The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Delhi-NCR Climate Shock: Dedicated Heatwave and Flood Control Rooms Live in Hospitals from Today; Check Full Emergency Plan

अस्पतालों में स्पेशल 'वॉर रूम', दिल्ली-NCR और हरियाणा में 'हीटवेव' से निपटने के लिए नया इमरजेंसी प्लान

Delhi NCR Heat Wave: दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा के सरकारी अस्पतालों में आज 18 मई से 'फ्लड एंड हीटवेव कंट्रोल रूम' लाइव हो गए हैं. यह सिर्फ एक कागजी आदेश नहीं है, बल्कि अस्पतालों के भीतर एक ऐसा 'वॉर रूम' तैयार किया गया है, जो सीधे मौसमी बीमारियों से पीड़ित मरीजों की ट्रैकिंग और इलाज करेगा.

Advertisement
pic
18 मई 2026 (अपडेटेड: 18 मई 2026, 12:54 PM IST)
Heatwave Emergency Plan 2026
'हीटवेव और फ्लड' से निपटने का क्या है नया इमरजेंसी प्लान? (फोटो- PTI)
Quick AI Highlights
Click here to view more

मई का महीना आधा बीत चुका है और सूरज की तपिश अब चमड़ी जलाने लगी है. दोपहर के वक्त जब आप घर से बाहर निकलते हैं, तो ऐसा लगता है कि किसी जलते हुए तंदूर के सामने खड़े हैं. दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों में पारा लगातार ऊपर चढ़ रहा है. इस भयंकर गर्मी के बीच एक और बड़ी चिंता खिड़की पर दस्तक दे रही है, वह है अगले महीने आने वाला मॉनसून.

हर साल हम देखते हैं कि जिस दिल्ली-एनसीआर में लोग मई-जून में बूंद-बूंद पानी और बिजली के लिए तरसते हैं, वही इलाका जुलाई आते-आते जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति से जूझने लगता है. यानी एक तरफ आसमान से बरसती आग और दूसरी तरफ सड़कों पर डूबने का खतरा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसी डबल अटैक से निपटने के लिए आज यानी 18 मई 2026 से हमारे आसपास का पूरा सरकारी हेल्थ सिस्टम बदलने जा रहा है.

अगर आप मिडिल क्लास परिवार से हैं, तो आपके मन में अक्सर यह डर रहता है कि अगर इस मौसम में घर के बुजुर्ग या बच्चों की तबीयत खराब हुई, तो सरकारी अस्पताल के चक्कर काटने पड़ेंगे. वहां लंबी लाइनें मिलेंगी, डॉक्टर समय पर नहीं मिलेंगे या ओआरएस (ORS) और जरूरी दवाइयों की किल्लत होगी. इसी चिंता को दूर करने के लिए स्वास्थ्य महानिदेशालय (DGHS) ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है. 

18 मई 2026 से दिल्ली-एनसीआर से सटे हरियाणा के तमाम जिलों और सरकारी अस्पतालों में 'फ्लड एंड हीटवेव कंट्रोल रूम्स' को पूरी तरह लाइव और एक्टिव कर दिया गया है. यह सिर्फ एक कागजी आदेश नहीं है, बल्कि अस्पतालों के भीतर एक ऐसा 'वॉर रूम' तैयार किया गया है, जो सीधे मौसमी बीमारियों से पीड़ित मरीजों की ट्रैकिंग और इलाज करेगा.

जनता के नजरिए से देखें तो यह कदम समय की मांग था. हर साल सरकारें तब जागती हैं जब आपदा सिर पर आ जाती है. जब लोग हीटस्ट्रोक से दम तोड़ने लगते हैं या बाढ़ के पानी की वजह से डेंगू-मलेरिया फैल जाता है, तब जाकर बैठकों का दौर शुरू होता है. लेकिन इस बार नीति निर्माताओं ने पहले से तैयारी का दावा किया है. 

