The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Why Iran threatened France over Charlie Hebdo cartoon Ali Khamenei

शार्ली हेब्दो के कार्टून पर ईरान ने फ्रांस को क्यों धमकाया?

ईरान की राजनीति में सुप्रीम लीडर कितना ताक़तवर होता है?

Advertisement
pic
5 जनवरी 2023 (अपडेटेड: 5 जनवरी 2023, 08:33 PM IST)
ईरान के सुप्रीम लीडर का कार्टून (फोटो-charlie hebdo magazine)
ईरान के सुप्रीम लीडर का कार्टून (फोटो-charlie hebdo magazine)
Quick AI Highlights
Click here to view more

सुप्रीम लीडर को किससे डर लगता है?
आलोचना से? प्रोटेस्ट से? स्वतंत्र मीडिया से?
या फिर, कार्टून से.

हम ईरान के सुप्रीम लीडर की बात कर रहे हैं. नाम, अली हुसैनी ख़ामेनई. जिनको फ़्रेंच मैगज़ीन शार्ली हेब्दो में छपे कार्टून्स बहुत नागवार गुजरे हैं. नतीजा, ईरान ने फ़्रांस के राजदूत को बुलाकर कहा कि, ये ठीक नहीं हुआ. इसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ेगा. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि, 

‘हम फ़्रांस की सरकार को सीमा लांघने नहीं देंगे. उन्होंने ग़लत रास्ता चुन लिया है.’

शार्ली हेब्दो फ़्रांस की एक वीकली सटायर मैगज़ीन है. अगर एक शब्द में इसका परिचय देना हो तो, इसको ‘मुंहफट’ कह सकते हैं. शार्ली हेब्दो उन विषयों पर कॉन्टेंट छापने के लिए प्रख्यात और कुख्यात, दोनों है, जिसके बारे में लोग निजी बैठकों में बात करने से भी हिचकते हैं. इसी वजह से मैगज़ीन हर धड़े के लोगों के निशाने पर रहती है. 2015 में पैगंबर मोहम्मद का विवादित कार्टून छापने के बाद शार्ली हेब्दो को आतंकी हमले का सामना करना पड़ा था. इस हमले में मैगज़ीन के कई बड़े कार्टूनिस्ट मारे गए थे. तब से मैगज़ीन किसी सीक्रेट लोकेशन से चल रही है.

ईरान शार्ली हेब्दो से क्यों नाराज़ है?

09 दिसंबर 2022 को शार्ली हेब्दो ने अपने ट्विटर अकाउंट पर एक कंपटीशन का ऐलान किया. 

इसमें लिखा है,

‘शार्ली हेब्दो एक इंटरनैशनल कंपटीशन की शुरुआत कर रहा है. अगर आप प्रोफ़ेशनल कार्टूनिस्ट हैं तो, अली खामेनई का सबसे मज़ाकिया और सबसे शरारती कार्टून बनाकर भेजिए.’

ये प्रतियोगिता ईरान में चल रहे हिजाब-विरोधी प्रोटेस्ट के सपोर्ट में शुरू की गई थी. इसके लिए तीन सौ से ज़्यादा एंट्रीज़ आईं. इनमें से कुछ को मैगज़ीन में जगह मिली. कुछ कार्टून्स तो क्रिएटिव थे. एक में अली खामेनई को महसा अमीनी के बालों के फंदे में लटकते दिखाया गया था. सितंबर 2022 में पुलिस हिरासत में महसा अमीनी की मौत के बाद ही ईरान में प्रोटेस्ट शुरू हुआ था. एक कार्टून में खामेनई के आसपास लटकती लाशें दिखाई गई थीं. इसके जरिए खुले में फांसी पर चढ़ाए गए प्रदर्शनकारियों को दिखाने की कोशिश की गई थी. कुछ कार्टून्स में खामेनई को भागते दिखाया गया था. कुछ कार्टून्स में यौन अंगों का भी प्रदर्शन किया गया था. उन्हें यहां पर नहीं दिखाया जा सकता.

शार्ली हेब्दो में छपे हर एक कार्टून में अली खामेनई विलेन थे. जबकि ईरान में उनका दर्जा राष्ट्रपति से भी ऊपर है. अली खामेनई ईरान के दूसरे सुप्रीम लीडर हैं. उन्होंने 1989 में सत्ता संभाली थी. तब से ईरान में पांच राष्ट्रपति बदल चुके हैं. खामेनई ख़ुद भी सुप्रीम लीडर बनने से पहले ईरान के राष्ट्रपति के तौर पर काम कर रहे थे.

आइए समझते हैं,

- ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनई की कहानी क्या है?
- और, ईरान की राजनीति में सुप्रीम लीडर कितना ताक़तवर होता है?

ईरान पश्चिम एशिया में बसा देश है. 

