इज़रायली सेना गाज़ा में इस्लामिक जिहाद पर हमले क्यों कर रही है?
फ़िलिस्तीन इस्लामिक जिहाद (PIJ) की पूरी कहानी क्या है?

26 अक्टूबर 1995 की तारीख़ को भूमध्यसागर में बसे ख़ूबसूरत देश माल्टा का मौसम गुनगुना था. सुबह के 10 बजे की बात है. होटल डिप्लोमैट के अहाते में एक औसत कद-काठी का एक अधेड़ शख़्स सूटकेस थामे कार से उतरा. उसकी आंखों पर गोल ऐनक लगी थी. सिर पर विग, बदन पर साधारण कपड़े और चाल में बेफ़िक्री. शायद ये तूफान से पहले वाली शांति थी.
होटल के रिसेप्शन पर पहुंचकर उसने दुआ-सलाम की. मेनेजर उसे पहले से जानता था. वो पहले भी कई मौकों पर माल्टा आ चुका था और हमेशा उसी होटल में रुकता था. उसने अपना आइडी कार्ड निकाला. उसमें नाम लिखा था, डॉ इब्राहिम अली शाबेश. ये नाम असली नहीं था. लेकिन होटल का स्टाफ़ लंबे समय से भरम में था. उन्होंने कमरा नंबर 616 की चाबी उसे थमा दी.
कमरे में बैग रखने के बाद शाबेश शॉपिंग के लिए निकला. उसे अभी तक अंदाज़ा नहीं था कि उसका पीछा किया जा रहा है. जैसे ही वो शर्ट खरीदकर दुकान से बाहर आया, एक मोटरसाइकिल उसके बगल में आकर खड़ी हो गई. पीछे बैठे शख़्स ने साइलेंसर वाली पिस्टल निकालकर शाबेश को गोली मार दी. छह गोलियों के बाद शाबेश धराशायी हो चुका था. उसके बाद हमलावर नीचे उतरा. उसने खाली खोखे चुनकर अपनी जेब में रखे. उसके बाद बाइक और दोनों सवार गायब हो गए. कई दिनों के बाद बाइक समंदर के किनारे लावारिस अवस्था में मिली. पता चला कि उस बाइक को हत्या से एक दिन पहले चुराया गया था. बाकी बचे दोनों हमलावर. वे समंदर के रास्ते अपने देश निकल चुके थे. इज़रायल.
हत्या के बाद माल्टा में हंगामा मचा. पुलिस ने जांच शुरू की. तब जाकर मालूम हुआ कि जिसे होटल का स्टाफ़ डॉ इब्राहिम अल शाबेश समझ रहा था, असल में वो इज़रायल के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक था. उसका नाम था, फ़तही शकाक़ी.
वही शकाकी, जो गाज़ा की झुग्गियों में पैदा हुआ, फ़िजिक्स और गणित की पढ़ाई की और उसका इस्तेमाल आतंक फैलाने में करने लगा.

जो सुसाइड बॉम्बर्स के लिए कहा करता,
मैं पहले टेस्ट करता हूं. मैं उन्हें नहीं जाने के लिए मनाता हूं. अगर इसके बाद भी वो बलिदान देने की बात करते हैं, तब मैं उन्हें चुनता हूं.
जो हत्या से एक दिन पहले लीबिया के तानाशाह शासक मुअम्मार गद्दाफ़ी से मिलकर आया था. गद्दाफ़ी उसकी मदद के लिए तैयार हो गया था. इस मुलाक़ात से इज़रायली खेमे में नाराज़गी थी. क्यों?
क्योंकि, ये वही फ़तही शकाकी था, जिसने 1980 के दशक में फ़िलिस्तीन इस्लामिक जिहाद (PIJ) की स्थापना की. PIJ आगे चलकर इज़रायल में आत्मघाती हमलों के लिए कुख्यात हुआ. शकाकी की मौत के बाद PIJ का नेतृत्व डूब चुका था. उसके कद का कोई नेता नहीं था. तब ईरान ने इस गुट को अपनी कठपुतली बना लिया. लंबे समय तक PIJ छिट-पुट हमले करता रहा. उसको लगभग गौण मान लिया गया था.
