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भागलपुर दंगों के आरोपी रहे केएस द्विवेदी क्यों बनाए गए बिहार पुलिस के मुखिया?

दंगा पीड़ितों की मानें, तो द्विवेदी एक समय भागलपुर दंगे के 'खलनायक' माने जा रहे थे.

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पहली किश्त में आपने भागलपुर दंगों की कहानी पढ़ी. नहीं पढ़ी, तो यहां क्लिक करके पढ़ लीजिए अब आगे पढ़िए:

कांग्रेस को दिख रहा था रामजन्मभूमि मुद्दा जोर पकड़ रहा है. कांग्रेस नहीं चाहती थी कि बीजेपी को इसका फायदा मिले. वो ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी, जिसकी वजह से हिंदू उसे राम-विरोधी मानें. शाहबानो प्रकरण के बाद वैसे भी कांग्रेस सरकार पर अपनी धर्मनिरपेक्षता साबित करने का काफी दबाव था. इतना ही नहीं, बल्कि दंगे के बाद कांग्रेस ने दोषियों को सजा देने में भी ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया.

पुलिस विभाग पर दंगाइयों की मदद का आरोप था
सबूत सामने थे. मगर कार्रवाई अटकी रही. मसलन पुलिस सर्जेंट ओम प्रकाश सिंह का मामला. जिनके ऊपर एक मुस्लिम कर्मचारी की हत्या का आरोप था. भागलपुर शहर के DM ऑफिस के अंदर. केस दर्ज हुआ, मगर कार्रवाई नहीं हुई. ऐसे कई पुलिसवाले थे. जिनके खिलाफ शिकायतें थीं. गंभीर शिकायतें. दंगाइयों के साथ मिले होने की शिकायतें. मगर राज्य सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई करने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई. सोचिए. कैसी स्थिति थी. कि जिस पुलिस विभाग पर दंगाइयों की मदद का आरोप था, उसको ही बाद में दंगे से जुड़े केस की जांच का जिम्मा मिला.

ऐसे ही नहीं 1988 और 1989 में इतने दंगे हुए
बात रही विहिप और बीजेपी की. तो 1984 के चुनाव में बीजेपी को फायदा नहीं हुआ था. उसे लोकसभा में केवल दो सीटें मिली थीं. तो बीजेपी नए अंदाज से उतरी. आक्रामक होकर उतरी. रामशिला यात्राएं लोगों को अपनी ओर खींचने, उन्हें साथ लाने के लिए बेहद मुफीद थीं. इसकी वजह से मॉबलाइजेशन हुआ. ये मजह संयोग नहीं कि 1988 और 1989 में कई जगह छिटपुट दंगे हुए. 18 से 23 मई, 1987 को मेरठ में दंगे हुए. बाबरी मस्जिद का ताला खुलने के विरोध में मुस्लिमों ने प्रदर्शन किया. दिल्ली में जामा मस्जिद के शाही इमाम ने भड़काऊ भाषण दिया. अप्रैल, 1987 में कई मौकों पर हिंसा हुई. फिर 18 मई को हाशिमपुरा में जमकर हिंसा हुई. पिलखोड़ी के कारखाने में लोगों को जिंदा जला दिया गया. मोरादनगर, मलियाना ये सारे इलाके हिंसा में घिरे रहे. 8 से 11 अक्टूबर, 1988 को UP के मुजफ्फरनगर में दंगा हुआ. बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी ने एक रैली आयोजित करने का फैसला किया. इसके जवाब में हिंदू संगठनों ने बंद का आयोजन किया. भिड़ंत हुई और दंगा हो गया.

अयोध्या में राम जन्मभूमि पर ऐसा मंदिर बनवाएंगे. विहिप ये मॉडल लेकर पूरे देश में घूमी.
विहिप पूरे देश में ये मॉडल लेकर घूमी. कहती थी, अयोध्या में राम जन्मभूमि पर ऐसा ही मंदिर बनवाएंगे.

