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आशीष खेतान तुम भी मजीठिया की तरह बर्तन धो लो!

AAP कोई पहली पार्टी नहीं है, गुरुग्रंथ साहिब पहला ग्रंथ नहीं. अकाली दल का इतिहास भी ऐसा ही है.

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6 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 6 जुलाई 2016, 01:38 PM IST)
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फोटो - thelallantop
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पंजाब में चुनाव होने को हैं, वो सब हो रहा है जो होना चाहिए. और नहीं होना चाहिए. आम आदमी पार्टी के आशीष खेतान ने मुसीबत मोल ले ली. बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया. आम आदमी पार्टी के यूथ मेनिफेस्टो की तुलना गुरुग्रंथ साहिब से कर डाली. कहा ये हमारे लिए गुरुग्रंथ साहिब जैसा ही है. फिर क्या था. लानत-मलानत होने लगी. केस भी हो गया. धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिए एफआईआर हुई. अमृतसर में.
https://twitter.com/ANI_news/status/750561207707467776
अकाली दल ने इसको सिखों और उनकी आस्था का अपमान बताया है. जगह -जगह आम आदमी पार्टी के खिलाफ प्रोटेस्ट वगैरह किया है. डिप्टी सीएम सुखबीर बादल ने तो कहा कि आम आदमी पार्टी वालों ने गुरुग्रंथ साहब की बेअदबी की है. हम इसकी निंदा करते हैं.एसजीपीसी (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी)  ने भी कहा कि आम आदमी पार्टी के मेनिफेस्टो की तुलना गुरुग्रंथ साहिब से करना बहुत गलत है. ये बहुत बड़ी गलती है. सिख कौम इसको कभी माफ़ नहीं कर सकती. अपने पॉलिटिकल फायदों के लिए ऐसे धर्मग्रंथ का नाम नहीं घुसाना चाहिए.

हालांकि बाद में आशीष खेतान ने माफी मांग ली. लेकिन उनने जो किया वो सतही और घटिया था. अपने मेनिफेस्टो, जो कि हमें और उन्हें भी पता ही होता है कि खुद पार्टी वाले कितना सीरियसली लेते हैं, को धर्मग्रंथ जैसा बता देना. इससे सस्ता आप क्या कर सकते हैं? गुरुग्रंथ साहिब ही क्यों कोई भी धर्मग्रंथ हो. किसी भी धर्म का हो. उसे अपनी राजनीति में क्यों घसीटते हैं. क्या ये धर्म की राजनीति नहीं है? वो पंजाब गए. पंजाब में सिख हैं. और वो सिखों के धार्मिक प्रतीकों का सहारा लेने लगे. कितना सस्ता तरीका है ये. राजनीति बदलने के नाम पर आई, आम आदमी पार्टी भी वही नहीं कर रही है, जिसके खिलाफ वो होने का दावा करती थी. रहने दीजिए ये वाला सवाल भी क्लीशे हो गया है.
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अकाली दल वाले प्रोटेस्ट करते हुए

 
इसके अलावा आम आदमी पार्टी एक और झमेले में फंसी है. पार्टी का जो मेनिफेस्टो है. उसमें अरविंद केजरीवाल की श्री हरमंदिर साहिब के साथ फोटो है. अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न झाड़ू भी नजर आ रहा है. लोग इस पर भी भड़के हैं. कह रहे हैं धर्मस्थल पर पवित्र सरोवर के ऊपर वो झाड़ू की फोटो कैसे लगा सकते हैं. हमें तो मेनिफेस्टो का इस्तेमाल ही बेतुका लगता है. क्या साबित करना चाहते हैं आप? पर जानिए कि धर्मग्रंथों को और धर्म को पॉलिटिक्स में घुसाना वहां वालों के लिए नई बात नहीं रही है.

गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी 

अक्टूबर 2015 में पंजाब के फरीदकोट में गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी हुई थी. तब इस धार्मिक ग्रन्थ के डेढ़ सौ पन्ने फाड़ दिए गए. उसके बाद हिंसा भड़की 2 लोग मारे गए. सैकड़ों जख्मी हुए जिसमें आईजी भी शामिल थे. मोगा, फरीदकोट, संगरूर, बठिंडा और मानसा हर जगह बड़े पैमाने पर बवाल हुआ. और विरोध प्रदर्शन हुए. 

कुरान की बेअदबी 

ज्यादा दिन नहीं बीते जब पंजाब के मलेरकोटला में कुरान की बेअदबी का मामला सामने आया था. आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश यादव पर मुकदमा दर्ज हुआ. हुआ ये था कि एक जुलाई को कुछ लोगों ने कुरान के पन्ने फाड़ कर वहां फेंक दिए जहां मुसलमान रहते थे. फिर पूरे इलाके में बवाल हो गया.
कुरान की बेअदबी से भीड़ गुस्सा गई. लोकल अकाली दल के विधायक के घर पर तोड़-फोड़ हुई. तीन लोग पकडे गए. पकडे गयों में से एक ने आरोप लगाया कि उसको आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश यादव ने इस काम के लिए एक करोड़ रुपए देने का प्रॉमिस किया था. नरेश यादव दिल्ली के महरौली से आम आदमी पार्टी के विधायक हैं.
वो नपे. पुलिस का फंदा कसाया. पटियाला और संगरूर की पुलिस ने इस मामले में उनसे पूछताछ की. कायदे से बैठाकर 5 घंटे सवाल पूछे गए.

बिक्रम सिंह मजीठिया ने गुरबानी की तुक को पॉलिटिकल बना दिया 

सुखबीर सिंह बादल के साले बिक्रम सिंह मजीठिया ने तो गुरबानी की तुक ही बदल दी. 2014 के चुनाव चल रहे थे. अरुण जेटली अमृतसर से चुनाव लड़ रहे चुनाव लड़ रहे थे. 24 अप्रैल को उनके फेवर में बोलते हुए बिक्रम ने एक सभा में कहा.
देह शिवा बर मोहे ईहे, शुभ कर्मन ते कभुं न टरूं न डरौं अरि सौं जब जाय लड़ौं, निश्चय कर अरुण जेटली जीत करौं.
जबकि तुक ये थी
देह शिवा बर मोहे ईहे, शुभ कर्मन ते कभुं न टरूं न डरौं अरि सौं जब जाय लड़ौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं.
लोग इससे ऑफेंड हुए. मीडिया का प्रेशर बना और एसजीपीसी ने उन्हें तन्खैया करार दिया. 5 गुरुद्वारों में जाकर बर्तन मांजने पड़े. पर जैसा इसका निबाह हुआ वो बड़ा हल्का सा था. बस गए. सांकेतिक दो-चार बर्तन धोए और उठ लिए. मानो मुंह जुठाकर चल देने आए रहे हों. पंजाब के जिन चैनल्स के लिए कहा जाता है कि वो मजीठिया के फेवर में हैं. वो उनके पीछे-पीछे दौड़े गए. और उन्हें यूं दिखाया गया मानो कितना बड़ा प्रायश्चित कर रहे हों.
तब एसजीपीसी के जत्थेदार ने कहा मजीठिया खुद आकर माफी मांग गए हैं. अब इस मुद्दे का पॉलिटिकल यूज नहीं होना चाहिए. ये उनने तब कहा था जब मजीठिया ने एक पॉलिटिकल रैली में पॉलिटिकल फायदे के लिए गुरबानी का इस्तेमाल किया था. कम कहे को ज्यादा समझिएगा.
SAD

हरमंदिर साहब के सामने केजरीवाल और उनके चुनाव चिह्न पर बवाल मच ही रहा है तो ये जानिए कि अकाली दल का चुनाव चिह्न तकड़ी है. तकड़ी माने तराजू. इस चिह्न को उनने नानक की तकड़ी से उठाया है. माने नानक के तराजू से. धार्मिक चिह्न नहीं है ये? इसका पॉलिटिकल इस्तेमाल शायद उन्हें जायज लगता हो.

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