18 मई से शुरू हुए इस एक्शन प्लान का सीधा असर आपके और हमारे जीवन पर पड़ने वाला है. इस बेहद विस्तृत लेख में हम आपको बताएंगे कि इस बार का क्लाइमेट शॉक कितना बड़ा है, अस्पतालों के भीतर क्या इंतजाम बदले हैं और एक आम नागरिक के तौर पर आपको इस सरकारी तंत्र से क्या उम्मीद रखनी चाहिए.

heat
गर्मी इस साल सारे रिकॉर्ड तोड़ने में लगी है! (फोटो- PTI)

क्या है डीजीएचएस का आदेश और अब क्या बदल गया?

स्वास्थ्य महानिदेशालय (DGHS) हरियाणा ने 13 से 15 मई 2026 के बीच सभी जिलों के सिविल सर्जन्स को एक बेहद जरूरी और कड़ा पत्र जारी किया था. इस पत्र का सीधा साफ निर्देश था कि 18 मई 2026 की सुबह से सभी जिला अस्पतालों में हीटवेव और बाढ़ से निपटने के लिए समर्पित कंट्रोल रूम काम करना शुरू कर देंगे. 

इसका मतलब यह है कि अब अगर आप किसी सरकारी अस्पताल में जाते हैं, तो आपको लू लगने या मौसमी बुखार के इलाज के लिए सामान्य ओपीडी की लंबी लाइनों में लगकर वक्त बर्बाद नहीं करना होगा. इन कंट्रोल रूम्स को सीधे इमरजेंसी वार्ड और एम्बुलेंस सेवाओं से जोड़ा गया है.

इस आदेश के पीछे की मुख्य वजह यह है कि इस साल मौसम का मिजाज पिछले कई सालों के मुकाबले ज्यादा आक्रामक रहने का अनुमान है. मौसम विभाग की चेतावनियों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने पहले ही अपनी कमर कस ली है. कंट्रोल रूम का काम सिर्फ मरीजों का इलाज करना नहीं होगा, बल्कि वे हर दिन अपने इलाके का डेटा इकट्ठा करेंगे कि कितने लोग हीटस्ट्रोक का शिकार हुए और किस इलाके में पानी से होने वाली बीमारियां फैल रही हैं. यह डेटा सीधे राज्य मुख्यालय को भेजा जाएगा ताकि दवाओं और डॉक्टरों की कमी को तुरंत पूरा किया जा सके.

नीतिगत स्तर पर इसे एक बड़ा बदलाव माना जा सकता है क्योंकि यह 'रिएक्टिव' होने के बजाय 'प्रोएक्टिव' अप्रोच है. यानी बीमारी फैलने के बाद इलाज ढूंढने से बेहतर है कि बीमारी के आने का रास्ता पहले ही रोक दिया जाए. अस्पतालों में दवाओं का स्टॉक, जैसे ओआरएस पैकेट, आईवी फ्लूइड्स और जीवन रक्षक दवाइयों को एडवांस में रिजर्व कर दिया गया है. 

इसके अलावा, इन कंट्रोल रूम्स में चौबीसों घंटे स्टाफ की तैनाती सुनिश्चित की गई है ताकि रात के वक्त भी अगर कोई मरीज गंभीर हालत में आए तो उसे तुरंत अटेंड किया जा सके.

क्लाइमेट शॉक का यह नया दौर कितना खतरनाक है?

ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज जैसे शब्द अब सिर्फ किताबों या बड़े सम्मेलनों तक सीमित नहीं रह गए हैं. यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. मेडिकल जर्नल द लांसेट (The Lancet) की रिपोर्ट्स लगातार चेतावनी दे रही हैं कि भारत जैसे विकासशील देशों में क्लाइमेट शॉक का सबसे पहला और गहरा असर जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है. 

इस साल मई में जो गर्मी हम देख रहे हैं, वह सामान्य से कई डिग्री ज्यादा है. कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके दिल्ली-एनसीआर में 'अर्बन हीट आइलैंड' का असर दिख रहा है, जहां रात के वक्त भी तापमान कम नहीं होता.

