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घर नहीं मौज मस्ती चाहिए! सेविंग और इनवेस्टमेंट से क्यों दूर जा रही है भारत की युवा पीढ़ी?

आज का भारतीय युवा 20 साल बाद मिलने वाले किसी अनिश्चित रिटर्न या जीवनभर की EMI के जाल में फंसने के बजाय, आज की शाम को खूबसूरत बनाने में यकीन रख रहा है. इसे बिजनेस और मार्केटिंग की भाषा में 'Present Wellbeing' या 'Immediate Joy' का ट्रेंड कहा जा रहा है.

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18 मई 2026 (पब्लिश्ड: 04:00 PM IST)
Indian Youth Consumer Trends 2026
युवा घर खरीदने के बजाय 'Immediate Joy' पर पैसे लुटा रहा है? (फोटो- इंडिया टुडे)
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"बेटा, अगले महीने से एक आरडी (RD) शुरू कर दो. थोड़ा पैसा बचेगा तो पांच साल में होम लोन के डाउन पेमेंट का जुगाड़ हो जाएगा." दिल्ली के करोल बाग में रहने वाले 52 साल के सतीश शर्मा जब अपने 24 साल के बेटे अर्णव को यह सलाह देते हैं, तो अर्णव मुस्कुराकर अपना फोन दिखाता है. फोन पर थाइलैंड के एक स्कूबा डाइविंग कोर्स का बुकिंग कन्फर्मेशन पेज चमक रहा होता है. अर्णव ने अगले तीन महीनों की अपनी पूरी सेविंग इस ट्रिप पर लगा दी है. सतीश जी सिर पकड़ लेते हैं कि आज की पीढ़ी को अपने भविष्य की कोई चिंता ही नहीं है.

यह कहानी सिर्फ अर्णव और सतीश जी की नहीं है. यह कहानी भारत के हर उस घर की है जहां एक मिलेनियल (26 से 41 साल के लोग) या जेन-जी (12 से 25 साल के लोग) रह रहा है. 2026 के भारत में एक बहुत बड़ा और खामोश बदलाव आया है. सालों से भारतीय समाज में जो 'पाई-पाई जोड़कर मकान बनाने' वाली थ्योरी चलती आ रही थी, उसकी बुनियाद हिल चुकी है. 

आज का भारतीय युवा 20 साल बाद मिलने वाले किसी अनिश्चित रिटर्न या जीवनभर की ईएमआई (EMI) के जाल में फंसने के बजाय, आज की शाम को खूबसूरत बनाने में यकीन रख रहा है. इसे बिजनेस और मार्केटिंग की भाषा में 'प्रेजेंट वेलबीइंग' या 'इमीडिएट जॉय' का ट्रेंड कहा जा रहा है.

सवाल उठता है कि ऐसा अचानक क्या हुआ कि भारतीय युवा इतना लापरवाह, या कहें कि इतना व्यावहारिक हो गया? क्या यह वाकई लापरवाही है या फिर आर्थिक अनिश्चितता के दौर में अपनी मानसिक शांति को बचाने का एक नया तरीका? 

मई 2026 की गूगल बिजनेस की ताजा कंज्यूमर ट्रेंड रिपोर्ट ने इस पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय मार्केट में 'माइक्रो-रिवॉर्ड्स' और शॉर्ट-टर्म लॉयल्टी प्रोग्राम्स को लेकर ग्राहकों के व्यवहार में भारी बदलाव आया है. आइए इस पूरे मामले को बहुत आसान भाषा में, परत-दर-परत समझते हैं कि भारत का मिजाज बदल कैसे रहा है.

गूगल की रिपोर्ट क्या कहती है और क्या है 'प्रेजेंट वेलबीइंग'

गूगल थिंक कंज्यूमर इनसाइट्स रिपोर्ट 2026 के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवा इस समय एक खास तरह की 'इमोशनल फटीग' यानी मानसिक थकान से गुजर रहे हैं. लगातार बदलती नौकरियां, वर्क फ्रॉम होम और ऑफिस के बीच का तनाव, और हर दिन बढ़ती महंगाई ने उन्हें इस बात पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि जब कल का कोई भरोसा नहीं, तो आज को क्यों मारा जाए? रिपोर्ट में साफ लिखा है, 

उपभोक्ता तत्काल मिलने वाले पुरस्कारों और नए अनुभवों को प्राथमिकता देकर अपनी मानसिक थकान से लड़ रहे हैं. यही वजह है कि 2026 की मार्केटिंग रणनीतियों में एक बड़ा बदलाव आया है.

