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2021 की जनगणना अब 2024 के चुनाव के बाद कराएगी मोदी सरकार? चुनाव हुए तो जनगणना क्यों नहीं?

आज तक जनगणना में इतनी देर नहीं हुई.

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10 जनवरी 2023 (अपडेटेड: 10 जनवरी 2023, 11:26 PM IST)
census 2021
सांकेतिक फोटो (इंडिया टुडे)
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भारत की आबादी कितनी है? इस सवाल का जवाब आपको गूगल पर मिल जाएगा. लेकिन फिर अगला सवाल आएगा, कि इंटरनेट पर मौजूद जानकारी को आप सत्यापित कैसे करेंगे? संदर्भ किसका देंगे? और तब आपको ज़रूरत पड़ेगी भारत की आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों की. सोचिए, अगर आपको एक साधारण से सवाल के जवाब के लिए एक पुख्ता रिपोर्ट की आवश्यकता है, तो तकरीबन 140 करोड़ लोगों के जीवन के हर पहलू के लिए ज़िम्मेदार सरकार को कितने महीन आंकड़ों की ज़रूरत पड़ती होगी. हम सबकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, आवास आदि के लिए जो नीतियां बनाई जाती हैं, वो जनगणना के आधार पर ही तैयार होती हैं. और भारत में 12 सालों से जनगणना हुई ही नहीं. ये काम इस साल भी पूरा नहीं हो पाएगा. और अगले साल कब होगा, स्थिति स्पष्ट नहीं है. इससे आपके जीवन पर क्या फर्क पड़ेगा, इसी के बारे में आज बात करेंगे.

आप पूछ सकते हैं, कि सरकार ने अपने मुंह से तो कहा नहीं कि जनगणना इस साल नहीं होगी. फिर हम किस आधार पर कह रहे हैं कि 2023 में जनगणना नहीं होने वाली. तो ऐसा है कि सरकार सारे काम बता के नहीं करती. तब पत्रकार उन संकेतों को पकड़ते हैं, जिनसे मालूम चलता है कि सरकार किस दिशा में आगे बढ़ रही है. जनगणना में देरी के संकेत कहां से मिले, इसके बारे में हमें बताया इंडिया टुडे से जुड़े तीर्थो बैनर्जी ने. तीर्थो बताते हैं कि 2 जनवरी 2023 को रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया RGI के दफ्तर ने सभी राज्यों और यूनियन टेरिटरीज़ को एक खत लिखकर प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज़ करने की मियाद 30 जून 2023 तक बढ़ाई. इसका मतलब ये, कि अब 30 जून तक ज़िलों, तहसीलों, पुलिस थानों आदि की सीमाओं में परिवर्तन हो सकता है. जनगणना के संदर्भ में इसका मतलब क्या हुआ, इसे समझने के लिए आपको पहले ये जानना होगा जनगणना होती कैसे है.

भारत जैसे विशाल देश में जनसंख्या का पैटर्न स्थान और समय के साथ बदलता रहता है. जो इलाके एक वक्त वीरान थे, वहां 10 साल के भीतर कस्बे बन जाते हैं. मिसाल के लिए दिल्ली NCR का इलाका. जहां दिल्ली से नज़दीकी के चलते उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के ज़िलों में बाकी देश से आकर लोग बस गए हैं. ठीक इसी तरह जहां पलायन की समस्या है, वहां 1 दशक के भीतर गांवों की आबादी घट जाया करती है. इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य समय-समय पर अपने ब्लॉक और ज़िलों की सीमाओं में परिवर्तन करते हैं. जहां आबादी बढ़ती है, वहां ज़िलों का आकार छोटा हो जाता है, और जहां घटती है, वहां पुराने ज़िलों में नए इलाके जोड़े जाते हैं. ये एक सतत प्रक्रिया है.

