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जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ को मुख्य न्यायाधीश की शपथ लेने से कौन रोकना चाहता है?

देश के अगले CJI को बार-बार टार्गेट क्यों किया जा रहा है?

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जस्टिस डी वाई चंद्रचूड (फोटो: पीटीआई)
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निखिल
2 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 2 नवंबर 2022, 11:42 PM IST)
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स्कूल में सोशल स्टडीज़ की किताब में आपने पढ़ा होगा - भारत में राज्य की शक्तियों को तीन हिस्सों में बांटा गया है - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. इसका मतलब ये है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश पर उतनी ही गंभीर ज़िम्मेदारियों का बोझ होता है, जैसा कि भारत के प्रधानमंत्री पर. ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका लग जाए कि भारत के अगले चीफ जस्टिस को शपथ ही लेने न दी जाए, तो हैरत हो सकती है.

अगर आप सुप्रीम कोर्ट या सूबों की हाईकोर्ट्स की कार्यवाही पर नज़र रखें, तो आपको लगभग रोज़ाना ऐसी याचिकाएं मिल जाएंगी, जिनमें ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं कि आप अपना सिर दे मारेंगे. जज साहिबान की इस बात के लिए तारीफ होनी चाहिए कि वो इन याचिकाओं को खारिज करने से पहले वकील को जिरह का एक मौका ज़रूर देते हैं. खबर बन जाती है, बात रफा दफा हो जाती है. लेकिन आज जब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस चंद्रचूड को CJI बनने से रोकने की मांग के साथ याचिका लगी, तो उन सारे मौकों की याद आ गई, जब अपने फैसलों के लिए जस्टिस चंद्रचूड को निशाने पर लिया गया.

याचिकाकर्ता का नाम है मुर्सलिन असिजीथ शेख. मांग की गई थी कि जस्टिस धनंजय चंद्रचूड को भारत के मुख्य न्यायाधीश की शपथ लेने से रोका जाए. दर्शक जानते ही हैं कि जस्टिस चंद्रचूड 9 नवंबर को CJI पद की शपथ लेंगे. खैर, इस याचिका की आज तारीख नहीं लगी थी. लेकिन वकील ने CJI यूयू ललित, जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ से तुरंत सुनवाई का अनुरोध किया. जिसे हम अदालत की भाषा में अर्जेंट लिस्टिंग कहते हैं. वकील ने तारीख मांगी थी 3 नवंबर. लेकिन पीछ ने आज का ही वक्त दे दिया.

लाइव लॉ ने अपनी वेबसाइट पर इस मामले को लेकर विस्तार से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसके मुताबिक राशिद खान पठान नाम के एक शख्स ने राष्ट्रपति कार्यालय को जस्टिस चंद्रचूड़ के खिलाफ एक पत्र लिखा था. पठान ने खुद को सुप्रीम कोर्ट एंड हाईकोर्ट लिटिगेंट असोसिएशन का अध्यक्ष बताया था. इसमें पठान ने कई आरोप लगाए थे. पहला ये था कि जस्टिस चंद्रचूड ने ऐसे मामलों में फैसला सुनाया, जिनमें बंबई उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है. और एक पक्ष के लिए जस्टिस चंद्रचूड के बेटे ने जिरह की है. दूसरा आरोप ये था कि जस्टिस चंद्रचूड ने कोविड वैक्सीन न लेने वालों पर लगी बंदिशों के संबंध में लगी याचिका पर फैसला देते हुए कानून की अनदेखी की.

स्वाभाविक ही था, कि जस्टिस चंद्रचूड इस खत पर कोई प्रतिक्रिया न देते. लेकिन जब इस खत की चर्चा होने लगी, तो बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक विस्तृत प्रेस रिलीज़ निकालकर इसकी निंदा की. काउंसिल ने जस्टिस चंद्रचूड पर लगे पहले आरोप का जवाब देते हुए लिखा कि वो जानते ही नहीं थे कि उनके बेटे ने मामले में बहस की है. फिर बंबई उच्च न्यायालय वाले मामले के पक्षकार और सुप्रीम कोर्ट आए पक्षकार अलग अलग थे. एक और बात थी. जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट आया, तब मांग ये नहीं थी कि अदालत इसपर फैसला दे. मांग ये थी कि सुप्रीम कोर्ट, बंबई उच्च न्यायालय को जल्द सुनवाई का निर्देश दे. जस्टिस चंद्रचूड के पीठ पर रहते सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया, वो यही था कि बंबई उच्च न्यायालय या तो उसके यहां लगी याचिका को स्वीकार कर ले, या फिर स्टे को हटा ले. ये फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंबई उच्च न्यायालय में चल रहे मामले के मेरिट्स पर कोई टिप्पणी नहीं की थी. माने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बंबई उच्च न्यायालय की सुनवाई पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

बार काउंसिल ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास नियमित रूप से ऐसी याचिकाएं आती रहती हैं. और न्यायालय नियमित रूप से ऐसे आदेश देता भी रहता है. इसीलिए पठान का खत मशहूर होने की एक ओछी कोशिश है. पठान इससे पहले भी जजों को लेकर ऐसी टिप्पणियां करते रहे हैं. बंबई उच्च न्यायालय एक ऐसे मामले में उनके खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कर चुका है. और 2020 में सर्वोच्च न्यायालय से पठान को तीन महीने की सज़ा भी हो चुकी है. तब उन्होंने जस्टिस रोहिंटन नरिमन और जस्टिस विनीत सरन के खिलाफ खत लिखे थे.

