कांग्रेस छोड़ने वाले अजित जोगी के दिलचस्प कारनामे
इंजीनियर से IAS फिर मुख्यमंत्री. फिर पार्टी के लिए खोदा गड्ढा. उसी गड्ढे में लगा रहे अपनी कुर्सी.
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फोटो - thelallantop
अजित जोगी नई पार्टी बना रहे हैं. कांग्रेस चुपचाप देख रही है. क्योंकि कुछ कर नहीं सकती. बीजेपी भी ध्यान से देख ही रही है. ताकि अगला मूव बनाया जा सके. व्हीलचेयर पर घूम रहा है ये शख्स. पर जमाना उस पर आंखें गड़ाए हुए है.
90 सीटों की असेंबली में अभी जोगी के 12 ही समर्थक हैं. पर सबको पता है कि 2018 के चुनावों में 12 से 30 और 50 तक भी जा सकते हैं. कभी-कभी लगता है कि ये आदमी सारे ज़माने की पॉलिटिक्स लेकर पैदा हुआ था. आओ ज़रा टहल लिया जाए, इनकी पॉलिटिकल लाइफ में.
पहले इंजीनियर से IAS बने1. मैकेनिकल इंजीनियर थे. गोल्ड मेडलिस्ट. 1968 में अजित जोगी आईपीएस बने. फिर 1970 में जाति का कोटा रहते हुए भी जनरल से अप्लाई किया और आईएएस बने.
2. अजित की पहचान एक कड़े एडमिनिस्ट्रेटर की रही. बोलने में बहुत ही तेज. कोई नहीं जानता था कि लपर-लपर बोलने वाला ये आदमी एक दिन मुख्यमंत्री बनेगा.
राजीव गांधी ने बुलाया राजनीति में1. 15 साल काम कर चुके थे अजित जोगी. उसी समय देश की राजनीति में भूचाल आया था. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने बागडोर संभाली थी. वो पुराने धुरंधरों से ज्यादा अपने दोस्तों और पीए पर निर्भर थे. इंदिरा गांधी का 'किचन कैबिनेट' राजीव के 'अड्डा कैबिनेट' में बदल गया था. चाय पर, कॉफ़ी पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल बदले जा रहे थे.
2. ऐसे में मध्य प्रदेश की राजनीति के लिए राजीव को नए चेहरे की तलाश थी. अजित जोगी कलेक्टर के रूप में मशहूर थे. लोग इज्जत करते थे. कहते हैं कि एक रात राजीव के पीए वी जॉर्ज का जोगी के घर फोन आया. कहा गया कि तुम्हारे पास ढाई घंटे हैं सोचने के लिए. नौकरी छोड़ के राजनीति में आ जाओ. दिग्विजय सिंह आएंगे लेने के लिए.
3. अजित ने फैसला लिया. कांग्रेस की ऑल इंडिया कमिटी फॉर वेलफेयर ऑफ़ शेड्यूल्ड कास्ट एंड ट्राइब्स के मेंबर बने. कुछ ही महीनों में राज्यसभा चले गए. गांधी परिवार के लिए उनकी निष्ठा बढ़ती गई. पहले राजीव, फिर नरसिम्हा राव के साथ परिचय बढ़ा. सीताराम केशरी के साथ 'मॉर्निंग वॉक' पर भी जाते थे.
4. इतने वर्षों में अर्जुन सिंह के रूप में एक गॉडफादर भी मिल गया था. पर दिग्विजय से अब नहीं बनती थी. क्योंकि अजित खुद को पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों का नेता मानने लगे थे. 1993 में दिग्विजय के बदले खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए दांव खेल चुके थे. दांव लगा नहीं पर दिग्विजय और बाकी कांग्रेसियों के मन में खटका जरूर पैदा कर गया.
अजित जोगी: छत्तीसगढ़ का पहला मुख्यमंत्री
1. फिर 2000 में मध्य प्रदेश से कटकर छत्तीसगढ़ बना. दिग्विजय इसके खिलाफ थे और अजित जोगी समर्थन में. अब तक सबको समझ आ गया था कि अजित को मुख्यमंत्री बनना है. इसके लिए चाहे राज्य बनाना पड़े चाहे देश. हालाँकि अजित का कहना था कि छत्तीसगढ़ की आधी जनता जो अनुसूचित जाति और जनजाति है को कुछ मिला नहीं है. छत्तीसगढ़ की जमीं, जंगल, पानी सब कीमती हैं. हक़ दिलाने के लिए लड़ रहा हूँ.
