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चीन में कोरोना-विस्फोट की पूरी कहानी क्या है? क्यों बेकाबू हुए हालात?

चीन के कोरोना-विस्फोट पर दुनिया में क्या हलचल मची है?

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23 दिसंबर 2022 (अपडेटेड: 23 दिसंबर 2022, 08:31 PM IST)
चीन के कोरोना-विस्फोट पर दुनिया में क्या हलचल मची है?
चीन के कोरोना-विस्फोट पर दुनिया में क्या हलचल मची है?
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चीन में तेज़ी से फैल रहा कोरोना संक्रमण अब डराने लगा है. अस्पतालों के अंदर जगह नहीं बची है. लोग बिस्तर का इंतज़ार करते-करते दम तोड़ रहे हैं. सप्लाई चेन ध्वस्त हो रहीं है. मॉल्स में सामान बिखरे हैं. सब कुछ अस्त-व्यस्त दिख रहा है. कोरोना का पहला मामला दिसंबर 2019 में चीन में ही आया था. चीन ने शुरुआत से ही ज़ीरो-कोविड पॉलिसी का पालन किया. उसने सख़्त लॉकडाउन्स लगाए, संक्रमितों और उनके आसपास के लोगों को क़्वारंटीन किया. चीन का ये दावा भी है कि वो अपनी 90 प्रतिशत से अधिक आबादी को कोरोना वैक्सीन की तय खुराक लगा चुका है. हालांकि, पश्चिमी देशों का कहना है कि चीन की दोनों वैक्सीन्स उतनी प्रभावी नहीं हैं.

ज़ीरो-कोविड पॉलिसी के पीछे चीन का ये तर्क था कि वो भविष्य की दिशा में काम कर रहा है. उसका कहना था कि वो एक ऐसा हेल्थकेयर सिस्टम तैयार कर रहा है, जिसके जरिए भविष्य के किसी ख़तरे से आसानी से निपटा जा सकेगा. चीन ने इसके लिए तीन साल का समय लिया. नवंबर 2022 में प्रोटेस्ट के बाद उसने ज़ीरो-कोविड पॉलिसी में ढील दी. इसके बाद चीन का जो हाल हो रहा है, उसने उसके दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल ये कि क्या चीन अपने हेल्थकेयर सिस्टम को ठीक करने में नाकाम रहा? या, इस बार फैल रहा कोरोना वैरिएंट ज़्यादा ख़तरनाक निकल गया?

तो आइए समझते हैं -

- चीन कोरोना को काबू करने में क्यों फ़ेल हो रहा है?
- और, चीन के कोरोना-विस्फोट पर दुनिया में क्या हलचल मची है?

चीन की राजधानी बीजिंग में 20 दिसंबर को एक शख़्स को दिल का दौरा पड़ा. उन्हें फौरन अस्पताल ले जाया गया. 84 साल के उस बुजुर्ग को इमरजेंसी केयर की दरकार थी. मगर ICU में जगह नहीं थी. उन्हें एंबुलेंस के अंदर ही इंतज़ार करना पड़ा. तीन घंटे के बाद जब उन्हें जगह मिली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 15 मिनट बाद ही उनकी मौत हो गई.

चीन का दावा है कि उसके यहां कोरोना काबू में है. पिछले हफ़्ते जब चीन के अस्पतालों से भयावह वीडियोज़ और तस्वीरें बाहर आईं, तब भी चीन सरकार ने चुप्पी साधकर रखी. हालांकि, ये चुप्पी ज़्यादा दिनों तक बरकरार नहीं रह सकी. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स कोविड से जुड़ी पोस्ट्स से भरे हुए हैं. लोग कोरोना संक्रमित लोगों की मदद की अपील कर रहे हैं. वे हेल्थकेयर वर्कर्स के प्रति नरमी बरतने की सलाह दे रहे हैं. वे एक्स्ट्रा दवाओं को साझा करने के लिए कह रहे हैं.

एक विशेषज्ञ ने कहा कि अगले 3 महीनों में चीन की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी के कोविड से संक्रमित होने की संभावना है. (फोटो- AP)

चीनी सोशल मीडिया पर कोविड-नीति में बदलाव की भी चर्चा है. मीडिया रपटों के अनुसार, नई कोविड नीति से जुड़े टैग को तीन करोड़ से अधिक बार पढ़ा जा चुका है. लोगों में इसको लेकर गुस्सा भी है. कुछ लोग नई कोविड पॉलिसी को लेकर नाराज़ भी हैं.

कुछ लोग हालिया कोरोना-विस्फोट को लेकर अचरज में भी हैं. उनका कहना है कि जिस रफ़्तार से वायरस फैल रहा है, उसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी.
चीन में सोशल मीडिया को सेंसर किए जाने का लंबा इतिहास रहा है. अगर सरकार को किसी शब्द से भी ख़तरा महसूस होता है, तो उस शब्द को पूरे सोशल मीडिया से गायब कर दिया जाता है. इसलिए, आशंका ये है कि कम्युनिटी स्पिरिट वाली पोस्ट तो ठीक है, लेकिन चीन में सब सही तो नहीं चल रहा है.