अब ये स्वाभाविक सी बात है कि एक से डेढ़ साल चलने वाली जनगणना के बीच में भी सीमाएं बदल सकती हैं. तब ये दिक्कत आएगी कि अमुक मकान या व्यक्ति को किस खांचे में गिना जाए. इससे बचने के लिए रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया का दफ्तर जनगणना से तीन महीने पहले प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज़ करने का आदेश जारी कर देता है. इन तीन महीनों में सारे ज़िलों, थानों आदि की सीमाओं में आए बदलाव आदि की जानकारी इकट्ठा होके संबंधित सूबे में मौजूद Directorate of Census Operations के पास जाती है. और फिर वहां से रजिस्ट्रार जनरल के दफ्तर में. इसी जानकारी के आधार पर रजिस्ट्रार का दफ्तर जनगणना की तैयारी करता है.

तैयारी पूरी होने पर RGI दफ्तर जनगणना का विधिवत काम शुरू करता है. लेकिन इसमें सीधे लोगों की गिनती नहीं की जाती. दो मुख्य चरण होते हैं -
> हाउस लिस्टिंग
> पॉपुलेशन एनुमरेशन
ये क्या हैं,  आइए समझें -

जनसंख्या में कोई दोबारा न गिन लिया जाए, इसीलिए असल गिनती से पहले पूरे भारत की एक-एक इमारत का सर्वे किया जाता है, चाहे वो कोई बड़ी बिल्डिंग हो, होटल हो, घर हो या झोंपड़ा ही हो. इसे कहा जाता है हाउस लिस्टिंग. सर्वे के दौरान हर इमारत का प्रकार, उसमें मौजूद सुविधाएं और संपत्ति की जानकारी ली जाती है. मसलन - घर में शौचालय है या नहीं, घर में पानी कैसे आता है, फ्रिज है या नहीं, गाड़ी है तो कौनसी है, आदि. पहले ये काम फॉर्म्स के ज़रिये होता था. शिक्षक, पटवारी या सरकारी अमले के दूसरे कर्मचारी इन्हें घर-घर जाकर भरते हैं. इसके बाद इन्हें डेटा-प्रोसेसिंग सेंटर्स में ले जाया जाता है. यहां फॉर्म्स की जानकारी को सरकारी सर्वर पर डाल दिया जाता है. फिर विश्लेषण का काम आगे बढ़ता है. ये एक लंबा और थका देने वाला काम है, जिसमें लगभग 10 से 11 महीने लग जाते हैं. कभी-कभी इससे भी ज़्यादा.

जनगणना 2021 में फॉर्मस की जगह टैबलेट्स का इस्तेमाल होगा. उदाहरण के लिए आई-पैड. जनगणना करने वाले कर्मचारी जब किसी इमारत का सर्वे करेंगे, तो टैबलेट अपने साथ ले जाएंगे. और सर्वे की जानकारी सीधे सरकारी पोर्टल पर जाएगी. इससे हाउस लिस्टिंग का काम तेज़ तो होगा, लेकिन कर्मचारियों को घर-घर तो जाना ही पड़ेगा. और इसीलिए जानकार यही मानते हैं कि डिजिटाइज़ेशन के बावजूद हाउस लिस्टिंग में महीनों लगेंगे.

हाउस लिस्टिंग के बाद असल जनगणना होती है. जिसे कहा जाता है पॉपुलेशन एनुमरेशन. इसमें RGI भारत में रहने वाले हर व्यक्ति की विस्तृत जानकारी इकट्ठा करता है, चाहे संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक हो, या न हो. और तब मालूम चलती है गिनती. कि भारत की जनसंख्या अमुक तारीख के अमुक वक्त पर कितनी थी?

अब इस संदर्भ के साथ तीर्थो की बात का मतलब समझिये. अगर अब जनगणना का फैसला ले भी लिया जाए, तो RGI के खत के मुताबिक 30 जून तक प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज़ की जाएंगी. इसके बाद 3 महीने RGI का दफ्तर जनगणना की तैयारी करेगा. माने 30 सितंबर के बाद ही हाउस लिस्टिंग शुरू हो पाएगी और फिर असल जनगणना होगी. डिजिटाइज़ेशन के बावजूद हाउस लिस्टिंग 2023 के अंत तक पूरी हो पाएगी, ऐसा लगता नहीं. 2024 में सरकारी अमले का फोकस पूरे देश में आम चुनाव करवाने पर रहेगा. तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में तो आम चुनावों के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी होने हैं. इसीलिए जानकार मान रहे हैं कि मौजूदा नियमों के तहत जनगणना करवाई गई, तो वो 2024 के आम चुनाव के बाद तक टल सकती है.