ईरान का नक्शा (गूगल)

नक़्शे पर देखें तो भारत के बाद पाकिस्तान आता है. पाकिस्तान के बाद अफ़ग़ानिस्तान और ईरान की सीमा शुरू हो जाती है. ईरान के उत्तर में कैस्पियन सागर है, जबकि दक्षिण में ओमान और पर्शिया की खाड़ी है. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के अलावा इराक़, तुर्की, अज़रबैजान, आर्मेनिया और तुर्कमेनिस्तान, ईरान के पड़ोसी हैं.

ये तो हुआ भूगोल. इतिहास के बारे में हम पहले भी बता चुके हैं. एक रिकैप करा देते हैं.

ईरान में 651 ईसवी से पहले सासानी वंश का राज हुआ करता था. 651 ईसवी में अरब पेनिनसुला से अरब आए. वे अपने साथ इस्लाम लेकर आए थे. उन्होंने सासानी वंश को ख़िलाफ़त का हिस्सा बना लिया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि, ईरान की सभ्यता इतनी समृद्ध थी कि उसने इस्लाम को भी प्रभावित किया.

1501 ईसवी में सफ़वी साम्राज्य का राज शुरू हुआ. उन्होंने शिया मत को आधिकारिक दर्जा दे दिया. 1722 में सफ़वी वंश का पतन हो गया. उसके बाद लंबे समय तक इलाके पर क़ब्ज़े को लेकर संघर्ष चला. इसमें अफ़ग़ान, ब्रिटिश और रुसियों ने हाथ आजमाया.

फिर 1925 में पहलवी वंश का शासन आया. 1941 में मित्र राष्ट्रों ने मिलकर रज़ा शाह को हटा दिया. उनकी जगह पर उनके छोटे बेटे मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी को कमान सौंपी गई. उनके शासन के दौरान एक प्रधानमंत्री हुए, मोहम्मद मोसादेक. रज़ा शाह पहलवी कौड़ियों के दाम पर ईरान का तेल पश्चिमी कंपनियों को बेच रहे थे. मोसादेक इसके ख़िलाफ़ थे. जब मोसादेक प्रधानमंत्री बने, उन्होंने इन कंपनियों पर जांच बिठा दी. वो ईरान के तेल रिजर्व पर से विदेशी नियंत्रण को खत्म करना चाहते थे. उन्होंने ईरान की राजशाही की लगाम भी कस दी थी. ईरान में ब्रिटेन और अमेरिका का सीधा हित जुड़ा था. मोसादेक उनके लाभ के लिए ख़तरनाक हो चुके थे.

फिर ब्रिटेन और अमेरिका ने उन्होंने पहले तो ईरान का आर्थिक बहिष्कार किया. उसके बाद पैसे देकर मोसादेक के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट करवाए. मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के नेतृत्व में सेना के एक गुट ने अगस्त 1953 में मोसादेक को कुर्सी से उतार दिया. अब शाह निरंकुश थे. वो अपनी खुफिया एजेंसी और सेना के दम पर आलोचकों को काबू में रखने लगे. इससे जनता का दम घुटने लगा. तब शाह के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट शुरू हुआ. उसी दौर में इस्लामी धर्मगुरु अयातुल्लाह रुहुल्लाह खोमैनी लौटकर ईरान आए. 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई. शाह निर्वासन में चले गए. और, तब खोमैनी ने ईरान को इस्लामिक रिपब्लिक घोषित कर दिया.

क्रांति के बाद नई व्यवस्था बनाने का सवाल उठा. इसके लिए ‘असेंबली ऑफ़ दी एक्सपर्ट्स’ यानी ज्ञानियों की सभा बनाई गई. ईरान के संविधान में बदलाव के बाद असेंबली को भंग कर दिया गया. 1982 में इसका फिर से गठन हुआ. मौजूदा दौर में 1982 वाली व्यवस्था चल रही है. असेंबली ऑफ़ द एक्सपर्ट्स में 86 सदस्य होते हैं. इनमें इस्लामी धर्मगुरुओं को जगह दी जाती है. इन सदस्यों का चुनाव आठ बरस के लिए होता है. असेंबली के पास सुप्रीम लीडर को चुनने और हटाने का अधिकार है. लेकिन इसमें ऐसे ही लोगों को जगह दी जाती है, जो सुप्रीम लीडर की हां में हां भरे. आज तक कभी भी असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स ने सुप्रीम लीडर के किसी भी फ़ैसले को चुनौती नहीं दी है.

अब सुप्रीम लीडर की शक्तियों के बारे में जान लेते हैं.

