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अज़ान पर फतवा सुचित्रा या सोनू की जगह किसी मौलाना ने दिया होता तो क्या करते?

सोनू निगम के बाद लोगों ने सुचित्रा कृष्णमूर्ति को ट्रोल करना शुरू कर दिया है.

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24 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 24 जुलाई 2017, 11:16 AM IST)
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ये आर्टिकल दी लल्लनटॉप के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है.


सोनू निगम के बाद अब सुचित्रा कृष्णमूर्ति ने कहा है कि सुबह सुबह लाउडस्पीकर से होने वाली अज़ान से उन्हें परेशानी हो रही है. उन्होंने ट्वीट कर के कहा है कि किसी को भी अज़ान से कोई परेशानी नहीं है, जबकि वो सही समय पर हो. मगर सुबह सुबह पांच बजे सारे लोगों को उठा देना 'सभ्य' समाज की क्रियाकलापों के अन्तर्गत नहीं आता है. सुचित्रा की इस बात से ज़ाहिर है 'भावनाएं' आहत हो गयी हैं. धार्मिक सिपाही जुट गए हैं गालियां देने उसे. ख़ूब अपनी अपनी दलीलें दे रहे हैं लोग. एक ने भी ये समझने की कोशिश नहीं की है अभी तक कि सोनू निगम या सुचित्रा आख़िर कहना क्या चाह रहे हैं. दरअसल मैं बार बार ये लिखता हूं कि अब धर्म ऐसी कोई चीज़ हमारे आसपास बची है नहीं. धर्म का जो भी स्वरूप आप देखते हैं वो शुद्ध राजनीति और प्रतिस्पर्धा है. ऐसा नहीं कि सोनू निगम या सुचित्रा ही परेशान हैं इस शोर से, बल्कि हज़ारों और लाखों मुसलमान परेशान हैं. हज़ारों लाखों हिन्दू परेशान हैं अपने मंदिरों के शोर से. मगर सारी परेशानी झेलते हुए लोग जीते हैं क्यूंकि उन्हें ये लगता है कि शायद यही उनकी नियति है. यही सामाजिक ढांचा है और यही धर्म है. जबकि ऐसा कुछ नहीं है. sonu nigam जहां आस पास मंदिर हो वहां की प्रॉपर्टी के रेट गिर जाते हैं. मस्जिद के आसपास के घरों के अच्छे दाम नहीं मिलते हैं. कोई भी अच्छे और समझदार लोग बचते हैं इस शोर से. लोग दूर अपार्टमेंट में रहना पसंद करते हैं. मगर यही समझदार लोग उन गाली देने वालों के साथ आ खड़े हो जाते हैं जो मंदिर और मस्जिदों के लाउड स्पीकर की रक्षा कर रहे होते हैं. ऐसा क्यूं हो रहा है बार बार? अपने उपद्रवियों की उसका समझदार समाज क्यूं रक्षा करने को आतुर रहता है? लाउडस्पीकर धर्म नहीं है. सब जानते हैं. सभ्य मुसलमान भी जानते हैं. मगर हिन्दू कोई कहे कि अज़ान से परेशानी हो रही है वो बहुत बड़ी बेइज़्ज़ती की बात है. मुसलमान कोई कह दे कि मंदिर की आरती परेशान कर रही है तो वो तो फिर हिन्दू सम्मान की बात बन जाता है. परेशानी सारी ये है. ये हर चीज़ को धर्म बताते गए और हम उसे अपने सम्मान से जोड़ते गए. अब दूसरा कोई उसे कुछ कहेगा तो भले हमको उस से परेशानी हो मगर हम खड़े हो जाएंगे उसके विरोध में. और दिन पर दिन ये लोग धर्म के नाम पर ऐसी ऊल जुलूल चीजों को जोड़ते जा रहे हैं और हम उसे बढ़ने दे रहे हैं. देखिए न "घोड़ा शाह बाबा" की दरगाह बीच सड़क में पड़ेगी और सरकार उसे तोड़ नहीं पाएगी. किसी "बिल्ली देवी" का मंदिर बीच रास्ते मे आएगा मगर सरकार हटा नहीं पाएगी.
अब इसी का एक और पहलू देखिए. सऊदी में वहां की सरकार धर्म से जुड़े जो चाहे वो फैसले ले, कोई आपत्ति नहीं. वहां मुहम्मद साहब से जुड़ी लगभग हर ऐतिहासिक महत्व की चीज़ों को गिरा कर उसकी जगह कुछ और बना दिया गया है. कोई भी मस्जिद वो गिरा देते हैं और वहां से ओबेरब्रिज बना देते हैं. मुहम्मद साहब के एक घर को गिरा कर वहां एक पुस्तकालय बनाया गया है. मुहम्मद साहब के खानदान वालों और साथियों से जुड़ी जितनी भी क़ब्रें (जन्नतुल बक़ी) और मकबरे थे सब गिरा दिए गए और पूरी दुनिया से किसी ने भी कुछ नहीं कहा. सोचिए ये काम अगर इजराइल ने किया होता तो सारे अरब देश मिलकर उस पर हमला कर चुके होते.