फिर आज हम PIJ की चर्चा क्यों कर रहे हैं?दरअसल, दशकों के बाद ये गुट एक बार फिर से इज़रायल के सामने खड़ा है. इज़रायल ने PIJ के दो बड़े कमांडर्स की हत्या कर दी है. इसके अलावा, इज़रायल के हमलों में 40 से अधिक लोग मारे गए हैं. तीन दिनों तक चली लड़ाई के बाद ईजिप्ट ने शांति की पहल की है. इसके बाद हमले पर विराम लगा है. लेकिन ये विराम कब तक कायम रहेगा, दावे से नहीं कहा जा सकता.
तो, आज हम जानेंगे,
- फ़िलिस्तीन इस्लामिक जिहाद (PIJ) की पूरी कहानी क्या है?
- इज़रायल ने गाज़ा पर हमला क्यों किया?
- और, ईजिप्ट दोनों पक्षों के बीच शांति की पहल क्यों कर रहा है?
पहले बैकग्राउंड समझ लेते हैं.
साल 1923. ईजिप्ट की राजधानी काहिरा के एक टीचर ट्रेनिंग स्कूल में एक नौजवान ने दाखिला लिया. उम्र 17 साल. नाम, हसन अल-बन्ना. चार बरस की ट्रेनिंग के बाद उसे एक प्राइमरी स्कूल में नौकरी मिल गई. स्कूल इस्माइलिया शहर में था. स्वेज़ नहर के पास. इस नहर पर ब्रिटेन और कुछ दूसरे देशों का नियंत्रण था. वे स्थानीय मज़दूरों के साथ दोयम दर्ज़े का सलूक करते थे. उन्हें इस्लामिक रीति-रिवाजों का पालन करने से रोका जाता था. अल-बन्ना को इससे धक्का पहुंचा था. उन्होंने कुछ मज़दूरों के साथ मिलकर एक संगठन बनाया. इसको अरबी में कहा गया, अल-इख़्वान अल-मुस्लिमीन. पॉपुलर कल्चर में इसे मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम से जाना जाता है.

मुस्लिम ब्रदरहुड का मुख्य मकसद था, इस्लाम का कायाकल्प. उनका मानना था कि क़ुरान और हदीस का पालन करके ही इस्लाम में सुधार लाया जा सकता है. अगर ऐसा नहीं किया गया तो धर्म ख़तरे में पड़ जाएगा. अल-बन्ना के संगठन को अच्छा-खासा समर्थन मिला. ईजिप्ट के हरेक तबके के लोग इससे जुड़े. एक समय तक ये ईजिप्ट की राजनीति और सत्ता का अभिन्न हिस्सा बन गया.
दूसरे विश्वयुद्ध के शुरुआती सालों में मुस्लिम ब्रदरहुड में फूट पड़ गई. एक धड़ा हिंसा की वक़ालत करने लगा. उसने सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी. सरकार नाराज़ हो गई. उसने संगठन पर ताला लगा दिया. ब्रदरहुड के नेताओं को जेल में डाल दिया गया. उनकी संपत्तियों को जब्त कर लिया गया. इससे गुस्सा होकर ब्रदरहुड के एक स्टूडेंट लीडर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नूकराशी पाशा की हत्या कर दी. अल-बन्ना ने हत्या की निंदा की.
