चॉकलेट का रॉ मटेरियल पैदा करने वाला देश पिछड़ता क्यों जा रहा है?
घाना की आर्थिक बदहाली की पूरी कहानी क्या है?

क्या आप चॉकलेट खाते हैं? क्या आपको पता है कि, आपके चॉकलेट में किसका ख़ून और पसीना मिला है? नहीं पता है. कोई बात नहीं. आज हम तसल्ली से पूरी कहानी बताएंगे.
जो चॉकलेट आप खाते हैं, उसका सबसे मेन एलीमेंट कोकोआ है. कोकोआ के फल के अंदर जो बीज होता है, उसी से चॉकलेट बनाया जाता है. CNBC इंटरनैशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में दुनियाभर में चॉकलेट का कारोबार लगभग आठ लाख करोड़ रुपये का था. मतलब ये कि इसमें ख़ूब सारा पैसा है. बहुत सारी कंपनियां चॉकलेट बेचकर धनकुबेर हो चुकीं है. लेकिन इसका रॉ मटेरियल पैदा करने वाला देश गुरबत में जी रहा है. पश्चिमी अफ़्रीका में बसा घाना नाम का देश कोकोआ उपजाने के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर है. इसके बावजूद घाना अपने समय के सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहा है. हालांकि, घाना सिर्फ कोकोआ तक सीमित नहीं है. ये देश एक समय तक कोकोआ के साथ-साथ सोने के सबसे बड़े निर्यातक देशों में गिना जाता था. यहां इतना सोना था कि औपनिवेशिक देशों ने इसका नाम ‘गोल्ड कोस्ट’ यानी स्वर्णतट रख दिया था.
घाना अफ़्रीकी महाद्वीप के सबसे सफल और अमनपसंद बन चुका था. उसे अफ़्रीका का पोस्टर-बॉय बन चुका था. फिर ऐसा क्या हुआ कि घाना की हालत बिगड़ने लगी? देश में महंगाई दर 50 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है. यानी, 2022 की शुरुआत में जो चीज 100 रुपये की मिल रही थी, उसका दाम अब 150 रुपये हो चुका है. जैसे-जैसे आर्थिक संकट बढ़ेगा, वैसे-वैसे ग़रीबी बढ़ेगी. उसी अनुपात में असंतोष भी फैलेगा. इसका असर सड़कों पर दिख सकता है.
आइए समझते हैं,
- घाना की आर्थिक बदहाली की पूरी कहानी क्या है?
- और, तालिबान ने इंडियन आर्मी की तस्वीर दिखाकर पाकिस्तान को क्यों धमका दिया?
घाना का शाब्दिक अर्थ होता है, वॉरियर किंग. हिंदी में बोलें तो योद्धा राजा. 13वीं सदी से पहले तक पश्चिमी अफ़्रीका में घाना साम्राज्य का दबदबा हुआ करता था. इसी साम्राज्य के नाम पर देश का नाम घाना पड़ा. इसे घनाटा और वागाडुगू किंगडम के नाम से भी जाना जाता है. उनका शासन आज के सेनेगल, माली और बुर्किना फासो तक फैला हुआ था. उस दौरान ये इलाका यूरोप के देशों से अधिक विकसित हुआ करता था. कालांतर में उत्तरी अफ़्रीका से आए कबीलों ने उन्हें पीछे धकेल दिया.
ये मैप देखिए. ये आज का घाना है. इसके उत्तर में बुर्किना फासो, पूरब में आइवरी कोस्ट और पश्चिम में टोगो हैं. घाना की दक्षिणी सीमा अटलांटिक सागर से घिरी हुई है.
1471 ईस्वी में पुर्तगाली खोजी इसी रास्ते से गिनी के तट पर उतरे. पुर्तगाली, गिनी के तट पर उतरने वाले पहले यूरोपियन थे. उन्होंने इस इलाके में मिलने वाले सोने, हाथीदांत और महंगी लकड़ियों के बारे में सुन रखा था. गिनी से आगे बढ़ते हुए वे आइवरी कोस्ट और फिर उसके बाद घाना तक पहुंचे. उन्होंने जितना सुन रखा था, उन्हें घाना उससे ज़्यादा समृद्ध मिला. पुर्तगाल ने कंट्रोल जताने का एक तरीका निकाला. उन्होंने किलों का निर्माण शुरू किया. इन किलों से वे संसाधनों की लूट को नियंत्रित करते थे.