एक और बात है. पूर्व में जनगणना न करवाने के पीछे ये तर्क दिया गया था, कि पहली प्राथमिकता कोरोना टीकाकरण है. ये हो जाए, तब जनगणना की जा सकती है. लेकिन इस बार जनगणना की तारीख आगे बढ़ाते हुए कोई कारण नहीं दिया गया है. बस इतना कहा गया है कि 14 जून 2022 के खत में प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज़ करने की तारीख 31 दिसंबर 2022 दी गई थी. इस मियाद को अब बढ़ाया जाता है. सीमाएं 1 जुलाई 2023 को फ्रीज़ की जाएंगी. इस खत में ''सेंसस 2021'' शब्द का इस्तेमाल भी नहीं हुआ है. बस ''एनसुइंग सेंसस'' लिखा गया है. जिसका अर्थ होता है, आगामी जनगणना. इससे ये स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि जनगणना होगी कब.

28 मार्च 2019 को निवर्तमान मोदी सरकार ने एक गजट नोटिफिकेशन निकालकर 2021 की जनगणना का संकल्प अधिसूचित किया था. माने सरकार ने आधिकारिक ऐलान किया, कि वो जनगणना कराने जा रही है. 1 जनवरी 2020 को प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज़ किया जाना था. इसके बाद जनगणना की तैयारी शुरू होती. लेकिन अनेक राज्यों ने केंद्र से कहा, कि उन्हें अपने यहां नई सीमाएं बनानी हैं, इसीलिए फ्रीज़िंग की तारीख को 31 दिसंबर 2020 तक बढ़ा दिया गया. इसके बाद इसे 31 दिसंबर 2021 तक बढ़ाया गया. फिर 30 जून 2022 तक बढ़ाया गया. इसके बाद फिर दो बार मियाद बढ़ाई गई, जिसके बारे में हम आपको बता चुके हैं.

जनगणना का काम केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत होता है, सो 14 दिसंबर 2022 को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने राज्य सभा में बताया कि ''अगले आदेश'' तक जनगणना टाल दी गई है. कारण - कोरोना. अब यहां सवाल उठता है कि क्या दुनिया में सारे देशों ने महामारी के चलते जनगणना टाल दी? इसका जवाब देते हुए तीर्थो बैनर्जी बताते हैं कि कोविड के बावजूद 2020 में अमेरिका, इंग्लैंड और चीन ने जनगणना की.

अब आप पूछ सकते हैं कि भैया सरकार के पास सेंसस के अलावा भी कई तरह का डेटा होता है. जैसे नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे NFHS से स्वास्थ्य का डेटा मिलता है. NSSO के पास रोज़गार का डेटा होता है. ये बाहर भले न आ रहा हो, लेकिन डेटा है तो सही. तब सेंसस इतना ज़रूरी क्यों है कि हमने पूरा दी लल्लनटॉप शो ही इसपर बना दिया. जवाब सुनिए IIT दिल्ली में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली प्रोफेसर रीतिका खेड़ा से. रीतिका लगातार जनसंख्या और जनगणना से जुड़े मसलों पर लिखती रही हैं.

उन्होंने बताया कि जनगणना में देश के हर एक व्यक्ति की गिनती होती है, कोई भी नहीं छूटता. लेकिन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे या ऐसे ही किसी और सर्वे का डेटा 2 से 3 लाख लोगों पर आधारित होता है. इसमें देश के सभी लोगों के बारे में जानकारी नहीं होती.

एक और बात है. सरकार के पास मौजूद बाकी डेटा और सेंसस के आंकड़ों की कानूनी स्थिति में फर्क है. इतना ही नहीं, ये आपकी निजता, माने प्राइवेसी से भी जुड़ा विषय है. इसके बारे में रीतिक खेड़ा बताती हैं कि जो भी जानकारी सरकार जनगणना के तहत इकट्ठा करती है वो पूरी तरह सुरक्षित होती है, वहीं बाकी सर्वे आदि की जानकारी कई और पोर्टल्स के साथ साझा की जाती है.

