पाकिस्तान में नए सेना प्रमुख के चुनाव में पीएम शहबाज को भाई नवाज़ शरीफ़ क्यों याद आए?
पाकिस्तान में अगले आर्मी चीफ़ के दावेदार कौन-कौन हैं?

पाकिस्तानी सेना का टॉपमटॉप अफ़सर बदलने वाला है. और, चिंता की लक़ीरें प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के माथे पर खिंच रहीं है. उन्हें अपने बड़े भाई मियां नवाज़ शरीफ़ वाली परंपरा बदलनी है. परंपरा ये कि जिस आर्मी चीफ़ को नवाज़ ने ‘अपना बंदा’ बताकर कुर्सी पर बिठाया, उसी ने उनकी कुर्सी के नीचे गड्ढा खोद दिया. पिछले 50 सालों में नियुक्त हुए 10 आर्मी चीफ़ में से पांच नवाज़ शरीफ़ की कलम से होकर गुज़रे. मगर हर बार उनकी नज़रों ने धोखा खाया.
शहबाज़ बड़े मियां के अनुभव से सबक ले पाएंगे या नहीं, ये तो आने वाला समय बताएगा. फिलहाल, सवाल ये है कि आज हम पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ की चर्चा क्यों कर रहे हैं?
दरअसल, जिनका कार्यकाल बढ़ाने के लिए नियम बदला गया था, वो फ़ाइनली रिटायर होने के लिए तैयार हो गए हैं. क़मर जावेद बाजवा नवंबर 2022 में पद छोड़ देंगे. आमतौर पर पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष का कार्यकाल तीन बरस का होता है. कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उनके उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो गई है. इसको लेकर राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने भी अपनी रज़ामंदी दे दी है. उन्होंने कहा है कि समय से पहले नया आर्मी चीफ़ चुनने में कोई समस्या नहीं है.
तो, आज हम जानेंगे,
- पाकिस्तान में आर्मी चीफ़ का चुनाव का प्रोसेस क्या है?
- पाकिस्तान में अगले आर्मी चीफ़ के दावेदार कौन-कौन हैं?
- और, क्या शहबाज़ शरीफ़ अपने बड़े भाई मियां नवाज़ शरीफ़ से सबक ले पाएंगे?
जहां बात क़मर जावेद बाजवा के उत्तराधिकार की होगी.
जनरल क़मर जावेद बाजवा पाकिस्तान आर्मी के मौजूदा चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ हैं. ये पाकिस्तान आर्मी का सबसे बड़ा अफ़सर होता है. पाकिस्तान को लेकर एक बड़ी मशहूर कहावत चलती है.
While every country has an army, the Pakistan army has a country
बाकी देशों के पास एक सेना होती है, जबकि पाकिस्तान आर्मी के पास एक देश है
ये कहावत पाकिस्तान की सत्ता में सेना के दखल को बताने के लिए पर्याप्त है. कहावत ही क्यों, पाकिस्तान का पूरा इतिहास सैन्य तानाशाहों की करतूतों से भरा पड़ा है. पाकिस्तान 75 साल पहले बना. इसमें से लगभग आधे समय तक सेना ने सीधे तौर पर शासन किया है. बाकी समय में काम करने वाली सिविलियन सरकारों पर भी सेना का ही नियंत्रण रहा है. उनके इशारे पर पाकिस्तान में सरकारें बनती-बिगड़ती रहीं है. कहा तो ये भी जाता है कि सरकार की रक्षा और विदेश से जुड़ी नीतियां भी सेना ही डिसाइड करती है. इसलिए, जब कभी सेना का मुखिया चुनने की बात आती है, तब लोगों के कान खड़े हो जाते हैं.
इस बार का मामला भी कुछ-कुछ वैसा ही है. शहबाज़ शरीफ़ सरकार को महज चार महीना हुआ है. उन्होंने इमरान ख़ान के नेतृत्व वाले PTI गठबंधन को विश्वासमत में हराकर सत्ता हासिल की थी. नए सेनाध्यक्ष का चुनाव उनके लिए बड़ी चुनौती साबित होने वाला है. पाकिस्तानी अख़बार डॉन की रिपोर्ट ने सरकार के एक मंत्री के हवाले से एक जानकारी छापी है. रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ अगस्त के अंतिम हफ़्ते में फ़ाइलें खुलवा सकते हैं. 15 सितंबर तक अंतिम फ़ैसला बाहर आ जाएगा.
अब सवाल ये उठता है कि आर्मी चीफ़ चुना कैसे जाता है?
पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 243 में चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ की नियुक्ति की बात लिखी है. इसके मुताबिक, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ को अपॉइंट करते हैं. आर्मी चीफ़ का वेतन और भत्ता तय करने का अधिकार भी राष्ट्रपति के पास होता है.