पुर्तगाल, अफ़्रीकी महाद्वीप के संसाधनों पर नज़र गड़ाने वाला यूरोप का इकलौता देश नहीं था. उसके बरक्स कई और लुटेरे तैयार हो रहे थे. उन्हें भी आसानी से मिलने वाले धन की तलाश थी. घाना की कहानी सुनकर ब्रिटेन, डच, जर्मनी, स्वीडन और डेनमार्क भी आए. जब दावेदार बढ़े तो झगड़ा हुआ. इलाके पर क़ब्ज़े को लेकर यूरोप के देशों के बीच लंबा संघर्ष चला.
फिर 17वीं शताब्दी में आयाम बदलने लगा. यूरोप के देशों को अमेरिका और कैरेबियन द्वीप में नई ज़मीनें मिली. ये ज़मीन बागवानी के लिए अधिक मुफीद थी. यूरोप के पास सोना बहुत था. अब उन्हें अनाज और मसालों की ज़रूरत थी. ये सब उपजाने के लिए सस्ते मज़दूर चाहिए थे. मज़दूरी को निचले दर्जे का काम माना जाता था. जबकि यूरोप के देश गोरों को सबसे ऊंची नस्ल का मानते थे. इसलिए, उनसे मज़दूरी नहीं कराई जा सकती थी. ऐसे में अफ़्रीका उनका सबसे बड़ा विकल्प बना. उन्होंने कौड़ियों में दाम में मज़दूरों की खरीद-बिक्री शुरू की. अश्वेत ग़ुलामों को उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ बेड़ियों में बांधकर, जहाजों में भरकर ले जाया गया.
जहाज में चढ़ाने से पहले ग़ुलामों को किलों में भूखे-प्यासे क़ैद करके रखा जाता था. उनका बुरा टॉर्चर ऐसा इसलिए, ताकि वे विरोध करने की हिमाक़त ना कर सकें. आंकड़े बताते हैं कि उस दौर में सिर्फ पश्चिमी अफ़्रीका से एक से डेढ़ करोड़ ग़ुलामों की खरीद-बिक्री हुई. इनमें से 60 लाख लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. जो बच गए, उन्हें जानवरों से भी बदतर ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर होना पड़ा. औपनिवेशिक शासन में अश्वेतों पर अत्याचार का अंतहीन इतिहास है.
स्लेव ट्रेड के दौर में घाना की अहमियत काफ़ी बढ़ गई थी. घाना अटलांटिक सागर के किनारे पर था. यहां से ग़ुलामों को आसानी से एक्सपोर्ट किया जा सकता था. इस वजह से घाना वेस्ट अफ़्रीका में स्लेव ट्रेड का सेंटर बन गया. यूरोप के देशों की दिलचस्पी तटीय इलाकों तक ही थी. बाकी के इलाकों पर अलग-अलग कबीलों का शासन था. यूरोपीय देशों ने अपने हिसाब से उन्हें दोस्तों और दुश्मनों में बांटा था.
अब एक और पेच समझ लीजिए.अश्वेतों में दो केटेगरी हुआ करती थी. वहां भी सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट चल रहा था. जो ताक़तवर कबीले थे, यूरोपियंस ने उनसे दोस्ती कर ली थी. वे उन्हें सोने और ग़ुलामों के बदले हथियार और पैसे दे रहे थे. इसकी बदौलत ताक़तवर कबीले, कमज़ोर कबीलों की ज़मीनें छीनते थे और उनके लोगों को ग़ुलाम बनाकर यूरोप के हाथों बेच दिया करते थे. अकवामु, फेंते और असांते जैसे कुछ कबीले ग़ुलामों के निर्यात से ख़ूब फायदा कमा रहे थे. 18वीं सदी के अंत तक ये साथ ठीक चला.