भागलपुर से पहले भी खूब हिंदू-मुस्लिम हो रहा था
1989 की बात करें, तो भी कई जगह दंगे हो रहे थे. हजारीबाग शहर की बात है. 16 अप्रैल को रामनवमी का एक जुलूस निकला. जुलूस के दौरान एक बम फटा. और दंगा भड़क गया. 14 सितंबर को राजस्थान के कोटा में एक दंगा हुआ था. अनंत चतुर्दशी के मौके पर. 28 सितंबर को उत्तर प्रदेश के बदायूं में ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) ने एक उर्दू-विरोधी जुलूस निकाला. क्योंकि इसी दिन UP विधानसभा में उर्दू बिल पेश होना था. इसके विरोध में ABVP ने एक उर्दू-विरोधी जुलूस निकाला. इसके विरोध में इस्लामिया इंटर कॉलेज के लड़कों ने उर्दू के समर्थन में जुलूस निकाला. और दंगा छिड़ गया. 14 अक्टूबर को मध्य प्रदेश के इंदौर में भी दंगा हो चुका था. विहिप ने रामशिला पूजन जुलूस निकाला. मुसलमानों ने भी एक जुलूस निकाला. दोनों तरफ के लोग भिड़े और शहर में दंगा शुरू हो गया. सरकार के इरादे ठीक होते, तो उसके पास चेतने के कई मौके थे. कई संकेत थे, जो बता रहे थे कि बाबरी और रामजन्मभूमि का मुद्दा कितना हिंसक हो सकता है. मगर उन्हें लगातार नजरंदाज किया गया. इसी के नतीजा थे भागलपुर दंगे.

लालू ने मुसलमानों से सहानुभूति दिखाई, मगर निभाई नहीं!
इस दंगे ने बिहार की राजनीति को बदल दिया. कांग्रेस सिकुड़ गई. एक वक्त में जिस कांग्रेस ने सवर्ण, दलित और मुसलमान, तीनों वोट बैंकों को साधा हुआ था, वो खेल से बाहर निकल गई. मुसलमानों ने उसे कभी माफ नहीं किया. वो वोट बैंक उसके पास कभी नहीं लौटा. इस दंगे ने लालू यादव की किस्मत लिख दी. मुसलमान उनके साथ हो लिए. तब जनता दल थी. राजद नहीं बनी थी तब. मगर क्या लालू यादव ने सच में मुसलमानों को इंसाफ दिया? नहीं. लालू ने मुस्लिमों के साथ सहानुभूति दिखाई. मगर सहानुभूति निभाई नहीं. इसकी एक बड़ी वजह वोट की राजनीति थी. भागलपुर दंगे में कई आरोपी यादव थे. लालू को डर था कि उनके खिलाफ कार्रवाई वोट बैंक छीन लेगा. शायद इसीलिए लालू यादव ने जस्टिस आर एन प्रसाद वाली रिपोर्ट को आधिकारिक माना. वो ही रिपोर्ट, जिसमें मुसलमानों को उपदेश और पुलिस-प्रशासन को क्लीन चिट दी गई थी. नेताओं को ऐसे दोहरेपन की सहूलियत जाने कैसे मिल जाती है? भागलपुर दंगे के पीड़ितों को मुआवजा भी ऐसा मिला कि जिक्र करते हुए शर्म आ जाए. बहुत कम लोगों को मुआवजा मिला. वो भी कौड़ियों के भाव. किसी को एक हजार. किसी को 1,200. किसी को डेढ़ हजार. कई सारे लोग तो इतने साल बाद भी मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं.

नीतीश आए, तो नई जांच समिति बनाई
जब नीतीश आए, तो उन्होंने जस्टिस एन एन सिंह जांच समिति बनाई. 2015 में इस जांच समिति की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश किया गया. इसमें सत्येंद्र नारायण सिंह सरकार को दोषी माना गया था. 100 पन्नों की इस रिपोर्ट में पुलिस की भी खूब फजीहत की गई थी. ये बात इसलिए भी मायने रखती है कि जिस समय ये रिपोर्ट पेश की गई, तब बिहार में नीतीश की पार्टी जेडी (यू) और कांग्रेस साथ थे. रिपोर्ट में 125 IAS और IPS अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुशंसा भी की गई थी.

ये बीजेपी की तिकड़ी है. लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी.
ये बीजेपी की तिकड़ी है. बीच में लालकृष्ण आडवाणी, दाहिनी ओर अटल बिहारी वाजपेयी और बाईं ओर मुरली मनोहर जोशी. राम जन्मभूमि आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक.

