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इस देश में नए 'गाय' और सैनिक' कौन हैं, जान लीजिए

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शास्त्री जी ने नारा दिया था, ‘जय जवान, जय किसान.’ अटल जी ने इसमें जोड़ा जय विज्ञान. लेकिन शास्त्री और अटल को अब कुछ वक्त हो गया है. विज्ञान और तर्क तेल लेने जा चुके हैं. लेटेस्ट नारा है, जय जवान, जय किसान की गाय और जय एनएचएआई. ये नारा उत्तराखंड से आया है. सरकार को वहां काम कर रहे एनएचएआई के अफसरों के मोराल की इतनी चिंता है कि वो उन पर लगे 240 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच नहीं होने देना चाहती. इसलिए उधम सिंह नगर में हुए एन एच 74 घोटाले की जांच कर रहे अफसर का ही तबादला कर दिया गया है.

उत्तराखंड सरकार ने 1 जून 2017 को कुमाऊं के कमिश्नर डी सेंथिल पांडियन का तबादला कर दिया. 2002 बैच के आईएएस अफसर सेंथिल एनएचएआई घोटाले की जांच कर रही स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम के मुखिया थे.

 

उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत (मध्य) ने सरकार बनते ही घोटाले की जांच का आदेश दे दिया था
उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत (मध्य) ने सरकार बनते ही घोटाले की जांच का आदेश दे दिया था

 

क्या है एनएच 74 घोटाला?

एन एच 74 बरेली से हरिद्वार जाता है. बीच में पड़ता है उधम सिंह नगर. पहले हाइवे टू लेन था. अब इसके कुछ हिस्सों को फोर लेन बनाया जा रहा है. तो हाइवे के आस-पास ढेर सारी ज़मीन सरकार ने अधिग्रहित कर ली है. सरकार जब आपसे ज़मीन ले ले और उसके बदले चार पैसे दे दे तो उसे सरकारी भाषा में अधिग्रहण कहते हैं. इस मामले में इसी कवायद में भ्रष्टाचार हुआ है. कैसे, ये समझने के लिए आपको ‘लैंड यूज़’ क्या होता है, ये समझना होगा.

सरकार अधिग्रहण करते वक्त अलग-अलग तरह की ज़मीन का अलग-अलग भाव लगाती है. बंजर ज़मीन होगी तो कम पैसे, खेती वाली ज़मीन हो तो ज़्यादा पैसे, खेती वाली ज़मीन में सिंचाई का जुगाड़ हो तो और ज़्यादा पैसे, ज़मीन व्यावसायिक उपयोग (कमर्शियल) हो तो बहुत सारे पैसे मिलते हैं. ये आम भाषा में ‘लैंड यूज़’ कहलाता है. आप अपने मन से लैंड यूज़ बदल नहीं सकते. इसकी जानकारी सरकार के पास राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज रहती है.

A labourer works at the construction site of the Delhi-Jaipur national highway in Manesar in Haryana, India, July 9, 2015. REUTERS/Adnan Abidi
प्रतीक फोटो (Reuters)

तो एन एच 74 घोटाले में हुआ ये कि उधम सिंह नगर के जशपुर, काशीपुर, बजपुर और सितारगंज के राजस्व अफसरों ने (माने तहसीलदार, एसडीएस वगैरह) ने हाइवे बनने से ऐन पहले हाइवे से सटी खेती वाली ज़मीन का लैंड यूज़ बदल दिया. इस से चुनिंदा लोगों को 8 से दस गुना तक ज़्यादा मुआवज़ा मिला. डी सेंथिल पांडियन के मुताबिक इस सब में एनएचएआई के अफसरों ने भी साथ दिया. 2011 से 2016 के बीच इस से सरकार को करीब 240 करोड़ रुपए का चूना लगा. यही एन एच 74 घोटाला है.

मामले में अब तक क्या हुआ?