फिर यूरोप में स्लेव ट्रेड के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा. प्रोटेस्ट होने लगे. दास-प्रथा को खत्म करने की मांग उठने लगी. 1792 में डेनमार्क ने इसके ख़िलाफ़ कानून बना दिया. डेनमार्क दास-प्रथा पर बैन लगाने वाला यूरोप का पहला देश था. 1807 में ब्रिटेन ने भी ग़ुलामी कराने को गैर-कानूनी बना दिया. हालांकि, कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस बैन के पीछे ‘नैतिकता’ नहीं थी. डेनमार्क या ब्रिटेन को अपनी ग़लती का अहसास नहीं हुआ था. इसकी असली वजह ये थी कि इन देशों को स्लेव-ट्रेड में भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था. इसलिए, वे बैन लगाने के लिए तैयार हुए थे.
खैर, घाना में डेनमार्क और ब्रिटेन, दो सबसे बड़े दावेदार बचे रह गए थे. जब ग़ुलामों का व्यापार रुका, तब उन्होंने अपना ध्यान कोकोआ, पाम ऑयल, सोने और लकड़ी की तरफ लगाया. अब उनकी नज़र ज़मीन की तरफ गई. जितना ज़्यादा इलाका, उतने ज़्यादा संसाधन. ग़ुलामों की खरीद-बिक्री रुकने के बाद कबीलों की अहमियत घट चुकी थी. ब्रिटेन या डेनमार्क के लिए वे उनके रास्ते की बाधा भर रह गए थे.
1806 में असांते कबीले ने फेंते पर हमला कर दिया. फेंते को ब्रिटेन का सपोर्ट था. इससे ब्रिटेन को लगा कि हमारा हित ख़तरे में पड़ सकता है. उन्होंने अपना आधार मज़बूत करना शुरू कर दिया. 1824 में असांते के सबसे ताक़तवर नेता ओसेई बोन्सु की मौत हो गई. कबीले के पास कोई नेता नहीं बचा. मौका देखकर ब्रिटेन ने असांते के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी. दो साल तक चली लड़ाई के बाद गोल्ड कोस्ट के तटीय इलाकों पर ब्रिटेन का एकछत्र राज था. असांते किंगडम उत्तरी घाना की तरफ बचा रहा.
1850 में डेनमार्क ने घाना में अपनी पूरी संपत्ति ब्रिटेन के हवाले कर दी. 10 हज़ार पौंड स्टर्लिंग के बदले. लगभग 10 लाख रुपये की कीमत में. अब गोल्ड कोस्ट में ब्रिटेन को इकलौती चुनौती असांते से मिल रही थी. 1873 में ब्रिटेन और असांते के बीच फिर से लड़ाई हुई. असांते कबीले ने ब्रिटेन को हरा दिया. लेकिन ये जीत निर्णायक नहीं थी. एक बरस बाद ही ब्रिटेन वापस लौटा. इस बार वे और बर्बर होकर आए. असांते की राजधानी कुमासी में भयानक लड़ाई हुई. ब्रिटेन ने राजधानी को जलाकर खाक़ कर दिया. वे राजा को पकड़ने के इरादे से आए थे. लेकिन राजा भाग चुका था. ब्रिटिश सैनिकों को महल में जो कुछ मिला, वे उसको लूटकर ले गए. फिर उन्होंने महल में आग लगा दी. इसके बाद घाना को आधिकारिक तौर पर ब्रिटिश कॉलोनी घोषित कर दिया गया.
1884 में बेल्जियम के तत्कालीन राजा लियोपॉल्ड की पहल पर बर्लिन में एक कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई. इसमें यूरोप के देश अफ़्रीकी महाद्वीप में फैले संसाधनों को बांटने पर राज़ी हो गए. उन्होंने तय किया कि लूट के खेल में कोई एक-दूसरे की सीमा में दखल नहीं देगा. घाना, ब्रिटेन के हिस्से में आया था. ब्रिटेन ने 1896 में असांते कबीले के नौजवान राजा को निर्वासित कर दिया.
ब्रिटेन ने अपनी तरफ से विरोध की हर आवाज को खत्म करने की कोशिश की थी. लेकिन चिनगारी पूरी तरह बुझी नहीं थी. असांते विद्रोहियों ने ब्रिटेन के ठिकानों पर छिटपुट हमले जारी रखे. ये उनकी आज़ादी का आंदोलन था.
