लाल किले की तरफ भीड़ ले जाने वाले लक्खा सिधाना की पूरी कहानी पढ़ लीजिए
पहले गैंगस्टर थे, फिर बने नेता
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लक्खा सिधाना
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गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में आयोजित किसान रैली के दौरान जो हिंसा देखने को मिली, उसके पीछे दीप सिद्धू के अलावा लक्खा सिधाना नाम के एक और व्यक्ति का नाम प्रमुख रूप से लिया जा रहा है. 26 जनवरी से एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को सिंघू बॉर्डर पर किसान संगठनों ने ट्रैक्टर मार्च को लेकर अंतिम घोषणा की थी. इसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा का मंच खाली हो गया. भीड़ बिखरने लगी. कुछ लोग मंच पर चढ़ गए. भाषण देने लगे. किसान नेताओं से अपील करने लगे कि वे युवाओं की मांग को सुनें. ये लोग मार्च को रिंग रोड पर ले जाने की बात करने लगे. ये बात रैली के रूट को लेकर किसान नेताओं और दिल्ली पुलिस के बीच हुए समझौते से अलग थी. ये नई मांग उठाने वालों में दीप सिद्धू और लक्खा सधाना का नाम मीडिया रिपोर्टों में प्रमुखता से लिया गया है.
दीप सिद्धू के बारे में हमने आपको बहुत कुछ बता दिया है, जो आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं. इस रिपोर्ट में बात करेंगे लक्खा सिधाना की. 26 जनवरी से पहले 25 जनवरी को लक्खा सिधाना ने ये बयान दिया था,
“हजारों युवा रिंग रोड अख्तियार करना चाहते हैं. किसान मजदूर संघर्ष समिति ने भी रिंग रोड से ही जाने का निर्णय लिया है. वो हमारे आगे प्रदर्शन कर रहे हैं, इसलिए हम उनके पीछे-पीछे चलेंगे. अगर कोई रिंग रोड पर जाना चाहता है, तो वो किसान मज़दूर संघर्ष समिति को फॉलो करे. ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं है.”मंगलवार को हुई हिंसा से जुड़ी खबरें बताती हैं कि इस रिंग रोड वाले जत्थे में से कुछ लोग लाल किले पहुंच गए. वहां उन्होंने लाल किले पर निशान साहिब का झंडा फहरा दिया. सवाल उठता है कि सिधाना ने ऐसा क्यों कहा? लोगों का कहना है कि इसके पीछे उनकी राजनीति है. उनके समर्थक हैं. सिधाना पंजाब के बठिंडा के रामपुरा फूल से ताल्लुक रखते हैं. पहले गैंगस्टर थे और बाद में बने नेता. नेता भी ऐसे कि अब मालवा यूथ फेडरेशन के प्रेसिडेंट हो गए हैं. पूरा नाम है लखबीर सिंह. गुंडागर्दी के कारोबार में आने से पहले सिधाना खिलाड़ी थे. वे कबड्डी खेलते थे. पढ़ाई-लिखाई करने में भी ठीकठाक थे. इतने कि आगे चलकर एमए की डबल डिग्री ले ली. लेकिन सिधाना का भविष्य से नहीं जुड़ा था. उन्हें अपराध ने धर लिया. रिपोर्टों से पता चलता है कि सिधाना को अपराध के क्षेत्र में नेता लेकर आए. सिधाना उन नेताओं के नाम नहीं बताते हैं. एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में वे कहते हैं,