इस बदलाव को समझने के लिए हमें कंपनियों के ऑफर्स को देखना होगा. पहले बैंक और फाइनेंस कंपनियां आपको 20 साल की होम लोन स्कीम या 15 साल की एंडोमेंट पॉलिसी बेचती थीं. आज कंपनियां आपको तीन महीने की नो-कॉस्ट ईएमआई पर आईफोन, या तुरंत मिलने वाले कैशबैक ऑफर्स दे रही हैं. 

कंपनियां समझ चुकी हैं कि आज के युवा को 'लॉन्ग-टर्म' के बड़े वादे नहीं चाहिए, उसे 'शॉर्ट-टर्म' के छोटे-छोटे माइलस्टोन पसंद हैं. अगर वह एक हफ्ते तक लगातार किसी ऐप से खाना ऑर्डर करता है, तो उसे आठवें दिन एक 'फ्री मील' का माइक्रो-रिवॉर्ड चाहिए. 20 साल बाद मिलने वाला बोनस उसके लिए आज कोई मायने नहीं रखता.

इस ट्रेंड को समझने के लिए हमें थोड़ा और पीछे जाना होगा. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हालिया डोमेस्टिक सेविंग्स रिपोर्ट को देखें तो पता चलता है कि भारतीय परिवारों की नेट फाइनेंशियल सेविंग्स पिछले कुछ सालों में अपने निचले स्तर पर आ गई हैं. लोग बैंकों में पैसा जमा करने के बजाय उसे म्यूचुअल फंड, शेयर मार्केट या फिर सीधे कंजम्पशन यानी खर्चों पर लगा रहे हैं. 

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत के पास पैसा नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह है कि भारत अब पैसे को तिजोरी में बंद करके रखने के बजाय उसे तुरंत इस्तेमाल करने के मूड में है.

घर खरीदने की चाहत से दूरी क्यों बना रहा है आज का युवा

हमारे माता-पिता के जमाने में जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य होता था 'अपना एक घर'. इसके लिए लोग अपनी पूरी जवानी एक ही सरकारी या प्राइवेट नौकरी में काट देते थे ताकि पीएफ (PF) के पैसे और लोन को मिलाकर एक फ्लैट या जमीन खरीदी जा सके. लेकिन 2026 के युवाओं के सामने मुश्किलें दूसरी हैं. पहली मुश्किल है रियल एस्टेट की आसमान छूती कीमतें. दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे शहरों में एक ढर्रे का टू-बीएचके (2 BHK) फ्लैट भी अब एक करोड़ रुपये से कम में नहीं मिलता.

अब जरा गणित को समझिए. अगर कोई युवा एक करोड़ रुपये का घर खरीदने के लिए 80 लाख रुपये का लोन लेता है, तो 8.5% की ब्याज दर पर उसकी महीने की ईएमआई लगभग 70,000 रुपये आएगी, वो भी पूरे 20 साल के लिए. अब सोचिए, जिस दौर में नौकरियों की कोई गारंटी नहीं है, जहां हर दूसरे दिन एआई (AI) के आने से ले-ऑफ की खबरें आती हैं, वहां कोई 24 या 28 साल का युवा अपनी सैलरी का 60% हिस्सा अगले 20 सालों के लिए किसी एक फ्लैट में कैसे ब्लॉक कर दे?

इसके अलावा, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और आवास विकास से जुड़े संगठनों के आंकड़े बताते हैं कि बड़े शहरों में रेंट टू प्रॉपर्टी वैल्यू का रेशियो यानी रेंटल यील्ड केवल 2 से 3% के बीच है. इसका मतलब यह है कि जिस एक करोड़ के घर की ईएमआई 70,000 रुपये है, वही घर किराए पर 20,000 से 25,000 रुपये में मिल जाता है. 

ऐसे में आज का प्रैक्टिकल युवा सोचता है कि जब वह कम पैसे में एक अच्छे इलाके में किराए पर रह सकता है, और जरूरत पड़ने पर अपनी नौकरी के हिसाब से शहर या इलाका बदल सकता है, तो वह 20 साल के लिए ईएमआई के बोझ तले क्यों दबे? इसी सोच ने 'रेंटल्स' और 'को-लिविंग' स्पेस के मार्केट को बहुत बड़ा बना दिया है.

