जोशीमठ त्रासदी के पीछे NTPC की सुरंग है या चारधाम की सड़क?
लोग केंद्र सरकार की एजेंसियों पर आरोप क्यों लगा रहे?

बीते एक हफ्ते से आप सुन रहे हैं कि जोशीमठ दरक रहा है. पूरा का पूरा शहर धंसा जा रहा है. सुनकर लगता है जैसे अचानक कोई बड़ा भूकंप या बाढ़ आई होगी, जिसे कौन ही टाल सकता था. लेकिन जोशीमठ वालों की ऐसी किस्मत कहां. उनके घर एक बेहद धीमी और क्रूर मौत के शिकार हो रहे हैं. महीनों नहीं, सालों नहीं, दशकों से सब जानते थे कि जोशीमठ खतरे में है. लेकिन सब तमाशा देखते रहे. जिन्होंने आवाज़ उठाई, उन्हें विकास विरोधी कहकर खारिज कर दिया गया. नतीजा हम सबके सामने है. विशेषज्ञ कहने भी लगे हैं कि जोशीमठ को अब बचाना मुमकिन नहीं है. जो दरारें नज़र आ रही हैं, वो आने वाले समय में गहरी और चौड़ी ही होंगी. उससे पहले लोगों को वहां से निकालना ज़रूरी है.
हैरान परेशान लोग सड़कों को रोककर प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन कोई ज़िम्मेदारी लेना नहीं चाहता. NTPC ने कह दिया कि उसके बिजली घर से कुछ नहीं हुआ. न केंद्र या उत्तराखंड सरकार ने किसी गलती को स्वीकारा है. सारी दिशाओं में यही गूंज रहा है कि ''अब सब ठीक कर देंगे.'', ''सरकार ने इसपर हाई लेवल मीटिंग कर ली है'', ''राहत-पुनर्वास के आदेश दे दिए हैं.'' लेकिन ये कौन बताएगा कि जो हो गया, उसका ज़िम्मेदार कौन है? यहां प्रश्न ये नहीं है कि एक या दो लोगों को चिह्नित कर उन्हें फंदे पर लटका दिया जाए. यहां प्रश्न ये है कि अगर हम नहीं समझे कि जोशीमठ में हमसे क्या चूक हुई, तो कल को यही हाल नैनीताल का होगा. मसूरी का होगा. शिमला का होगा. धर्मशाला का होगा. इसीलिए आज के दी लल्लनटॉप शो में हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि जोशीमठ की तबाही का ज़िम्मेदार किसे माना जाए?
हमने 6 जनवरी के दी लल्लनटॉप शो में भी जोशीमठ त्रासदी की बात की थी. आपको बताया था कि 6 जनवरी को जब जोशीमठ के मारवाड़ी वॉर्ड में ज़मीन से पानी का रिसाव होने लगा, तो आनन-फानन में लोगों को घर छोड़ने पड़े. लोगों की नाराज़गी को देखते हुए तपोवन-विष्णुगाढ़ परियोजना और हेलांग-विष्णुप्रयाग बाईपास का काम रोक दिया गया है. अब इससे आगे के अपडेट्स जान लेते हैं.
8 जनवरी को प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई. प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीके मिश्रा इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे. इसमें केंद्र, उत्तराखंड शासन, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण NDMA, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया GSI और दूसरी संबंधित एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए थे. PMO की तरफ से उत्तराखंड सरकार को कहा गया कि प्रभावितों से निरंतर संवाद कायम रखा जाए और खतरों का ध्यान रखते हुए पुनर्निमाण के लिए एक योजना तैयार की जाए. इसी दिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ट्वीट करके बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे फोन पर बात की और जोशीमठ में प्रभावितों के पुनर्वास पर जानकारी ली. साथ ही केंद्र की ओर से हर-संभव मदद का आश्वासन भी दिया.
8 जनवरी के रोज़ ही जोशीमठ को ''लैंडस्लाइड - सबसाइडेंस ज़ोन'' घोषित कर दिया गया था. माने इस इलाके में भूस्खलन और ज़मीन धसंकने के खतरे को स्वीकार कर लिया गया है. आपात स्थिति से निपटने के लिए नेशनल डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फोर्स NDRF और स्टेट डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फोर्स SDRF की टीमें जोशीमठ में तैनात कर दी गई हैं. और PMO की ओर से NDMA के सदस्यों को निर्देश मिले हैं कि 9 जनवरी के रोज़ जोशीमठ का दौरा करें और सारी संबंधित एजेंसियों से इनपुट लेकर एक विस्तृत विश्लेषण तैयार करें.
सूत्रों ने दावा किया है कि इस बैठक के दौरान उत्तराखंड सरकार के मुख्य सचिव सुखबीर सिंह संधू ने कहा कि 350 मीटर की चौड़ाई वाला एक इलाका प्रभावित हुआ है. और मुख्यमंत्री राहत कोष से 1 करोड़ रुपये जारी किये गए हैं. प्रभावितों को जिन किराये के घरों में शिफ्ट किया जाएगा, उनका किराया इन पैसों से दिया जाएगा.