“पॉलिटिशियन बहुत शातिर होते हैं. इनकी शाबाशी बहुत खराब होती है. वो इंसान को बरतना जानते हैं. ईगो प्रॉब्लम की वजह से जुर्म में आया. चाहता था कि हर जगह लक्खा-लक्खा हो. लेकिन जब अंदाजा हुआ कि हमेशा तो किसी का नाम नहीं रहता, तो फिर लगा कि यार क्या कर रहे हैं. निकलते हैं जुर्म की दुनिया से. लेकिन ये दलदल बहुत गहरी है. यहां से कोई नहीं निकाल सकता.”सिधाना खुद दावा करते हैं कि साल 2004 से 2017 साल तक वे हर साल जेल गए. कभी 4 महीने, तो कभी 6 महीने के लिए. साल 2017 में तो फरीदकोट जेल में मोबाइल फोन यूज करने के मामले में ही लक्खा पर मुकदमा हो गया था. अपने अपराधी जीवन के बारे में बात करते हुए लक्खा कहते हैं कि पंजाब के लगभग 90 प्रतिशत युवा किसी न किसी रूप में जुर्म की दुनिया से जुड़ाव रखते हैं. लक्खा जब अपराध की दुनिया में गए तो घर वालों को पता नहीं था. एक इंटरव्यू में बताते हैं कि बहुत समय तक घर वाले नहीं जानते थे कि वो क्या काम करते हैं. पूछने पर बता देते थे कि वो किसी दोस्त के घर पर थे. कहते हैं,
“मिडिल क्लास परिवारों में मां-बाप पढ़े लिखे नहीं होते. ज्यादा पूछताछ नहीं करते. जब मुझसे पूछते थे तो कह देता था दोस्त के पास था. जब मेरे कामों का पता चला तब देर हो गई थी. पुलिस आती थी, मां-बाप को उठा ले जाती थी. जब कोई झगड़ा हो जाता था तो. समझ तो ठोकर लगने के बाद ही आती है.”लक्खा दावा करते हैं कि जेल में रहते हुए उन्होंने किताबें पढ़ीं. सिखी क्या है, सिखी इतिहास, मार्क्सवाद, लेनिन को पढ़ा, भगत सिंह को पढ़ा. फिर सोच में तब्दीली आई. अपने किए गए कामों का दुख एक टीवी इंटरव्यू में साझा करते हुए कहते हैं,
“मुझे खुद के किए कामों का दुख है. एक बार एक पॉलिटिशियन की वजह से 27 साल के युवा का कत्ल हुआ. उसके मां-बाप, बीवी और 3 बच्चियां हैं. उसकी मौत का भार मुझ पर हमेशा रहेगा.”जेल के जीवन के बारे में सिधाना बताते हैं कि जेल में नशा, मोबाइल, बंदूक का इस्तेमाल आम है. ये प्रशासन की मिलीभगत से होता है. चिट्टा-हेरोइन तो ऐसे चलती है जैसे सब्जी हो. फिर सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ से फोन पर बातचीत का किस्सा साझा करते हैं. कहते हैं कि फोन पर बात हुई और दोसांझ ने लक्खा से पूछा कि वो गोली-बंदूकों के गाने गाकर युवाओं को क्यों बरगलाते हैं? लक्खा सिधाना पर दर्जन भर मुकदमे हुए. हत्या, हत्या के प्रयास और लूटपाट के. कुछ के किस्से तो खुद ही लक्खा ने सुनाए हैं. जमीन पर कब्जे का काम किया. फिर जमीन पर कब्जे का काम बूथ पर कब्जे तक चला गया. प्रकाश सिंह बादल के भतीजे और पंजाब के मौजूदा वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने एक समय पार्टी बनाई थी - People party of Punjab. 2012 के विधानसभा चुनाव में लक्खा को इसका टिकट मिल गया. जमानत नहीं बची. 10 हजार वोट मिले. आगे भी राजनीतिक रूप से लक्खा एक्टिव रहे. कहा जाता है कि शिरोमणि अकाली दल के नेता सिकंदर सिंह मालुका के भी बहुत करीबी रहे हैं. उनके साथ लम्बे समय तक काम किया है. राजनीति हो या दहशतगर्दी, दो बार जानलेवा हमलों का सामना किया. फिर एक समय खुद ही कहा,
“इस दुनिया में आने के बाद आप कहीं सेफ नहीं हैं. या तो देश छोड़कर चले जाओ या यहीं रहो कैद होकर. कुछ पता नहीं, कौन, कब, कहां मार जाए.”मंगलवार को दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसके बाद लक्खा फिर से रडार पर हैं. सूत्रों के हवाले से आने वाली ख़बरें बताती हैं कि दिल्ली पुलिस पर हुए हमलों में लक्खा और उनके सहयोगी शामिल थे. इस आरोप पर अब तक लक्खा की ओर से सफाई नहीं आई है.

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