न जस्टिस हुआ, न जस्टिस होता हुआ दिखा
नीतीश ने सत्ता में आने के बाद ही भागलपुर दंगे से जुड़े 27 केस दोबारा खुलवाए थे. कुछ मामलों में फैसला भी आया. कामेश्वर यादव को सजा मिली. बिहार पुलिस ने एक जमाने में ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ बनाने के लिए इसी कामेश्वर यादव की तारीफ की थी. लोगाइन नरसंहार के 14 आरोपियों को भी सजा मिली. इन 14 लोगों में एक पुलिसवाला भी था. छह अन्य आरोपी मर चुके थे. चार लापता थे.  ज्यादातर आरोपी बरी हो गए. आजाद घूमते रहे. भागलपुर दंगों में सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात ये ही है. इतना बड़ा दंगा हुआ, मगर जस्टिस होता हुआ दिखा नहीं. कानून कहता है कि जस्टिस सिर्फ होना नहीं चाहिए, होता हुआ दिखना भी चाहिए. भागलपुर दंगों के मामले में ये बात एकदम गलत साबित हुई. जब इंसाफ हुआ ही नहीं, तो इंसाफ होता हुआ कैसे दिखता?

भागलपुर दंगे को जैसे भुला दिया गया
भागलपुर दंगों के मामले में एक और परेशान करने वाली बात है. इसे एक तरह से भुला दिया गया. 1984 के दंगों के बाद ज्यादातर लोगों को 1992-93 में हुए बंबई के दंगे याद आते हैं. जबकि भागलपुर का ये दंगा बहुत बड़ा था. दो महीनों तक चला. मगर बिहार के बाहर इसकी बहुत कम बात हुई. इस एक मामले से सीख लेकर सरकार बाबरी विध्वंस रोक सकती थी. मुंबई दंगा रुक सकता था. मगर ऐसा हुआ नहीं. ऐसा लग रहा था कि किसी को कोई परवाह ही नहीं है. सबने अपना-अपना कोना पकड़ा हुआ है. कांग्रेस को लगता था कि मुसलमान उसको वोट नहीं देंगे, तो जाएंगे कहां. मतलब, मुसलमानों को मन मारकर साथ आना ही पड़ेगा. इसीलिए अभी हिंदू वोट बैंक सुधारो. ताकि बीजेपी उसमें सेंधमारी न कर सके. बीजेपी को अपनी राजनीति चमकानी थी. इन सबके बीच सबसे डरावनी बात थी पुलिस-प्रशासन का सांप्रदायिक हो जाना. पुलिस मदद न करे, तो भी आदमी एक पल को सब्र कर ले. मगर पुलिस दंगाइयों के साथ मिल जाए, मुसलमानों को मरवाए, तो कोई कैसे कलेजा मजबूत करेगा? भागलपुर में पहले भी दंगे हुए थे. मगर वो दंगे कभी ग्रामीण इलाकों तक नहीं फैले. पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत और सरकार की लापरवाही ने 1989 के इस दंगे को गांव-गांव तक पहुंचा दिया. 250 गांव इसकी चपेट में आ गए.

बिना सांप्रदायिकता के भी उग्र रहा है भागलपुर
भागलपुर पिछले लंबे समय से सांप्रदायिक रहा था. दंगे यहां के लिए नई बात नहीं थे. पहले भी तीन बड़े दंगे देख चुका था ये शहर. कभी दो अलग-अलग मजहबों के लड़के-लड़कियों की शादी पर. कभी दुर्गा पूजा और मुहर्रम पर. ये शहर कितना उग्र है, इसकी दो मिसालें सुन लीजिए.

1. यहां दो गांव हैं. दो भाई थे. दोनों रेत माफिया. एक ही धंधे में थे, तो तनातनी भी थी. एक बार दोनों उलझ पड़े. दो भाइयों की इस लड़ाई में दो गांव गुंथ गए. तकरीबन 100 लोगों की जान चली गई.