ईरान की सत्ता की संरचना में सुप्रीम लीडर टॉप पर है. राष्ट्रपति से भी ऊपर. मौजूदा सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनई 1989 में इस कुर्सी पर बैठे थे. खामेनई ने शाह के ख़िलाफ़ क्रांति में रुहुल्लाह खोमैनी का साथ दिया था. इसके चलते उन्हें कई बरस जेल में भी रहना पड़ा. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अलग से एक सेना बनाने की बात आई. इसका काम इस्लामी मूल्यों की रक्षा करना था. इसके लिए ख़ोमैनी ने इस्लामिक रेवॉल्युशनरी गार्ड्स कोर (IRGC)  का गठन किया. ईरान के संविधान में रेगुलर आर्मी के साथ-साथ IRGC को भी जगह दी गई. तय ये हुआ कि रेगुलर आर्मी ईरान के इंटरनैशनल बॉर्डर की रक्षा करेगी, जबकि IRGC घरेलू मामले को देखेगी. कालांतर में ये सिस्टम आपस में नत्थी हो गया. IRGC का दखल बढ़ता गया. अब वो रेगुलर आर्मी से कंपीट करती है. IRGC का विचार के केंद्र में अली खामेनई ही थे.

ईरान की इस्लामिक क्रांति का एक दृश्य (AFP)

ईरान के संविधान के मुताबिक,

- सुप्रीम लीडर मुल्क़ की घरेलू और विदेश नीतियां तय कर सकते हैं.
- सुप्रीम लीडर सशस्त्र सेना के कमांडर-इन-चीफ़ भी होते हैं.
- ईरान की खुफिया एजेंसियां भी उन्हें ही रिपोर्ट करतीं है.
- किसी देश के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम लीडर को है.
- ईरान में एक गार्डियन काउंसिल भी है. ये काउंसिल तय करती है कि, कौन सा कैंडिडेट चुनाव में खड़ा हो सकता है. इस काउंसिल में 12 सदस्य होते हैं. इनमें से छह की नियुक्ति सुप्रीम लीडर के हाथों में हैं.
- सुप्रीम लीडर के दो हज़ार से अधिक प्रतिनिधि अलग-अलग सरकारी विभागों पर नज़र रखते हैं. उन्हें सुप्रीम लीडर का आंख और कान माना जाता है. कई मायनों में वे मंत्रियों से भी ज़्यादा ताक़तवर होते हैं. वे सुप्रीम लीडर के आदेश पर सरकार के किसी भी काम में दखल दे सकते हैं.

ईरान में भले ही पूरी शक्ति सुप्रीम लीडर के पास हो, लेकिन व्यवस्था में कोई कमी नहीं है.
वहां राष्ट्रपति भी हैं. बाकायदा चुनाव भी होता है. राष्ट्रपति सरकार के मुखिया भी हैं. लेकिन पावर के मामले में उनकी हैसियत कठपुतली जैसी है. ईरान कुछ चुनिंदा देशों में से है, जहां आर्म्ड फ़ोर्सेज़ की कमान राष्ट्रपति के हाथों में नहीं होती. राष्ट्रपति को किसी भी फ़ैसले को लागू कराने के लिए सुप्रीम लीडर की हामी ज़रूरी होती है.

ईरान में संसद भी है. यहां एकदलीय संसदीय व्यवस्था है. संसद में 290 सदस्य होते हैं. उनका कार्यकाल चार बरस का होता है. संसद कानून और बजट पास करने का काम करती है. हालांकि, संसद द्वारा पास किए गए प्रस्ताव को रिव्यू के लिए काउंसिल ऑफ़ गार्डियन्स में भेजना होता है. ये काउंसिल तय करती है कि संसद का फ़ैसला शरिया कानून के हिसाब से है या नहीं. अगर उन्हें लगता है कि नहीं है, तो काउंसिल फ़ैसले को रद्द करवा सकती है. ये काउंसिल भी सुप्रीम लीडर की छत्रछाया में काम करती है.

इसके अलावा, न्यायपालिका, सेना और खुफिया एजेंसियों में भी सुप्रीम लीडर का दखल होता है. ईरान के पोलिटिकल सिस्टम की कोई तय परिभाषा नहीं है. यहां जनता अपना नेता चुनने के लिए वोट करती है. कुछ राजनैतिक विचारक ईरान को लोकतांत्रिक धर्मतंत्र का नाम देते हैं. कुछ इसे कुलीन धर्मतंत्र कहते हैं. कुछ को ईरान का सिस्टम धार्मिक तानाशाही वाला लगता है. ईरान में संसद, अदालत और संविधान जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं, लेकिन उसके ऊपर कठमुल्लों का नियंत्रण है. इसलिए, कुछ राजनैतिक चिंतक इसे मुल्लातंत्र का नाम देते हैं. क्योंकि अंतिम सत्ता उन्हीं के हाथों में क़ैद है. और, सुप्रीम लीडर इस सत्ता के इकलौते सूत्रधार हैं.

वीडियो: दुनियादारी: 'बिकिनी किलर' कहे जाने वाले चार्ल्स शोभराज की पूरी कहानी क्या है?

Advertisement

Advertisement

()