ब्राज़ील में चुनाव से पहले जाएर बोल्सोनारो इतने बौखलाए क्यों घूम रहे हैं?
मौजूदा राष्ट्रपति जाएर बोल्सोनारो की लीगेसी क्या है?

एक देश है. अपने इलाके में सबसे अहम. एक राष्ट्रपति है. कर्तव्यों के हिसाब से, देश का मुखिया. पालनहार. मगर हक़ीक़त में, उसके ऊपर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लग रहा है. एक चुनाव है. जिसमें सबका हिसाब होना है. और, इन सबके बीच कुछ कहानियां हैं. जो पूरे वाकये को दिलचस्प बना रही है.
ये कहानी ब्राज़ील की है. ब्राज़ील में अक्टूबर 2022 में आम चुनाव होने वाला है. इसमें राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और संसद के दोनों सदनों के सदस्य चुने जाएंगे. जब चुनाव होगा, तब होगा. उससे पहले आहट आ रही है. किसी बड़े तूफ़ान की. कैसा तूफ़ान? आशंका जताई जा रही है कि मौजूदा राष्ट्रपति जाएर बोल्सोनारो संभावित हार से बचने के लिए कुछ ऐसा-वैसा कर सकते हैं. कैसा? तख़्तापलट कर सकते हैं. संसद पर क़ब्ज़ा करवा सकते हैं. ट्रंप जैसा दंगा करवा सकते हैं. करवा सकते हैं, करवाएंगे या नहीं? ये भविष्य के गर्भ में क़ैद है.
आज के दिन हम जानेंगे,
- ब्राज़ील में आम चुनाव का पूरा प्रोसेस क्या है?
- मौजूदा राष्ट्रपति जाएर बोल्सोनारो की लीगेसी क्या है?
- ब्राज़ील में चुनाव से पहले तख़्तापलट का ख़तरा क्यों जताया जा रहा है?
- और, ब्राज़ील का आम चुनाव बाकी दुनिया के लिए कितनी अहमियत रखता है?
पहले बैकग्राउंड समझ लेते हैं.
ब्राज़ील की बसाहट साउथ अमेरिका में है. भारत से ब्राज़ील की दूरी लगभग 16 हज़ार किलोमीटर है.
क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से ये साउथ अमेरिका का सबसे बड़ा देश है. समूचे महादेश की लगभग आधी ज़मीन ब्राज़ील की सीमा में आती है.
अगर दायरे का गोला बढ़ाया जाए और पूरी धरती की बात करें तो ब्राज़ील क्षेत्रफल में पांचवें और आबादी में छठे नंबर का देश है.
आकार का अंदाज़ा लगाने के लिए एक और फ़ैक्ट सुन लीजिए.
साउथ अमेरिका में कुल 12 देश हैं. इनमें से सिर्फ़ चिली और इक़्वाडोर ही ऐसे देश हैं, जिनकी सीमा ब्राज़ील से नहीं लगती. बाकी सारे देश ब्राज़ील के पड़ोसी हैं.
ब्राज़ील की राजधानी ब्राज़ीलिया है.
सबसे बड़ा शहर साओ पाउलो है.
एक और शहर का ज़िक्र आप अक्सर सुनते होंगे. रियो डि जनेरो. इसी शहर में 2016 में ओलंपिक गेम्स का आयोजन हुआ था. रियो डि जनेरो 1960 तक ब्राज़ील की राजधानी भी था.
ब्राज़ील में लगभग 89 प्रतिशत आबादी ईसाई धर्म को मानती है. आठ प्रतिशत लोग किसी धर्म को नहीं मानते. बाकी धर्मों का प्रतिनिधित्व तीन प्रतिशत के आसपास है.
ब्राज़ील दुनिया के कुल कॉफ़ी उत्पादन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा उपजाता है.
अमेज़न के वर्षावनों का 60 प्रतिशत हिस्सा ब्राज़ील मे है.
इसके अलावा, ब्राज़ील यूनाइटेड नेशंस, जी20 और ब्रिक्स जैसे खासमखास अंतरराष्ट्रीय संगठनों का संस्थापक सदस्य भी रहा है.
ये तो हुए ब्राज़ील से जुड़े कुछ तथ्य. अब एक नज़र टाइमलाइन पर.