उन्होंने सरकार के साथ मिलकर रिश्ता सुधारने की कोशिश भी की. 12 फ़रवरी 1949 को अल-बन्ना अपने साले के साथ एक मंत्री से मिलने काहिरा गए. शाम हो गई, लेकिन मंत्री नहीं आए. अल-बन्ना वापस लौटने के लिए टैक्सी का इंतज़ार करने लगे. इसी दौरान उन्हें गोली मार दी गई. हसन अल-बन्ना की मौत के बाद ईजिप्ट में मुस्लिम ब्रदरहुड ठप पड़ गया. गमाल अब्देल नासेर के दौर में संगठन को लगभग दबा दिया गया.
ईजिप्ट में अल-बन्ना नहीं थे. लेकिन उनकी सीखें थी. उनके अनुयायी थे. उनके अवशेष बचे थे. जिसकी टहनियों से कई दूसरे देशों में नई इमारतें गढ़ी जाने वालीं थी. इसका पहला उदाहरण 70 के दशक में देखने को मिला. कैसे? ये समझने के लिए हमें फिर से पीछे चलना होगा. कितना पीछे? दो दशक पीछे. मई 1948 में इज़रायल की स्थापना हुई. स्थापना के अगले दिन ही अरब देशों ने हमला कर दिया. इस लड़ाई में इज़रायल बीस साबित हुआ. उसने पहले से तय ज़मीन से अधिक हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसके हिस्से में जो ज़मीन आई, वहां से फ़िलिस्तीनी परिवारों को निकाल दिया गया. उनमें से कुछ को गाज़ा में शरण मिली. ऐसे ही एक परिवार में 1951 में फ़तही शकाकी का जन्म हुआ था.
शकाकी ने शरणार्थियों के लिए बने यूनाइटेड नेशंस के स्कूल में पढ़ाई की. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद शकाकी मेडिकल की पढ़ाई के लिए ईजिप्ट गया. वहां वो मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा. अल-बन्ना के लिखे को आत्मसात किया. एक इंटरव्यू में शकाकी ने अल-बन्ना को अपना मार्गदर्शक बताया था. ईजिप्ट में वो कई और विद्रोही नेताओं के संपर्क में आया. उनमें से कुछ 1981 में ईजिप्ट के राष्ट्रपति अनवर सदात की हत्या में शामिल हुए थे. हालांकि, शकाकी उससे पहले ही वापस लौट आया था. उसके पास डॉक्टर की डिग्री थी. उसने ईस्ट जेरूसलम के एक अस्पताल में काम करना शुरू कर दिया. लेकिन उसका मन कहीं और रमा था.
जनवरी 1995 में ब्रिटिश अख़बार ‘द इंडिपेंडेंट’ में एक रिपोर्ट पब्लिश हुई. इसका टाइटल था,
The Doctor Who Finds Death a Laughing Matter
वो डॉक्टर जिसके लिए मौत एक मज़ाक भर है
ये रिपोर्ट फ़तही शकाकी से हुए इंटरव्यू पर बेस्ड थी. इसका एक हिस्सा सुनिए,
“ईजिप्ट में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान डॉ शकाकी को कुछ ऐसा दिखा, जिसने उसे इज़रायल के सबसे ख़तरनाक दुश्मनों में से एक बना दिया. इसकी शुरुआत 70 के दशक के मध्य में हुई एक मीटिंग से हुई थी. वो कुछ सालों तक मुस्लिम ब्रदरहुड का सदस्य रहा लेकिन वो उनके विचारों से असहमत था. फ़िलिस्तीनी छात्र आपस में इस्लाम और फ़िलिस्तीन पर बहस किया करते थे. इसी बहस में उसने फ़िलिस्तीनियों को दो वर्गों में बांटा, पहले थे राष्ट्रवादी, जो फ़िलिस्तीन की आज़ादी की बात करते थे, लेकिन इस्लाम को भूल चुके थे. दूसरे थे रुढ़िवादी, जो इस्लाम की बात करते थे लेकिन फ़िलिस्तीन को भुला चुके थे. शकाकी इस समस्या को दूर करना चाहता था. वो राष्ट्रवादियों और रुढ़िवादियों को साथ लाने की कोशिश कर रहा था. इसलिए, उसने इस्लाम, फ़िलिस्तीन और जिहाद को जोड़ना शुरू किया. उसने नारा गढ़ा कि, हमारा विचार इस्लाम है, हमारा मकसद फ़िलिस्तीन को आज़ाद कराना है और हमारा रास्ता जिहाद से होकर जाता है.”
