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ओवर एम्बीशन की बात करने वाली घर में रहे तो दुनिया क्यों सवाल न करे?

मलेशिया से 'यादों की रेजगारी' की दूसरी किस्त आ गई है, मनीषा श्री का सफ़र, नई मंज़िल की ओर.

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21 नवंबर 2016 (Updated: 21 नवंबर 2016, 08:33 AM IST)
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मनीषा श्री, नाम, काम और नेचर से घोर देसी हैं. ऐसा दावा करती हैं लेकिन परिवार और काम के फेर में देश से दूर हैं. मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में रहती हैं. पढ़ाई टेक्निकल थी लेकिन दिल साहित्यिकल, सो नौकरी की गाड़ी में ब्रेक लगाया और दिल से दोस्ती निभाते हुए सिर्फ लिख रही हैं. नोट बंदी के जमाने से पहले ही ‘ज़िंदगी की गुल्लक’ नाम की एक किताब लिख डाली. लेखन के खाते में वही बड़ा नोट है. अब वो न तो काव्य संग्रह है और ना कहानियां. मनीषा की मानें तो कविताओं की कहानियां है. ये वो जिद्दी कविताएं हैं जो कहानियों के साथ आई हैं.हमारे बीच का कोई दूर रहता है तो अपना हाल लिख भेजता है. वहां का हाल भेजता है. ये खिड़की होती है, जिससे हम भी थोड़ी सी दुनिया देखने की कोशिश करते हैं. मनीषा हमारे लिए ‘यादों की रेजगारी’ लिखती हैं. हम आपके लिए पहली किस्त ला चुके हैं, आज बारी दूसरी किस्त की. जब शुरू हुआ सफ़र, नई मंज़िल की ओर.Cover Yadon ki Rezgari मतलब समझ के परे है भैया यह बात. नौकरी करो तो सिरदर्द न करो तो भी मुसीबत. ना ना... बात यहां पैसा कमाने की नहीं हो रही, बात हो रही है इज्जत बचाने की. हमने कहा था न की हम आईआईटियंस को ऑप्शन नहीं होता घर बैठने का. मतलब होता तो है मगर समाज उन आईआईटियंस को अजीब नज़रों से देखता तो है.
"बेकार सीट ख़राब कर दी, कोई लायक लड़का करता यह कोर्स तो आज पूरे परिवार को संभाल रहा होता, लड़कियों को कितना भी पढ़ा लो रहना तो घर में ही है उन्हें."
प्लीज ऊपर लिखे संवाद को दकियानूसी न कहें. लेटेस्ट है भाई हम तो अभी भी सुनते रहते है. अच्छा सच बोलना आप नहीं सुनते क्या? तो हुआ यूं कि 10 साल की नौकरी पर बड़ी सोच-विचार के बाद हमने ब्रेक लेने का सोचा. मतलब थक गए थे यार 15 घंटे की नौकरी कर करके. 8 घंटे दफ्तर, 3 घंटे सड़क या लोकल ट्रेन 4 घंटे घर में बेस्ट मॉम और वाइफ की नौकरी कर करके, अमां किसी चीज़ की हद तो होती है न, हम लड़कियों के लिए शायद यह शब्द हद बना ही नहीं है. मैं कंप्लेन नहीं कर रही हूं, अच्छा है जो नहीं बना है शायद इसीलिए हममें सहनशक्ति ज्यादा होती है. जब मियां जी की मलेशिया जॉब लगी तो हमने सोचा कुछ दिन आराम करेंगे और अपने राजकुमार मतलब के बेटे के साथ वो पल बांटेंगे जो सिर्फ सोचे थे मगर वक़्त की कमी के कारण कभी गुजारे नहीं. इसके भी दो कारण थे. पहला यह कि बच्चा छोटा था तो सोचा कि जब तक वो नए माहौल और स्कूल में रम न जाए हम उसके साथ रहेंगे और दूसरा अभी बताया न हम थक गए थे नौकरी से.