हमने इस विषय पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी से भी बात की. कुरैशी ने जनसंख्या पर ''द पॉपुलेशन मिथ'' नाम से एक किताब भी लिखी है. उन्होंने दी लल्लनटॉप को एक दूसरे पहलू से अवगत कराया. कि जनगणना के न होने से, नुकसान तो सभी का है, लेकिन सबसे ज़्यादा चोट पहुंचती है वंचित तबकों पर. सरकार ने इस बार जनगणना को आगे बढ़ाने का कोई कारण नहीं दिया है. ऐसे में किसी को लग सकता है कि इस साल कई हाई प्रोफाइल चुनाव हैं - मसलन कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़. और अगले साल तो आम चुनाव ही हैं. तो ऐसे में सरकार को जनगणना के लिए वक्त कैसे मिलेगा. इसका जवाब देते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी कहते हैं कि आजादी के बाद से अब तक 7 बयार जनगणना हो चुकी है और जिस साल जनगणना हुई है उस दौरान राज्यों में चुनाव भी हुए. जब पहले चुनावों के साथ-साथ जनगणना हो सकती है तो अब क्यों नहीं.

एक तर्क ये भी दिया जा सकता है, कि सरकार के पास 2011 की जनगणना के आंकड़े तो हैं ही. और उसके पास जनसंख्या और लोगों के जीवन में आए परिवर्तन को लेकर अलग अलग आंकलन भी मौजूद हैं. ऐसे में 2011 की जनसंख्या को आधार बनाकर आंकलन के आधार पर नीतियां बनाई जा सकती हैं. माने प्रोजेक्शन्स के आधार पर भी पॉलिसी बन सकती है. लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं होगा. अर्थशास्त्र की प्रोफेसर रीतिका खेड़ा के मुताबिक 2011 के बाद से जनसंख्या काफी बढ़ चुकी है. इस वजह से अगर सरकार पुराने आंकड़ों के मुताबिक नीतियां लागू करती है तो सभी को इसका फायदा नहीं मिल पाएगा.

तो सुना आपने, सिर्फ एक स्कीम से 10 करोड़ लोग बाहर छूट जा रहे हैं. 10 करोड़. गूगल से पता कीजिएगा कि ये संख्या कितने देशों की आबादी से ज़्यादा है. इतने लोगों तक सरकारी नीतियों का सही फायदा नहीं पहुंच पा रहा. और हम सिर्फ एक स्कीम की बात कर रहे हैं. हम उम्मीद करते हैं कि इससे आपको अंदाज़ा हो गया होगा, कि जनगणना करवाना और जल्द करवाना कितना ज़रूरी है. अब आपकी ज़िम्मेदारी है, कि इस काम के लिए अपने प्रतिनिधियों को ''प्रेरित'' करें.

चलते चलते जातीय जनगणना पर भी बात कर लेते हैं, जिसे लेकर अक्सर राजनीति गर्म रहती है. जातीय जनगणना में प्रत्येक जाति के लोगों की संख्या का हिसाब रखा जाता है. 2011 की जनगणना में 29 तरह की जानकारी लोगों से इकट्ठा की गई थी. आम तौर पर होने वाली जनगणना में सवालों की लिस्ट में एक कॉलम अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति का भी होता है. जनगणना करने वाले कर्मचारी केवल इन्हीं दो समुदाय से जुड़े लोगों के बारे में जानकारी इकट्ठा करते हैं. गृह मंत्रालय के मुताबिक भारत सरकार ने आजादी के बाद से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा जाति जनगणना नहीं की.