क्या कहते हैं समाजशास्त्री और अर्थशास्त्री

इस पूरे मामले पर हमने दो अलग-अलग क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स से बात की ताकि यह समझा जा सके कि यह बदलाव देश को किस तरफ ले जा रहा है.
मुंबई के मशहूर जेवियर्स इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की सीनियर सोशियोलॉजिस्ट डॉ. अनन्य मुखर्जी कहती हैं:

इसे आप युवाओं का भटकाव नहीं कह सकते. यह दरअसल एक सोशल डिफेंस मैकेनिज्म है. आज का युवा अपने माता-पिता को देख चुका है, जिन्होंने पूरी जिंदगी सिर्फ बचत करने और घर की ईएमआई चुकाने में निकाल दी और जब जिंदगी जीने का वक्त आया तो वे बूढ़े हो चुके थे या बीमारियों से घिर गए थे. 

डॉ मुखर्जी आगे कहते हैं,

कोविड-19 महामारी के बाद से युवाओं में यह भावना बहुत गहरी हुई है कि जिंदगी बहुत अनिश्चित है. 'यू ओनली लिव वंस' (YOLO) का विचार सिर्फ एक स्लोगन नहीं है, यह उनकी जीने की शैली बन चुका है. वे भविष्य के किसी बड़े सुख के लिए अपने आज के छोटे-छोटे सुखों की कुर्बानी नहीं देना चाहते.


दूसरी तरफ, कानपुर के एक प्रमुख कॉलेज में मैनेजमेंट पढ़ाने वाले डॉक्टर राजीव नयन सिंह का नजरिया थोड़ा अलग है. उनका कहना है,

बिजनेस और इकोनॉमी के लिहाज से यह शॉर्ट-टर्म में बहुत अच्छा है क्योंकि जब लोग खर्च करते हैं, तो मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ती है. ट्रैवल, हॉस्पिटैलिटी, गैजेट्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर इसी वजह से बूम कर रहे हैं. लेकिन लॉन्ग-टर्म के लिहाज से यह चिंता का विषय हो सकता है. अगर युवा पीढ़ी बिल्कुल भी कोर सेविंग्स नहीं करेगी, तो 30 साल बाद जब वे रिटायर होंगे, तो उनके पास सोशल सिक्योरिटी के नाम पर कुछ नहीं होगा.

डॉ सिंह इस मुद्दे पर आगे कहते हैं,

भारत में अमेरिका या यूरोप की तरह सरकारी पेंशन या सोशल सिक्योरिटी का मजबूत ढांचा नहीं है. इसलिए आज के इमीडिएट जॉय और कल की फाइनेंशियल सिक्योरिटी के बीच एक बैलेंस होना बहुत जरूरी है.

मध्यवर्गीय माता-पिता की हैरानी और मनोवैज्ञानिक पहलू

इस पूरे बदलाव का सबसे ज्यादा असर भारतीय मिडिल क्लास परिवारों के आपसी रिश्तों पर पड़ रहा है. एक तरफ वो माता-पिता हैं जिन्होंने अपनी हर इच्छा को मारकर बच्चों की पढ़ाई और घर के लिए पैसे जोड़े. दूसरी तरफ उनके बच्चे हैं जो पहली सैलरी मिलते ही सीधे आईफोन स्टोर या लद्दाख ट्रिप की प्लानिंग करने लगते हैं. माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे गैर-जिम्मेदार हो रहे हैं, जबकि बच्चों को लगता है कि उनके माता-पिता बहुत ही रूढ़िवादी सोच के हैं और जिंदगी को जीना नहीं जानते.

यहां पर मनोविज्ञान का एक बड़ा नियम काम करता है जिसे 'ग्रैटिफिकेशन' कहते हैं. पुराने जमाने में 'डिलेड ग्रैटिफिकेशन' यानी आज मेहनत करो और फल कल मिलेगा, पर जोर था. आज का दौर 'इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन' का है. इंटरनेट की स्पीड से लेकर रील के स्क्रॉलिंग तक, सब कुछ तुरंत हो रहा है. जब आपको खाना 10 मिनट में डिलीवर हो रहा है, कैब 2 मिनट में आ रही है, तो पैसे का रिटर्न 10 साल बाद क्यों मिले? युवाओं को लगता है कि जो पैसा आज उनके पास है, उसकी वैल्यू आज ज्यादा है, क्योंकि महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ रही है, कल उस पैसे की वैल्यू कम ही होनी है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (NIMHANS) के कुछ अनऑफिशियल सर्वे भी बताते हैं कि युवाओं में फाइनेंशियल स्ट्रेस की वजह बचत न कर पाना नहीं है, बल्कि लाइफस्टाइल को मेंटेन न कर पाने का डर है. जिसे 'फोमो' (FOMO - Fear of Missing Out) कहा जाता है.