गुजरात की सरकार ने गुजरात में अतिक्रमण के नाम पर कितने मंदिर तोड़ दिए. मगर कोई आफ़त नहीं मची क्यूंकि वो स्वयं हिन्दू सम्राट हैं. यही काम अगर मुख्तार अब्बास नक़वी के मुख्यमंत्री रहते हुए करवाए होते तो फिर देखते. मोदी जी "देवालय से पहले शौचालय" का नारा दें तो कोई आपत्ति नहीं. लेकिन समाजवादी पार्टी का कोई नेता देवताओं पर चल रहे एक व्हाट्सऐप जोक सुना दे तो उसकी ऐसी तैसी कर दी जाएगी और अगर इसे किसी मुसलमान ने सुना दिया होता फिर तो दंगे तय थे. ये क्या है आख़िर? ये किस तरह की समस्या है. दूर कैसे होगी इस पर हमें सोचने की ज़रूरत है. लाउडस्पीकर ध्वनि प्रदूषण है. सभ्य समाज के रिहायशी इलाकों में उसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए. वो कहीं भी लगे हों. मंदिर में या मस्जिद में. इसे हटाया जाना चाहिए जल्दी से जल्दी. जानवर बेचारे डरकर भाग जाते हैं आपके इन धार्मिक क्रिया कलापों से. परिंदे डर जाते हैं इतने शोर से भाई. zakir अभी सऊदी का कोई मौलाना फ़तवा दे दे कि लाडस्पीकर हराम है तब कोई दिक़्क़त नहीं होगी उसे हटाने में. कोई किसी तरह से कोई आपको ये समझा ले जाए कि मुहम्मद साहब के समय ये सब नहीं था इसलिए ये इस्लाम नहीं है. मगर वो समझाने वाला दाढ़ी में हो, पैजामा कुर्ता पहने हो तो आप सुनते हो. हर दूसरी बात में सुब्हान अल्लाह मॉशा अल्लाह करते हो. मगर सोनू निगम? सुचित्रा? अरे बाप रे. इनकी हिम्मत कैसे हुई डिस्टर्ब होने की. वो भी इतनी पाक अज़ान की आवाज़ से? ये धर्म नहीं पागलपन है. मानसिक रोग है जिसे आप धर्म समझ कर ढो रहे हैं आजकल. आज नहीं तो कल आने वाली पीढ़ियों के लिए आपको इसे बदलना ही होगा. क्यूंकि धीरे धीरे आपकी अपनी नस्लें बीमार पैदा होनी शुरू होंगी और आप समझ ही नहीं पाएंगे कि सुबह शाम की इतनी आवाज़ें उन्हें बीमार बना रही हैं. समझदारों की सुनिये. सऊदी के फ़तवे का इंतज़ार न कीजिये. आप पहल कीजिए. किसी को परेशानी है तो उसकी सुनिए. उसके घर के पास आप पांच पांच माइक लगा कर दिन में पांच बार चिल्ला रहे हैं तो रहम कीजिये. हटाइए उन माइक को. बीमार लोगों के बारे में सोचिए. धर्म यही है कि आप सोचें उनके बारे में जो परेशान हैं. जो मानसिक बीमारी से जूझ रहे हैं. जिनको चैन की नींद बहुत ज़रूरी है और उनका सुबह पांच बजे उठना ज़रूरी नहीं है आपकी तरह. ख़ुदा के वास्ते अगर हर जगह से नहीं तो कम से कम ऐसी जगहों से तो माइक हटा दीजिए जहां लोग परेशान हो रहे हों.
20196805_10213145238562576_712062070_nताबिश एक लिबरल मुसलमान हैं. अपनी लॉजिकल सोच की वजह से फेसबुक पर फेमस हैं. इसी वजह से आसपास के कट्टर धार्मिक विचारधारा वाले लोगों के निशाने पर रहते हैं. ताबिश का मानना है कि सबसे पहले खुद के घर से शुरुआत करनी चाहिए. इसीलिए अपने ही मज़हब की कुरीतियों पर खुलकर लिखते हैं. फेसबुक पर फॉलोअर्स और विरोधक समान मात्रा में हैं इनके. अक्सर दोनों तरफ के कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं. उनको गालियां देने या उनकी तारीफ करने का मन हो तो उनकी फेसबुक प्रोफाइल पर जाने के लिए यहां क्लिक कीजिए.
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