अब कई विपक्षी दल हैं जो जातीय जनगणना की मांग केंद्र से कर रहे हैं. उनका तर्क है कि जातियों की जनगणना होने से उन तक योजनाएं पहुंचाने और अधिकार दिलाने में आसानी होगी. हालांकि एक पहलू राजनीतिक वोटबैंक का भी है. जानकार बताते हैं कि यही वो पहला मुद्दा है जो बिहार में नीतीश और तेजस्वी को साथ लाया. JDU और RJD दोनों ही वक्त-वक्त पर जातीय जनगणना की बात करते रहे हैं. फिलवक्त बिहार में जातीय जनगणना चल रही है, जिसका काम 7 जनवरी से शुरू हुआ. इसे दो चरणों में पूरा किया जाएगा. पहला चरण 21 अप्रैल तक चलेगा. दूसरे चरण की गिनती 1 अप्रैल से शुरू होगी और 30 अप्रैल तक चलेगी. बिहार सरकार ने जाति-आधारित जनगणना का सारा काम 30 मई तक पूरा करने का टारगेट रखा है.

जैसे बाकी जनगणना होती है वैसे ही इसे भी घर-घर जाकर किया जा रहा है. बिहार सरकार का अनुमान है कि इसमें 500 करोड़ रुपए खर्च होंगे. ये अनुमानित है यानी इस खर्च में घटोतरी-बढ़ोतरी हो सकती है. अब सवाल है कि क्या इससे पहले किसी राज्य में जातीय जनगणना हुई है? जवाब हां में है. कर्नाटक में 2015 में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने राज्य में जाति आधारित जनगणना करवाई थी. लेकिन इसका डेटा आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया. एक सवाल और कि क्या कभी देशव्यापी जातीय जनगणना हुई है?

आजादी के पहले 1931 तक जातीय जनगणना ब्रतानिया हुकूमत कराती थी. 1941 तक ये सिलसिला चला. विरोध हुआ तो 1941 में डेटा इकट्ठा करने के बाद पब्लिश नहीं हुआ. 2010 में जाति आधारित जनगणना की मांग फिर उठी. लालू यादव, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव और गोपीनाथ मुंडे जैसे ओबीसी नेताओं ने ज़ोर शोर से ये मांग उठाई. कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार इसके पक्ष में नहीं थी. लेकिन गठबंधन की सरकार थी. तो मांग माननी पड़ी. इस जनगणना को नाम दिया गया- सोशियो- इकनॉमिक एंड कास्ट सेन्सस. 48 सौ करोड़ रुपये खर्च कर सरकार ने जनगणना कराई. ज़िलावार पिछड़ी जातियों को गिना गया. जातीय जनगणना का डेटा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को दिया गया. कई सालों तक इस डेटा की बात नहीं हुई. मोदी सरकार में इस डेटा पर फिर सुगबुगाहट शुरू हुई. जातीय जनगणना के डेटा के क्लासिफिकेशन के लिए एक एक्सपर्ट ग्रुप बनाया गया. इस ग्रुप ने रिपोर्ट दी या नहीं, इसकी जानकारी अब तक नहीं आई है. कुल मिलाकर डेटा अब तक पब्लिश नहीं हुआ है.

जुलाई 2021 में संसद के मॉनसून सत्र के दौरान सरकार से जातीय जनगणना पर सवाल पूछा गया था. सवाल था कि 2021 की जनगणना जातियों के हिसाब से होगी या नहीं? नहीं होगी तो क्यों नहीं होगी. सरकार का लिखित जवाब आया. कहा कि सिर्फ एससी, एसटी को ही गिना जाएगा. यानी ओबीसी जातियों को गिनने का कोई प्लान नहीं है.

जातीय जनगणना का अपना राजनैतिक गणित है. इसीलिए इसके सही और गलत में हम आज नहीं गए. आज हम सिर्फ एक बात दर्ज कराना चाहते हैं. कि भारत में जनगणना में खतरनाक रूप से देरी हो रही है. द्वितीय विश्वयुद्ध, 1961 के भारत-चीन युद्ध और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के वक्त जनगणना प्रभावित हुई थी, लेकिन टली नहीं. तब 2021 की जनगणना को टालने का क्या ही मतलब रह जाता है. 

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: मोदी सरकार जनगणना कराने में क्यों हिचक रही है?

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