जब शरीर को लगातार इतनी तेज गर्मी का सामना करना पड़ता है, तो वह अपना तापमान नियंत्रित नहीं कर पाता. इसे ही मेडिकल की भाषा में हीटस्ट्रोक या लू लगना कहते हैं. लेकिन कहानी सिर्फ गर्मी पर खत्म नहीं होती. जैसे ही जून के दूसरे या तीसरे हफ्ते में मॉनसून दस्तक देगा, वैसे ही हवा में उमस का स्तर अचानक बढ़ जाएगा. उमस भरी गर्मी इंसानी शरीर के लिए सूखी गर्मी से भी ज्यादा खतरनाक होती है क्योंकि इसमें पसीना सूख नहीं पाता और शरीर अंदर ही अंदर उबलने लगता है.

इसके ठीक बाद शुरू होता है बाढ़ और जलभराव का सीजन. दिल्ली-एनसीआर की ड्रेनेज व्यवस्था किसी से छिपी नहीं है. हल्की सी बारिश में भी सड़कें समंदर बन जाती हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बाढ़ के बाद जो पानी जमा रहता है, वह मच्छरों और बैक्टीरिया के लिए ब्रीडिंग ग्राउंड बन जाता है. इसके कारण डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया और डायरिया जैसी बीमारियां महामारी का रूप ले लेती हैं. डीजीएचएस का यह नया प्लान इसी दोहरे खतरे को भांपते हुए तैयार किया गया है.

अस्पतालों के 'वॉर रूम' में आम आदमी के लिए क्या सुविधाएं हैं?

एक आम आदमी जब बीमार होता है तो उसे पॉलिसी की बारीकियों से कोई लेना-देना नहीं होता. उसे सिर्फ इस बात से मतलब होता है कि जब वह अस्पताल पहुंचे तो उसे स्ट्रेचर मिले, डॉक्टर मिले और दवा मिले. इस बार के इमरजेंसी प्लान में इसी बात पर सबसे ज्यादा फोकस किया गया है. हर जिला अस्पताल में एक 'हीटस्ट्रोक डेडिकेटेड वार्ड' बनाया गया है. यह वार्ड पूरी तरह एयर-कंडीशंड या ठंडे कूलरों से लैस होगा ताकि मरीज के शरीर के तापमान को तुरंत कम किया जा सके.

इसके साथ ही, एम्बुलेंस सेवाओं को हाई अलर्ट पर रखा गया है. अगर किसी सार्वजनिक जगह या काम के दौरान कोई व्यक्ति बेहोश होकर गिरता है, तो हेल्पलाइन पर कॉल करते ही नजदीकी एम्बुलेंस उसे लेने पहुंचेगी. इन एम्बुलेंसों के भीतर भी ओआरएस (ORS) और आइस पैक्स की व्यवस्था अनिवार्य कर दी गई है. अस्पतालों के भीतर डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को इस बात की विशेष ट्रेनिंग दी गई है कि वे सामान्य बुखार और हीटस्ट्रोक के लक्षणों के बीच तुरंत अंतर कर सकें और बिना समय गंवाए इलाज शुरू कर सकें.

बाढ़ के एंगल को देखें तो कंट्रोल रूम्स को जलभराव वाले इलाकों की मैपिंग करने की जिम्मेदारी दी गई है. अगर किसी खास कॉलोनी या स्लम एरिया से डायरिया या उल्टी-दस्त के ज्यादा मरीज आ रहे हैं, तो कंट्रोल रूम तुरंत वहां एक मोबाइल मेडिकल टीम भेजेगा. यह टीम वहीं मौके पर जाकर लोगों को साफ पानी के लिए क्लोरीन की गोलियां बांटेगी और ओआरएस के पैकेट देगी ताकि बीमारी को अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही रोका जा सके.

मिडिल क्लास और गरीब तबके पर इसका क्या असर होगा?

इस पूरे क्लाइमेट क्राइसिस का सबसे बड़ा शिकार भारत का मिडिल क्लास और लोअर-मिडिल क्लास होता है. अमीर तबका तो अपने घरों और दफ्तरों में सेंट्रलाइज्ड एसी चलाकर बैठ जाता है, लेकिन जो लोग रोज कमाने-खाने वाले हैं या जिन्हें फील्ड में रहकर काम करना पड़ता है, उनके पास कोई चॉइस नहीं होती. डिलीवरी बॉयज, कंस्ट्रक्शन वर्कर्स, सिक्योरिटी गार्ड्स और ऑटो ड्राइवर्स इस झुलसाती गर्मी में सीधे मौत से जूझते हैं. उनके लिए सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा होते हैं.