फिर 20वीं सदी के पहले दशक में घाना में दो बड़ी घटनाएं हुईं.
- नंबर एक. 1902 में असांते किंगडम का बचा-खुचा हिस्सा भी ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया.
- नंबर दो. 1909 में क्रोफ़ुल गांव में क्वामे क्रुमाह नाम के एक लड़के का जन्म हुआ. उस लड़के ने अमेरिका और इंग्लैंड में पढ़ाई की. आगे चलकर वो लड़का घाना की आज़ादी का नायक बना.
ब्रिटिश शासन के दौरान एक और चीज हुई थी. वो ये कि कुछ नौजवानों को विदेश जाकर पढ़ने का मौका मिला. वहां उन्होंने लोकतंत्र, बुनियादी अधिकार और स्वतंत्रता जैसे विचारों को विस्तार से पढ़ा और सामने से देखा भी. जब वे लौटकर घाना आए, उन्होंने इसे अपने यहां अप्लाई किया. 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ. भले ही ब्रिटेन ने जीत दर्ज की थी, लेकिन उसकी शक्ति घट चुकी थी. उसे युद्ध में भारी तबाही झेलनी पड़ी थी. वो अपना उपनिवेश कायम करने के काबिल नहीं रह गया था. ऐसे दौर में घाना में राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हुआ. क्रुमाह इस आंदोलन को लीड कर रहे थे. उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. 1949 में उन्होंने अपनी कन्वेंशन पीपुल्स पार्टी (CPP) बना ली. जल्दी ही ये पार्टी आंदोलन का चेहरा बन गई.
तमाम मोर्चों पर कमज़ोर होने के बावजूद ब्रिटेन, घाना पर से अपना दावा छोड़ने के लिए तैयार नहीं था. एशिया में उसका शासन खत्म हो चुका था. अफ़्रीका में वैसी नियति ताबूत में आख़िरी कील होती. ब्रिटेन ने क्रुमाह को सरकार में हिस्सेदार बनाकर उन्हें शांत कराने की कोशिश की. मगर क्रुमाह पूर्ण आज़ादी से कम पर मानने के लिए तैयार नहीं हुए.
आख़िरकार, मार्च 1957 में ब्रिटेन को घाना को आज़ाद करना पड़ा. क्वामे क्रुमाह देश के पहले राष्ट्रपति बने. इस मौके पर उन्होंने अपने भाषण में कहा था,
‘हमारा प्यारा देश घाना हमेशा के लिए आज़ाद हो चुका है!... घाना की आज़ादी का तब तक निर्रथक है, जब तक कि पूरा अफ़्रीकी महाद्वीप आज़ाद नहीं हो जाता.’
घाना, ब्रिटिश शासन से आज़ाद होने वाला पहला अफ़्रीकी देश था. उसने बाकी के ग़ुलाम देशों को रास्ता दिखाया था. घाना के संघर्ष से सबके लेकर अफ़्रीकी देशों ने अपने औपनिवेशिक मालिकों के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू किया. इसका नतीजा ये दिखा कि 1960 के दशक तक अधिकतर अफ़्रीकी देश आज़ाद हो चुके थे.
इस आज़ादी को जल्दी ही कोल्ड वॉर की नज़र लगने वाली थी. क्वामे क्रुमाह घाना का विकास चाहते थे. लेकिन उनकी विचारधारा उन्हें सोवियत संघ और चीन के करीब ले जाती थी. इसलिए, अमेरिका उनकी मदद के लिए तैयार नहीं था. जो मदद घाना को मिली, उसने देश को आर्थिक संकट के दलदल में फंसा दिया. क्रुमाह की लोकप्रियता घटने लगी. उनके ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट होने लगे. रास्ता तलाशने के लिए वो सोवियत संघ और चीन की शरण में गए. इससे पश्चिमी देश नाराज़ हो गए. उन्होंने क्रुमाह को रास्ते से हटाने का प्लान तैयार किया.
फ़रवरी 1966 में क्रुमाह गए. माओ से मिलने. जब तक क्रुमाह बीजिंग पहुंचते, उससे पहले ही सेना ने उनका तख़्तापलट कर दिया. क्रुमाह की बाकी ज़िंदगी गिनी में निर्वासन में गुजरी.
