The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Why did Bhimrao Ambedkar not participate in Indian Freedom Struggle

आजादी के आंदोलन में भाग लेने से आंबेडकर ने क्यों मना कर दिया?

भीमराव आंबेडकर क्यों चाहते थे भारत को एक बार में आजादी न मिले?

Advertisement
bhimrao-ambedkar-mahatma-gandhi
कई घटनाक्रम हैं जिनसे डॉ आंबेडकर और गांधी जी के बीच तल्खी भरे रिश्तों का पता चलता है! | प्रतीकात्मक फोटो: आजतक
pic
अभय शर्मा
8 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 8 अगस्त 2022, 08:59 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

8 अगस्‍त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान पर हजारों की भीड़ थी. मंच पर अखिल भारतीय कांग्रेस महासमिति ने वह प्रस्ताव पारित किया, जिसे 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव कहा गया. महात्मा गांधी खड़े हुए और कहा, 'अब एक साथ खड़े होकर आवाज उठाने का वक्त अब आ गया है. मैं आपको एक मंत्र देना चाहता हूं जिसे आप अपने दिल में उतार लें, यह मंत्र है, करो या मरो.' गांधी के इस भाषण ने पूरे देश को खड़ा कर दिया. ये एक ऐसा आंदोलन बन गया जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख दीं.

अंग्रेजी हुकूमत इतना डर गई थी कि उसने आंदोलन शुरू होते ही गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद समेत कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. उसे लगा कि आंदोलन ठंडा पड़ जाएगा. लेकिन तस्वीर इससे उलट बनी. नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली. संचार व्यवस्था ठप हो गई, रेल की पटरियां उखाड़ दी गईं, जनता और अंग्रेज़ी पुलिस के बीच कई जगह मुठभेड़ हुई. हाल ये था कि कई जगह बंदी जेल तोड़कर भाग निकले.

Image embed

गांधी जी की बात पर पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हो गया था. लेकिन, एक शख्स जिसकी काबिलियत पर खुद गांधी जी को भी कभी शक नहीं रहा, उसने इस आंदोलन का विरोध किया. इस शख्स का नाम था डॉ भीम राव आंबेडकर. आज हम जानेंगे कि आखिर क्यों भीम राव आंबेडकर ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का विरोध किया था.

महात्मा गांधी और भीमराव आंबेडकर की पहली मुलाकात 

अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी को पूना के आगाखान पैलेस में नजरबंद कर दिया. विरोध में गांधी जी ने उपवास शुरू कर दिया. अंग्रेजों से नाराज होकर वायसराय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल के कई सदस्यों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. लेकिन, डॉ आंबेडकर ने ऐसा करने से मना कर दिया. उन्होंने तर्क दिया कि पद से इस्तीफा देने से कोई लाभ नहीं होगा. आंबेडकर इस गतिरोध के लिए ब्रिटिश सरकार को दोषी ठहराने के पक्ष में भी नहीं थे.

आंबेडकर गांधी के विरोधी थे और इसलिए उन्होंने गांधी द्वारा शुरू किये गए आंदोलन में उनका साथ नहीं दिया. इस तरह की बातें आम हो चुकीं थीं. उस समय उन्हें देश विरोधी तक कहा गया? लेकिन क्या यह सच था, इस बात को जानने से पहले थोड़ा जान लेते हैं कि आखिर डॉ आंबेडकर और गांधी के संबंध कैसे थे?

Image embed

14 अगस्त, 1931 वो दिन जब भीम राव आंबेडकर पहली बार महात्मा गांधी से मिले थे. इसके लिए गांधी जी ने खुद उन्हें पत्र लिखा था. बंबई के मणि भवन में हुई इस मुलाकात की चर्चा काफी समय तक सियासी गलियारों में रही. गांधी जी की बातें इतनी आत्मीयता भरी होती थीं कि विरोधी भी उनसे मिलकर उनके कायल हो जाते थे. लेकिन उस दिन गांधी की भाषा थोड़ी रूखी थी. उनके मुंह से पहला ही वाक्य निकला- ‘तो डॉक्टर, आपको इसके बारे में क्या कहना है?’ यहां 'इसके' से गांधी का मतलब दलितों की समस्याओं से था.

जब महात्मा गांधी ने इस रुखाई से बात की, तो अंबेडकर ने भी उसी भाषा में जवाब दिया. हल्के तंज के साथ कहा-

Image embed

ये सुन गांधी और तल्ख होकर बोले-

Image embed

इसके जवाब में डॉ आंबेडकर की बातों में भी तल्खी और व्यंग्य साफ देखा जा सकता था. बोले-

Image embed

कहा जाता है कि इस बातचीत के दौरान काफी देर तक माहौल तनावपूर्ण बना रहा.