साल 1500. ऐज ऑफ़ डिस्कवरी. यूरोप के देश नई ज़मीनें तलाश रहे थे. इसी क्रम में 1498 में पुर्तगाली जहाजी वास्कोडिगामा भारत के तट पर उतरा. उसी के कुनबे का एक कप्तान पेद्रो अल्वारेज़ कैब्रा ब्राज़ील के तट पर उतरा. उसे वहां पर कोई विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. पेद्रो ने बड़ी आसानी से उस ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया. उस दौर में उस ज़मीन पर ब्राजील नाम का एक पौधा बहुतायत में था. इस पौधे से निकलने वाला रस कपड़ों को डाई करने में इस्तेमाल किया जाता था. इतिहासकारों का दावा है कि इसी पौधे के नाम पर उस ज़मीन का नाम ब्राज़ील रखा गया.
ब्राज़ील पर पुर्तगाल का नियंत्रण 1822 तक रहा. 1822 में पुर्तगाल के राजकुमार ने ख़ुद को ब्राज़ील का महाराजा घोषित कर दिया. उसने अपना नाम रखा पीटर प्रथम. पीटर प्रथम ने पुर्तगाल का शासन मानने से मना कर दिया. इस तरह ब्राज़ील पुर्तगाली शासन से आज़ाद हुआ.
1888 में ब्राज़ील में ग़ुलामी प्रथा का अंत हो गया. एक बरस बाद राजशाही समाप्त कर दी गई. फिर गणतंत्र की स्थापना हुई. अगले चार दशकों तक ब्राज़ी की सत्ता पर कॉफ़ी प्लांटेशन के मालिकों का नियंत्रण रहा.
1930 में तख़्तापलट हुआ. इसके बाद गेतुलियो वर्गास सत्ता में आए. उनका शासन 15 बरस तक चला.
सेकेंड वर्ल्ड वॉर के शुरुआती सालों में ब्राज़ील न्यूट्रल बना रहा. लेकिन 1943 में वो मित्र राष्ट्रों की तरफ़ से लड़ाई में शामिल हो गया.
1960 में ब्राज़ील की राजधानी बदल दी गई. एक नया शहर बनाया गया, ब्राज़िलिया. 1960 से ब्राज़ील की राजधानी ब्राज़िलिया ही है.
1964 में सेना ने सिविलियन सरकार का तख़्तापलट कर दिया. अगले 21 सालों तक लोगों की आज़ादी को दबाकर रखा गया. विरोधियों का दमन किया गया.

1985 में सिविलियन सरकार की वापसी हो गई.
2002 में लुला डि सिल्वा ब्राज़ील के राष्ट्रपति बने. 40 सालों में पहली बार कोई वामपंथी व्यक्ति इस पद पर पहुंचा था.
2010 में डिल्मा राउसेफ़ ब्राज़ील की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं. 2014 में उन्होंने लगातार दूसरा चुनाव जीत लिया. उन्हें राष्ट्रपति की कुर्सी के साथ-साथ अपार लोकप्रियता भी हासिल हुई थी. लेकिन ये लंबे समय तक टिकी नहीं. 2016 में उनके ऊपर पैसों की धांधली के आरोप लगे. फिर महाभियोग लाकर उन्हें पद से हटा दिया गया. उनका बचा कार्यकाल तत्कालीन उप-राष्ट्रपति माइकल टेमर ने पूरा किया.
फिर आया साल 2018. अक्टूबर में चुनाव हुए.
इस चुनाव में खड़ा एक कैंडिडेट बाकियों से कतई अलग था. वो तानाशाहों की पूजा करता था. अक्सर नस्लभेदी बातें करता था. उसने ब्राज़ील में हुए सैन्य शासन की तारीफ़ें की थी.
ब्राज़ील की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अश्वेत है या मिश्रित नस्ल का है. उनका इतिहास काफ़ी हिंसक रहा है. बहुत सारे लोगों के लिए औपनिवेशिक इतिहास कभी ना भूलने वाला दर्द है. इसके बावजूद वो पुर्तगाल के अत्याचारों को नकार देता था. वो महिलाओं और समलैंगिकों पर घटिया बातें करता था. उसने एक महिला साथी को कहा था,
वो इतनी भी अच्छी नहीं है कि उसका रेप किया जा सके.