घोटाला सामने आने पर उत्तराखंड सरकार ने जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम (SIT) बना दी. कुमाऊं संभाग के कमिश्नर डी सेंथिल पांडियन इसके हेड थे. सेंथिल ने मार्च 2017 में अपनी रिपोर्ट उत्तराखंड सरकार को दी जिसमें कहा गया कि राज्य सरकार, एनएचएआई के अफसरों और ज़मीन मालिकों ने मिल कर ये घोटाला किया है.

ताज़ा-ताज़ा चुनाव जीत कर आई त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने मार्च में रिपोर्ट पर कार्रवाई शुरू की और धड़ाधड़ कई एसडीएम रैंक के अफसरों को सस्पेंड कर दिया. 10 मार्च को रूद्रपुर के पंतनगर पुलिस स्टेशन में इस मामले को लेकर एफआईआर भी दर्ज कर ली गई. इसमें रूद्रपुर और नजीबाबाद के एनएचएआई प्रोजेक्ट डायरेक्टर का नाम शामिल था.

मामले में दर्ज एफआईआर
मामले में दर्ज एफआईआर

25 मार्च को त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि घोटाले करने वाले कुछ अफसर केंद्र के हैं इसलिए जांच के लिए केंद्रिय एजेंसी की ज़रूरत है. माने सीबीआई. इसके बाद से सब तरफ हड़कंप मचा हुआ है. 5 अप्रैल को केंद्रीय परिवहन मंत्री ने उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र रावत को एक लेटर लिख कर कहा कि आप सीबीआई जांच पर अड़े रहे तो ”एनएचएआई के अफसरों का मोराल नीचे हो जाएगा” और वो आइंदा ”राज्य में काम करने से डरेंगे.”

26 मई को एक और लेटर एनएचएआई के चेयरमैन युद्धवीर सिंह ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव एस रामास्वामी को लिखा. इसमें उन्होंने धमकी दी कि इस तरह एनएचएआई के अफसरों के खिलाफ जांच होती रही तो एनएचएआई राज्य में सारे प्रोजेक्ट रोक देगा.

 

एन एच 74 घोटाला हरीश रावत के कार्यकाल में हुआ था.
एन एच 74 घोटाला हरीश रावत के कार्यकाल में हुआ था.

 

रावत करें तो क्या?

यहां दिलचस्प ये है कि केंद्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार है. आमतौर पर देखा जाता है कि पिछली सरकार के कार्यकाल में हुआ भ्रष्टाचार नई सरकार के लिए करेंसी का काम करता है. इस पर चुनाव भी जीता जा सकता है और चुनाव जीत कर अपने विरोधियों को ‘जांच’ से परेशान भी किया जा सकता है. एन एच 74 घोटाला हरीश रावत के कार्यकाल में हुआ था. लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत चाह कर भी इस मौके को भुना नहीं कर पा रहे क्योंकि उनके सामने उनकी ही पार्टी की केंद्र सरकार खड़ी है जिसके पास पूर्ण बहुमत है और एक लार्जर देन लाइफ प्रधानमंत्री. तो उन्होंने बीच का रास्ता जांच को धीमा कर के निकाला है.

एनएचएआई ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि वो इस प्रोजेक्ट में खालिस फंडिंग एजेंसी की भूमिका में थे. इसलिए उनका नाम इस घोटाले में घसीटना गलत है. लेकिन नितिन गडकरी और युद्धवीर सिंह जिस तरह से लेटर लिख कर धमकी दे रहे हैं, वो कतई सही नहीं है. यदि उन्हें लगता है कि एनएचएआई बेजां बदनाम की जा रही है तो उन्हें मीनार पर चढ़ कर चिल्लाना चाहिए कि ल्यो कर लो जांच. हमें कोई डर नहीं. लेकिन वो एक ऐसे राज्य को रोड प्रोजेक्ट बंद करने की धमकी दे रहे हैं जहां काफी पहाड़ी इलाका है, सड़कों पर काम होना है. मीडिया रिपोर्ट्स में जिन दो चिट्ठियों का ज़िक्र है, वो यदि सही हैं तो इस हिसाब से एक केंद्रीय मंत्री और एक सीनियर आईएएस अफसर एक राज्य सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं.


 

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