मिडिल क्लास परिवार के लिए प्राइवेट अस्पतालों का खर्च उठाना आजकल बजट से बाहर होता जा रहा है. नीति आयोग (NITI Aayog) की विभिन्न रिपोर्ट्स में यह बात सामने आ चुकी है कि भारत में लोगों की जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) आज भी बहुत ज्यादा है, जो कई परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे धकेल देता है. ऐसे में अगर सरकारी अस्पतालों की यह नई व्यवस्था सुचारू रूप से काम करती है, तो यह मिडिल क्लास के लिए एक बहुत बड़ी आर्थिक और मानसिक राहत होगी.

इसके अलावा, इस व्यवस्था का एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है. जब आम जनता को पता होता है कि सरकार ने संकट से निपटने के लिए एक विशेष ढांचा तैयार किया है, तो समाज में पैनिक या डर का माहौल कम होता है. लोग समय रहते अस्पताल पहुंचने लगते हैं, जिससे गंभीर मामलों और मौतों की संख्या में भारी गिरावट आ सकती है. अब जमीन पर यह प्लान कितना कामयाब होता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अस्पतालों का स्टाफ इस आदेश को कितनी गंभीरता से लेता है.

सरकार की मंशा बनाम जमीनी हकीकत

अगर हम नीतिगत चश्मे से देखें, तो स्वास्थ्य महानिदेशालय का यह कदम सराहनीय है. यह दिखाता है कि प्रशासन अब आपदा आने का इंतजार नहीं कर रहा है. नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (National Health Accounts) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का एक छोटा हिस्सा ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है. हालांकि पिछले कुछ सालों में इस बजट में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बुनियादी ढांचे में सुधार की रफ्तार अभी भी धीमी है. ऐसे में मौजूदा संसाधनों का ही बेहतर इस्तेमाल करके विशेष कंट्रोल रूम बनाना एक स्मार्ट एडमिनिस्ट्रेटिव मूव है.

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. विपक्ष और स्वास्थ्य क्षेत्र के एक्टिविस्ट्स अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि क्या सिर्फ कंट्रोल रूम बना देने से डॉक्टरों की कमी पूरी हो जाएगी? हेल्थ सेक्टर में एक एनजीओ चलाने वाले ओल्ड राजिन्दर नगर निवासी ओजस वालिया कहते हैं,

 दिल्ली-एनसीआर के कई सरकारी अस्पतालों में आज भी स्वीकृत पदों के मुकाबले डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है. जब तक मैनपावर की इस कमी को दूर नहीं किया जाता, तब तक दुनिया का कोई भी बेहतरीन प्लान जमीन पर पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकता.

इसके अलावा, विभागों के बीच तालमेल की कमी भी एक बड़ी चुनौती है. स्वास्थ्य विभाग अपना काम कर सकता है, लेकिन बिजली कटौती और पानी की किल्लत को दूर करना दूसरे विभागों के हाथ में है. अगर अस्पताल में ही बिजली गुल हो जाए या साफ पानी की सप्लाई न हो, तो कंट्रोल रूम बेअसर हो जाएंगे. इसलिए, इस इमरजेंसी प्लान की सफलता के लिए पावर कॉर्पोरेशन और अर्बन लोकल बॉडीज के साथ रियल-टाइम कोऑर्डिनेशन होना बेहद जरूरी है.

बिजनेस और इकोनॉमी पर मौसम के इस बदले मिजाज का असर

क्लाइमेट शॉक का असर सिर्फ सेहत पर ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और बिजनेस सेंटर्स पर भी पड़ता है. दिल्ली-एनसीआर देश का एक बड़ा इकोनॉमिक हब है. गुरुग्राम और नोएडा में हजारों कॉर्पोरेट दफ्तर, आईटी पार्क और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं. जब गर्मी अपने चरम पर होती है, तो लेबर प्रोडक्टिविटी में भारी गिरावट आती है. अत्यधिक गर्मी के कारण काम के घंटे कम करने पड़ते हैं, जिससे कंस्ट्रक्शन और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर सीधे प्रभावित होते हैं.

