The Lallantop
Advertisement

क्या शेख़ हसीना को भारत छोड़ना पड़ेगा?

शेख़ हसीना को देश छोड़े 2 हफ्ते से ज़्यादा बीत चुके हैं लेकिन अब तक उन्हें किसी भी देश में शरण की मंज़ूरी नहीं मिली है. बांग्लादेश में शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग उठने लगी है. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने अभी तक उनके प्रत्यर्पण की मांग नहीं की है लेकिन देश में माहौल वैसा ही तैयार हो रहा है.

Advertisement
pic
23 अगस्त 2024 (पब्लिश्ड: 02:45 PM IST)
Sheikh Hasina
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना
Quick AI Highlights
Click here to view more

5 अगस्त 2024 को प्रदर्शनकारियों की भीड़ बांग्लादेश के प्रधानमंत्री आवास गोनो भवन पहुंची. ये लोग शेख हसीना के इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे. प्रदर्शनकारियों की भीड़ गुस्से में थी. फिर बांग्लादेश के सेना प्रमुख वक़ार उज़ ज़मां देश के सामने आए. कहा, शेख हसीना ने इस्तीफ़ा दे दिया है. अब देश में अंतरिम सरकार बनाई जाएगी. उस समय शेख हसीना कहां थीं? वो हैलीकॉप्टर में बैठकर देश से भाग चुकी थीं. सेना ने उन्हें जाने के लिए मात्र 45 मिनट का समय दिया. उनका हैलीकॉप्टर भारत लैंड हुआ. 

शुरू में कहा गया कि वो उसी दिन लंदन चले जाएंगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उनके देश छोड़े 2 हफ्ते से ज़्यादा बीत चुके हैं लेकिन अब तक उन्हें किसी भी देश में शरण की मंज़ूरी नहीं मिली है. वो तबसे भारत में ही हैं. पर आज हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं. क्योंकि बांग्लादेश में शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग उठने लगी है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा है कि भारत उन्हें कानूनी तरीके से बांग्लादेश के हवाले कर दे. यहां उनपर मुकदमा चलाया जाएगा. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने अभी तक उनके प्रत्यर्पण की मांग नहीं की है लेकिन देश में माहौल वैसा ही तैयार हो रहा है. आइए समझते हैं. 

-क्या शेख हसीना के भारत में रहने से दोनों देशों के रिश्ते प्रभावित होंगे?
-किसी व्यक्ति के प्रत्यर्पण के लिए नियम क्या हैं?
-और क्या कोई देश प्रत्यर्पण की मांग को मानने के लिए बाध्य होता है?

शुरुआत एक किस्से से करते हैं. ये किस्सा आज से 49 साल पुराना है. जब पहली बार भारत ने शेख हसीना को भारत ने शरण दी थी. वो 6 साल तक पहचान बदलकर भारत में रहीं थीं.
कहानी की शुरुआत होती है शेख हसीना के पिता मुजीबुर्रहमान की हत्या से. मुजीबुर्रहमान जिन्हें बांग्लादेश में बंगबंधु नाम से जाना जाता है. उन्होंने 1971 में बांग्लादेश को आज़ादी दिलवाई. उन्हें फादर ऑफ़ द नेशन का लकब मिला. वो बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति बने. लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद वो देश को ढंग से चला नहीं पाए. ऐसा कहने की वजह क्या है? पॉइंट्स में समझिए. 

- युद्ध की वजह से बांग्लादेश की अर्थवयवस्था चरमरा गई थी. 1972 में विश्व बैंक ने बांग्लादेश की बदहाली का ज़िक्र भी अपनी रिपोर्ट में किया था.
- उन्होंने बांग्ला भाषा को मैंडेटरी कर दिया. जबकि उर्दू थोपने की वजह से ही बांग्लादेश में आज़ादी की मांग शुरू हुई थी. मुजीब ने पाकिस्तान समर्थकों की पहचान कर उन्हें जेल में डाला.
- सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार बढ़ा. मुजीब इसे रोकने में असफल रहे.
- 1974 के अकाल के दौरान मुजीब की पार्टी पर आरोप लगे कि वो घूस लेकर अनाज बांट रहे हैं.
- मुजीब ने 1972 में एक पैरामिलिट्री फ़ोर्स का गठन किया था. जिसका नाम ‘रख्खी बाहिनी’ था. ये फ़ोर्स इंसर्जेन्सी को रोकने के लिए बनाई गई थी. इसपर हत्या और रेप के कई इल्ज़ाम लगे.