जब एक युवा अपने कलीग को इंस्टाग्राम पर यूरोप की तस्वीरें डालते देखता है, तो वह अपने अंदर एक हीन भावना महसूस करता है. इस हीन भावना से बचने के लिए वह अपनी सेविंग्स को ट्रिप पर उड़ा देता है. यह एक तरह का एक्शन-रिएक्शन चैन है, जहां सोशल मीडिया खर्चों को बढ़ावा दे रहा है और खर्चे मानसिक सुकून की तलाश में किए जा रहे हैं.

कॉरपोरेट और कंपनियों का बदला हुआ गेम प्लान

कंपनियां बहुत चालाक होती हैं. वे हवा का रुख भांप लेती हैं. गूगल की 2026 की जो रिपोर्ट हमने ऊपर बताई, उसका असर कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर साफ दिख रहा है. अब कंपनियां आपको बड़ी गाड़ियां या बड़े घर बेचने के बजाय 'सब्सक्रिप्शन मॉडल' पर चीजें बेच रही हैं. आज आपको कार खरीदने की जरूरत नहीं है, आप उसे महीने के सब्सक्रिप्शन पर ले सकते हैं. आपको फर्नीचर खरीदने की जरूरत नहीं है, आप उसे किराए पर ले सकते हैं.

कंपनियों ने अपने लॉयल्टी प्रोग्राम्स को पूरी तरह से बदल दिया है. पहले आपको सालभर शॉपिंग करने पर कुछ पॉइंट्स मिलते थे, जिससे आप अगले साल कुछ खरीद सकते थे. अब कंपनियां 'माइक्रो-लॉयल्टी' पर काम कर रही हैं. जैसे ही आपने तीन बार किसी ऐप से पेमेंट किया, आपको चौथे पेमेंट पर तुरंत एक मूवी टिकट का डिस्काउंट कूपन मिल जाता है. कंपनियों को पता है कि अगर उन्होंने यूजर को तुरंत कुछ नहीं दिया, तो यूजर तुरंत किसी दूसरे ऐप पर शिफ्ट हो जाएगा.

नीति आयोग के कुछ नीतिगत दस्तावेजों में भी इस बात की चर्चा है कि भारत की डिजिटल इकोनॉमी का बड़ा हिस्सा अब इसी तरह के 'कंजम्पशन ड्रिवन' मॉडल पर चल रहा है. फिनटेक कंपनियां जैसे क्रेड, पेटीएम और अन्य बैंकों ने 'बाय नाउ, पे लेटर' (BNPL) की जो सुविधा दी है, उसने आग में घी का काम किया है. इस सुविधा ने युवाओं के लिए खर्च करना बेहद आसान बना दिया है. उनके पास पैसे नहीं भी होते, तो भी वे अपनी इच्छाओं को तुरंत पूरा कर लेते हैं, भले ही अगले महीने उन्हें उसकी किस्त चुकानी पड़े.

सरकार, पॉलिसी और लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक इम्पैक्ट

जब देश का युवा घर खरीदने के बजाय घूमने और गैजेट्स पर पैसे खर्च करता है, तो इसका असर सिर्फ उन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी देश की अर्थव्यवस्था और सरकार की पॉलिसियों पर पड़ता है. भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स के पुराने और नए पैटर्न्स को देखें तो सरकार हमेशा से चाहती रही है कि लोग लॉन्ग-टर्म एसेट्स में इनवेस्ट करें. जब लोग घर खरीदते हैं, तो सीमेंट, स्टील, लेबर और बैंकिंग जैसे लगभग 200 से ज्यादा सहायक उद्योगों को बढ़ावा मिलता है. रियल एस्टेट को भारतीय जीडीपी (GDP) का एक बड़ा इंजन माना जाता है.