वर्ल्ड बैंक (World Bank) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बढ़ती गर्मी के कारण आने वाले दशकों में लाखों नौकरियां और अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है, क्योंकि लोग खुले में काम करने की क्षमता खो रहे हैं. जब वर्कफोर्स बीमार होगी, तो इसका सीधा असर कंपनियों के आउटपुट पर पड़ेगा. अस्पतालों में भीड़ बढ़ने से वर्कफोर्स की गैर-हाजिरी बढ़ती है, जिससे प्रोजेक्ट्स में देरी होती है और लागत बढ़ जाती है.

दूसरी तरफ, स्वास्थ्य क्षेत्र की कंपनियों जैसे फार्मास्यूटिकल्स और ओआरएस निर्माताओं के बिजनेस में इस दौरान तेजी आती है. लेकिन यह तेजी किसी सकारात्मक आर्थिक विकास का संकेत नहीं है, बल्कि यह एक मजबूरी की मांग है. बीमा क्षेत्र (IRDAI) के आंकड़ों को देखें तो इस मौसम में हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम्स की संख्या भी बढ़ जाती है, खासकर मौसमी बीमारियों और इनफेक्शन्स के कारण होने वाले हॉस्पिटलाइजेशन के मामलों में. इसलिए, मौसम के इस बदले मिजाज को सिर्फ एक मेडिकल इमरजेंसी नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए.

क्या हम हमेशा ऐसे ही जीएंगे?

यह सवाल हर नागरिक के जेहन में घूम रहा है कि क्या हर साल गर्मी और बाढ़ का यह चक्र ऐसे ही बढ़ता जाएगा? वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि आने वाले समय में ये मौसमी घटनाएं और ज्यादा गंभीर और अनप्रेडिक्टेबल होंगी. आज हम मई में जो एक्शन प्लान देख रहे हैं, हो सकता है आने वाले सालों में इसे अप्रैल या मार्च से ही लागू करना पड़े.

फ्यूचर सिनेरियो को देखते हुए सरकारों को अब अपनी शहरी प्लानिंग में बड़े बदलाव करने होंगे. सिर्फ अस्पतालों को मजबूत करना काफी नहीं है. हमें अपने शहरों को 'क्लाइमेट रेजिलिएंट' बनाना होगा. इसका मतलब है कि सड़कों और इमारतों का निर्माण इस तरह हो जो गर्मी को कम सोखे, और ड्रेनेज सिस्टम ऐसा हो जो भारी से भारी बारिश के पानी को भी चंद घंटों में निकाल दे.

हेल्थकेयर के क्षेत्र में भी टेलीमेडिसिन और एआई-बेस्ड ट्रैकिंग को बढ़ावा देना होगा. अगर कंट्रोल रूम्स के पास ऐसा सिस्टम हो जो पहले ही प्रेडिक्ट कर दे कि किस इलाके में अगले हफ्ते हीटस्ट्रोक के मामले बढ़ सकते हैं, तो वहां पहले ही प्रीवेंटिव कदम उठाए जा सकते हैं. भविष्य की स्वास्थ्य चुनौतियां बड़ी हैं और उनसे निपटने के लिए हमें पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर सोचना होगा.

आम जनता के लिए जरूरी और व्यावहारिक सलाह

सरकार अपना काम कर रही है और अस्पताल भी तैयार हो रहे हैं, लेकिन आपकी सेहत की पहली जिम्मेदारी आपकी खुद की है. इस जानलेवा मौसम में कुछ बेहद आसान लेकिन जरूरी बातों का ध्यान रखकर आप खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं. डॉक्टरों की सलाह है कि जब तक बहुत जरूरी न हो, दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे के बीच घर से बाहर निकलने से बचें.

अगर बाहर जाना ही पड़े, तो हमेशा अपने पास पानी की बोतल और ओआरएस का पैकेट रखें. सूती और ढीले कपड़े पहनें जो पसीने को सोख सकें. चाय, कॉफी और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स का सेवन कम करें क्योंकि ये शरीर को हाइड्रेट करने के बजाय डिहाइड्रेट करते हैं. इसकी जगह नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी और आम पन्ना जैसे पारंपरिक देसी पेयों को प्राथमिकता दें.

