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800 लोगों ने एक आदमी को जिंदा जलाकर खा लिया, लेकिन 300 करोड़ का खजाना नहीं मिला

सेना भी वो खजाना नहीं बचा पाई थी, देश की सबसे बड़ी अदालत को भी उसकी तलाश है.

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11 मई 2016 (अपडेटेड: 11 मई 2016, 01:48 PM IST)
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अपने परिवार के साथ मृदुल और रीता (Source- Facebook)
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असम में चाय बागान का एक मालिक था. वो अपने बागानों में नई-नई तकनीक लाया. चाय बागान के मालिकों का मुखिया बना, उसकी तीन पीढ़ियां इसी काम में लगी थीं. लेकिन एक दिन उसके घर पर हमला हो गया. उसका घर जला दिया गया. साथ में उसे भी जला दिया गया. कहते हैं हमलावर उसे मारकर खा गए थे. आपको लगता है कहानी खत्म? कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. उस आदमी के पीछे एक खजाना छूट गया था. सेना भी उसे नहीं बचा पाई. खजाना गायब हो गया. देश की सबसे बड़ी अदालत भी आज उस खजाने को तलाश रही है.

सात साल पहले की बात है. 2010 का मार्च लगा था. जगह थी असम के गुवाहाटी से 20 किलोमीटर दूर. कामरूप में रानी टी स्टेट. 376 हेक्टेयर में फैली इस जगह में एक गोली चली. जाकर लगी एक 15 साल के बच्चे को. प्रदीप मुरारी नाम था उसका. कक्षा आठ में पढ़ता था. आरोप लगे कि उसे गोली मारी थी मृदुल कुमार भट्टाचार्य ने. ये आदमी एमकेबी टी स्टेट का मालिक था. गोली लगने के बाद बच्चे की मौत तो हुई ही उसके साथ चार और लोग भी घायल हो गए थे. बाद में मृदुल कुमार भट्टाचार्य को पकड़ लिया गया. दो साल की जेल हुई. मृदुल पर औरतों से दुर्व्यवहार करने के आरोप लगे थे. कहते हैं, उसने अपने चाय बागान में काम करने वाली औरतों को पीटा था. उनके कपड़े फाड़ दिए थे. इसी के खिलाफ लोग प्रोटेस्ट कर रहे थे. ये तमाम लोग उसी के मजदूर थे जिन पर मृदुल ने फायर खोल दिया था. लोग खिसिआए.  दो फैक्ट्रियां जला दीं, घर जला दिया, वाहन जला दिए. मृदुल के साथ उस हमले में कुछ बुरा नहीं हुआ था .
लोकल लोग इल्जाम लगाते थे, कि भट्टाचार्य ने पंद्रह सालों से उनका जीना हराम कर रखा था. कभी वो उन्हें पीटते थे. पिस्तौल दिखाकर धमकाते थे. जमीन हथिया लेते थे. और तो और उनके पानी के सोर्सेज भी प्रदूषित कर डालते थे. कौन थे मृदुल कुमार भट्टाचार्य 
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रीता और मृदुल भट्टाचार्य Source- assamteacompany