एक बार उसने कहा था,
अगर मेरा बेटा समलैंगिक हो तो मैं चाहूंगा कि वो किसी एक्सीडेंट में मर जाए.
ऐसी घटिया और अमानवीय राय रखने वाले शख़्स का नाम जाएर बोल्सोनारो था. तमाम विवादों के बावजूद बोल्सोनारो चुनाव जीत गए.

आज हम ब्राज़ील की चर्चा क्यों कर रहे हैं?
दरअसल, ब्राज़ील में अक्टूबर 2022 में आम चुनाव होने वाले हैं. इसको ब्राज़ील के इतिहास का सबसे ज़रूरी चुनाव बताया जा रहा है. इस चुनाव में बोल्सोनारो के भविष्य का फ़ैसला होने वाला है.
बोल्सोनारो का पूरा कार्यकाल विवादों से भरा रहा है. जिस सोच के साथ बोल्सोनारो ने चुनाव जीता था, वो उसपर एकदम खरे उतरे. उन्होंने अपने नफ़रती बयान जारी रखे. कोरोना महामारी के दौरान बोल्सोनारो ने महामारी को कमतर करके आंका. मास्क पहनने से बचते रहे. कोर्ट ने उनके ऊपर जुर्माना तक लगाया.
इसके अलावा, उनके कार्यकाल में अमेज़न के जंगलों की कटाई बढ़ी. हाल ही में अमेज़न के अंदर अपराधियों ने दो पत्रकारों की हत्या कर दी थी. वे दोनों अमेज़न में हो रहे अपराध को उजागर करने गए थे. कहा जाता है कि बोल्सोनारो की नीतियों ने अपराधियों का काम आसान कर दिया है.
बोल्सोनारो की सबसे बड़ी विरासत कोरोना महामारी से जुड़ी है. ब्राज़ील में कोरोना के चलते छह लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. कोरोना से निपटने में लापरवाही को लेकर उनके ख़िलाफ़ लगातार विरोध प्रदर्शन आयोजित होते रहे हैं. इसी वजह से बोल्सोनारो को हार का डर सता रहा है. बहुत संभावना है कि हार के बाद उनके ऊपर मुकदमा चलेगा और उन्हें जेल भी जाना जा सकता है.
बोल्सोनारो इससे बचने के लिए क्या कर रहे हैं?- बोल्सोनारो चुनाव में धांधली का आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि चुनाव आयोग बिका हुआ है. उनका कहना है कि अगर फ़्रॉड नहीं हुआ तो उन्हें जीतने से कोई नहीं रोक सकता. बोल्सोनारो का दावा काफ़ी हद तक अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मेल खाता है. ट्रंप ने आख़िरी समय तक हार स्वीकारने से मना कर दिया था. इसी के नतीजे में उनके समर्थकों ने कैपिटल हिल में दंगा कर दिया था. आशंका जताई जा रही है कि बोल्सोनारो के समर्थक अमेरिका वाला कांड ब्राज़ील में दोहरा सकते हैं.
- एक संभावना ये भी है कि बोल्सोनारो सत्ता पर क़ब्ज़े के लिए आर्मी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. बोल्सोनारो सेना में कैप्टन के तौर पर काम कर चुके हैं. एक चुनावी रैली में उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था,
‘सेना हमारे साथ है. ये सेना भ्रष्टाचार और फ़र्ज़ीवाड़े को स्वीकार नहीं करती.’
- 19 जुलाई को बोल्सोनारो ने 20 से अधिक देशों के राजनीतिज्ञों को बुलाकर वोटर फ़्रॉड की आशंका जताई थी. उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ जज उन्हें चुनाव जीतने से रोकना चाहते हैं.
26 जुलाई को बोल्सोनारो ने आधिकारिक तौर पर अपना चुनावी कैंपेन शुरू कर दिया है. वो अपने दावों को लेकर अडिग हैं. उनके अधिकतर दावों के पीछे कोई तर्क नहीं होता. उनके कई दावों का फ़ैक्ट-चेक भी हो चुका है. इसके बावजूद बोल्सोनारो फ़र्ज़ी अफवाह फैलाने से पीछे नहीं हट रहे हैं.
