दविंदर को लेकर NIA चीफ योगेश चंद्र मोदी को क्यों घेर रहे हैं राहुल गांधी?
हिजबुल के दो आतंकियों के साथ गिरफ्तार हुए थे जम्मू कश्मीर पुलिस के डीसीपी दविंदर सिंह.
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हिजबुल आतंकियों के साथ पकड़े गए डीएसपी दविंदर सिंह के मामले में राहुल गांधी ने NIA चीफ वायसी मोदी पर निशाना साधा है. फाइल फोटो
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राहुल गांधी दविंदर सिंह मामले को लेकर ट्विटर पर एक्टिव हो गए हैं. 16 जनवरी को उन्होंने अपनी ऑफिशियल ट्विटर हैंडल पर लिखा, 'DSP दविंदर ने तीन ऐसे आतंकवादियों को पनाह दी जिनके हाथ भारतीयों के खून में रंगे हैं. दविंदर इन्हें दिल्ली ले जाते हुए पकड़े गए. उनपर 6 महीनों के भीतर एक फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चले और दोषी पाए जाने पर सख्त से सख्त सज़ा दी जाए.'
14 जनवरी को लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ट्वीट किया कि अगर दविंदर सिंह, दविंदर खान होते तो संघ की प्रतिक्रिया ज़्यादा मुखर होती. उन्होंने पुलवामा मामले की भी नए सिरे से जांच की मांग की थी. 16 जनवरी का राहुल का ट्वीट इसी लाइन पर आगे जाता है, लेकिन संगठन की जगह इस बार सरकार को संबोधित किया गया. 17 जनवरी को राहुल एक कदम और आगे चले गए. उन्होंने ट्वीट किया,
आतंकवादी DSP दविंदर सिंह को शांत करने का सबसे बढ़िया तरीका है कि केस NIA को दे दिया जाए. NIA के हेड भी एक मोदी ही हैं - YC मोदी. इन्होंने ही गुजरात दंगों और हरेन पंड्या की हत्या की जांच की थी. YC के पास केस जाने का मतलब है केस का खत्म हो जाना.
इस ट्वीट में राहुल गांधी ने YK मोदी लिखा है. पर NIA चीफ का नाम योगेश चंद्र मोदी यानी YC मोदी है.
दविंदर को आतंकवादी कहने से बचा जा सकता था
राहुल फिलहाल वायनाड से सांसद भर हैं. लेकिन टिप्पणीकार इस बात पर बराबर ध्यान दिलाते रहते हैं कि राहुल कांग्रेस अध्यक्ष न सही तो उससे कम भी नहीं हैं. और कांग्रेस फिलहाल सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है. इसीलिए राहुल के कहे पर ध्यान तो जाता ही है. और इसीलिए इस ट्वीट का मतलब निकाला ही जाएगा.
दविंदर सिंह कार में दो हिज़बुल आतंकियों के साथ मिले थे. और जम्मू कश्मीर पुलिस उनके बर्खास्तगी के लिए लिख चुकी है. डीजीपी दिलबाग सिंह ने साफ कर दिया है कि पुलिस दविंदर के मामले में ढील नहीं देने वाली. लेकिन फिर भी जांच पूरी हो जाने से पहले ही दविंदर को आतंकवादी लिखने से बचा जा सकता था. हमारे देश में कपड़े और नाम देखकर लोगों को आतंकवादी का लेबल दे देने की परंपरा है. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि इस परंपरा के खिलाफ खड़े होने का दावा करने वाले लोग ऐसा करते दिखें. लेकिन राहुल का ट्वीट एक व्यक्ति पर सवाल उठाने से कहीं आगे जाता है. वो एक संस्था पर सवाल उठा रहे हैं - भारत में आतंकी मामलों की जांच करने वाली सबसे बड़ी एजेंसी- NIA.