16 दिसंबर को हॉन्ग कॉन्ग से चलने वाले अख़बार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) ने मेडिकल स्टूडेंट्स के प्रोटेस्ट पर एक रिपोर्ट पब्लिश की थी. प्रदर्शनकारी छात्र अपने लिए बेहतर वेतन और सुविधाओं की मांग कर रहे थे. छात्रों का कहना था कि उन्हें जाड़े की छुट्टियों में घर जाने नहीं दिया जा रहा है. वे स्टाफ़ डॉक्टर्स के बराबर पैसे की मांग भी कर रहे थे. SCMP ने दावा किया कि प्रोटेस्ट के बाद छात्रों की कुछ मांगें मानी भी गईं.

चीन में कोविड लॉकडाउन की सख़्ती के ख़िलाफ़ बड़े प्रोटेस्ट का सिलसिला नवंबर में शिनजियांग प्रांत में एक इमारत में हुई आगजनी के बाद शुरू हुआ था. 24 नवंबर की रात शिनजियांग की राजधानी उरुम्ची की एक इमारत में आग लगी. आग 15वीं मंजिल पर लगी थी. धीरे-धीरे ये बिल्डिंग के बाकी हिस्से में फैल गई. इसे बुझाने में तीन घंटे का समय लग गया. बैरिकेडिंग के कारण दमकल की गाड़ियों को इमारत के पास नहीं जा पाईं. जब तक आग बुझ पाती, तब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी थी. जबकि 09 लोग घायल हुए थे. स्थानीय अधिकारियों और सरकारी मीडिया ने बताया कि आग एक्सटेंशन सॉकेट में शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी थी. उन्होंने इस आगजनी को एक सामान्य घटना बताकर पल्ला झाड़ लिया था. लेकिन, ये मामला इतना आसान था नहीं. स्थानीय जनता इसे आसानी से छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. चीनी सोशल मीडिया पर निष्पक्ष जांच की मांग होने लगी. लोगों ने ये भी लिखा कि कोविड प्रोटोकॉल्स की वजह से फ़ायर फ़ाइटर्स को पहुंचने में और आग बुझाने में देर हुई. इसके कारण नुकसान बढ़ा. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, चीन में आगजनी से जुड़े टॉपिक को 80 करोड़ से अधिक बार देखा गया. लोग ये जानना चाह रहे थे कि बिल्डिंग में सेफ़ एग्जिट की सुविधा है भी या नहीं?

शिनजियांग में 07 अगस्त से कोविड लॉकडाउन लगा था. मीडिया रपटों के अनुसार, लोगों को कुछ मिनटों के लिए भी घर से बाहर जाने के लिए परमिशन लेनी पड़ती थी. इमरजेंसी के अलावा बाहर जाने की अनुमति नहीं थी. एक बिल्डिंग के अंदर एक फ़्लोर से दूसरे फ़्लोर पर जाने की मनाही थी. इसी वजह से सवाल पूछा जा रहा है कि क्या आगजनी के बाद लोग नीचे नहीं उतर पाए? क्या कोविड प्रोटोकॉल्स की वजह से लोगों की मौत हुई?

लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहा. उरुम्ची में सड़क पर भी नारेबाज़ी हुई. लोग पुलिसवालों से भी उलझे. इसके वीडियोज़ भी चीनी सोशल मीडिया पर वायरल हुए. 26 नवंबर को प्रोटेस्ट उरुम्ची से बाहर निकला. शंघाई और बीजिंग में भी लोगों ने सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. शंघाई में ‘शी जिनपिंग मुर्दाबाद’ और ‘कम्युनिस्ट पार्टी मुर्दाबाद’ के नारे लगे. चीन में छिटपुट विरोध-प्रदर्शनों का लंबा इतिहास रहा है. लेकिन सीधे राष्ट्रपति और कम्युनिस्ट पार्टी पर निशाना साधने की मिसाल कम ही मिलती है. बीजिंग और शंघाई जैसे शहरों में अगर ऐसा हो रहा है तो ये बड़ी बात है. वुहान में प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स हटाए और आसपास की दुकानों में भी तोड़फोड़ की. यही हाल कुछ और बड़े शहरों में भी देखने को मिला.

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट से बीजिंग और शिनजियांग से जुड़े सर्च टर्म्स को मिटा दिया. दोनों शहर हालिया प्रोटेस्ट के केंद्र की तरह उभरे थे. इसके अलावा, प्रोटेस्ट से जुड़े कीवर्ड्स और पुराने भाषणों को भी सेंसर किया गया. इसी क्रम में 26 नवंबर को जिनपिंग के पिता का एक भाषण भी इंटरनेट से हटा दिया गया. इस भाषण में जिनपिंग के पिता ने क्रांति की अपील की थी.

