कभी ऐसा कोई दावा किया हो कि भारत उनकी जागीर है. विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के बहुत कर्ता-धर्ता हैं, उन्होंने कभी कुछ कहा हो, तो नहीं पता.

# जितना ये मुल्क तेरा है, उतना ही ये मुल्क मेरा भी है.

- हम और हमारे जैसे तमाम देशवासी यही बात कह रहे हैं. कोशिश कर रहे हैं कि लोगों को ये समझ आ जाए. कभी-कभी हम इसे ऐसे भी कहते हैं कि 'जितना ये मुल्क मेरा है, उतना ही तुम्हारा भी है.' फर्क बस इतना है कि हमारे गले अकबरुद्दीन जितने आक्रामक नहीं हैं.

# अगर एक हिंदू माथे पर तिलक लगाकर घूम सकता है, तो मैं एक मुसलमान होकर अपने सिर पर टोपी पहनकर दाढ़ी भी रख सकता हूं.

- बिल्कुल रख सकते हैं. रख रहे हैं. हैदराबाद में घर से बाहर निकलिए. देखिए. राज्य के बाहर निकलकर देखिए. हम जहां बैठकर ये लिख रहे हैं, वहीं तीन आदमी घनघोर घनी दाढ़ी उगाए बैठे हैं. नाम नहीं लिखेंगे, क्योंकि इसके लिए उन्हें हिंदू या मुसलमान होने की जरूरत नहीं पड़ती. आजाद मुल्क के आजाद नागरिक हैं. पॉटी जाने, नहाने, तिलक और टोपी लगाने के लिए किसी की इजाजत की जरूरत थोड़े न है.

# मेरे प्यारे मुसलमानो, समझो मुल्क कहां जा रहा है... मुल्क किधर जा रहा है... क्या हालात हो रहे हैं...!

- हां साहब, ये जरूर चिंता की बात है. हमारा देश बदल तो रहा है, लेकिन बेहतर होता नहीं दिख रहा. इंसानों का एक-दूसरे के साथ बर्ताव देखकर तो ऐसा ही लगता है. लेकिन ये समझना सिर्फ मुसलमानों की जिम्मेदारी नहीं है. मुल्क के हर नागरिक को इस बात का इलहाम होना चाहिए कि वो क्या कह और कर रहा है. मुसलमानों को ही नहीं, हिंदुओं को भी होना चाहिए. आपको भी होना चाहिए.

# अगर आज भी हम एक नहीं हुए, तो फिर कैसे होगा?

- एक होने के लिए अगर हम किसी दौर के मोहताज हैं, तो सोचने की जरूरत है. सिर्फ आपको नहीं, सबको एक होने की जरूरत है. ये जो हो रहा है, ये घर अलग कर लेने से नहीं थम जाएगा. बल्कि बढ़ेगा. मज़हब के आधार पर एक होंगे, तो सामने वाला भी यही करेगा. करना भी नहीं पड़ेगा, अपने-आप हो जाएगा. हम ऐसा बिल्कुल नहीं होने देना चाहते. उम्मीद है आप भी नहीं चाहते होंगे.

# हम बार-बार बार-बार कहते रहें कि इत्तेहाद इत्तेहाद इत्तेहाद (गठबंधन). क्यों कहते हैं? इसलिए कहते हैं कि मुसलमानों की तबाही और बर्बादी के कानून बाजारों, चौराहों या मैदानों में नहीं बनते, ये संसद या असेम्बली में बनते हैं.

- जी हां, कानून तो संसद में ही बनते हैं. लेकिन उनका मकसद किसी की बर्बादी नहीं होता. संसद में बैठने वाले सारे के सारे तो मौसेरे भाई नहीं होते. ये तो आप पर है कि आप कानूनों को कैसे लेते हैं. अभी GST को ही ले लीजिए. लागू हो गया. महंगा पड़ेगा, तो हिंदू और मुस्लिमों, दोनों के लिए बराबर महंगा पड़ेगा. दूध का पैकेट हिंदुओं को 26 रुपए का मिलेगा, तो मुसलमानों से 28 रुपए नहीं लिए जाएंगे. इससे पहले अप्रैल में बच्चों की फ्री एजुकेशन के अधिकार में कुछ बदलाव किया गया था. उसका फायदा सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, हिंदू बच्चे भी उठाएंगे. उम्मीद है आपको तकलीफ नहीं होगी. अगर आप जानवरों के कटने वाले नियम-कानूनों की बात कर रहे हैं, तो उनका भी असर हिंदू-मुसलमान दोनों पर पड़ेगा और जिन पर पड़ेगा, उन्होंने आवाज भी उठाई, जिनमें हर धर्म के लोग शामिल हैं.

# अरे अगर मुसलमान उठ जाएं, एक हो जाएं और मैं जानता हूं कि किसी के रहम, किसी के करम, किसी की मदद की जरूरत नहीं है.

- भइया, किसी को किसी के रहम-करम की जरूरत नहीं है. मृत्यु-लोक में घिसट रहे आधे से ज्यादा अहमकों को यही खुशफहमी है. अब तक जितने जमीन में दफनाए, आग में जलाए और गंगा में बहाए जा चुके हैं, उनमें भी न जाने कितने ऐसा ही सोचते थे. लेकिन समाज ऐसे तो नहीं चलता ओवैसी साब. एक होना है, तो मुल्क के हर बाशिंदे के साथ एक होइए. प्यार से रहिए. प्रेम करने और रहम करने में जो फर्क है, उसे बना रहने दीजिए.

# हमारा भाई खुद अपने भाइयों के वोट से हिंदुस्तान के 50 लोकसभा की सीटें जीत सकता है.

- धत्त तेरे की... कर दी न आखिर में वही मगलुओं वाली बात. अमां यार अगर हमेशा मुसलमान-मुसलमान करते-करते वोट उठाओगे, तो मुसलमानों के अलावा कंधा लगाने कौन आएगा! आप मुसलमान करोगे, कोई और हिंदू-हिंदू करेगा. और हां, आप अपने इस बयान से उन लोगों की मदद करने वाले दोस्त नजर आते हैं, जिन पर कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करने का आरोप लगता है. समझे जनाब!

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