जल्लीकट्टू पर सुप्रीम कोर्ट ने जो शुरुआती आदेश दिया था उसे सरकारी रास्ते से दबावडालकर लोगों ने बदलवा लिया. और इससे तमिलनाडु के पड़ोसी खासा प्रेरित हो गए हैं. अबकर्नाटक में भैसों की दौड़ 'कंबाला' को दोबारा शुरू करवाने की मांग ज़ोर पकड़ रहीहै. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 'कंबाला' शुरू करने की मांग कर रहे समूह, 'जॉइंटकंबाला कमिटी' के बैनर तले एक हो गए हैं. इनका कहना है कि कंबाला 700 साल पुरानीपरंपरा है और इसके लिए खास नस्ल के भैंसे तैयार किए जाते हैं. वे इसे अपनी संस्कृतिका हिस्सा बताते हैं तो लोग इसके लिए लामबंद हो रहे हैं.क्या है कंबाला?कंबाला कर्नाटक के तटीय ज़िलों की परंपरा है. खासकर उडीपी और दक्षिण कन्नड ज़िलोंकी. आमतौर पर धान की बुवाई के बाद होने वाले इस खेल में धान के खेतों में भैंसों कीदौड़ होती है. एक वक्त वो भी था कि कंबाला के लिए तैयार किए जाने वाले भैसें सिर्फ'बंट' जाति के लोगों के पास होते थे. बकौल अंग्रेज़ी वेबसाइट वायर, खूब खुराक वालेये मोटे-तगड़े भैंसे बंट जाति के दबदबे के प्रतीक होते थे.लाज़मी तौर पर धान के खेतों वाले लोग नहीं चाहते थे कि ये दौड़ उनके खेतों में होजाए. इसलिए 'कोगरा' जाति के लोग खेतों की रखवाली के लिए रखे जाते थे. दौड़ से पहलेइन्हें खेतों में दौड़ाया जाता था ताकि कांच वगैरह का पता चल जाए जिससे भैसों कोचोट न लग जाए! मतलब साफ है कि किसी भी पारंपरिक खेल की तरह कंबाला भी जानवरों की दौड़ भर नहीं है.इससे जाति के जटिल सवाल भी जुड़े रहे हैं. इसलिए कुछ बुद्धिजीवी कंबाला के खिलाफहैं. इसके अलावा इसका अपना अर्थशास्त्र भी है. दौड़ के बहाने से जुआ भी चलता है.लोग जीतने वाले जानवर पर दांव लगाते हैं. मेंगलुरु के पास पुत्तुर का कंबाला बड़ामशहूर है. इसे गैंगस्टर से नेता बने मुतप्पा राय आयोजित करवाते हैं.पिक्चरः Reutersजल्लीकट्टू की ही तरह PETA कंबाला के खिलाफ कोर्ट गया था. इसके बाद 22 नवंबर 2016को कर्नाटक हाई कोर्ट ने कंबाला पर रोक लगा दी थी.अपने आदेश में कोर्ट ने कहा था कि परंपरा कानून से परे नहीं हो सकती. ऐसा कोई भीकाम जो जानवरों को बेजा तकलीफ में डालता हो, नहीं होना चाहिए.बात जहां संस्कृति की आ जाती है तो नेता, लोगों की राय से फर्क रखने की हिम्मत नहींकरते. कर्नाटक में भी सरकार-विपक्ष सब एक सुर में कह रहे हैं कि कंबाला दोबारा शुरूहो. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कह चुके हैं कि कोर्ट के आदेश के बावजूद उनकी सरकारकंबाला शुरू करवाने के पक्ष में है. वे केंद्र से वैसी ही 'मदद' चाहते हैं जैसीउसने तमिलनाडु को जल्लीकट्टू मामले में दी. चूंकि अगले साल कर्नाटक में चुनाव होनेवाले हैं, विपक्ष में बैठे भाजपा के नेता भी कंबाला के समर्थन में ही दिखना चाह रहेहैं. भाजपाई राज्य सरकार पर मामले में दखल देकर कंबाला शुरू करवाने का दबाव बना रहेहैं.पिक्चरः Reutersमतलब मामला अब इस तरह का हो गया है कि एक तरफ PETA और कोर्ट हैं और दूसरी तरफ हरकोई जो अपने-अपने मकसद के लिए कंबाला शुरू करवाना चाहते हैं. कंबाला कमिटी केअध्यक्ष अशोक राय का टाइम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर बयान है कि कोर्ट में मामले कीसुनवाई से पहले ही वे कंबाला आयोजित करवा के रहेंगे.कोर्ट बनाम संस्कृति के इस एक और मामले का अंत क्या होगा, देखना है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ेंःकमल हसन ने बताया अपना सीक्रेट जिसमें वो बैलों के साथ लड़ते थेजयललिता के एरिया में PM मोदी की वजह से दौड़ेंगे बैलजल्लीकट्टू बवाल में सबसे शॉकिंग वीडियो इस पुलिसवाले का है