28 नवंबर को चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाऊ लिजियान ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस की. उन्होंने प्रोटेस्ट को सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश बता दिया. मगर कुछ दिनों के बाद ही चीन सरकार नरम होती नज़र आई. उसने ज़ीरो-कोविड पॉलिसी के बरक्स 20 गाइडलाइंस की लिस्ट जारी की. कुछ शहरों में स्थानीय अधिकारियों ने नियमों में ढील देने की बात भी कही.

07 दिसंबर को सरकार ने छूट का दायरा और बढ़ा दिया. सरकार ने 10 बिंदुओं वाली नया प्लान लाया. इसके तहत कुछ नई व्यवस्थाएं लाईं गई. मसलन,

- अगर कोरोना से संक्रमित व्यक्ति के लक्षण बहुत गंभीर नहीं हैं, तो वो ख़ुद को घर पर ही आइसोलेट कर सकता है. ज़ीरो-कोविड पॉलिसी में संक्रमित व्यक्ति के साथ-साथ पूरे परिवार और अपार्टमेंट को क़्वारंटीन किया जाता था.

- नए प्लान में ये भी कहा गया कि, PCR टेस्ट की ज़रूरत सिर्फ अधिक जोखिम वाले इलाकों में रहनेवालों के लिए होगी. बाकी जगहों पर रैपिड एंटीजेन टेस्ट से भी काम चल जाएगा. रैपिड एंटीजेन टेस्ट घर पर रहकर भी किया जा सकता है. इससे पहले गिनती के मामले सामने आने के बाद पूरी आबादी को लाइन में लगकर कोविड टेस्ट कराना पड़ता था.

- नए प्लान में पूरी बिल्डिंग को सील करने वाले नियम को बंद कर दिया गया. कहा गया कि अब सिर्फ कोरोना संक्रमण से प्रभावित घर या फ़्लोर को सील किया जाएगा.

लोगों ने नए प्लान का स्वागत किया. कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कहा कि ये फ़ैसला चीन की अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी था.

चीन ने कोविड नियमों में जो छूट दी, उसका आधार ये था कि हम संभावित ख़तरों के लिए तैयार हैं. लेकिन इस दावे में बहुत बल था नहीं.
इसकी दो बड़ी वजहें थीं,

नंबर एक.

- जानकारों का मानना है कि चीन ने ख़तरे का सही से आकलन नहीं किया. वो ज़ीरो-कोविड पॉलिसी के भुलावे में बना रहा. चूंकि अब उसने मास टेस्टिंग वाला सिस्टम खत्म कर दिया है. इसलिए, कोरोना संक्रमण की सही संख्या का पता लगा पाना मुश्किल हो गया है.
हालांकि, पश्चिमी देशों की मीडिया में दावा किया जा रहा है कि चीन में कोरोना काबू से बाहर चला गया है. अस्पतालों में बिस्तर नहीं है. दवाओं का स्टॉक खत्म हो चुका है. अंतिम-संस्कार के लिए लंबी लाइनें लग रहीं है.

चीन ने कभी अपने यहां कोरोना के ख़तरे का असली ग्राफ़ नहीं बताया. वो दुनिया को भुलावे में रखता रहा कि सब ठीक है. घबराने की ज़रूरत नहीं है. इसी वजह से शुरुआती दौर में बाकी दुनिया ज़रूरी तैयारी नहीं कर पाई. जिसके चलते आनन-फानन में लॉकडाउन लगाना पड़ा था.

- दूसरी वजह वैक्सीनेशन से जुड़ी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि कोविड से निकलने का एकमात्र उपलब्ध रास्ता वैक्सीनेशन से होकर गुजरता है. चीन के पास कोरोना की दो वैक्सीन्स हैं. सिनोवैक और सिनोफ़ार्म. दोनों की प्रभाव-क्षमता पर सवाल उठते हैं. पश्चिमी देशों ने अपनी वैक्सीन देने की पेशकश भी की थी. लेकिन चीन ने उनकी मदद ठुकरा दी थी.
नवंबर 2022 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चीन 80 बरस से ऊपर की सिर्फ 40 फीसदी आबादी को कोरोना वैक्सीन की खुराक दे पाया है. इसी ऐज-ग्रुप के लोग सबसे ज़्यादा ख़तरे में हैं. चीन सरकार वैक्सीनेशन की रफ़्तार बढ़ाने की कोशिश कर रही है. उन्होंनेे जनवरी 2023 तक 90 फीसदी बुजुर्गों को वैक्सीनेट करने की बात कही है. चीन में बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच सरकारों ने ऐहतियात बरतना शुरू कर दिया है. भारत में भी सरकार ने लोगों से सावधानी बरतने की सलाह दी है.

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