बोल्सोनारो को जिस शख़्स से हार का खतरा सता रहा है, उसका नाम लूला डि सिल्वा है. लूला 2003 से 2011 तक ब्राज़ील के राष्ट्रपति के तौर पर काम कर चुके हैं. उनकी बनाई वर्कर्स पार्टी ब्राज़ील के सबसे प्रभावशाली राजनैतिक दलों में से एक है. लूला को ओपिनियन पोल्स में लगातार बढ़त हासिल हुई है. अगर आज के दिन चुनाव हुए तो लूला डि सिल्वा को 53 फीसदी से अधिक वोट मिलेंगे. इसकी तुलना में महज 29 प्रतिशत लोग बोल्सोनारो का सपोर्ट करते हैं. अगर यही हाल चुनाव तक बरकरार रहा तो लूला का चुनाव जीतना तय है. लूला को ब्राज़ील के इतिहास के सबसे महान नेताओं में गिना जाता है. 2011 में उन्होंने कैंसर की पुष्टि की थी. इसके बाद हुए चुनाव में उनकी चीफ़ ऑफ़ स्टॉफ़ डिल्मा राउसेफ़ ने राष्ट्रपति पद हासिल किया था.

लूला पर 2017 में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप भी लगाए गए. अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया. उन्हें 580 दिनों तक जेल में रहना पड़ा. ब्राज़ील के कानून के हिसाब से, सज़ायाफ़्ता लोग आठ बरस तक चुनाव नहीं लड़ सकते. इसी वजह से वो 2018 के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश नहीं कर सके. बोल्सोनारो को इसका फायदा मिला. वो चुनाव जीत गए. जिस जज ने लूला को सज़ा सुनाई थी, उन्हें बोल्सोनारो सरकार में जस्टिस एंड पब्लिक सिक्योरिटी मिनिस्टर बना दिया गया. आख़िरकार, मार्च 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया. उनके ऊपर लगाए गए सभी केस हटा लिए गए. इसके बाद ही लूला 2022 के चुनावों में अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं.
ये तो हुई उम्मीदवारी की बात. अब जान लेते हैं कि ब्राज़ील में चुनाव की प्रक्रिया क्या है?
- ब्राज़ील में राष्ट्रपति सरकार और देश, दोनों का मुखिया होता है.
- राष्ट्रपति ब्राज़ील की सशस्त्र सेना के अध्यक्ष भी होते हैं.
- राष्ट्रपति कैबिनेट के मंत्रियों को अपॉइंट और सस्पेंड कर सकते हैं.
- राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति भी करते हैं.
इसके अलावा भी राष्ट्रपति के पास अनगिनत शक्तियां हैं.
ब्राज़ील में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार बरस का होता है. जनता सीधे तौर पर राष्ट्रपति के लिए वोट डालती है. ब्राज़ील में वोट डालना एक अनिवार्य है. ये अनिवार्यता 18 से 70 बरस के लोगों पर लागू है. 16 से 18 बरस के लोगों पर ये अनिवार्यता लागू नहीं होती. ये उनकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है.
02 अक्टूबर को जो चुनाव होने वाला है, उसमें जनता सीधे तौर पर राष्ट्रपति का चुनाव करेगी. वोटिंग इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से होती है. इसलिए, इसका रिजल्ट कुछ ही घंटों में आ जाता है.
एक बात और. ब्राज़ील में कोई भी व्यक्ति निर्दलीय राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकता. दावेदारी पेश करने के लिए ज़रूरी है कि उसे कोई रजिस्टर्ड पार्टी नॉमिनेट करे.
02 अक्टूबर को पहले राउंड की वोटिंग होनी है. चुनाव जीतने के लिए एक कैंडिडेट को 50 प्रतिशत से अधिक वोट चाहिए. अगर किसी उम्मीदवार को पहले राउंड में 50 प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिलता, तब दूसरे राउंड की वोटिंग कराई जाती है. दूसरे राउंड की वोटिंग के लिए 30 अक्टूबर को तारीख़ तय है.
