बार-बार रेप होने के बाद भागी नक्सल लीडर की कहानी
"जब मैंने विरोध किया, उसने मेरा गला दबाने की धमकी दी. जान के डर से मैंने हार मान ली."
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फोटो - thelallantop
इस खबर को आज सोशल मीडिया पर वायरल होते देखा. तो लगा आपको पढ़ानी चाहिए. खबर अंग्रेजी में थी. तो हमने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को क्रेडिट देते हुए अपने हिंदी पाठकों के लिए खबर की. फिर हमारे एक पाठक ने हमें बताया कि ये खबर 5 साल पुरानी है. अपने पाठक को हम शुक्रिया कहते हुए इस बात कि माफ़ी मांगते हैं कि हमने तारीख क्रॉस-चेक नहीं की. हालांकि वेब पर खबरें डिलीट करने कि सुविधा होती है. पर हम इसे हटाएंगे नहीं. दो कारणों से. पहला, हमें हमारी गलती याद रहे और हम इससे सीख लेते रहें. दूसरा, हमारे पाठक इसे पढ़ें और समझें. क्योंकि बात औरतों के खिलाफ हिंसा और अन्याय की है.उमा 25-30 माओवादियों की कमांडर हुआ करती थी. लेकिन 4 महीने पहले ही ड्यूटी से भाग आई. वहां से ये कह कर निकली कि डॉक्टर को दिखाने जा रही है. कई दिनों तक अपनी मौसी के साथ छिपी रही. और अब ये चाहती है कि दुनिया उसकी कहानी जाने. वो सरेंडर करना चाहती है. नक्सलवाद से सन्यास लेना चाहती है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने उमा से मुलाकात की. उससे पूछा कि क्या वजह है कि वो सरेंडर करना चाहती है. जिसके जवाब में उमा ने सुनाई अपनी कहानी.
"वो रेप करते हैं. नक्सल ग्रुप को जॉइन करने के लगभग एक साल बाद मेरी झारखंड के जंगलों में एक कैंप में रात भर की ड्यूटी लगाई गई. अचानक अंधेरे से बिकाश निकलकर आया. बिकाश झारखंड मिलिट्ररी कमीशन का हेड है. उसने मुझसे पानी लाने के लिए कहा. जैसे ही मैं पानी लाने के लिए मुड़ी, उसने मेरे साथ भद्दी हरकत करने की कोशिश की. जब मैंने विरोध किया, उसने मेरा गला दबाने की धमकी दी. जान के डर से मैंने हार मान ली. उसने मेरा रेप कर दिया. तब मैं 17 साल की थी. उसने मुझे धमकी दी. कि इसके बारे में किसी को बताया तो ठीक नहीं होगा. फिर मैंने इसके बारे में आकाश को बताया. जो कमिटी के मेंबर हैं और किशनजी के करीबी दोस्त हैं. उन्होंने कहा वो मामले को देखंगे. पर उन्होंने भी कुछ नहीं कहा. बल्कि आकाश की पत्नी अनु खुद किशनजी के साथ रहती है.जिन औरतों की भर्ती होती है, उनमें से अधिकतर को सीनियर माओवादी लीडर एक्सप्लॉइट करते हैं. सीनियर महिला लीडरों के भी एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर होते हैं. अगर कोई मेंबर प्रेगनेंट हो जाती है, तो बच्चा गिराने के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं होता. कहते हैं बच्चे ग्रुप के ऊपर बोझ होते हैं जो गुरिल्लाओं के मिशन को खराब करते हैं.