उत्तर प्रदेश की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले इस बात पर ध्यान दे रहे होंगे कि2017 चुनावों से पहले बहन कुमारी मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस की गिनती सामान्य कीतुलना में काफी बढ़ गई है. ये सियासी हांडी का वो चावल है जिसे देख कर यूपी कीचुनावी खिचड़ी में हाथी की पोजीशन के बारे में काफी कुछ कहा जा सकता है. चुनावों केनतीजे चाहे जो हों, मगर ये चुनाव बहनजी के करियर के सबसे मुश्किल चुनावों में से एकसाबित होने वाला है.--------------------------------------------------------------------------------कॉन्फिडेंस की कमी2014 के लोकसभा चुनावों में बसपा का खाता भी नहीं खुला. किसी भी पार्टी के लिए येबड़ा झटका हो सकता है. मायावती के मामले में इसके डैमेजिंग इफेक्ट्स कहीं ज़्यादाहो सकते हैं क्योंकि मायावती अपनी पार्टी का इकलौता सेलिंग पॉइंट हैं. इस बारप्रदेश से सबसे चर्चित चेहरा अखिलेश यादव हैं. 2014 में इसी तरह से जब सारा फोकसनरेंद्र मोदी पर था तो सबसे बड़ा नुकसान मायावती को हुआ. बसपा सुप्रीमो की इस वक्तये सबसे बड़ी चिंता होगी कि कहीं इतिहास अपने आप को दोहरा न दे.कभी गुंडा विहीन पार्टी नहीं थी बसपाबशीर बद्र का शेर है , यहां लिबास की कीमत है आदमी की नहीं, मुझे गिलास बड़ा देशराब कम कर दे. मतलब आप जो परसेप्शन जनता में बना लें, वही चल जाता है. मायावती केराज में गुंडागर्दी का खत्म होना यही भ्रम है. सपा की गुंडागर्दी की बात तो सबकोपता है. मगर बहनजी भी इससे अलग नहीं हैं. पॉइंट दर पॉइंट समझते हैं. # मायावती केमुख्तार अंसारी को टिकट देने की बुराई हो रही है, मगर अमरमणि त्रिपाठी जैसे बाहुबलीभी हाथी की सवारी कर चुके हैं. # कुख्यात डाकू ददुआ का बसपा प्रेम राजनीति में कोईअनजानी चीज़ नहीं है. सियासत के जानकार बताते हैं कि बुंदेलखंड के कई इलाकों मेंददुआ के इशारों पर ही बसपा के टिकट बंटते थे. 2006 में इलाहाबाद से ददुआ के भाई कोबसपा ने ही टिकट दिया था. कहा तो ये भी जाता है कि ददुआ एक समय पर मायावती के फेवरमें फतवे जारी किया करता था. # हरिजन ऐक्ट का भी कितना दुरुपयोग हुआ है, इसे यूपीवाले भूले नहीं होंगे. # मायावती के समय में सरकारी तंत्र का कैसा इस्तेमाल हुआ औरइसके NRHM घोटाले और लगातार होती हत्याओं जैसे परिणाम भी सबको पता हैं. जनतामायावती के कानून व्यवस्था वाले दावों से इस बार उतनी भी सहमत नहीं है.बहनजी के पास विकास नहीं हैमायावती की सबसे बड़ी ताकत मुलायम सिंह का कानून व्यवस्था को न संभाल पाना था. इसबहाने उनके काम के नाम पर मूर्तियां बनवाने वाले दोष छिप जाते थे. 2014 से राजनीतिमें विकास की बातें होने लगीं (हुआ या नहीं वो अलग बहस है). अखिलेश यादव ने भी कामबोलता है जैसे कैंपेन के साथ राजनीति को विकास की तरफ ही मोड़ दिया है. इसलिए इसबारमायावती के लिए लोगों को विश्वास दिलाना मुश्किल है कि बहुजन सरकार भी मूर्ति नहींमेट्रो की बात करेगी.अचानक से खेल बदल गयासितंबर तक मायावती की चुनावी सियासत पूरी रफ्तार से चल रही थीं. अचानक से दो बातोंने बहन जी के सियासी गणित को बदल दिया. पहला था अखिलेश-शिवपाल-मुलायम विवाद. शुरूमें कईयों को लगता रहा कि झगड़े से अखिलेश यादव की छवि को नुकसान होगा मगर ऐसा होतादिख नहीं रहा. दूसरा झटका नोटबंदी का है. बसपा सुप्रीमो की राजनीति और बहुजन वोटरकी डिजिटल इकॉनमी से दूरी दोनों का असर इस चुनाव पर दिख सकता है.सोशल मीडिया में इंजीनियरिंग नहींबसपा अपनी सोशल इंजीनियरिंग के लिए जानी जाती है. जाति-उपजाति, बहुजन-सर्वजन जैसेतमाम तरीकों से मायावती सत्ता में आती रही हैं. मगर मीडिया और सोशल मीडिया से दूरीबनाए रखने वाली मायावती के लिए सबसे बड़ी मुश्किल 2014 के बाद शुरू हुई नई तरह कीराजनीति है. सायबर सेल, सोशल मीडिया अकाउंट्स के साथ निगेटिव-पॉज़िटिव हर तरह काप्रचार हो रहा है. मतदान के समय इस प्रचार के फायदे भी दिख रहे हैं. फिलहाल बसपा इसमोर्चे पर पिछड़ती दिखती है. ये सभी कयास हैं, कुछ पुरानी और कुछ नई राजनीतिकपरिस्थितियों के हिसाब से. चुनाव के समय में आखिरी मौके पर क्या समीकरण बन जाए कहानहीं जा सकता है. 2017 चुनावों की सबसे चौकस और चौचक खबरों के लिए हमारे साथ बनेरहिएगा. https://www.youtube.com/watch?v=VWIxUBCT9so-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ें :केजरीवाल से अगर मायावती ये सीख लें तो कमाल हो जाएगायूपी में बीजेपी-कांग्रेस की इन पांच बेटियों का जीतना तय है!उत्तर प्रदेश की जनता इतनी बेवकूफ क्यों है?