पूना पैक्ट के लिए जब महात्मा गांधी अड़ गए

कहते हैं कि पूना पैक्ट को लेकर जो हंगामा हुआ था उसके बाद गांधी और आंबेडकर के बीच तल्खियां और बढ़ गई थीं. 24 सितंबर 1932 को 'पूना पैक्ट' समझौता दोनों के बीच पुणे की यरवदा जेल में हुआ था.

दरअसल, भीमराव अंबेडकर भारत के दलित, शोषित और वंचित तबके को अधिकार दिलाने के लिए लंबे वक्त से लड़ रहे थे. काफी कोशिशों के बाद साइमन कमीशन 1928 में डिप्रेस्ड क्लासेज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने को राजी हुआ. दस्तावेज तैयार हुए और 17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार ने दलितों को अलग निर्वाचन का अधिकार दिया. दलितों को दो वोट का अधिकार भी मिला. दो वोट सिस्टम में दलित एक वोट से अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे और दूसरे वोट से वे सामान्य वर्ग के किसी प्रतिनिधि को चुन सकते थे.

Image embed

गांधी जी दलितों के उत्थान के पक्षधर थे, लेकिन वो दलितों के लिए अलग निर्वाचन और उनके दो वोट के अधिकार के विरोधी थे. उन्हें लगता था कि इससे दलितों और सवर्णों के बीच खाई बढ़ेगी, हिंदू समाज बिखर जाएगा.

इसके विरोध में गांधी जी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया. अनशन की वजह से महात्मा गांधी की तबीयत लगातार बिगड़ने लगी. देश के कई हिस्सों में भीमराव अंबेडकर के पुतले जलाए जाने लगे. उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए. कई जगहों पर दलितों की बस्तियां जला दी गईं.

आखिरकार बाबा साहब को झुकना पड़ा. 24 सितंबर 1932 को महात्मा गांधी और बाबा साहब अंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ. बताते हैं कि आंबेडकर ने बड़े बेमन से रोते हुए इस पर साइन किए थे. इस समझौते में दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया. हालांकि, इसके बदले में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केंद्रीय विधायिका में कुल सीटों की 18 फीसदी कर दी गई.

Image embed

गांधी को लेकर आंबेडकर के क्या विचार थे 1955 में डॉ आंबेडकर के एक इंटरव्यू से भी इसका पता लगता है. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ़-साफ़ कहा,

Image embed

आंबेडकर क्यों चाहते थे भारत को एक बार में पूरी आजादी न मिले

फ्रेंच राजनीति विज्ञानी क्रिस्तोफ़ जाफ़्रलो ने डॉ आंबेडकर की जीवनी लिखी है. क्रिस्तोफ़ के मुताबिक डॉ आंबेडकर वाइसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य थे. सदस्य का दर्जा आज के समय के कैबिनेट मंत्री के बराबर होता था. क्रिस्तोफ़ जाफ़्रलो लिखते हैं,

Image embed

कुल मिलाकर आंबेडकर ब्रिटिश हुकूमत में जिस पद पर थे. वे इसे अपने हाथ में मिली एक ऐसी बड़ी ताकत मानते थे जिसके जरिए वे दलितों और वंचितों के हित में कुछ बड़े काम कर सकते थे. उनका मानना था कि वे देश की आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार में ही दलितों के लिए कुछ कर देंगे जिससे जातिवाद की खाई और लोगों की सोच बदल जाए. और अगर ऐसा होने के बाद देश को आजादी मिलती है तो वह दलितों के लिए लाभकारी होगी. इन्हीं वजहों के चलते आंबेडकर कहते थे कि भारत को एकदम पूरी आजादी नहीं मिलनी चाहिए थी क्योंकि भारतीय समाज इसके लिए तैयार नहीं था.

Image embed
क्या आंबेडकर ने गांधी से तल्खी के चलते 'भारत छोड़ो आंदोलन' का विरोध किया?

अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद एक और बात को लेकर भी आंबेडकर डरे हुए थे. क्रिस्तोफ़ जाफ़्रलो इस बारे बताते हुए लिखते हैं,

Image embed

Image embed

दरअसल, उन्हें ये डर था कि अंग्रेजों के जाने के बाद कहीं नाज़ी और जापानियों ने भारत पर कब्जा कर लिया तो परिणाम बहुत ज्यादा बुरे होंगे. आंबेडकर ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान एक बार इस बात का जिक्र करते हुए कहा भी था,

Image embed

देखा जाए तो गांधी और आंबेडकर के लक्ष्य थोड़ा अलग-अलग थे, दोनों के रास्ते भी थोड़ा जुदा थे, लेकिन दोनों अपनी-अपनी जगह पर सही थे.

तारीख: पहली फांसी की सजा जिसने महाभियोग करवा दिया

Advertisement

Advertisement

()