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जीएसटी घटने के भी मोदी सरकार फ्लैट सस्ते क्यों नहीं करा पाएगी?

जानिए क्या असर पड़ेगा मकानों पर जीएसटी कम होने का.

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25 फ़रवरी 2019 (अपडेटेड: 25 फ़रवरी 2019, 11:00 AM IST)
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मकानों पर जीएसटी कम कर दिया गया है. पर घर सस्ते होने के आसार नहीं. फाइल फोटो.
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सस्ते मकानों के लिए ग्राहकों को अभी और इंतजार करना होगा. अंडर कंस्ट्रक्शन यानी बन रहे मकानों पर और किफायती घरों पर जीएसटी घटने का लाभ ग्राहकों को मिलना फिलहाल मुश्किल है. सरकार ने अंडर कंस्ट्रक्शन घरों पर जीएसटी घटाकर 12 से घटाकर 5 फीसदी और अफोर्डेबल हाउसिंग 8 फीसदी से कम करके 1 परसेंट कर दी है. फिर भी ये फायदा ग्राहकों को जल्दी मिलने के आसार नहीं हैं. वजह है बिल्डरों को मिलने वाला इनपुट टैक्स क्रेडिट. इनपुट टैक्स क्रेडिट जीएसटी चुकाने के बदले बिल्डरों को दिया जाता था. जीएसटी काउंसिल ने बिल्डरों को मिलने वाला ये लाभ भी 24 फरवरी को खत्म कर दिया है. इस वजह से टैक्स कम होने का फायदा ग्राहकों को मिल पाना बेहद मुश्किल है.
सरकार ने बड़े शहरों में 60 वर्गमीटर और 45 लाख रुपए तक के मकान को सस्ते घरों की कैटेगरी में रखने का फैसला किया है. छोटे शहरों में 90 वर्गमीटर और 4 लाख रुपए तक का मकान इस श्रेणी में रखा जाएगा. बड़े शहरों यानी मेट्रो सिटीज में मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु के अलावा दिल्ली-एनसीआर शामिल हैं. दिल्ली-एनसीआर में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम आते हैं. बिल्डरों का कहना है कि टैक्स कम हो गया, ये सुनने में अच्छा लगता है. इसका फायदा ग्राहकों को मिलेगा, अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. मकानों पर जीएसटी का ये पूरा गणित क्या है? आइए समझते हैं आसान भाषा में.
सरकार जीएसटी की दरें लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है. फाइल फोटो.
सरकार जीएसटी की दरें लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है. फाइल फोटो.

सवाल-1. मकानों पर अभी कितना जीएसटी देना पड़ता है?
हमारे यहां मोटे तौर पर दो तरह से मकान बनाए जाते हैं. कुछ लोग निजी तौर पर जमीन खरीदकर घर बनाते हैं. और कुछ मकान या फ्लैट बिल्डर बनाकर बेचते हैं. ये सारा मसला बनाकर बेचे जाने वाले मकानों को लेकर है. अभी जो मकान या फ्लैट बनाकर बेचे जाते हैं, उन पर 12 फीसदी जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स देना पड़ता था. इसी तरह देश भर में इन दिनों बड़े पैमाने पर सस्ते मकान या फ्लैट बनाए जा रहे हैं. ऐसे फ्लैट्स को अफोर्डेबल यानी सस्ते घरों की कैटेगरी में रखा जाता है. अभी इस कैटेगरी के मकानों या फ्लैट पर 8 फीसदी जीएसटी लग रहा था. अब इसे घटाकर 12 से 5 और 8 से 1 परसेंट कर दिया गया है. यानी अंडर कंस्ट्रक्शन और अफोर्डेबल हाउसिंग की कैटेगरी में अब 7 फीसदी टैक्स कम कर दिया गया है. नई टैक्स व्यवस्था पहली अप्रैल, 2019 से लागू होगी.
सवाल-2. टैक्स कम होने से ग्राहकों को क्या फायदा हो सकता है?
मोटे तौर पर देखने से ये ग्राहकों को बड़ा फायदा दिखाई दे रहा है, क्योंकि टैक्स में सीधे-सीधे 7 फीसदी की कटौती कर दी गई है. अब अगर सीधे गणित से चलें तो 45 लाख रुपए के अफोर्डेबल कैटेगरी के घर पर ग्राहक को 2 लाख 10 हजार रुपए का फायदा मिलता. अभी 45 लाख रुपए के घर में अभी एक तिहाई रकम यानी 15 लाख रुपए जमीन की कीमत मानी जाती है. बाकी 30 लाख रुपए पर 8 फीसदी यानी 2 लाख 40 हजार रुपए जीएसटी जोड़ा जाता है. अब जीएसटी घटकर 1 परसेंट कर दिया गया है. इस वजह से 30 लाख रुपए पर 1 फीसदी की दर से अब सिर्फ 30,000 रुपए ही जीएसटी बनेगा. इस तरह ग्राहकों को 45 लाख रुपए के मकान पर अब 2 लाख 40 हजार रुपए की जगह सिर्फ 30,000 रुपए ही टैक्स देना पड़ेगा. और ग्राहकों को 2 लाख 10 हजार रुपए की बचत हो जाती. पर सरकार का जीएसटी कम करने का गणित इतना सिंपल नहीं है.
सवाल-3. ग्राहकों को इस कटौती का फायदा क्यों नहीं मिलता दिख रहा?
अभी अंडर कंस्ट्रक्शन या ऐसे फ्लैट जिनको कंप्लीशन सर्टीफिकेट यानी काम पूरा होने का प्रमाण पत्र नहीं मिला है, उन पर खरीदारों को 12 फीसदी टैक्स चुकाना पड़ता है. ऐसे प्रोजेक्ट पर बिल्डर निर्माण सामग्री पर चुकाए गए टैक्स में छूट का लाभ भी हासिल करते हैं. मतलब ये कि जब भी कोई बिल्डर फ्लैट बनाता है, तो उसके लिए सरिया, सीमेंट और गिट्टी-मौरंग जैसे उत्पाद खरीदता है. जीएसटी के मौजूदा नियम के हिसाब से अभी बिल्डर हर उत्पाद पर टैक्स चुकाते हैं. फिर चुकाए गए टैक्स पर बिल्डर इनपुट टैक्स क्रेडिट के तौर पर छूट पाते हैं. इसे और साफ-साफ कहें, तो बिल्डर अभी जो सरिया-सीमेंट खरीदते हैं. उस पर टैक्स का भुगतान करते हैं. फिर इनपुट टैक्स क्रेडिट के तौर पर टैक्स में छूट हासिल कर लेते हैं. इस तरह बिल्डरों पर टैक्स का बोझ कम हो जाता है. 24 फरवरी की जीएसटी काउंसिल की बैठक में बिल्डरों को मिलने वाले इस इनपुट टैक्स क्रेडिट को भी खत्म कर दिया गया है. इसका मतलब ये हुआ कि ऐसे मकान जो अभी बिल्डर बना ही रहे हैं, उनका निर्माण पूरा नहीं हुआ है, बिल्डरों को मिलने वाली टैक्स छूट अब पूरी तरह से खत्म कर दी गई है. बिल्डर इस टैक्स की भरपाई ग्राहकों से करने की कोशिश करेंगे.
घरों पर जीएसटी कम करने की मांग काफी अरसे से की जा रही थी. सांकेतिक तस्वीर.
घरों पर जीएसटी कम करने की मांग काफी अरसे से की जा रही थी. सांकेतिक तस्वीर.