लेकिन जब युवा इस सेक्टर से मुंह मोड़ रहे हैं, तो रियल एस्टेट कंपनियों को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है. अब वे बड़े-बड़े लग्जरी फ्लैट्स बनाने के बजाय 'स्टूडियो अपार्टमेंट्स' और 'वन-आरके' (1 RK) फ्लैट्स बना रही हैं, जो युवाओं के बजट में फिट हो सकें. सरकार भी अब प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी स्कीमों के जरिए मिडिल क्लास को लुभाने की कोशिश कर रही है, लेकिन ब्याज दरों की अनिश्चितता और शहरों में जमीनों की कमी के कारण यह बहुत ज्यादा असरदार नहीं हो पा रहा है.

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में अगर कंजम्पशन बढ़ता है, तो वह शॉर्ट-टर्म में जीडीपी ग्रोथ को बहुत तेज दिखाता है. भारत इस समय दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, और इसकी एक बड़ी वजह हमारा घरेलू कंजम्पशन ही है. 

लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि अगर घरेलू बचत (Household Savings) कम होती चली गई, तो देश के बैंकों के पास बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लोन देने के लिए पूंजी की कमी हो जाएगी. तब सरकार को विदेशी कर्ज पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ेगा, जो किसी भी देश की आर्थिक संप्रभुता के लिए लंबा जोखिम हो सकता है.

क्या बदल सकता है भविष्य: एक न्यूट्रल एनालिसिस

अब बात करते हैं कि आने वाले समय में यानी अगले पांच से दस सालों में इस ट्रेंड का क्या असर होगा. क्या यह सिर्फ एक फेज है जो उम्र के साथ निकल जाएगा, या फिर यह भारतीय समाज का एक स्थायी सच बनने जा रहा है?

पैमानापुराना मॉडल (माता-पिता का दौर)नया मॉडल (2026 के युवाओं का दौर)
मुख्य लक्ष्यखुद का घर और फिक्स्ड डिपॉजिटट्रेवल, अनुभव और मेंटल पीस
बचत का तरीकासैलरी का 30-40% पहले बचाओ, फिर खर्च करोपहले खर्च करो, जो बचे उसे शॉर्ट-टर्म में इनवेस्ट करो
लोन का नजरियाघर या जमीन के लिए बड़ा और लंबा लोनगैजेट्स, ट्रिप्स या कार के लिए छोटा और नो-कॉस्ट ईएमआई लोन
करियर की सोचएक ही कंपनी में स्थिरता और रिटायरमेंट का प्लानहर 2-3 साल में नौकरी बदलना और फ्रीलांसिंग/गिग इकोनॉमी

इस टेबल से साफ है कि बदलाव बहुत गहरा है. भविष्य में इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि 'ओनरशिप' यानी मालिकाना हक की अहमियत कम हो जाएगी और 'यूसेज' यानी इस्तेमाल करने की अहमियत बढ़ जाएगी. युवा किसी चीज को अपना बनाने के बजाय उसे इस्तेमाल करके आगे बढ़ जाने में ज्यादा यकीन रखेंगे. यह सोच रियल एस्टेट और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के पारंपरिक स्ट्रक्चर को पूरी तरह से बदल कर रख देगी.

आम आदमी और युवाओं के लिए व्यावहारिक सलाह

अगर आप भी इसी जेन-जी या मिलेनियल पीढ़ी का हिस्सा हैं और आपको भी 'इमीडिएट जॉय' का यह ट्रेंड अपनी तरफ खींचता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. अपनी मानसिक शांति के लिए घूमना, अच्छे अनुभव लेना और खुद पर खर्च करना बहुत जरूरी है. लेकिन इसके साथ ही कुछ ऐसी व्यावहारिक बातें हैं जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.

50-30-20 का नियम अपनाएं. अपनी इनकम का 50 फीसदी हिस्सा जरूरी खर्चों (किराया, बिल) पर लगाएं, 30 फीसदी अपने 'इमीडिएट जॉय' (घूमना, खाना, गैजेट्स) पर खर्च करें, लेकिन कम से कम 20 प्रतिशत ऐसी जगह जरूर बचाएं जिसे आप अगले 5-10 साल तक छुएंगे नहीं.

इमरजेंसी फंड सबसे पहले बनाएं: नौकरियां आज के दौर में बहुत अनिश्चित हैं. आपके पास कम से कम 6 महीने के खर्च के बराबर का पैसा लिक्विड फॉर्म में (जैसे सेविंग्स अकाउंट या शॉर्ट-टर्म एफडी) होना चाहिए, ताकि अगर कल को कोई दिक्कत आए तो आपको किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े.