अपने घर के बुजुर्गों और बच्चों पर विशेष नजर रखें. अगर किसी को तेज बुखार, सिरदर्द, चक्कर आना, उल्टी होना या त्वचा का बिल्कुल सूखा और लाल हो जाना जैसे लक्षण दिखें, तो इसे सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज न करें. यह हीटस्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में मरीज को तुरंत किसी ठंडी जगह पर ले जाएं, उसके शरीर पर गीली पट्टियां रखें और बिना समय गंवाए नजदीकी सरकारी अस्पताल के नए बने कंट्रोल रूम या इमरजेंसी वार्ड में लेकर जाएं.

ये भी पढ़ें: दिल्ली-मुंबई की तपती जमीन का कड़वा सच: 10 साल में 3 डिग्री बढ़ा तापमान, रातें भी दिन जैसी जलेंगी!

क्या यह नया प्लान बनेगा गेम चेंजर?

स्वास्थ्य महानिदेशालय (DGHS) द्वारा 18 मई 2026 से लागू किया गया यह इमरजेंसी एक्शन प्लान कागजों पर बेहद मजबूत और विजनरी नजर आता है. यह दिखाता है कि प्रशासन अब मौसम के खतरों को एक बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार कर रहा है. अस्पतालों में वॉर रूम का एक्टिव होना और बुनियादी सुविधाओं को एडवांस में तैयार रखना एक सही दिशा में उठाया गया कदम है, जो यकीनन कई मासूम जिंदगियों को बचा सकता है.

लेकिन इस पूरे प्लान की असली परीक्षा आने वाले हफ्तों में होगी, जब गर्मी अपने चरम पर पहुंचेगी और उसके बाद मॉनसून की बारिश सड़कों को समंदर बनाएगी. एक सजग समाज और जिम्मेदार मीडिया के तौर पर हमारी भूमिका यह है कि हम इस व्यवस्था पर नजर रखें. अगर कहीं लापरवाही दिखती है, तो आवाज उठाएं और अगर व्यवस्था सही काम कर रही है, तो उसका सहयोग करें. क्लाइमेट चेंज से लड़ना सिर्फ सरकार का काम नहीं है, बल्कि यह हम सबकी सामूहिक लड़ाई है, जिसमें सतर्कता ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है.

वीडियो: भीषण हीटवेव के बीच पानी की कमी से जूझ रही है दिल्ली, लोग पलायन को मजबूर

सामान्य प्रश्न

हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के सरकारी अस्पतालों में आज से क्या खास व्यवस्था शुरू हुई है?

स्वास्थ्य महानिदेशालय के आदेश पर आज 18 मई 2026 से सभी जिला अस्पतालों में विशेष 'फ्लड एंड हीटवेव कंट्रोल रूम' शुरू हो गए हैं. इनके जरिए लू और बाढ़ के कारण होने वाली बीमारियों के मरीजों को बिना किसी देरी के तुरंत इलाज मुहैया कराया जाएगा और चौबीसों घंटे स्टाफ तैनात रहेगा.

अगर किसी को लू के लक्षण दिखें तो इस नई व्यवस्था के तहत क्या करना चाहिए?

आपको तुरंत नजदीकी सरकारी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड या नए बने कंट्रोल रूम में जाना चाहिए. वहां इस मौसम से जुड़ी बीमारियों के लिए अलग से डॉक्टर और दवाओं का स्टॉक रिजर्व रखा गया है, ताकि मरीजों को सामान्य ओडीपी की लाइनों में न लगना पड़े.

क्या मॉनसून आने पर इस कंट्रोल रूम का काम बदल जाएगा?

यह कंट्रोल रूम दोहरे मकसद के लिए बनाया गया है. अभी यह मुख्य रूप से हीटवेव और लू के मामलों को देख रहा है, और जैसे ही बारिश शुरू होगी, यह जलभराव के कारण होने वाली बीमारियों जैसे डेंगू, मलेरिया और डायरिया की ट्रैकिंग और रोकथाम का काम शुरू कर देगा.

Advertisement

Advertisement

()