घाना में तख़्तापलट और सिविलियन सरकार का सिलसिला 1992 तक चला. फिर 1992 में नया संविधान बना. नए संविधान में मल्टी-पार्टी सिस्टम की व्यवस्था रखी गई. प्रेस और मानवाधिकार संगठनों को काम करने की आज़ादी मिली. घाना ने पिछले 30 बरस से ये आज़ादी बचाकर रखी है. 2022 के ग्लोबल पीस इंडेक्स में घाना पूरी दुनिया में 40वें नंबर पर था. घाना, अफ़्रीकी महाद्वीप का दूसरा सबसे शांतिपूर्ण देश है. पहले नंबर पर मॉरिशस का नाम आता है.
ये तो हुई घाना की पूरी कहानी. आज ये देश चर्चा में क्यों है?दरअसल, घाना आर्थिक मोर्चे पर लगातार पीछे छूट रहा है. इसी वजह से आशंका जताई जा रही है कि ये सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष की वजह बन सकता है. अतीत में आर्थिक संकट के कारण घाना में कई तख़्तापलट हो चुके हैं.
अलजज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, एक बरस में घाना में महंगाई दर 51 प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है. गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. देश पर लगभग चार लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ लदा है. ये घाना की कुल जीडीपी का 76 प्रतिशत है. पिछले कुछ महीनों में सरकार की आमदनी घटी है, जबकि खर्च काफी बढ़ गया है. इसका असर सरकारी खजाने पर साफ-साफ दिखने लगा है. सरकार ने कहा है कि आर्थिक संकट की वजह कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध है. लेकिन जानकारों का मानना है कि ये संकट पहले से तय था. सरकार की नीतियों ने इसे बद से बदतर बना दिया है.
घाना के आर्थिक संकट की तीन बड़ी वजहें हैं.
- नंबर एक. सरकारी खर्च. घाना में सबसे ज़्यादा नौकरी सरकार देती है. ये नौकरियां हेल्थ, एजुकेशन और सिक्योरिटी सेक्टर में है. यानी, इनसे सीधी कमाई नहीं होती. सरकार अपनी आमदनी का आधा हिस्सा वेतन देने में खर्च कर देती है. 2022 में सरकार को लगभग सात लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला. इसमें से लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये सैलरी देने में खर्च हो गए.
- नंबर दो. आमदनी पर कुल्हाड़ी. 2017 में न्यू पैट्रिओटिक पार्टी सत्ता में आई थी. नए राष्ट्रपति नाना अकुफ़ो-अदो ने 15 तरह के टैक्स को खत्म कर दिया. कोविड के समय में सरकार ने राशन, बिजली और पानी फ़्री कर दिया. इसका पूरा खर्च सरकार को बचत से उठाना पड़ा. नतीजा ये हुआ कि सरकार खजाने को मेंटेन नहीं रख पाई.
- तीसरी वजह निवेश से जुड़ी है. घाना, कोकोआ का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है. इसके बावजूद उसके खाते में मार्केट शेयर का दो प्रतिशत हिस्सा ही आता है. इसकी वजह ये है कि घाना में चॉकलेट बनाने वाली कंपनियां नहीं है. घाना, रॉ मटेरियल सप्लायर बनकर रह गया है. कोकोआ के बागानों में चाइल्ड लेबर और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं आम हैं. लेकिन सरकार अभी तक इसे रेगुलेट करने में नाकाम रही है. कोकोआ की खेती में घाना की ग़रीब जनता अपना ख़ून और पसीना बहाती है, लेकिन उन्हें इसकी पूरी कीमत नहीं मिलती. ये शोषण से कम नहीं है. इसमें घाना की सरकार भी बराबर की ज़िम्मेदार है.
घाना सरकार ने मौजूदा आर्थिक संकट से निपटने के लिए इंटरनैशनल मॉनेटरी फ़ंड (IMF) के साथ समझौता किया है. हालांकि, इसकी वजह से निवेशकों का भरोसा कम हुआ है. जानकार बताते हैं कि अगर सरकार ने समय रहते अपनी आमदनी नहीं बढ़ाई तो मुसीबत बढ़ सकती है.
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