अनुभव खरीदिए, लेकिन कर्ज लेकर नहीं: अगर आप थाइलैंड या लद्दाख जाना चाहते हैं, तो उसके लिए पैसे जोड़कर जाइए. क्रेडिट कार्ड या 'बाय नाउ, पे लेटर' के जरिए ट्रिप प्लान करना आपके आज के आनंद को कल के तनाव में बदल देगा.

हेल्थ इंश्योरेंस को हल्के में न लें: घर भले न खरीदें, लेकिन एक अच्छा हेल्थ इंश्योरेंस जरूर ले लें. आज के दौर में मेडिकल खर्च इतने ज्यादा हैं कि एक बीमारी आपकी सालों की लाइफस्टाइल को एक झटके में खत्म कर सकती है.

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क्या वाकई 'आज' जीत गया और 'कल' हार गया?

तो लब्बोलुआब यह है कि 2026 का भारतीय युवा कोई मूर्ख या गैर-जिम्मेदार नहीं है. वह बहुत ही कैलकुलेटिव और प्रैक्टिकल है. उसने अपने आस-पास की दुनिया को बदलते देखा है. उसने देखा है कि कैसे बड़े-बड़े वादे और लंबी योजनाएं एक झटके में बिखर जाती हैं. इसलिए उसने एक नया रास्ता चुना है, जहां वह भविष्य के किसी बड़े महल के सपने देखने के बजाय आज की धूप का मजा लेना चाहता है.

यह ट्रेंड भारतीय समाज के लिए एक वेक-अप कॉल है. यह बताता है कि अब पुरानी थ्योरी से काम नहीं चलेगा. सरकारों को, कंपनियों को और माता-पिता को भी युवाओं की इस बदलती मानसिकता को समझना होगा. जब तक हम उन्हें एक सुरक्षित और स्थिर भविष्य का भरोसा नहीं देंगे, तब तक वे आज के 'माइक्रो-रिवॉर्ड्स' में ही अपनी खुशियां तलाशते रहेंगे. जिंदगी आखिर आज में ही जी जाती है, कल तो सिर्फ एक संभावना है. युवाओं ने इसी संभावना के ऊपर आज की हकीकत को चुना है, और फिलहाल तो यह ट्रेंड रुकने वाला नहीं दिखता.

वीडियो: भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने युवाओं को कॉकरोच क्यों कहा?

सामान्य प्रश्न

प्रेजेंट वेलबीइंग ट्रेंड क्या है?

यह एक ऐसा कंज्यूमर बिहेवियर है जहां लोग भविष्य के लिए बड़ी बचत करने के बजाय अपने आज के जीवन को बेहतर बनाने, मानसिक शांति पाने और तुरंत मिलने वाले सुखों (जैसे घूमना, अच्छे गैजेट्स) पर पैसे खर्च करते हैं.

क्या आज के युवा बिल्कुल भी बचत नहीं कर रहे हैं?

ऐसा नहीं है. युवा बचत कर रहे हैं, लेकिन उनके बचत का तरीका बदला है. वे पारंपरिक फिक्स्ड डिपॉजिट या प्रॉपर्टी में पैसे लगाने के बजाय म्यूचुअल फंड, एसआईपी (SIP) और इक्विटी में छोटे समय के लिए इनवेस्ट करना ज्यादा पसंद करते हैं.

घर न खरीदने का फैसला आर्थिक रूप से सही है या गलत?

यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस शहर में रह रहे हैं और वहां का रेंटल यील्ड क्या है. अगर किसी शहर में प्रॉपर्टी के दाम बहुत ज्यादा हैं और किराया कम है, तो किराए पर रहना और बाकी पैसे को अच्छी जगह इनवेस्ट करना आर्थिक रूप से एक समझदारी भरा फैसला माना जाता है.

कंपनियों को इस नए ट्रेंड से क्या फायदा हो रहा है?

कंपनियों को इससे यह फायदा हो रहा है कि उनका टर्नओवर बढ़ गया है. ग्राहक अब बार-बार और छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन कर रहे हैं. 'माइक्रो-रिवॉर्ड्स' के जरिए कंपनियां ग्राहकों को अपने प्लेटफॉर्म पर लगातार व्यस्त रखने में कामयाब हो रही हैं.

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