कन्हैया के लालू प्रेम से हमें चंदू याद आ रहे हैं
JNU की नौजवान आवाज रहे चंदू को सन् 97 में किसने मरवाया था? जिसने मरवाया था, उसे किसकी सरपरस्ती हासिल थी?

मूर्तियां बनाना बुरा होता है.
जो तारीफ के लिए, सराहे जाने या पूजे जाने के लिए ये मूर्तियां बनाते हैं उनके लिए तो यह बुरा होता ही है. जिनकी मूर्तियां बनाई जाती हैं उनके भविष्य के लिए भी यह घातक साबित होता है. यह मूर्तियां बनाने अौर गिराए जाने का काम पिछले दिनों जेएनयू स्टूडेंट यूनियन प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार के मामले में दोनों अोर से हुआ. जैसे उन्हें 'खलनायक' बनाने की अतिवादी कोशिशें बढ़ीं, वैसे ही उनमें हीरो अौर 'तारणहार' देखने की प्रवृत्तियां भी बलवती हुईं.
लेकिन इस दूसरे इंसान में तारणहार देखने की प्रवृत्तियों के नतीजे घातक होते हैं.

कन्हैया कुमार की एक तस्वीर बीते दो दिन से सोशल मीडिया पर घूम रही है. बवंडर इसी तस्वीर से उठा है. इस तस्वीर में कन्हैया 'राष्ट्रीय जनता दल' नेता अौर अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के साथ नज़र आ रहे हैं अौर उनका पोस्चर देखकर लगता है कि वो उनके चरण छूने की अोर बढ़ रहे हैं. मित्रता अौर घनिष्ठता का यह जेस्चर खुद उनके बहुत से वैचारिक साथियों को हजम नहीं हो रहा.
आखिर क्या खास है इस तस्वीर में जिससे जनता बौखलाई हुई है. राजनीति में 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है' के सिद्धान्त के तहत तो इसे स्वाभाविक गठबंधन माना जाना चाहिए. लेकिन इस तस्वीर को देखते ही एक अन्य तस्वीर लोगों के ज़ेहन में घूम जाती है, अौर यही दूसरी तस्वीर इस तड़प की वजह है. वो स्मृति मेें घूमती तस्वीर है एक अौर जेएनयू प्रेसिडेंट की. वो तस्वीर है एक अौर 'जनता के नायक' की. वो तस्वीर है 'चंदू' की.
एक तस्वीर, अौर एक दिन − 31, मार्च 1997.
तारीख, जो चंदू की अमिट छवि को कन्हैया की इस ताजा तस्वीर के लिए प्रासंगिक बना देती है.

फोटो, 'एक मिनट का मौन' से
'चंदू', जेएनयू में साथी उन्हें इसी प्यार भरे नाम से पुकारा करते थे. कॉमरेड चंद्रशेखर 1993-94 में जवाहरलाल नेहरू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए अौर फिर उसके बाद दो बार लगातार जेएनयू के प्रेसिडेंट रहे. जेएनयू की नामचीन प्रेसिडेंशियल स्पीच में उनकी अोजस्वी वाणी सुनने वालों की स्मृतियों में आज भी अमिट है.
चंदू बिहार के सिवान जिले से थे. तिलैया के सैनिक स्कूल से पढ़े चन्द्रशेखर एनडीए में चुने गए. लेकिन वहां मन ना रमा तो वापस अपने गृहराज्य बिहार लौट आए अौर छात्र राजनीति में सक्रिय हुए. वे अॉल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ़) की राज्य इकाई में उपाध्यक्ष के पद तक पहुंचे. एआईएसएफ़ राजनैतिक पार्टी 'सीपीआई' की छात्र इकाई है. वही छात्र संगठन जिससे जेएनयू के वर्तमान अध्यक्ष कन्हैया कुमार आते हैं.
चंद्रशेखर के जीवन में निर्णयकारी अगला पड़ाव आया जब वे पढ़ने के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय आए. यहां उनका जुड़ाव अॉल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) से हुआ, जो सीपीआई एमएल (लिबरेशन) की छात्र इकाई है. जेएनयू में उन्हें छात्रों के लिए हमेशा समर्पित रहनेवाले जननेता की पहचान मिली. विश्वविद्यालय के छात्र उनमें अपना नेता नहीं, एक करीबी दोस्त को देखते थे.
लेकिन चंद्रशेखर के लिए जेएनयू की पढ़ाई अौर छात्र राजनीति में पहचान किसी ऊंचे अोहदे या चमकदार राजनैतिक करियर के लिए स्टेपिंग स्टोन नहीं थी. उन्होंने बहुत पहले खुद से एक वायदा किया था कि जिस मिट्टी ने उन्हें बनाया, उसके लिए कुछ करना है. जेएनयू से पढ़ाई पूरी कर वे अपने उसी खुद से किए वादे को पूरा करने वापस लौट गए बिहार के सिवान. सिवान में उन दिनों जनता दल से सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन का आतंक था. अपराध की दुनिया से राजनीति में आए शहाबुद्दीन को लालू ने शरण दी. नब्बे अौर पच्चानवे में वह राज्य विधानसभा में चुने गए अौर छियानवे के लोकसभा चुनावों में जनता दल के टिकट पर जीतकर सांसद बन गए. इसी दौर में चंद्रशेखर सिवान पहुंचे अौर उन्होंने राजनीति अौर अपराध के गठजोड़ के खिलाफ, शहाबुद्दीन के खिलाफ एक प्रतिपक्षी राजनीति खड़ी करनी शुरू की. हालात बदलने लगे.
ये 1997 का साल था. होली गुज़री ही थी अौर बिहार में राजनैतिक सरगर्मियां तेज थीं. तत्कालीन राज्य सरकार के खिलाफ 2 अप्रैल को होने वाले राज्य बन्द के लिए चंद्रशेखर प्रचार अभियान में लगे थे अौर चौक चौराहों पर घूमकर नुक्कड़ सभाएं कर रहे थे. तभी सिवान के जेपी चौक पर तीन बंदूकधारी व्यक्तियों ने चंदू पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं. एमएल के नेता श्याम नारायण अौर वहीं ठेला लगाने वाले भुट्टेले मियां उनके साथ इस गोलीबारी में मारे गए.
चंदू की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई.