लेकिन कुछ लोग मृदुल को ऐसे याद नहीं रखते. मृदुल कुमार भट्टाचार्य एमकेबी (एशिया) प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर थे. असम टी गार्डन एसोसिएशन के प्रेसीडेंट थे. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक़ भट्टाचार्य मैकेनिकल इंजीनियर थे. रीता और वो, दोनों मिलकर बायोडायनेमिक फार्मिंग और रीन्यूएबल एनर्जी के लिए काम कर रहे थे. सिर्फ चाय ही नहीं मल्टी- क्रॉपिंग के फील्ड में भी काम कर रहे थे. संतरे, चावल, काली मिर्च, अदरक वगैरह भी उगाते थे. उनने खुद का माइक्रो हाइडल पॉवर प्लांट लगा रखा था, क्योंकि बिजली पर्याप्त नहीं आया करती थी.
उनका परिवार 1880 से चाय उपजाने में लगा है. उनके परदादा ने अंग्रेजों के टाइम ये काम शुरू किया था.  रानी टी स्टेट में तो मृदुल मछली भी पाला करते थे. जहां वो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से सजावटी मछलियां लाते थे. उन्हें हमेशा ऐसा आदमी माना जाता था जिसने कभी उग्रवादी संगठन उल्फा के सामने घुटने नहीं टेके. हालांकि बाद में ये बात गलत निकली. 800 लोगों ने मिलकर उनका घर जला दिया   दो साल बाद 26 दिसंबर 2012 की बात है. उस वक़्त मृदुल असम के तिनसुकिया ज़िले में अपने दूसरे कुनपाथर चाय बागान में थे. उनके बंगले के बाहर उनके ही मजदूर प्रोटेस्ट कर रहे थे. टेलीग्राफ यूके के हवाले से तो ये भी कहा गया कि मृदुल ने एक चर्च की जमीन दबा ली थी जिससे लोग भड़क गए थे. पर पुलिस के मुताबिक़ मज़दूर इस बात से नाराज थे कि कुछ दिन मृदुल ने बागान में रहने वाले कुछ कर्मचारियों को घर खाली करने के नोटिस भेज दिए थे. इसी मामले में विवाद हुआ तो दो मजदूरों को उनने पुलिस से पकड़वा दिया.
Source- Facebook
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उनके घर के बाहर लगभग 800 मजदूर जमा थे. उनके पास लाठी डंडे थे. उनने भट्टाचार्य के घर पर धावा बोल दिया. उनके घर को आग लगा दी, इस आग में मृदुल और उनकी बीवी रीता जिंदा जल गए. बात ये भी आई कि मरने के बाद उनके शरीर के छोटे-छोटे 70 टुकड़े किए गए. और लोगों ने उनकी जली हुई लाश के टुकड़े खा लिए. तब इंस्पेक्टर जनरल एसएन सिंह ने तब मीडिया वालों को दो प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से ये बताया था. घर के अलावा उनकी दो कारों में आग लगा दी, लूटपाट भी हुई.
इस घटना का मुख्य आरोपी मानेश्वर मुरा था. ये पहले मृदुल के यहां ही काम करता था. लेकिन मृदुल ने 3 साल पहले उसे नौकरी से निकाल दिया था. तब  मानेश्वर ने पड़ोस के चाय बागान में काम करना शुरु कर दिया. उसी ने लोगों को उकसाया था. अब है खोए खजाने की तलाश  असम में बोडो उग्रवादी अक्सर व्यापारियों को पैसे के लिए परेशान करते थे. इन उग्रवादियों ने मृदुल भट्टाचार्य से भी रुपये उगाहने चाहे थे. यूं तो भट्टाचार्य ऐसे आदमी नहीं माने जाते थे जो किसी के आगे झुकें, लेकिन जान की सलामती के लिए उनने पैसे देने तय भी किए. 300 करोड़ रुपये निकाले. साथ में 3 क्विंटल सोना भी था और 2 AK-47 भी.
ये सब उग्रवादियों को दिया जाना था. इसे छुपाकर रखने के लिए इसे असम के ही एक चाय के बागान में गाड़ कर छिपा दिया गया था. ताकि मौका आने पर निकालकर बोड़ो उग्रवादियों को दिया जा सके. ये बात सिर्फ मृदुल भट्टाचार्य और उनकी पत्नी बीवी को पता थी, इससे पहले की वो पैसे दे पाते. उनको मार दिया गया.
लगभग ढाई साल पहले की बात है. उनकी मौत की जांच चल रही थी, जांच करने वालों में एक थे, मनोज कौशल. खुफिया विभाग के अधिकारी. वो कहते हैं भट्टाचार्य हत्याकांड की जांच के दौरान उन्हें बात का इस खजाने का पता चला. साथ में वो जगह भी मिल गई, जहां पर बोडो उग्रवादियों के लिए खजाना छुपाया गया था. खुफिया विभाग का अधिकारी होने के नाते उन्होंने ये बात सेना के अधिकारियों को बताई.
सेना वालों ने तय किया कि वो 1 जून 2014 को उस जगह खुदाई करेंगे. खुदाई करके खजाना निकाल लेंगे. मगर कुछ अधिकारियों की मिलीभगत के चलते यह सूचना लीक हो गई. कुछ अज्ञात लोग आए. 30 मई की रात को ही उस जगह पर खुदाई करके उनने सारा खजाना चुरा लिया.
मनोज कौशल को पता चला तो इस मामले में शामिल अधिकारियों की जांच की. उन पर एक्शन लेने के लिए कई बड़े अफसरों से शिकायत की. लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया. खुफिया विभाग का ये अफसर हारकर कोर्ट पहुंच गया.
मनोज कौशल ने मांग की कि केंद्र सरकार को कहें कि इस पूरे मामले की हाई लेवल पर जांच हो. जिनने जानकारी लीक कर दी उनके अगेंस्ट एक्शन लिया जाए. गायब सोने का पता लगाकर उसे भारत सरकार के खजाने में जमा कराया जाए.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार, असम सरकार और असम के डीजीपी को नोटिस जारी कर दिया है. 6 हफ्ते में जवाब भी मांगा है. मुख्य न्यायधीश टीएस ठाकुर ने कहा ये बहुत सीरियस मामला है. अब 6 हफ्ते बाद इस मामले में सुनवाई होगी तो पता लगेगा आगे क्या हुआ. खजाना मिला कि नहीं और सरकारों ने क्या जवाब दिया है.

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