तो हम तीन और हमारे 6 या 7 बड़े बड़े सूटकेस मलेशिया आ गए, जिसमें कपड़ों और किताबों के अलावा बहुत सारे सवाल भी पैक किए थे. कैसा होता होगा प्रवासी का जीवन, बिना नौकरी कैसी कटेगी ज़िंदगी? इंटरनेशनल कॉल पर कैसे करुंगी मां से मन भर दिल की बात. कहीं अपना यह चयन अपने दुःख का कारण तो नहीं बन जाएगा.
कुछ भी हो, बस नेमसेक की नायिका न बनाना हमारे ख़ुदा हमें. क्या बोले गज़ब का शहर है कुआलालम्पुर , हर रोज़ बारिश मुम्बई वाली नहीं जहां बारिश के आफ्टर इफेक्ट्स बारिश का मज़ा चबा खाते हैं. खैर जो जो सोचा था वैसा कुछ भी नहीं हुआ, किसी का नहीं होता तो हमें कौन सा स्पेशल पास मिला है? ख़्वाबों का, कि देखो और जी लो. सुबह 8 बजे तक घर खाली हो जाता, मियां जी ऑफिस और बेटा स्कूल और हम बड़े से घर के छोटे से कोने में दुबक जाते कभी सोफे, कभी बालकनी कभी स्टडी तो कभी बिन बात के टीवी चैनल से अपनी बोरियत का हल मांगते. हां एक और चीज़ करते थे, फेसबुक और लिंक्डइन पर ऑफलाइन जाकर दोस्तों की ज़िंदगी में ताकझांक. ऑफलाइन इसलिए क्योंकि कभी भी कोई भी हमें उस सवाल में जकड़ सकता था जिसका जवाब हमें नहीं चाहिए था. "कहां ज्वाइन किया तुमने?" अरे नहीं किया यह हम कहना चाहते थे मगर नौकरी न करने का सबसे बड़ा बोझ तो हम पर ही था न. मतलब आप समझ सकते है की अगर एक ओवर एम्बीशन की कसम खाने वाली लड़की घर में रहना अपनी चॉइस बना ले तो दुनिया क्यों सवाल न करे. घर पर भी बात करो तो यही सावल, अपना टाइम क्यों बर्बाद कर रही हो वगैरह-वगैरह
डिप्रेशन सिर्फ चुप हो जाना नहीं होता. कई बार हंसते लिपस्टिक सजे होंठ भी सिसकियां भर रहे होते हैं मगर चुप तो वो भी होते हैं. हमारे डिसीजन पर हम से ज्यादा फिर से दुनिया की नज़र थी. हम तंग आ गए थे, भागना हमारी फ़ितरत नही, वैसे लड़ना भी नहीं है तो बीच का रास्ता निकाला और ज़िंदगी का एक नया सफ़र शुरू किया.
अब एक ही जवाब सबके लिए था, नो कन्फ्यूजन. बच्चे के लिए ब्रेक लिया है, मेरी पहली प्राथमिकता मेरी फैमिली है. वैसे बात सही थी मगर पूरी तरह नहीं, पिछले दो साल से ऑइल मार्केट का हाल सबको पता है. उसमें कौन दे रहा था हमें नौकरी, वैसे थोड़ी मेहनत करी गई थी नौकरी को तलाशने की. नहीं मिली तो रोने की जगह घूमना शुरू कर दिया. जब सब चले जाते तो मैं भी चली जाती नए शहर की पुरानी गलियों में. कई कहानियां टकराई हैं इन 2 सालो में, छोटा सा शहर है और किस्से बड़े-बड़े. कभी इज्जत भर देता है मन में तो कभी थोड़ी सनसनी. बताएंगे धैर्य धरें. अब तो ताकझांक होती रहेगी मलेशिया की खिड़की से इंडिया वाले अपने फेवरेट ठिकाने पर.
यादों की रेजगारी की पहली किस्त यहां पढ़िए. हमें बस ये पता था, डिस्कवरी वाले हमारे सब्जेक्ट को बहुत पसंद करते हैं
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