इन्हीं सब कारणों से मुजीब का देश में विरोध भी शुरू हुआ. 14 अगस्त 1975 को बांग्लादेश की फ़ौज के कुछ लोगों शेख मुजीब की हत्या कर दी. इन लोगों ने मुजीब के साथ उनके परिवार वालों को भी नहीं बख्शा. उस रात कुल 18 लोगों की हत्या हुई थी. शेख मुजीब का पूरा परिवार खत्म हो चुका था उनकी 2 बेटियों को छोड़कर. शेख हसीना और शेख रिहाना. ये दोनों उन दिनों जर्मनी में थीं. उनके पिता की हत्या के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक उथल पुथल थी. देश सैन्य शासन की भेंट चढ़ चुका था. ऐसे में शेख हसीना का बांग्लादेश जाना सुरक्षित नहीं था. इसी वजह से भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शेख हसीना और उनके परिवार को शरण दी.

इंदिरा गांधी ने दी शरण 

शेख हसीना ने एक इंटरव्यू में बताया,

‘इंदिरा गांधी ने हमें संदेश भेजा कि वो उनके परिवार को सुरक्षा देना चाहती हैं. हमने भी दिल्ली जाने का फैसला किया. उस समय हमारे मन में था कि अगर हम दिल्ली पहुंच गए तो हमारा बांग्लादेश पहुंचना भी आसान हो जाएगा. वहां जाकर हमें पता चलेगा कि हमारे परिवार के कितने सदस्य अभी ज़िन्दा हैं?’

इंदिरा गांधी के बुलावे पर शेख हसीना और उनका परिवार दिल्ली आया. शेख हसीना के साथ उनके पति मोहम्मद अब्दुल वाजिद मियां और उनके दो बच्चे सजीब और सायमा भी थे. दिल्ली आने के बाद उनकी मुलाकात इंदिरा गांधी से हुई. इसी मुलाकात में शेख हसीना को पता चला कि उनके परिवार के 18 सदस्यों की हत्या हो चुकी है. 

2022 में समाचार एजेंसी ANI को दिए इंटरव्यू में शेख हसीना बताती हैं कि इंदिरा गांधी ने उनके परिवार की रहने की व्यवस्था की. उनके पति वाजिद मियां को नौकरी दी. वो पेशे से न्यूक्लियर साइंटिस्ट थे. शेख हसीना पहले 56 रिंग रोड लाजपत नगर में दिल्ली में रहती थीं. फिर उन्हें लुटियंस दिल्ली के पंडारा रोड में शिफ्ट किया गया. शेख हसीना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि भारत में निर्वासन के शुरूआती 2-3 साल बहुत कठिन थे, उनके दोनों बच्चे छोटे थे. वो अपने नाना नानी और अपने मामा को याद करके रोते थे. जिन्हें 14 अगस्त की रात को कत्ल कर दिया गया था.  

दिल्ली में शेख हसीना और उनका परिवार सुरक्षा कारणों से अपनी पहचान छिपाकर रहता था. उनके पास दूसरे नामों के पहचान पत्र थे. दिल्ली में रहते हुए शेख हसीना गांधी परिवार के करीब हो गई थीं. भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से उनकी अच्छी बनने लगी थी. 

प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने पिता के जीवन पर एक किताब लिखी है. नाम है ‘प्रणब, माई फादर’ इसमें शर्मिष्ठा लिखती हैं,

‘शेख हसीना का परिवार जल्द ही हमारे परिवार से घुल मिल गया. वो बर्थडे पार्टीज़, गेट टू गेदर और पिकिन में हमारे साथ आया करते. चुनिंदा फैमिली फ्रेंड्स के अलावा शेख हसीना और उनके परिवार की असली पहचान किसी को नहीं पता थी. प्रणब की पत्नी शुभ्रा अजनबियों से हसीना का परिचय अपनी बहन के रूप में कराती थीं.’

शर्मिष्ठा किताब में लिखती हैं,

‘शेख हसीना मेरे पिता को दादा यानि बड़ा भाई और मेरी मां को दीदी यानि बड़ी बहन बुलाया करती थीं. बांग्लादेश लौटने के बाद वो मेरी मां और परिवार की दूसरी महिला सदस्यों के लिए ढाका की जामदानी साड़ियां भेजी करती थीं.’

भारत में कुछ साल रहने के बाद वो विदेश में यात्रा करने लगी थीं. साल 1980 तक उनके विदेश में दिए गए भाषण प्रचलित होने लगे. 16 अगस्त 1980 में उन्होंने लंदन के यॉर्क हॉल में अपने परिवार वालों के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की मांग की थी. इस भाषण में शेख हसीना ने कहा था कि,

 ‘मुझे कई बार मारने की कोशिश हुई. मेरी सभा में बम लगाया गया पर उसे एक आम आदमी ने पकड़ लिया. मेरे काफिले पर गोली चलाई गई मैं उसमें भी बच गई. मुझपर दिन दहाड़े ग्रेनेड से हमला किया गया लेकिन पार्टी के लोगों ने मुझे घेर लिया. मैं वहां भी बचने में कामयाब हुई. पर अब मेरे परिवार के कातिलों को सज़ा मिलनी चाहिए.’