NIA आज जितनी ताकतवर है, उसके पीछे कांग्रेस नेताओं का बड़ा हाथ है. सबसे बड़ा नाम- पी चिदंबरम. लेकिन UPA के काम करने के तौर तरीकों पर नज़र रखने वाले आपको बताएंगे कि चाहे चिदंबरम कितने ही सख्त गृह मंत्री हों, NIA का विचार उनका अकेले का नहीं रहा होगा. इसमें पार्टी के शीर्ष नेताओं की रज़ामंदी भी रही होगी. फिर भी NIA कांग्रेस के निशाने पर है. इसकी एक वजह तो यही मानी जा सकती है कि अगर NIA लाठी है, तो वो लाठी आज भाजपा सरकार के हाथ में है. जैसे कभी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के हाथ में थी. अपनी लाठी दूसरे के हाथ में देखना किसी को अच्छा नहीं लगेगा. ये मानव स्वभाव की बात है.
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और वायनाड सांसद राहुल गांधी के साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल. फोटो- पीटीआई
दूसरी और ज़्यादा गंभीर वजह है NIA के खिलाफ खड़ी छत्तीसगढ़ सरकार. वही छत्तीसगढ़ जहां निज़ाम कांग्रेस के हाथ में है. छत्तीसगढ़ सरकार NIA एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे चुकी है. राज्य ने NIA एक्ट को संघीय ढांचे के तहत मिली शक्तियों का उल्लंघन करने वाला बता दिया है. राहुल का ट्वीट इस बहस को छत्तीसगढ़ से निकालकर राष्ट्रीय खबर बनाने की कोशिश करता है. लेकिन इसके लिए वो एक बेहद गंभीर इल्ज़ाम चुनते हैं - कि NIA के हाथ में जाने के बाद दविंदर सिंह वाला मामला शांत पड़ जाएगा. दविंदर के पास बताने को जो कुछ है, वो दुनिया के सामने नहीं आएगा. और इसकी वजह जो राहुल ने बताई है, वो उनके ट्वीट में लगाया गया सबसे गंभीर इल्ज़ाम है. कि NIA चीफ केस को रफा दफा कर देंगे.
राहुल अपने ट्वीट में योगेश चंद्र मोदी के बारे में बात कर रहे थे. योगेश चंद्र 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. उनका काडर है - असम-मेघालय. 2001 में उन्हें पुलिस मेडल फॉर मेरिटोरियस सर्विस मिला और 2008 में प्रेसिडेंट्स पुलिस मेडल फॉर डिस्टिंग्विश्ड सर्विस. प्रमोशन पाते-पाते वो CBI पहुंचे, जहां उन्होंने 10 साल काम किया. पहली बार 2002 से 2010. 2015 में वो CBI के स्पेशल डायरेक्टर बने. इस दौरान उन्होंने शीना बोरा मर्डर केस पर भी काम किया. 22 सितंबर, 2017 को उन्हें NIA में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी माने OSD बना दिया गया. इसी पद पर रहते हुए अक्टूबर, 2017 में योगेश चंद्र मोदी NIA के डायरेक्टर जनरल माने चीफ बनाए गए. उन्होंने शरद कुमार की जगह ली थी. योगेश चंद्र इस पद पर 31 मई, 2021 तक बने रहेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गोधरा दंगों की जांच के लिए जो स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम माने SIT बनाई थी, उसमें 2010 में योगेश चंद्र को शामिल किया गया था. योगेश चंद्र जुलाई, 2012 तक SIT में रहे. योगेश चंद्र ने जिन मामलों की जांच की, उनमें से तीन प्रमुख थे -
- गुलबर्ग सोसायटी - नरोडा पाटिया - नरोडा गाम
SIT ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को गुलबर्ग सोसायटी नरसंहार और दूसरे मामले में क्लीन चिट दी थी. SIT की रिपोर्ट को 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था. इसी SIT में आरके राघवन भी थे. जिन्हें 2016 में साइप्रस में भारत का हाईकमिश्नर बनाया गया.