सोचिए, इन्हीं पठान के खत को आधार बनाकर आज वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई थी. जब याचिकाकर्ता की तरफ से वकील ने पक्ष रखना शुरू किया, तो पहली आपत्ति इसी बात पर ले ली कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया यूयू ललित इस मामले की सुनवाई कैसे कर सकते हैं. क्योंकि उन्होंने ही जस्टिस चंद्रचूड को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था. तब बेंच से जस्टिस ललित ने कहा कि फिलहाल अदालत इसी बात पर सुनवाई कर रही है कि याचिका सुनी जाने लायक है या नहीं.

इसके बाद वकील ने कहा, कि ये हो ही नहीं सकता कि जस्टिस चंद्रचूड ये न जानते हों कि वो एक ऐसे फैसले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उनके बेटे ने जिरह की है. क्योंकि अदालत का आदेश सुप्रीम कोर्ट में लगी याचिका में नत्थी था. इसपर बेंच ने कहा, कि अगर ऐसा था, तो हमें दिखा दीजिए. लेकिन वकील दस्तावेज़ खोज नहीं पाया. वकील ने अगले दिन सुनवाई की मांग की. जिसे खारिज कर दिया गया. वकील के पास कोई दलील नहीं बची थी, तो अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया.

ये तो रही आज की बात. लेकिन जस्टिस चंद्रचूड को लगातार निशाने पर लिया जाता रहा है. जब उनके नाम का ऐलान होने ही वाला था, तब उन्हें सोशल मीडिया पर बुरी तरह ट्रोल किया गया. हाल के दिनों से पहले ट्रोल्स सुप्रीम कोर्ट के जजों के पीछे नहीं पड़ते थे. लेकिन जस्टिस चंद्रचूड के बारे में तरह तरह की बातें बनाई गईं. अडल्ट्री पर उन्होंने जो फैसला दिया था, उसका आधार बराबरी और समान गरिमा का अधिकार था. लेकिन उन्हें प्रो अडल्ट्री बता दिया गया. कुछ लोगों ने तो ये तक दावा कर दिया कि जस्टिस चंद्रचूड के पास US ग्रीन कार्ड है. ग्रीन कार्ड धारक अमेरिका में रहकर काम कर सकते हैं. और इसीलिए जस्टिस चंद्रचूड को भारत का चीफ जस्टिस नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि वो तो खुद अमेरिका जाना चाहते हैं. ट्रोल्स इस हद तक गए कि संभवतः पहली बार कानूनी मामलों की रिपोर्टिंग करने वाली वेबसाइट्स पर फैक्ट चेक पब्लिश हुए.

जस्टिस चंद्रचूड के पिता,  जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ देश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे. 1978 से 1985 तक करीब साढ़े 7 साल. तो जस्टिस DY चंद्रचूड़ के पास एक समृद्ध विरासत तो है ही. लेकिन ऐसा नहीं है कि विरासत से इतर कुछ नहीं है. दर्शक जानते ही हैं कि सबरीमाला, अडल्ट्री और सेना में महिलाओं को समान अवसर जैसे चर्चित फैसले देने वाले जस्टिस DY चंद्रचूड़ ने अपने पिता के फैसलों को भी पलटा है. एक उदाहरण तो अडल्ट्री वाला है ही. फिर निजता के अधिकार पर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया, वो भी इसी जस्टिस YV चंद्रचूड़ की राय से अलग था.

तो जस्टिस DY चंद्रचूड़ के करियर में मौलिकता है. और इसे उनका संस्थान और उनके संस्थान पर नज़र रखने वाले लोग मानते भी हैं. तो क्या जस्टिस चंद्रचूड़ को उनके विचारों के लिए टार्गेट किया जा रहा है? इस सवाल का जवाब खोजिएगा. क्योंकि आने वाले दो साल जस्टिस चंद्रचूड़ CJI रहेंगे. हर व्यक्ति की आलोचना की जा सकती है. लेकिन उसके विचारों से कुंठित होकर लांछन लगाना सही नहीं है.

वीडियो: अगले मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ को शपथ लेने से कौन रोकना चाहता है?

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