इसी को केंद्र में रखकर ईजिप्ट में इस्लामिक जिहाद की स्थापना की गई. अनवर सदात की हत्या के बाद इस्लामिक जिहाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई. इसके सदस्यों को ईजिप्ट से निकाल दिया गया. इन लोगों ने वापस लौटकर फ़िलिस्तीन इस्लामिक जिहाद (PIJ) की नींव रखी. शकाकी ने एक मैगज़ीन निकाली. इसके कारण उसे एक साल की जेल हुई. 1986 में उसे दोबारा सज़ा हुई. इस बरस चार साल के लिए.
लेकिन दो बरस बाद ही उसे जेल से छोड़ दिया गया. इज़रायल के तत्कालीन रक्षामंत्री यित्हाक राबिन के आदेश पर उसे लेबनान में निर्वासित कर दिया गया. शकाकी वहां से सीरिया और फिर ईरान चला गया. वहां उसने अयातुल्लाह खोमैनी से मुलाक़ात की. ईरान फ़िलिस्तीन के सशस्त्र विद्रोह को समर्थन देने के लिए राज़ी हो गया. शकाकी का ईरान आना-जाना लगा रहा. हालांकि, उसका स्थायी ठिकाना दमास्कस में था.
शकाकी दमास्कस में रहते हुए इज़रायल में हमले की साज़िशें रच रहा था. वो इज़रायल का नामोनिशान मिटाने पर आमादा था. उसके आत्मघाती हमलावर इज़रायली सैनिकों और नागरिकों पर हमले कर रहे थे.
फिर 1993 का साल आया. इज़रायल और फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (PLO) के बीच ओस्लो में समझौता हुआ. इज़रायल ने यासिर अराफ़ात की PLO को फ़िलिस्तीन का इकलौता प्रतिनिधि मान लिया. इसके बदले में PLO ने इज़रायल के अधिकारों को मान्यता दी. आतंकवाद का रास्ता छोड़ने पर रज़ामंदी बनी और PLO के चार्टर में भी बदलाव की बात हुई. इसके अलावा भी सीमा, शरणार्थियों और बाकी दूसरे मुद्दों को लेकर सहमति बनी. माना जा रहा था कि ओस्लो अकॉर्ड्स से मिडिल-ईस्ट में शांति स्थापित होगी. लेकिन ये भरम साबित हुआ.
फ़िलिस्तीन में PLO को छोड़कर और कोई पीस अकॉर्ड्स के पक्ष में नहीं था. हमास और PIJ जैसे संगठनों ने अराफ़ात का नेतृत्व मानने से इनकार कर दिया. इन संगठनों ने आपस में हाथ मिला लिया. उन्होंने साथ मिलकर इज़रायल पर हमले तेज़ कर दिए.इसके बावजूद PIJ लंबे समय तक नेपथ्य में रहा.
फिर 1995 का साल आया. 22 जनवरी को नेतन्या में इज़रायल के एक मिलिटरी बेस के बाहर एक बम धमाका हुआ. हमलावर ने ख़ुद को बम से उड़ा लिया था. धमाके की आवाज़ सुनकर सैनिक बाहर निकले. तब दूसरे हमलावर ने भीड़ में घुसकर ख़ुद को उड़ा लिया. इस हमले में 20 सैनिक और एक नागरिक की मौत हो गई. ये हमला PIJ ने कराया था. शकाकी ने सीना ठोककर इसका प्रचार किया. उसने धमकी दी कि आने वाले दिनों में और भी हमले होंगे. हमले के बाद उसने कई इंटरव्यू दिए. इसमें वो इज़रायलियों की मौत पर ज़ोर-ज़ोर से हंसता था. वो कहता कि ये तो बस शुरुआत है.