रुलबुक में सेनाध्यक्ष चुनने को लेकर कोई तय नियम-कायदा नहीं है. एक को छोड़कर. क्या? वो ये कि आर्मी चीफ़ वही बन सकता है, जिसने किसी कोर को लीड किया हो. अगर आपको याद हो तो अक्टूबर 2021 में पाकिस्तान में एक बड़ा विवाद हुआ था. उस समय सेना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को बताए बिना ISI का चीफ़ बदल दिया था. फ़ैज़ हमीद की जगह पर नदीम अंजुम को ISI का डायरेक्टर-जनरल नियुक्त किया गया. इससे इमरान ख़ान नाराज़ हो गए थे. उनके ऑफ़िस ने नोटिफ़िकेशन जारी करने में दो हफ़्ते लगा दिए थे. हालांकि, बाद में उन्हें पीछे हटना पड़ा. तब फ़ैज़ हमीद को ISI से हटाकर पेशावर कोर का कमांडर बनाया गया था. उस समय कहा गया कि उनको अगला आर्मी चीफ़ बनाने की तैयारी चल रही है. इसके लिए कोर कमांड करने का अनुभव ज़रूरी था. इसलिए, उन्हें ISI से हटाकर नई नियुक्ति मिली.
अब जाकर ये बात सच साबित हुई है. जिन अफ़सरों का नाम अगला आर्मी चीफ़ बनने की लिस्ट में है, उनमें फ़ैज़ हमीद भी हैं. लिस्ट में किन अफ़सरों का नाम है?
फ़ैज़ हमीद के अलावा पांच और अफ़सर हैं.
पहला नाम लेफ़्टिनेंट-जनरल असीम मुनीर का है. असीम मुनीर फ़्रंटियर फ़ोर्स रेजिमेंट में कमिशन हुए थे. उन्होंने जनरल बाजवा के साथ ब्रिगेडियर के तौर पर काम किया है. 2017 की शुरुआत में उन्हें मिलिटरी इंटेलिजेंस का डायरेक्टर-जनरल बनाया गया था. फिर अक्टूबर 2018 में उन्हें ISI का मुखिया बना दिया गया. हालांकि, इस पद पर उनका कार्यकाल महज आठ महीने में खत्म हो गया. उस समय के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के कहने पर असीम मुनीर को हटाकर फ़ैज़ हमीद को ISI की कमान सौंपी गई.
असीम मुनीर को गुजरांवाला कोर का कमांडर बनाया गया. वो दो बरस तक इस पद पर रहे. फिलहाल असीम मुनीर सेना मुख्यालय में क़्वार्टरमास्टर जनरल के तौर पर काम कर रहे हैं.
दूसरा नाम लेफ़्टिनेंट-जनरल शमशाद मिर्ज़ा का है. उनका ताल्लुक सिंध रेजिमेंट से है. शमशाद मिर्ज़ा ने सेना में कई बड़े पदों पर काम किया है. 2013 से 2016 तक पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ रहे रहील शरीफ़ से उनकी ख़ूब बनती थी. रहील के कार्यकाल में शमशाद मिर्ज़ा डायरेक्टर-जनरल मिलिटरी ऑपरेशंस (DGMO) के पद तक पहुंचे थे. जब पाक आर्मी ने नॉर्थ वज़ीरिस्तान में आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन चलााया, उस समय शमशाद मिर्ज़ा कोर टीम में थे. शमशाद मिर्ज़ा चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ के तौर पर भी काम कर चुके हैं. इस समय वो रावलपिंडी कोर को लीड कर रहे हैं.
अगला नाम लेफ़्टिनेंट-जनरल अज़हर अब्बास का है. अज़हर अब्बास को भारत से जुड़े मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है. अब्बास रावलपिंडी कोर की कमान संभाल चुके हैं. उनके कार्यकाल में भारत और पाकिस्तान की सेना के बीच लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर सीजफ़ायर को लेकर सहमति बनी थी. अज़हर अब्बास पूर्व आर्मी चीफ़ राहील शरीफ़ के पर्सनल स्टाफ़ ऑफ़िसर के अलावा टेन कोर के कमांडर के तौर पर काम कर चुके हैं. फिलहाल, वो पाक आर्मी में चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ के पद पर हैं.
चौथा नाम लेफ़्टिनेंट-जनरल नौमान महमूद का है. महमूद का संबंध बलोच रेजिमेंट से है. बलोच रेजिमेंट ने पाकिस्तान को तीन आर्मी चीफ़ दिए हैं. नौमान महमूद का आर्मी ट्रेनिंग कॉलेजों में काम का अच्छा-खासा अनुभव रहा है. 2019 में उन्हें थ्री-स्टार जनरल बनाया गया था. दिसंबर 2019 में पेशावर कोर की कमान सौंपी गई. अक्टूबर 2021 में फ़ैज़ हमीद ने पेशावर कोर के कमांडर के तौर पर नौमान महमूद को ही रिप्लेस किया था. महमूद फिलहाल इस्लामाबाद की नेशनल डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट हैं.