2. पर कांग्रेस ने कभी ये प्लान नहीं किया था कि जनजाति और जाति का मुद्दा उठाकर सत्ता रखनी है. उस समय इमरजेंसी काल के फेमस कांग्रेसी विद्या चरण शुक्ल और उनके कुनबे का प्रभुत्व छत्तीसगढ़ में बराबर बना हुआ था. ऊपरी जाति और कुछ मिडिल जातियों के वोट से कांग्रेस खुश थी. जो मान जाए वो जोगी कैसे? सोनिया गांधी को पता नहीं क्या मंतर पढ़ाया और मुख्यमंत्री बन गए अजित. शायद 50% पिछड़ी जाति के वोट का गणित बनाया हो. बहुत से कांग्रेसी नेताओं ने उस वक़्त कहा था कि सोनिया को राजनीति नहीं आती.
3. जोगी उस समय विधानसभा के सदस्य भी नहीं थे. शुक्ल जी एंड कंपनी शपथ समारोह में नहीं आये. शुक्ल जी के बौखलाए समर्थकों ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ धक्का-मुक्की कर दी. पर जोगी को कोई फरक नहीं पड़ा. फरक बाद में पड़ा जब छत्तीसगढ़ की जनता को छोड़कर पूरे वक़्त वो सरकार बनाते-बचाते रहे. शिखर पर पहुंच तो गए पर टिकना नहीं आया.
4. दो साल के अंदर जाना पड़ा. और बीजेपी की सरकार आ गयी. तब से वही सरकार चल रही है.
बुरा वक़्त भी आया1. तब तक उनका लड़का अमित जोगी बड़ा हो चुका था. बताने वाले बताते हैं कि बड़ा ही उद्दंड और मनबढू है. फिर अमित ने अजित जोगी को कई मामलों में फंसा दिया. पुत्र-मोह इज्जत पर भी भारी पड़ा. बेटे का जाली जाति सर्टिफिकेट, तीन जगह पर तीन जन्मदिन और तीन जन्म-स्थान, नेता आर जग्गी के क़त्ल में नाम. इतने से ही नहीं हुआ. एक उपचुनाव में बीजेपी कैंडिडेट को जिताने के लिए जोड़-तोड़ कर रहे थे बाप-बेटा. बाद में बीजेपी ने ही इस कांड की सीडी मीडिया में भेज दी. कांग्रेस से बाहर किये गए. पांच साल बाद वापस भी लौटे. राजनीति ऐसी ही चीज है.
2. उनके लौटने के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति और अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ बदल चुका था. बीजेपी की सरकार ने उद्योग लगाने शुरू किये. (प्रजेंट में छत्तीसगढ़ देश का 15 % स्टील और बिजली देता है) पर वो जमीन जनजातियों की थी. इसके साथ ही नक्सलिज्म पूरी तरह से छत्तीसगढ़ को ले चुका था. सरकार अलग फाइट कर रही थी. कांग्रेस के नेता महेंद्र कर्मा 'सलवा जुड़ूम' बनाकर अलग फाइट कर रहे थे. सलवा जुड़ूम में शामिल हो आदिवासी नक्सलियों से लड़ते. नक्सली भी अपनी टीम में भर्ती करते. आदिवासी दोनों तरफ से मारे जाते. अजित जोगी ने ये मामला बहुत जोर-शोर से उठाया. ये सही मौका था वोट बैंक बनाने का. बाद में महेंद्र कर्मा एक नक्सली हमले में मारे गए. अजित जोगी का नाम इसमें भी आया था.
3. 2004 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक हादसे में इनकी टांगें चली गईं. व्हीलचेयर पर बैठना पड़ गया.
अजित जोगी की प्रजेंट राजनीति: मोदी लहर और कांग्रेस के सफाये के बीच
1. धीरे-धीरे देश की राजनीति बदली. मोदी-लहर आई. कांग्रेस का अपना राहुल प्लान फेल होता गया. और कांग्रेस देश के पांच राज्यों में सिमटकर रह गई. 2014 के उप-चुनाव में सुपुत्र अमित जोगी ने फिर विपक्षी पार्टी से सेटिंग की और कांग्रेस से बाहर किये गए. राहुल गांधी बाप-बेटे को इग्नोर करना शुरू कर दिए. इस बात को आधार बनकर अजित जोगी कांग्रेस से नाराज हो गए. लोकसभा चुनावों में घोटालों के चलते हारी कांग्रेस इस नाराजगी को दूर करने का जोखिम नहीं लेना चाहती.