इंटरव्यूज़ के बाद वो मोसाद की हिटलिस्ट में आ चुका था. उसके ऊपर नज़र रखी जा रही थी. आख़िरकार, अक्टूबर 1995 में दो बाइकसवारों ने माल्टा में दिनदहाड़े उसकी हत्या कर दी. दोनों बाइकसवार असल में मोसाद के एजेंट्स थे. दोनों किदॉन यूनिट से ताल्लुक रखते थे. किदॉन का हिंदी में मतलब होता है, भाला. ये मोसाद की सबसे सीक्रेट यूनिट्स में से एक है. इस यूनिट का इस्तेमाल ऑपरेशन रेथ ऑफ़ गॉड और ईरानी वैज्ञानिकों की हत्या में होता रहा है. इसको लेकर बहुत कम जानकारी बाहर आती है. इज़रायली सरकार भी इसके बारे में कुछ बताने से बचती है.
खैर, शकाकी की मौत ने PIJ को सदमे में डाल दिया था. उसने इसका बदला लेने की धमकी दी. लेकिन उसके पास शकाकी के कद का कोई नेता नहीं था. शकाकी के बाद अब्दुल्ला मोहम्मद सल्लाह को PIJ का नेता बनाया गया. उसके ऊपर ईरान का वरदहस्त था. PIJ को लगातार ईरान से सपोर्ट मिलता रहा. बीच में कुछ समय के लिए रिश्तों में दरार ज़रूर पड़ी, लेकिन ईरान का समर्थन बरकरार रहा.
इज़रायल और ईरान की दुश्मनी जगजाहिर है. इज़रायल ईरान के न्युक्लियर मिशन के ख़िलाफ़ है. उसका कहना है कि वो किसी भी कीमत पर ईरान को न्युक्लियर हथियार हासिल नहीं करने देगा. न्युक्लियर साइट्स पर अटैक हो या परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या, इज़रायल ईरान के ख़िलाफ़ हरसंभव रास्ता उठाता रहता है.
जहां तक PIJ की बात है, इज़रायल का आरोप है कि ये ईरान के प्रॉक्सी के तौर पर काम कर रहा है. इसी को लेकर इज़रायली सेना ने इस्लामिक जिहाद के ख़िलाफ़ ऑपरेशन शुरू किया था. पिछले हफ़्ते सैनिकों ने कुछ कैंप्स पर छापेमारी की और एक बड़े नेता को गिरफ़्तार किया. इससे नाराज़ PIJ ने इज़रायल पर रॉकेट्स दागे. इसके बाद इज़रायल ने हवाई हमले शुरू कर दिए. दोनों तरफ़ से गोलाबारी चली. हालांकि, PIJ के अधिकतर रॉकेट्स को आयरन डोम की मदद से नेस्तनाबूद कर दिया गया.
फिर यूनाइटेड नेशंस, क़तर और ईजिप्ट ने मिलकर मध्यस्थता कराई. 07 अगस्त की शाम को संघर्षविराम पर समझौता हो गया. जहां तक नुकसान की बात है, इज़रायल के हमले में 44 लोगों की मौत हो गई. फ़िलिस्तीन का आरोप है कि मरनेवालों में 15 बच्चे हैं. इज़रायल का कहना है कि उसने सिर्फ़ इस्लामिक जिहाद के ठिकानों को निशाना बनाया है. दोनों पक्ष अभी के लिए शांति पर सहमत हो गए हैं, लेकिन उनका कहना है कि अगर किसी ने शर्त तोड़ी तो लड़ाई फिर से शुरू होगी. यानी, शांति अस्थायी है.
ओबामा को शैतान बताने वाले ट्रम्प के दोस्त के दावे सिर चकरा देंगे.