मैंने दूसरी महिला नक्सलों से भी हिंसा की कहानियां सुनी हैं. सीमा ने मुझे बताया था कि आकाश ने उसका रेप किया था. राहुल ने हमारे ही एक ग्रुप के कमांडर मदन महतो की पत्नी जाबा के रेप किया था. राहुल माओवादी कैंपों में हथियार चलाना सिखाता है. उसको सजा भी मिली थी. बस इतनी कि तीन महीने के लिए ट्रेनिंग कैंप से निकाल दिया गया था उसे. एक बड़े लीडर और थे सुदीप चोंग्दर. लोग गौतम के नाम से जानते हैं उसे. उसे भी रेप की सजा मिली थी. उसका ट्रांसफर कर दिया गया था. माओवादी अपना समय बांट लेते हैं. आधे समय जंगलों के ट्रेनिंग कैंप में बिताते हैं. और आधा गांवों में छिपते हुए. गांवों में बंदूक की नोक पर घरों में घुसते हैं. जब सुदीप गांवों में जाता था, घरों में घुसकर औरतों का रेप करता था. वो विरोध करने में घबराती थीं.मेरे कई सीनियर लीडरों ने मेरा फायदा उठाया. एक दिन कमल मैती ने मुझे बचाया. बंगाल-झारखंड-उड़ीसा कमिटी के मेंबर हैं. फिर एक मीटिंग में कमल ने मुझे रिश्ता बनाने की बात की. मीटिंग में किशनजी और सभी बड़े नेता मौजूद थे. सारे लीडर मान गए. जाबा के साथ हुए हादसे के बाद मैं जान गई थी कि अगर रेप होते रहने से बचना है, तो किसी बड़े लीडर से रिश्ता बनाना होगा. वो दिन मेरे लिए बड़ा अहम निकला. मेरी रैंक बढ़ने लगी."उमा पुलिस की 'मोस्ट वॉन्टेड' लिस्ट में है. उसके पूरे हमलों की एक सिरीज को प्लान करने और उसे अंजाम देने का आरोप है. जिसमें 2010 में हुए 24 EFR जवानों की हत्या, संकरैल पुलिस स्टेशन में घुसकर पुलिसवालों की हत्या करना, और झारखंड से सांसद सुनील महतो के मर्डर का आरोप है. PCPA (पीपल्स कमिटी अगेंस्ट पुलिस एट्रॉसिटीज) के मेम्बरों को ट्रेनिंग देती थी. 2009 में लालगढ़ में पुलिस से चली 8 महीनों की लड़ाई में उसके ऊपर पुलिस पर फायर करने का आरोप है. झारग्राम में सब उसे दीदी बुलाते हैं.
"जब मैंने माओवादी संगठन जॉइन किया था, CPI-M नहीं बनी थी. मैंने PW (पीपल्स वॉर) जॉइन किया था. जो बाद में MCC (माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर) के साथ मिलकर CPI-M बना. मेरा नाम तब उमा नहीं था. मोटी सी थी मैं. आकाश की पत्नी कहती थी मैं उमा भारती जैसी लगती हूं. इसलिए मेरा नाम उमा रखा गया. मैं पश्चिम मिदनापुर में आदिवासी औरतों को मोबिलाइज करती थी. मैंने हथियारों की ट्रेनिंग ली.हथियार चलाने के अलावा कभी कभी औरतें नेलपॉलिश लगाना चाहती थीं. या झुमके पहनना चाहती थीं. लेकिन ये सब तो छोड़ो, हमें खुशबू वाला साबुन लगाने की भी मनाही थी. केवल लाइफबॉय इस्तेमाल करते थे.परिस्थितियों ने माओवादी संगठनों को जॉइन करने पर मजबूर किया. तीन भाई-बहन और थे. हम या तो दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे. या महुआ और लाल चीटियां बीनते थे. पढ़ाई में ठीक थी मैं. पर मैथ्स में कमजोर थी. दसवीं की बोर्ड परीक्षा में फेल हो गई थी. 2002 में एक्सट्रीमिस्ट मेरे छोटे भाई को ले गए, लालगढ़ फ़ौज में गया था वो. अब जेल में है. पिता दारूबाज थे. टीबी था उनको. इलाज कराने के पैसे नहीं थे. पार्टी वालों ने कहा कि अगर में उनके साथ शामिल हो जाऊं तो वो मदद करेंगे. कहा कि काम अच्छा न लगे तो छोड़ देना. काम के लोभ में गई थी मैं. पर बाद में पता चला अब वापस जाना मुमकिन नहीं."उमा कहती है कि अगर मौका मिले तो बहुत से माओवादी भाग जाएंगे.
"सात साल बाद अब मुझे मौत से डर नहीं लगता."

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