2. इसके अलावा कांग्रेस के बड़े नेता कांग्रेस छोड़ रहे हैं. असम में हेमंत बिस्व शर्मा ने बीजेपी जॉइन कर कांग्रेस को हरवा ही दिया. महाराष्ट्र में गुरुदास कामत ने पार्टी छोड़ी. सत्यव्रत चतुर्वेदी अलग नहीं हुए, पर पार्टी के काम-काज से खुश नहीं हैं. पंजाब में अमरिंदर सिंह किसी तरह एकता बनाए रखे हैं. बिरेंदर सिंह हरियाणा में, जी के वासन और जयंती नटराजन तमिलनाडु में, विजय बहुगुणा उत्तराखंड में, कलिको पुल अरुणाचल प्रदेश में, सत्यनारायण और श्रीनिवास आंध्र प्रदेश में, बेनी प्रसाद वर्मा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस छोड़ ही चुके हैं. अजीत जोगी क्यों सारा भार उठायें? वैसे भी राहुल गांधी कांग्रेस के प्रेजिडेंट बनने वाले हैं.
3. अभी देश में एक बार फिर इंदिरा गांधी के समय वाला हाल हो गया है. बीजेपी की केंद्र में सरकार तो है. पर 'देसी बॉयज' और 'देसी गर्ल्स' अपने अपने राज्यों में बड़े बड़े नेता बन के उभरे हैं. ममता बनर्जी, जयललिता, बीजू पटनायक, नीतीश कुमार, अरविन्द केजरीवाल, चंद्रबाबू नायडू. कांग्रेस के वापस आने के आसार नहीं लग रहे. ऐसे में अजित जोगी क्या करेंगे? हवन? ना जी ना.
4. छत्तीसगढ़ में एक 'एंटी-इंकम्बेंसी' माहौल बना हुआ है बीजेपी के खिलाफ. कोई भी सरकार चौदह-पंद्रह साल रह जाए तो जनता का मूड बदल जाता है. सरकार को कुछ नया करना पड़ता है. पर हो नहीं रहा है. विपक्षी पार्टी के रूप में कांग्रेस साफ़ ही है. महेंद्र कर्मा , उदय मुदलियार और नन्द कुमार पटेल के सुकमा नक्सली हमले में मारे जाने के बाद अब कोई बड़ा नेता बचा नहीं है. विद्या चरण शुक्ल भी उसी हमले का शिकार होकर बाद में अपनी जान गँवा बैठे. चरण दास महंत हैं पर अजित जोगी के मुकाबले अभी नीचे हैं. फिर अमित जोगी कानून की नज़र में तिकड़मबाज है पर 'यूथ ' में उसकी बहुत पहुंच है. अब यही सही मौका है.
5. भले ही विरोधी कहें कि अजित जोगी की पैठ सिर्फ आदिवासियों और थोड़े बहुत 'सतनामियों' (शेड्यूल्ड कास्ट) में है पर सच तो ये है कि अजित जोगी 90 में से 30 सीटों पर वोट बैंक बनाए हुए हैं. कांग्रेस ने जरूर दिग्विजय सिंह के दिमाग से ओबीसी वोट बैंक तैयार करने की कोशिश की है. पर ओबीसी वोट बैंक की दो इम्पॉर्टेंट जातियां 'कुर्मी' और 'तेली' एक नहीं हो पाई हैं. इस माहौल में अजित जोगी का फायदा ही है.
6. अगर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो अजित जोगी तुरंत इम्पॉर्टेंट बन जाएंगे. ये स्टेटस भी चलेगा.
अगले दो सालों में अजित जोगी छत्तीसगढ़ की राजनीति को कब्जे में लेते दिखाई दे रहे हैं. शंकालु लोगों को डर लग रहा है. नई पार्टी बनाने में रिस्क तो है. पर नीतीश कुमार ने भी तो रिस्क लिया ही था. राहुल की अगुवाई में हारने से बेहतर है कि एक बार फिर दिल की सुनकर दांव खेल लिया जाए. कांग्रेस से तोड़कर अपनी पार्टी बनाना एक रुसे-फूले इंसान की हरकत नहीं है. ये एक सोचा-समझा प्लान है. जो बहुत ही मौके से मैदान में लाया गया है. तभी तो अजित जोगी कहते हैं कि जैसे जोधा ने अकबर को तिलक लगाकर जंग के लिए विदा किया था, वैसे ही मेरी पत्नी रेणु ने मुझे तिलक लगाकर भेजा है.यह स्टोरी टीम 'दी लल्लनटॉप' से जुड़े ऋषभ ने लिखी है.

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