जब भागलपुर में एक ईमानदार पुलिसवाले को भीड़ ने घेरकर मार डाला
अगर आपको लगता है कि भागलपुर में हुई सबसे बुरी घटना 1989 का दंगा है, तो आप गलत हैं.

बीते वर्ष इन्हीं दिनों हिंदू नव वर्ष पर निकाले गए जुलूस में हुई हिंसा को लेकर भागलपुर खबरों में था. बिहार का ये वही शहर है, जहां 1989 में दंगा हुआ था. इलाकाई लोग बताते हैं कि जिन इलाकों से दंगा शुरू हुआ था, वो आज भी कम्युनली चार्ज रहते हैं. प्रशासन की कोशिश रहती है कि उन इलाकों से किसी को रैली-जुलूस वगैरह निकालने की इजाज़त न दी जाए. पर 1989 से पहले भी भागलपुर में एक ऐसी घटना हुई थी, जो किसी भी शहर के लिए एक धब्बे की तरह है.

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साल 1987 के जनवरी महीने में भागलपुर में गुस्साए बुनकरों की भीड़ ने DSP सुखदेव मेहरा की हत्या कर दी थी. मेहरा एक ईमानदार अफसर थे, जो अपने मातहतों के बीच फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे थे. उनकी हत्या की कहानी षड़यंत्र और बदले की कहानी है.
भागलपुर चादरों के लिए मशहूर है. यहां बुनकर काफी तादाद में है. ये बुनकर 24 दिसंबर 1986 से बिजली सप्लाई में कटौती के खिलाफ हड़ताल पर बैठे हुए थे. फरवरी में ये बुनकर तब हिंसक हो गए, जब 19 जनवरी 1987 को दारोगा केके सिंह ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए और इस गोलीबारी में दो लोग मारे गए.
इससे करीब 5000 से ज़्यादा बुनकरों की भीड़ उत्तेजित हो गई और पुलिसवालों को मारने दौड़ी. इसी बीच दारोगा केके सिंह बाकी पुलिसवालों को साथ लेकर DSP मेहरा को अकेला छोड़कर भाग गए. मेहरा भीड़ के हत्थे चढ़ गए. उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया और फिर जलती हुई सरकारी जीप में फेंक दिया गया.

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1987 में बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और विपक्ष के नेताओं ने खुलेआम आरोप लगाए थे कि केके सिंह ने मेहरा को मौत के मुंह में धकेल दिया. असल में केके सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ मेहरा की लड़ाई का बदला लेना चाहते थे. रोचक बात ये है कि सरकार की तरफ से विपक्ष के इन आरोपों का कोई खंडन नहीं किया गया था.
हालांकि, उस समय भागलपुर से कांग्रेस विधायक शकीलुज्जमां ने राज्य बिजली बोर्ड के एरिया मैनेजर बलिराम सिंह को घटना का दूसरा विलेन बताया था. असल में बुनकरों के नेता बकाया बिलों का ब्याज माफ करने, रकम का आसान किस्तों पर भुगतान करने और ज़्यादा रकम के बिल बनाने के खिलाफ जांच करने की मांग कर रहे थे.
पर उसी दौरान बलिराम सिंह ने 24 दिसंबर से अचानक बिजली की सप्लाई बंद करने का आदेश दे दिया था, जिससे बुनकरों के भूखे मरने की नौबत आ गई थी. मेहरा की हत्या के इस मामले में 26 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी. बाद में कुल 29 लोगों को आरोपी बनाया गया, लेकिन घटना के 29 साल बाद भी किसी पर आरोप साबित नहीं किए जा सके और सभी 29 लोगों को रिहा कर दिया गया.

इस मामले में पुलिस ने सिधुआ नाम के एक आदमी को भी गिरफ्तार किया था, जिस पर मेहरा को जीप में फेंकने का आरोप था. पुलिस को उसके पास से DSP मेहरा की अंगूठी भी मिली थी. लेकिन केस का फैसला आने से कुछ साल पहले ही इस शख्स की मौत हो गई थी.
आखिर में इस घटना को लेकर ये मान लिया गया कि ईमानदार अफसर DSP मेहरा गलत समय पर गलत जगह फंस गए और उनके दुश्मनों ने इसका फायदा उठाया. हालांकि, सच्चाई यही है कि भागलपुर में एक ईमानदार अफसर भीड़ के हाथों मार दिया गया था.
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