अब सुर्ख़ियों की बारी.आज की पहली सुर्खी ईरान से है. 31 जुलाई को ईरानी सेना और तालिबान के बीच हिंसक झड़प हुई. ये झड़प ईरान-अफगानिस्तान बॉर्डर पर हुई. झड़प की असल वजह क्या थी, इसकी अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है. दोनों पक्ष एक-दूसरे पर झड़प शुरू करने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं. झड़प में तालिबान का एक सैनिक मारा गया है और एक घायल हुआ है. ईरान की तरफ से किसी के भी मारे जाने की कोई ख़बर नहीं आई है. झड़प अफगानिस्तापन के निमरोज प्रांत के कोंग जिले में हुई है.
झड़प के बाद आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ. दोनों देशों ने एक दूसरे पर पहले गोली चलाने का आरोप लगाया है. ईरानी मीडिया में दावा किया है कि इस लड़ाई को तालिबानी सैनिकों ने शुरू किया था. ईरानी न्यूज़ एजेंसी तासनिम ने कहा कि ये झड़प तब शुरू हुई जब तालिबानी सैनिक ईरान के हिरमंड इलाके में घुस आए. ईरानी मीडिया में झड़प को लेकर ये दावा भी किया गया कि तालिबान के सैनिक ईरान के अंदर घुसकर अपना झंडा फहराने की कोशिश कर रहे थे इसलिए ये विवाद शुरू हुआ. झड़प तेज़ होने की वजह से अफगानिस्तान बॉर्डर पर रहने वाले लोगों ने इलाका खाली कर दिया है.
हमारी अगली सुर्खी यूक्रेन से है. रूस यूक्रेन युद्ध जारी है. युद्ध शुरू हुए 5 महीने से ज़्यादा हो चुके हैं. ताज़ा अपडेट ये है कि रूस के एक मिसाइल हमले में यूक्रेन के सबसे अमीर लोगों में से एक की मौत हो गई है. उस अमीर व्यक्ति का नाम ओलेक्सी वडातुर्स्की है. फोर्ब्स की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, उनके पास 35 अरब रुपये से अधिक की संपत्ति थी. मीडिया रपटों के अनुसार, ओलेक्सी पत्नी रायसा की रात में अपने घर पर ही थे, लेकिन रात को उनके घर पर रूसी मिसाइल से हमला किया गया. हमले में दोनों की मौत हो गई. ओलेक्सी निबुलॉन कंपनी के मालिक थे. ये कंपनी यूक्रेन की सबसे बड़ी अनाज निर्यातक कंपनियों में से एक है. उनकी मौत यूक्रेन के लिए बड़ी क्षति मानी जा रही है. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने भी उनकी मौत को यूक्रेन के लिए बड़ा नुकसान बताया है. उन्हें ‘हीरो ऑफ़ यूक्रेन’ अवार्ड से भी नवाज़ा जा चुका है. ये अवार्ड यूक्रेन का सबसे सम्मानित अवार्ड है.
आज की तीसरी और आखिरी सुर्खी म्यांमार से है. म्यांमार में सेना ने आपातकाल बढ़ा दिया है. म्यांमार की सरकारी मीडिया के मुताबिक, आर्मी जनरल मिन आंग लाइंग ने कहा है कि सुरक्षा परिषद के सर्वसम्मति के बाद आपातकाल को आगे बढ़ाया जा रहा है. सेना ने एक साल पहले ये कहते हुए तख्तापलट किया था कि साल 2020 में हुए चुनावों में आंग सान सू ने बड़े स्तर पर हेराफेरी की है. तब से सेना सरकार को चला रही है. जनरल लाइंग ने पिछले अगस्त में खुद को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया था.
तख्तापलट के बाद से ही सेना लगातार कहती आ रही है कि म्यांमार में जल्द ही ‘फ्री एंड फेयर’ इलेक्शन होंगे. लेकिन हालिया आपातकाल बढ़ाने के पीछे सेना ने तर्क दिया है कि देश अभी चुनाव के लिए तैयार नहीं है. अभी देश को और स्थिर होने की ज़रूरत है. इसके लिए और वक्त लगेगा. इसलिए आपातकाल की अवधि बढ़ाई जा रही है.
हाल ही में म्यांमार में चार राजनैतिक कैदियों को फांसी की सजा हुई है. जिसके बाद म्यांमार सहित पूरी दुनिया में इसकी निंदा की गई. सेना ने नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के पूर्व सांसद, एक लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्त्ता और दो अन्य लोगों को फांसी दी थी.
चीन में अरबपतियों के इतने पैसे क्यों डूब रहे हैं?