पांचवां और अंतिम नाम लेफ़्टिनेंट-जनरल मोहम्मद आमिर का है. उनका ताल्लुक आर्टिलरी रेजिमेंट से है. वो मौजूदा आर्मी चीफ़ बाजवा के सबसे करीबी लोगों में से हैं. 2011 से 2013 के बीच आमिर उस समय के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के सैन्य सचिव थे. माना जाता है कि सेना मुख्यालय से लेकर राजनैतिक पार्टियों तक में उनकी अच्छी पहचान है. लेफ़्टिनेंट-जनरल आमिर फिलहाल गुजरांवाला कोर की कमान संभाल रहे हैं.
ये तो हुए संभावित नाम.
अब सवाल ये आता है कि इनमें से कौन?
वही जो बाजवा मन भाए. कहने का मतलब ये कि अगला आर्मी चीफ़ चुनने में सबसे बड़ी भूमिका मौजूदा आर्मी चीफ़ की होती है.
प्रोसेस क्या है?
परंपरा ये रही है कि जनरल हेडक़्वार्टर्स (GHQ) सबसे वरिष्ठ चार या पांच लेफ़्टिनेंट जनरलों की लिस्ट रक्षा मंत्रालय के पास भेजता है. GHQ पाकिस्तान आर्मी का मुख्यालय है. ये रावलपिंडी में है. इसकी स्थापना 14 अगस्त 1947 को हुई थी. उससे पहले ये ब्रिटिश इंडियन आर्मी के नॉर्दर्न कमांड का हेडक़्वार्टर हुआ करता था.
GHQ रेकमेंड किए गए नामों के साथ-साथ उनकी पर्सनल हिस्ट्री भी भेजता है. डिफ़ेंस मिनिस्ट्री इन नामों पर वीटो कर सकती है. लेकिन आमतौर पर वो ऐसा करती नहीं है. वो फ़ाइल को उसी रूप में आगे बढ़ा देती है. इसके बाद फ़ाइल पहुंचती है, प्रधानमंत्री के पास. प्रधानमंत्री नामों पर चर्चा करते हैं. मौजूदा मिलिटरी चीफ़ की सलाह लेते हैं. इसके बाद नाम फ़ाइनल कर राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. फिर औपचारिक तौर पर नए सेनाध्यक्ष के नाम का ऐलान होता है.
जानकारों की मानें तो शहबाज़ शरीफ़ जनरल बाजवा की सलाह पर मुहर लगा सकते हैं. इस मामले में उनकी निजी पसंद की कोई भूमिका नहीं होगी. इतिहास ये कहता है कि शरीफ़ खानदान सेनाध्यक्ष चुनने में कभी सही नहीं हो सकता. नवाज़ शरीफ़ ने अभी तक पांच आर्मी चीफ़्स की नियुक्ति की है.
1991 में जनरल आसिफ़ नवाज़ जनजुआ, 1993 में जनरल वहीद अख़्तर, 1998 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़, 2013 में जनरल रहील शरीफ़ और 2016 में जनरल बाजवा. सबसे विवादित नियुक्ति परवेज़ मुशर्रफ़ की थी. मुशर्रफ़ ने उन्हीं को धता बताकर भारत के साथ युद्ध शुरू कर दिया था. बाद में मुशर्रफ़ ने शरीफ़ का तख़्तापलट भी कर दिया. नवाज़ शरीफ़ को बरसों तक सपरिवार निर्वासन में रहना पड़ा. मौजूदा सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा की नियुक्ति भी शरीफ़ के कार्यकाल में ही हुई थी. उन्होंने बड़े भरोसे के साथ जनरल बाजवा को आर्मी चीफ़ बनाया था. इसके बावजूद कि जनरल बाजवा वरिष्ठता के क्रम में चौथे नंबर पर थे. इस अहसान के बावजूद शरीफ़ अपना कार्यकाल पूरा कर पाने में नाकाम रहे. जनरल बाजवा के कार्यकाल में सेना ने इमरान ख़ान का खुलकर समर्थन किया. नवाज़ शरीफ़ को मुकदमा झेलना पड़ा. कोर्ट के ऑर्डर के बाद पीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी और अंत में वो भागकर लंदन चले गए.
एक समय नवाज़ शरीफ़ के एक करीबी ने आर्मी चीफ़ चुनते वक़्त एक ज़रूरी सलाह दी थी. उसने कहा था,
याद करिए, जब-जब सीनियॉरिटी को इग्नोर किया गया, तब-तब क्या हुआ? आर्मी चीफ़ के पावर को नज़रअंदाज़ मत करिए. और, अपना बंदा वाली मानसिकता से ऊपर उठ जाइए. नवाज़ ने इस सबक को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया था. क्या शहबाज़ शरीफ़ अपने बड़े भाई मियां नवाज़ की भूलों से सबक ले पाएंगे, ये देखने वाली बात होगी.
क्या तालिबान आतंकियों को पाल रहा है?