फोटो, 'एक मिनट का मौन' से
सीधा आरोप शहाबुद्दीन पर लगाया गया. उन्हें संरक्षण देने वाली पार्टी अौर नेता सीधे छात्र राजनीति के निशाने पर आ गए. इधर खबर कैम्पस पहुंची अौर दिल्ली जल उठी. तमाम छात्र बिहार भवन के बाहर प्रदर्शन करने इकट्ठा हुए, जहां भीतर लालू प्रसाद यादव मौजूद थे. लालू यादव तो छात्रों से बात करने बाहर नहीं आए, वहां लाठियों अौर हवा में चलती गोलियों ने उन छात्रों का स्वागत किया. इसके अगले कई दिनों तक दिल्ली की सड़कों पर छात्रों के अभूतपूर्व जनसमूह न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर निकले. एक अोर टियर गैस, बम शेल, वॉटर कैनन थे. दूसरी अोर छात्रों का हौसला. केस की जांच सीबीआई को दे दी जाती है.
मानवाधिकार संगठन पीपल्स यूनियन अॉफ सिविल लिबर्टीज़ की 2001 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन आरजेडी सरकार ने शहाबुद्दीन को जो संरक्षण अौर अघोषित अभयदान दिया हुआ था, उसने ही उन्हें बिहार में कानून से भी ऊपर बना दिया. पुलिस ने उनकी गैरकानूनी गतिविधियों से अांखें फेर लीं अौर सिवान शहाबुद्दीन के अातंक का गढ़ बन गया. उनका आतंक इतना था कि कोई उनके खिलाफ गवाही देने की हिम्मत भी नहीं करता था.
शहाबुद्दीन 2004 में एक अन्य सीपीआई एमएल कार्यकर्ता की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए. फिर नवंबर 2005 में दिल्ली से हुई गिरफ्तारी के बाद से वे जेल में हैं. 2009 में इलेक्शन कमीशन ने उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी.
23 मार्च 2012 को, चंदू की हत्या के पन्द्रह साल बाद इस केस का फैसला आता है. तीन शार्प शूटर ध्रुव कुमार जायसवाल, शेख मुन्ना, इलियास वारसी को उम्रकैद की सज़ा सुनाई जाती है.
लेकिन क्या न्याय हुआ? गोली चलानेवाले तो पकड़े गए, लेकिन उनका क्या हुआ जिनके कहने पर गोली चलवाई गई थी?
कन्हैया की इस नई तस्वीर से जुड़ी विडम्बना, अौर अफसोस यहीं छिपा है. ठीक इस समय जब कन्हैया की लालू प्रसाद यादव के साथ नज़दीकी अौर साझेदारी की यह तस्वीर सामने आ रही है, लालू प्रसाद अपनी नई हासिल हुई राजनैतिक ताकत के साथ शहाबुद्दीन का राजनैतिक पुनर्वास शुरू कर चुके हैं.
लालू प्रसाद यादव आज बिहार के चीफ मिनिस्टर नीतीश कुमार की सरकार में बराबर के साथी हैं. नीतीश कुमार, देश में 'धर्मनिरपेक्ष' ताकतों के तारणहार. पिछले दिनों आरजेडी के दो नेताअों की सिवान जेल में शहाबुद्दीन से हुई मीटिंग का वीडियो सामने आया था. वे जेलर के कमरे में बैठे नेताअों के साथ चाय समोसे खाते हुए देखे गए. बाद में हल्ला होने पर जेलर को सस्पेंड कर दिया गया. लेकिन उन नेताअों या पार्टी के नेता पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. उसके एक ही महीने बाद लालू यादव ने ससम्मान शहाबुद्दीन को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल कर लिया है.
लेकिन सवाल कन्हैया से नहीं है. उन लोगों से है जिन्होंने कन्हैया की अपने मन मुताबिक 'मूर्तियां' बनाईं.
आखिर में, राजनीति में 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है' का सिद्धान्त चलाने वालों के लिए एक पुरानी याद. 77 के क्रांतिकारी दौर में कांग्रेस को हराने के लिए पहली बार इसी सिद्धान्त के तहत जनसंघ को केन्द्र की मुख्यधारा राजनीति में हिस्सा मिला था. अौर...
चंदू पर, अौर उनकी हत्या के बाद उठे छात्र आन्दोलन पर डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाई है निर्देशक अजय भारद्वाज ने. 'एक मिनट का मौन'. फिल्म आप यहां देख सकते हैं −https://www.youtube.com/watch?v=JmHv8pbUKhc