गुजरात सरकार में एक समय गृहमंत्री थे हरेन पांड्या. नरेंद्र मोदी की सरकार में नहीं, भाजपा की केशुभाई पटेल सरकार में. 26 मार्च, 2003 की सुबह अपने आवास से सैर के लिए निकले हुए थे. अहमदाबाद के लॉ गार्डेन में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. फाइल फोटो
हरेन पंड्या की हत्या का मामला योगेश चंद्र के हाथ आया था जब वो CBI में थे. मामले में 12 लोगों को प्रिवेंशन ऑफ टेररिज्म एक्ट (POTA)के तहत दोषी पाया गया था. अगस्त, 2011 में इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने 12 लोगों को बरी करते हुए CBI की खिंचाई की थी. कोर्ट ने कहा था कि मामले में हुई जांच संकीर्ण दृष्टिकोण के चलते खराब हुई. कोर्ट ने ये भी कहा था कि मामले में जांच अधिकारियों ने क्षमता के अनुरूप काम नहीं किया और इससे अन्याय हुआ.
दविंदर सिंह का मामला NIA को देने की आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है. लेकिन जल्द ही गृह मंत्रालय ऐसा कर सकता है. जम्मू और नई दिल्ली- दोनों जगह इसके लिए ज़रूरी कार्रवाई की जा रही है. अभी तक जितनी जानकारी उपलब्ध है, उससे योगेश चंद्र की पेशेवर क्षमताओं या कथित राजनैतिक झुकाव का ठीक-ठीक पता करना मुश्किल है. फिर जितने मामलों में राहुल ने योगेश चंद्र पर सवाल उठाए हैं, तब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम भले थे, लेकिन योगेश चंद्र उनके मातहत नहीं थे. क्योंकि सीबीआई केंद्र को रिपोर्ट करती है. और केंद्र में राहुल की पार्टी 2004 से 2014 तक राज कर रही थी. तो राहुल के पास अगर NIA चीफ को लेकर कहने को वाकई कुछ है, तो वो अपनी बात ट्विटर पर कहकर खत्म नहीं कर सकते. उन्होंने देश की सबसे ताकतवर एजेंसी के चीफ पर सवाल उठाया है. अब उन्हें अपनी बात साबित करनी चाहिए. ठोस सबूतों के साथ.
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14 जनवरी को लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ट्वीट किया कि अगर दविंदर सिंह, दविंदर खान होते तो संघ की प्रतिक्रिया ज़्यादा मुखर होती. उन्होंने पुलवामा मामले की भी नए सिरे से जांच की मांग की थी. 16 जनवरी का राहुल का ट्वीट इसी लाइन पर आगे जाता है, लेकिन संगठन की जगह इस बार सरकार को संबोधित किया गया. 17 जनवरी को राहुल एक कदम और आगे चले गए. उन्होंने ट्वीट किया,
आतंकवादी DSP दविंदर सिंह को शांत करने का सबसे बढ़िया तरीका है कि केस NIA को दे दिया जाए. NIA के हेड भी एक मोदी ही हैं - YC मोदी. इन्होंने ही गुजरात दंगों और हरेन पंड्या की हत्या की जांच की थी. YC के पास केस जाने का मतलब है केस का खत्म हो जाना.
The best way to silence Terrorist DSP Davinder, is to hand the case to the NIA.
The NIA is headed by another Modi - YK, who investigated the Gujarat Riots & Haren Pandya’s assassination. In YK’s care, the case is as good as dead. #WhoWantsTerroristDavinderSilenced
And why??
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) January 17, 2020
इस ट्वीट में राहुल गांधी ने YK मोदी लिखा है. पर NIA चीफ का नाम योगेश चंद्र मोदी यानी YC मोदी है.