अब आते हैं 9 जनवरी, माने आज के दिन पर. दरार वाले मकानों की संख्या 561 से 610 तक पहुंच गई है. ये दोपहर पांच बजे तक का आंकड़ा है, जिसके बढ़ने की आशंका है. इसीलिए राहत अभियान को तेज़ कर दिया गया है. असुरक्षित मकानों पर लाल निशान लगा दिए गये हैं. और कम से कम 68 परिवारों को अस्थायी राहत कैंप्स में पहुंचा दिया गया है. प्रशासन की पहली प्राथमिकता है ऐसी किसी अनहोनी को टालना, जिसमें किसी नागरिक की जान चली जाए. इसीलिए लोगों से लगातार अपील की जा रही है कि दरार वाले घरों को छोड़ दें. चमोली ज़िला प्रशासन के मुताबिक केंद्र की ओर से दो और राज्य की ओर से एक टीम जोशीमठ के रास्ते में है. इनके साथ केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय के अधिकारी और विशेषज्ञ भी आ रहे हैं.
आज ही जोशीमठ त्रासदी का मामले पर अदालती कार्यवाही भी शुरू हो गई. वकील रोहित दाडरियाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में जोशीमठ को लेकर एक याचिका लगाई थी. इनकी मांग है कि केंद्र इस मामले पर एक सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन करे और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास में तेज़ी लाए. जब हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सतीष चंद्र शर्मा और जस्टिस सुब्रहमण्यम प्रसाद की बेंच के सामने इस याचिका का ज़िक्र हुआ, तब बेंच ने कहा कि आप पहले ये मालूम करें कि इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय विचार कर रहा है या नहीं. इसके बाद हमारे पास आएं.
जोशीमठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने घोषणा की थी कि वो जोशीमठ को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाएंगे. आज इनके वकील परमेश्वर नाथ मिश्र ने इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच के सामने उठाया. और मांग की कि न्यायालय मामले में दखल दे, ताकि जोशीमठ त्रासदी को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जा सके. मिश्र ने त्वरित सुनवाई की मांग की थी, जिसपर बेंच ने कहा कि विधिवत प्रक्रिया के पालन के बाद 10 जनवरी को एक बार फिर इस मामले को बेंच के समक्ष उठाएं.
हमने आपको सारे अपडेट दे दिये. अब लौटते हैं उस सवाल पर, जिससे हमने आज के दी लल्लनटॉप शो की शुरुआत की थी. कि इसका ज़िम्मेदार है कौन. हम ये जानते हैं कि जोशीमठ के घरों में दरारें बहुत पहले पड़ गई थीं. हड़कंप तब मचा, जब ये दरारें इतनी बढ़ गईं, कि घर गिरने का खतरा पैदा हो गया. ज़मीन से अचानक पानी बाहर आने लगा. स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हैं कि स्थिति खराब होने के पीछे है एक धमाका. इस आरोप का सत्य अभी सामने आना बाकी है. लेकिन स्थानीय नागरिक रोष में हैं क्योंकि उनके घर टूटने की कगार पर हैं.
बात सिर्फ NTPC के एक निर्माणाधीन बिजलीघर की नहीं है. जोशीमठ के इर्द गिर्द चमोली ज़िले में इतने बड़े पैमाने पर भारी निर्माण हुआ है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. दी लल्लनटॉप ने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता मल्लिका भनोट से बात की. सुनिए जोशीमठ के इर्द गिर्द कैसा ''विकास'' हुआ है.
आपने भारी निर्माण का विस्तार जान लिया. अब आते हैं इस सवाल पर, कि ये निर्माण हुआ कहां है. आरोप-प्रत्यारोप से परे एक अकाट्य तथ्य है. कि जोशीमठ का इलाका ग्लेशियर द्वारा पीछे छोड़े मलबे पर बना हुआ है. ग्लेशियर माने बर्फ की नदी, जो बेहद धीमी रफ्तार से नीचे उतरती है. इसकी बर्फ पिघलने से ही नदियों की धाराएं आकार लेती हैं. अब कल्पना कीजिए, जब बहता पानी अपने साथ मलबा लेकर चल सकता है, तो साबूत बर्फ कितना मलबा लेकर चलती होगी. तो जब ग्लेशियर पीछे हटता है, या रास्ता बदलता है, तो नीचे ये मलबा रह जाता है. जो देखने में साबूत ज़मीन जैसा लगता है.
क्योंकि इसकी परत बहुत मोटी होती है. लेकिन जैसा कि हमने कहा, ये है तो मलबा ही. इसपर निर्माण के क्या खतरे होते हैं, हमने जाना राष्ट्रीय भू-भौतिकी अनुसंधान संस्थान में चीफ साइंटिस्ट विनीत गहलौत से. उन्होंने बताया कि पहाड़ों पर इमारत बनाने से पहले नींव की मजबूती की जांच करनी सबसे जरूरी है. पहाड़ों पर अकसर ढीली मिट्टी होती है जिसमें मकान की नींव रखना सुरक्षित नहीं होगा, इसके लिए गहराई तक खुदाई कर ठोस मिट्टी तक पहुंचना जरूरी है.