सवाल-4. क्या होगा इन हालात में?
बिल्डरों का कहना है कि कच्चे माल और सेवा की लागत पर जो टैक्स वे चुका रहे हैं, उसका क्रेडिट या रिटर्न न मिलने से मकानों की लागत में खास कमी नहीं आएगी. एसोचैम की अफोर्डेबल हाउसिंग पर नेशनल काउंसिल के चेयरमैन प्रदीप अग्रवाल ने इकॉनमिक टाइम्स को बताया कि सरसरी नजर में ये प्रस्ताव इंडस्ट्री और बायर्स दोनों के लिए फायदेमंद है. लेकिन कच्चे माल पर इनपुट क्रेडिट नहीं मिलना एक बड़ी चुनौती होगी. अभी इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलने से बिल्डरों का बोझ और घट जाता है. कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी एडजस्ट होता रहता है. पर बिना क्रेडिट के एकमुश्त 5 परसेंट रेट बहुत ज्यादा राहत देता नहीं दिखता. वेल्थ क्लिनिक के सीएमडी अमित रहेजा के मुताबिक इनपुट क्रेडिट छिनने से वास्तव में घरों के दाम स्थिर या कुछ मामलों में बढ़ भी सकते हैं.
इसी तरह गुलशन होम्स के डायरेक्टर दीपक कपूर ने कहा कि
'रेट घटने के बाद इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलने से कंस्ट्रक्शन लागत बढ़ जाएगी. ज्यादातर बिल्डिंग मैटीरियल्स पर रेट बहुत ज्यादा हैं. कच्चे माल पर हमें ज्यादा कर चुकाना पड़ता है. बिल्डर्स के पास इस लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने के अलावा बहुत कम विकल्प होंगे. ऐसे में कीमतें घटेंगी या नहीं ये कहना मुश्किल है.'
सवाल-5- घर सस्ते होने के वित्त मंत्री के दावे में कितना दम है?
जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दावा किया कि जीएसटी रेट कम होने से घर सस्ते होंगे. जेटली ने कहा कि
'उपभोक्ताओं को लग रहा था कि बिल्डर इनपुट टैक्स पर छूट का लाभ उन्हें नहीं दे रहे थे. इसीलिए रियल एस्टेट सेक्टर में टैक्स प्रणाली में बदलाव के लिए मंत्रियों के समूह का गठन किया गया था.'
ज्यादातर जानकार अभी इसे दूर की कौड़ी मान रहे हैं. जानकारों का कहना है कि टैक्स में कटौती के बाद भी ग्राहकों को इसका लाभ फिलहाल नहीं मिल पाएगा. प्रॉप टाइगर के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर अंकुर धवन ने इकॉनमिक टाइम्स को बताया कि इनपुट टैक्स क्रेडिट न मिलना डेवलपर और सरकार दोनों के लिए नकारात्मक है. इनवॉइस चेन टूट जाएगी. ज्यादातर डेवलपर लागत का बोझ ग्राहकों पर ही डालेंगे.


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