शेख हसीना विदेश तो जा पा रहीं थी पर खुद के वतन जाने का रास्ता साफ़ नहीं हो पाया था. उस समय BNP के ज़िया उर्रहमान राष्ट्रपति थे. उन्होंने हसीना की देश में एंट्री बैन की हुई थी. फिर आई 16 फरवरी 1981 की तारीख. शेख हसीना को आवामी लीग का प्रेसिडेंट बनाया गया. 3 महीने बाद 17 मई 1981 को शेख हसीना बांग्लादेश पहुंची. उसके चंद दिन बाद 30 मई को ज़िया उर्रहमान की हत्या कर दी गई. फिर BNP के ही अब्दुल सत्तार देश के राष्ट्रपति बने. पर इनकी सरकार ज़्यादा नहीं टिक पाई. 

1982 में जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद ने तख्तापलट कर मार्शल लॉ लगा दिया. फिर चुनाव में धांधली कर खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया. इसी सैन्य शासन के विरोध में शेख हसीना ने विरोध प्रदर्शन किए. 1996 में वो पहली बार देश की प्रधानमंत्री बनी. 2001 तक वो देश की पीएम रहीं. फिर 2009 में वापस उनकी सत्ता में वापसी हुई और तबसे लेकर 5 अगस्त तक शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी रहीं. 5 अगस्त के इस्तीफे के बाद वो दोबारा भारत में रह रही हैं. 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें ब्रिटेन और दूसरे यूरोपीय देशों में शरण लेने की मंज़ूरी नहीं मिल रही है. 2 हफ्ते से भी ज़्यादा समय से वो भारत में हैं. शेख हसीना के विरोधी उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहे हैं. तौहीद हुसैन बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में एक्टिंग फोरेन मिन्स्टर की भूमिका निभा रहे हैं. उन्होंने 15 अगस्त को रॉयटर्स को इंटरव्यू दिया. इसमें तौहीद ने कहा कि बांग्लादेश में उनपर कई मुकदमें दर्ज किए जा चुके हैं. अगर गृह मंत्रालय चाहे तो शेख हसीना की वापसी की मांग कर सकता है. 

फिर 21 अगस्त को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम ने खुले तौर पर ये मांग कर दी. उन्होंने कहा है कि भारत शेख हसीना को बांग्लादेश वापस भेज दे. यहां लोग उनपर मुकदमा करना चाहते हैं. हालांकि अभी तक बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने आधिकारिक तौर पर ऐसी मांग नहीं की है.

प्रत्यर्पण के नियम 

दो देशों के बीच प्रत्यर्पण तभी संभव है जब दोनों देशों ने प्रत्यर्पण संधि साइन की हो. भारत और बांग्लादेश ने 2013 में ही ये संधि साइन कर ली थी. क्या है ये संधि?

अगर एक देश की अदालत किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित कर देती है और वो व्यक्ति प्रत्यर्पण के योग्य अपराध का दोषी पाया जाता है तो दूसरे देश को उस व्यक्ति का प्रत्यर्पण करना होगा. इसके अलावा ये संधि तभी अमल में आएगी जब उस व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध दोनों देशों में दंडनीय हो.

Narendra Modi and Sheikh Hasina
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना
क्या कोई देश प्रत्यर्पण के लिए मना कर सकता है?

जवाब है हाँ. अगर उस व्यक्ति का अपराध राजनीतिक प्रवत्ति का है तो कोई भी देश प्रत्यर्पण के लिए मना कर सकता है. इसके अलावा भी संधि के नियम कहते हैं कि प्रत्यर्पण का फैसला लेने के लिए दोनों देश आज़ाद हैं.

बांग्लादेश और भारत के बीच कब प्रत्यर्पण हुआ है?

2015 में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के नेता अनूप चेतिया को बांग्लादेश से भारत लाया गया था. उल्फा को भारत में एक आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है. भारत ने भी बांग्लादेश के कुछ भगोड़ों  को वापस प्रत्यर्पित किया है. जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश के सदस्य असम और पश्चिम बंगाल में छिपे रहते हैं. उनकी भी बांग्लादेश ने पहले मांग की हुई थी.

 

वीडियो: दुनियादारी: न्यूक्लियर हथियारों की तुलना में अमेरिका और चीन कहां हैं?

Advertisement

Advertisement

()