दविंदर को आतंकवादी कहने से बचा जा सकता था
राहुल फिलहाल वायनाड से सांसद भर हैं. लेकिन टिप्पणीकार इस बात पर बराबर ध्यान दिलाते रहते हैं कि राहुल कांग्रेस अध्यक्ष न सही तो उससे कम भी नहीं हैं. और कांग्रेस फिलहाल सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है. इसीलिए राहुल के कहे पर ध्यान तो जाता ही है. और इसीलिए इस ट्वीट का मतलब निकाला ही जाएगा.
दविंदर सिंह कार में दो हिज़बुल आतंकियों के साथ मिले थे. और जम्मू कश्मीर पुलिस उनके बर्खास्तगी के लिए लिख चुकी है. डीजीपी दिलबाग सिंह ने साफ कर दिया है कि पुलिस दविंदर के मामले में ढील नहीं देने वाली. लेकिन फिर भी जांच पूरी हो जाने से पहले ही दविंदर को आतंकवादी लिखने से बचा जा सकता था. हमारे देश में कपड़े और नाम देखकर लोगों को आतंकवादी का लेबल दे देने की परंपरा है. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि इस परंपरा के खिलाफ खड़े होने का दावा करने वाले लोग ऐसा करते दिखें. लेकिन राहुल का ट्वीट एक व्यक्ति पर सवाल उठाने से कहीं आगे जाता है. वो एक संस्था पर सवाल उठा रहे हैं - भारत में आतंकी मामलों की जांच करने वाली सबसे बड़ी एजेंसी- NIA.
NIA आज जितनी ताकतवर है, उसके पीछे कांग्रेस नेताओं का बड़ा हाथ है. सबसे बड़ा नाम- पी चिदंबरम. लेकिन UPA के काम करने के तौर तरीकों पर नज़र रखने वाले आपको बताएंगे कि चाहे चिदंबरम कितने ही सख्त गृह मंत्री हों, NIA का विचार उनका अकेले का नहीं रहा होगा. इसमें पार्टी के शीर्ष नेताओं की रज़ामंदी भी रही होगी. फिर भी NIA कांग्रेस के निशाने पर है. इसकी एक वजह तो यही मानी जा सकती है कि अगर NIA लाठी है, तो वो लाठी आज भाजपा सरकार के हाथ में है. जैसे कभी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के हाथ में थी. अपनी लाठी दूसरे के हाथ में देखना किसी को अच्छा नहीं लगेगा. ये मानव स्वभाव की बात है.
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और वायनाड सांसद राहुल गांधी के साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल. फोटो- पीटीआईदूसरी और ज़्यादा गंभीर वजह है NIA के खिलाफ खड़ी छत्तीसगढ़ सरकार. वही छत्तीसगढ़ जहां निज़ाम कांग्रेस के हाथ में है. छत्तीसगढ़ सरकार NIA एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे चुकी है. राज्य ने NIA एक्ट को संघीय ढांचे के तहत मिली शक्तियों का उल्लंघन करने वाला बता दिया है. राहुल का ट्वीट इस बहस को छत्तीसगढ़ से निकालकर राष्ट्रीय खबर बनाने की कोशिश करता है. लेकिन इसके लिए वो एक बेहद गंभीर इल्ज़ाम चुनते हैं - कि NIA के हाथ में जाने के बाद दविंदर सिंह वाला मामला शांत पड़ जाएगा. दविंदर के पास बताने को जो कुछ है, वो दुनिया के सामने नहीं आएगा. और इसकी वजह जो राहुल ने बताई है, वो उनके ट्वीट में लगाया गया सबसे गंभीर इल्ज़ाम है. कि NIA चीफ केस को रफा दफा कर देंगे.