जब गहलौत ने हमें बताया कि मलबे पर निर्माण के खतरे क्या होते हैं, तब हमने उनसे पूछा कि ऐसी जगहों पर निर्माण के लिए तो कुछ नियम कायदे भी होंगे. क्या इनका पालन भी होता है. तब हमें जो जवाब मिला, उसपर आपको ध्यान देना चाहिए. विनीत गहलौत ने बताया, कि जब भी कोई सरकारी इमारत बनाई जाती है तो सभी नियमों का खयम रखा जाता है. मिट्टी की जांच होती है. इसके बाद ही इमारत बनाने की इजाजत मिलती है. लेकिन आम लोग जब पहाड़ों पर घर बनाते हैं तब इन नियमों का पालन को इसकी कोई गारंटी नहीं है.
अब इस संदर्भ के साथ वापस तपोवन विष्णुगाढ़ परियोजना के प्रश्न पर लौटते हैं. इसे बना रही है नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन. NTPC. नाम में ताप विद्युत का ज़िक्र है, लेकिन ये संस्था पनबिजली घर भी बनाती है. माने जहां पानी के प्रवाह से बिजली बनाई जाती है. इसी एजेंसी के पास तपोवन परियोजना की ज़िम्मेदारी है. जब जोशीमठ त्रासदी को लेकर लगातार तपोवन परियोजना पर आरोप लगाए गए, तो NTPC ने साफ कह दिया कि वो साढ़े 12 किलोमीटर लंबी सुरंग बना तो रहे हैं, लेकिन वो जोशीमठ शहर के नीचे से नहीं जाती. और न ही इस सुरंग के चलते शहर को नुकसान पहुंचा है. और हाल में कोई ब्लास्ट भी नहीं किया गया. केंद्र की इतनी बड़ी एजेंसी कोई दावा करे तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. लेकिन क्या बात इस दावे पर खत्म हो सकती है?
हमारे सामने इंडियन एक्सप्रेस अखबार की 9 जनवरी की रिपोर्ट है. जिसे जय मज़ूमदार ने लिखा है. जय अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि दिसंबर 2009 के बाद से अब तक कई बार ऐसा हुआ कि सुरंग की खुदाई में लगी मशीन ऐसी चट्टानों से टकराई, जिनमें पानी मौजूद था. तकनीकी भाषा में इसे कहते हैं 'एक्वीफायर इंग्रेस ईवेंट'. इसमें ज़मीन के भीतर का पानी तेज़ी से सुरंग में बहने लगता है.
2010 में इतना पानी रिसा, कि NTPC को जोशीमठ के लोगों के साथ एक समझौता करना पड़ा, क्योंकि शहर में पानी की कमी हो गई थी. याद रखिए, हम जोशीमठ की बात कर रहे हैं, जहां पानी की कोई कमी नहीं है. हर तरफ हिमालय की चोटियों पर ग्लेशियर हैं.
रिपोर्ट में उत्तराखंड सरकार के Disaster Management and Mitigation Centre में एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर पीयूष रौतेला का बयान है. रौतेला भी कह रहे हैं कि जोशीमठ में रिस रहा पानी मटमैला है. संभव है कि ज़मीन के भीतर पानी के स्रोत पर असर पड़ा है. लेकिन फिलहाल ये बताना मुश्किल है कि इसके पीछे सुरंग है या नहीं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा चारधाम परियोजना पर जो कमेटी बैठाई गई थी, उसके सदस्य हेमंत ध्यानी साफ शब्दों में NTPC पर सवाल उठाते हैं. उन्होंने पूछा कि NTPC ये कैसे कह रहा है कि उसकी सुरंग का त्रासदी से कोई लेना-देना नहीं?
सरकार अब एक्शन मोड में है. धड़ाधड़ कमेटियों का गठन हो रहा है. संयोग देखिये, पर्यावरण कार्यकर्ता और समाजसेवी सुंदरलाल बहुगुणा की आज जयंती है. और आज ही हम उनके ही इलाके में आई एक मानव निर्मित त्रासदी के ज़िम्मेदारों को खोज रहे हैं. कारण जानते हैं क्या है - हमने बहुगुणा और उनकी परंपरा से आने वाले लोगों को जीके का एक सवाल बनाकर छोड़ दिया. हमें ये मालूम नहीं है कि चिपको आंदोलन के लिए मशहूर सुंदरलाल बहुगुणा विकास की हमारी अवधारणा को लेकर क्या सोचते थे. क्या हम इसकी कीमत चुका रहे हैं, जवाब हम आप पर छोड़ते हैं.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: जोशीमठ की तबाही के लिए जिम्मेदार कौन?

