'शिवाय'. अजय देवगन की बहु-प्रतीक्षित फिल्म. क्योंकि निर्देशन भी उन्होंने ही कियाहै. इससे पहले राजू चाचा (2000) और यू मी और हम (2008) के डायरेक्टर भी वे थे.उनमें सराहना नहीं हुई. इस बार अजय ने इतनी तैयारियां की है कि बहुत सारा संहारहोना तय है. फिल्म का ट्रेलर रविवार को रिलीज किया गया. हालांकि शिवजी का दिनसोमवार होता है. विषय-वस्तु कुछ यूं है: 1. हीरो अजय देवगन हैं. उनके पात्र का नामवैसे तो नहीं उच्चारा गया है कहीं, लेकिन अंतिम दृश्य में जलते पासपोर्ट पर पढ़ पातेहैं शिवाय. 2. वह पर्वतारोही है या फिर धुनी रमाकर कैलाश पर्वत में बसता है. 3.उसकी एक बैकस्टोरी भी है. दुख भरी. उसकी एक प्रेमिका/पत्नी है. फिर बाद में एकप्रशंसक (सायेशा - डेब्यूटेंट, सायरा बानो की रिश्तेदार) भी दिखती है. यानी दोहीरोइन. 4. शिवाय की बच्ची (?) को गुंडे अपने कब्जे में ले लेते हैं. उसकी जानबचाने या पुराना हिसाब चुकाने के लिए अजय का पात्र उनका संहार करता है. ट्रेलर मेंसिंगर लोग गाते भी रहते हैं, "जा जा कैलाश, जा कर विनाश. कर सर्वनाश." 5. मूल रूपसे बुल्गारिया में इसकी शूटिंग हुई है. 6. फिल्म दीवापली से दो दिन पहले यानी 28अक्टूबर को रिलीज होगी. अजय को दो बड़ी त्योहारी डेट्स अतिरिक्त मिलेंगी जिससेकारोबार बड़ा हो सकता है. ट्रेलर को दो सबसे प्रमुख तत्व हैं: शिव होने के मायने अजयइन पंक्तियों को पढ़ते हैं.. ना आदि ना अंत है उसका वो सब का ना इनका उनका वही शून्यहै वही इकाय जिसके भीतर बसा शिवाय आंख मूंदकर देख रहा है साथ समय के खेत रहा हैमहादेव महा एकाकी जिसके लिए जगत है झांकी राम भी उसका रावण उसका जीवन उसका मरण भीउसका तांडव है और ध्यान भी वो है अज्ञानी का ज्ञान भी वो है इसको कांटा लगे न कंकररण में रूद्र घरों में शंकर अंत यही सारे विघ्नों का इस भोले का वार भयंकर वहीशून्य है वही इकाय जिसके भीतर बसा शिवाय वे यहां एक भक्त के रूप में शिव की बात कररहे हैं या वृहद तौर पर शिव की फिलॉसफी पर ध्यान दे रहे हैं, ज्ञात नहीं हो पाताहै. दर्शक स्वयं सोचे. या अजय बाद में बताएं. बहुत सारा एक्शन ट्रेलर में एक्शन हीसबसे ज्यादा है. बर्फीली चोटियों पर, गुफाओं में, पहाड़ों पर, हिमपात के बीच औरट्रेकिंग के उपकरणों से. कई सारे विहंगम स्थलों को इसमें शामिल करने की कोशिश की गईहै. उसके अलावा बुल्गारिया के शहरों में भी सड़कों पर, बांधों पर, पुलों पर गाड़ियांदौड़ाते हुए ऐसे स्टंट हैं जो एक्शन डायरेक्टर वीरू देवगन के बेटे अजय की खासियत रहेहैं 1991 में आई उनकी पहली फिल्म फूल और कांटे से ही जिसमें अपने परिचय दृश्य मेंवे दो बाइक्स पर पैर रखकर आते हैं. ट्रेलर कैसा लग रहा है? इसका जवाब बहुत उत्साहभरा नहीं है. फालूदा और खिचड़ी इन दो शब्दों से समझाया जा सकता है. ये फिल्म अगर दोस्पष्ट धाराओं में से कोई एक होती तो ज्यादा बेहतर होता. या तो इसका नायक कैलाशपर्वत पर रहने वाला आध्यात्मिक/धार्मिक आदमी होता जो जीवन की किसी घटना के बाद वहांचला गया है और जीवन के अर्थ खोज रहा है. वो वहां उसी इलाके में किन्हीं जरूरतमंदोंकी रक्षा का काम हाथ में लेता. या फिर किसी अपने की मदद के लिए उस शहर लौटता जोउसने छोड़ दिया है तो ये एक सीधी सपाट बॉलीवुड फिल्म होती और दिमाग के लिए इस कहानीका उपभोग करना आसान होता. इसमें धर्म भी आ जाता और एक्शन भी. या फिर इसमें ये होताहै कि ये एक पर्वतारोहण या ट्रेकिंग या खोजी मिशन को समर्पित कहानी होती. जैसे, एकउदाहरण पिछले साल प्रदर्शित बाल्तज़र कोर्माकुर द्वारा निर्देशित फिल्म एवरेस्ट थीजो मई 1996 में हुई माउंट एवरेस्ट त्रासदी पर आधारित थी जिसमें कई लोग मारे गए थे.इसमें हिमालय पर कमर्शियल एक्टिविटी बढ़ने का मसला भी जुड़ा था. ऐसे ड्रामा न सिर्फहमें जागरूक करते हैं बल्कि मनोरंजन के लिहाज से भी संपूर्ण होते हैं. इनके कारण आपदुनिया को काल्पनिकता के जरिए से नहीं देख रहे होते, बल्कि स्पष्टता के साथ. शिवाय इन दो में से किसी एक राह पर नहीं खड़ी होती. इसी से सरलता नहीं रहती. सब फालूदा सालगता है. क्यों आप फिल्म बनाते हुए सबकुछ दर्शक के हिसाब से तय करें? फिर आप इसेआर्ट न समझें. ये तमाशा हो जाता है. और तमाशे में शिव वाली गंभीरता नहीं आ सकती.https://www.youtube.com/watch?v=poLjq0u4_5A