राहुल अपने ट्वीट में योगेश चंद्र मोदी के बारे में बात कर रहे थे. योगेश चंद्र 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. उनका काडर है - असम-मेघालय. 2001 में उन्हें पुलिस मेडल फॉर मेरिटोरियस सर्विस मिला और 2008 में प्रेसिडेंट्स पुलिस मेडल फॉर डिस्टिंग्विश्ड सर्विस. प्रमोशन पाते-पाते वो CBI पहुंचे, जहां उन्होंने 10 साल काम किया. पहली बार 2002 से 2010. 2015 में वो CBI के स्पेशल डायरेक्टर बने. इस दौरान उन्होंने शीना बोरा मर्डर केस पर भी काम किया. 22 सितंबर, 2017 को उन्हें NIA में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी माने OSD बना दिया गया. इसी पद पर रहते हुए अक्टूबर, 2017 में योगेश चंद्र मोदी NIA के डायरेक्टर जनरल माने चीफ बनाए गए. उन्होंने शरद कुमार की जगह ली थी. योगेश चंद्र इस पद पर 31 मई, 2021 तक बने रहेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गोधरा दंगों की जांच के लिए जो स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम माने SIT बनाई थी, उसमें 2010 में योगेश चंद्र को शामिल किया गया था. योगेश चंद्र जुलाई, 2012 तक SIT में रहे. योगेश चंद्र ने जिन मामलों की जांच की, उनमें से तीन प्रमुख थे -
- गुलबर्ग सोसायटी - नरोडा पाटिया - नरोडा गाम
SIT ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को गुलबर्ग सोसायटी नरसंहार और दूसरे मामले में क्लीन चिट दी थी. SIT की रिपोर्ट को 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था. इसी SIT में आरके राघवन भी थे. जिन्हें 2016 में साइप्रस में भारत का हाईकमिश्नर बनाया गया.
गुजरात सरकार में एक समय गृहमंत्री थे हरेन पांड्या. नरेंद्र मोदी की सरकार में नहीं, भाजपा की केशुभाई पटेल सरकार में. 26 मार्च, 2003 की सुबह अपने आवास से सैर के लिए निकले हुए थे. अहमदाबाद के लॉ गार्डेन में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. फाइल फोटोहरेन पंड्या की हत्या का मामला योगेश चंद्र के हाथ आया था जब वो CBI में थे. मामले में 12 लोगों को प्रिवेंशन ऑफ टेररिज्म एक्ट (POTA)के तहत दोषी पाया गया था. अगस्त, 2011 में इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने 12 लोगों को बरी करते हुए CBI की खिंचाई की थी. कोर्ट ने कहा था कि मामले में हुई जांच संकीर्ण दृष्टिकोण के चलते खराब हुई. कोर्ट ने ये भी कहा था कि मामले में जांच अधिकारियों ने क्षमता के अनुरूप काम नहीं किया और इससे अन्याय हुआ.
दविंदर सिंह का मामला NIA को देने की आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है. लेकिन जल्द ही गृह मंत्रालय ऐसा कर सकता है. जम्मू और नई दिल्ली- दोनों जगह इसके लिए ज़रूरी कार्रवाई की जा रही है. अभी तक जितनी जानकारी उपलब्ध है, उससे योगेश चंद्र की पेशेवर क्षमताओं या कथित राजनैतिक झुकाव का ठीक-ठीक पता करना मुश्किल है. फिर जितने मामलों में राहुल ने योगेश चंद्र पर सवाल उठाए हैं, तब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम भले थे, लेकिन योगेश चंद्र उनके मातहत नहीं थे. क्योंकि सीबीआई केंद्र को रिपोर्ट करती है. और केंद्र में राहुल की पार्टी 2004 से 2014 तक राज कर रही थी. तो राहुल के पास अगर NIA चीफ को लेकर कहने को वाकई कुछ है, तो वो अपनी बात ट्विटर पर कहकर खत्म नहीं कर सकते. उन्होंने देश की सबसे ताकतवर एजेंसी के चीफ पर सवाल उठाया है. अब उन्हें अपनी बात साबित करनी चाहिए. ठोस सबूतों के साथ.
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