2. दो गांव हैं. एक खुटहा. एक कैली. दोनों यादव बहुल गांव. किसी दूसरी जाति का आदमी मुश्किल ही मिलेगा आपको यहां. गांव में पहली बार बिजली पहुंच रही थी. तो बिजली का खंभा गड़ना था. खंभा एक था, गांव दो. दोनों गांवों में बहस छिड़ी. खुटहा के लोग कहने लगे, हमारे यहां खंभा गाड़ो. कैली के लोग अपना दावा करने लगे. बहस बढ़ी, तो खुटहावालों ने बंदूकें निकाल लीं. चला भी दीं. जवाब में कैलीवालों ने भी गोलियां चलाईं. एक बिजली के खंभे के पीछे कई लोग मारे गए.

भागलपुर दंगा जैसे कांग्रेस के लिए नुकसान का खेल बना, वैसे ही लालू यादव और उनके जनता दल के लिए बहुत फायदे का सौदा साबित हुआ.
भागलपुर दंगा जैसे कांग्रेस के लिए नुकसान का खेल बना, वैसे ही लालू यादव और उनके जनता दल के लिए बहुत फायदे का सौदा साबित हुआ. बिहार के मुसलमान कांग्रेस छोड़कर लालू के साथ हो लिए.

दंगे के बाद बीजेपी लगातार मजबूत होती गई
इस दंगे के बाद से बीजेपी भागलपुर में लगातार मजबूत होती रही. 1999 के लोकसभा चुनाव में यहां बीजेपी जीती. 2006 में इस सीट ने बीजेपी के शाहनवाज हुसैन को जिताया. सोचिए. हिंदू बहुल आबादी ने मुस्लिम कैंडिडेट को जिताया. मगर फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में शाहनवाज बहुत कम अंतर से हार गए. इसकी वजह थी ध्रुवीकरण. मुस्लिम लामबंद हो गए. और इसका फायदा हुआ राजद के उम्मीदवाद शैलेश कुमार मंडल को.

नीतीश समझ गए हैं कि मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला!
बीजेपी और नीतीश की जोड़ी दोबारा बिहार की सत्ता में है. नीतीश जानते हैं कि पिछले विधानसभा में लालू के साथ होने का फायदा मिला उन्हें. मुसलमानों ने उनके लिए वोट किया. मगर अब ऐसा नहीं होगा. शायद इसीलिए उन्हें अब मुस्लिम वोटों की कोई आस नहीं. और शायद इसीलिए अब नीतीश कुमार सेक्युलर इमेज बनाए रखने का लालच नहीं दिखा रहे हैं. के एस द्विवेदी को DGP बनाना शायद ऐसा ही कदम है. 1989 के बाद द्विवेदी को सेंट्रल डेप्युटेशन पर भेज दिया गया था. फिर उनकी पोस्टिंग बड़ी मामूली जगहों पर हुई. हाशिये पर रहे. उन्होंने भागलपुर दंगों में अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ पटना हाई कोर्ट में अपील भी की थी. वहां से बरी हो गए. ये उनके लिए बड़ी राहत थी. मगर लोगों के दिमाग में द्विवेदी का नाम भागलपुर दंगों का पर्याय ही बना रहा. बरी होने के बाद भी वो करियर में इधर-उधर ही पोस्टिंग पाते रहे. कभी सिपाही भर्ती ट्रेनिंग में. तो कभी कहीं. अब एकाएक उन्हें बिहार का डीजीपी बना दिया गया है.

तो क्या ये माना जाए कि बीजेपी के मिशन 2019 का एक हिस्सा है के एस द्विवेदी को DGP बनाना?
इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि बिहार में जनता दल (यू) के साथ गठबंधन सरकार में शामिल बीजेपी ने द्विवेदी को DGP बनाने का दबाव बनाया हो.

द्विवेदी के बहाने बीजेपी 2019 के लिए हिंदू कार्ड खेल रही है?
नीतीश के साथ सत्ता में वो ही बीजेपी है, जिसने 1989 में द्विवेदी के भागलपुर से ट्रांसफर किए जाने पर विहिप के साथ मिलकर बवाल किया था. इसी बवाल की वजह से राजीव गांधी को अपना फैसला वापस लेना पड़ा था. हालांकि राजीव के सामने खुद को ‘हिंदू विरोधी’ न दिखाने की राजनैतिक चुनौती भी थी. मगर द्विवेदी के मामले में वो उस चुनौती से कहीं ज्यादा निर्णायक था उनके पक्ष में बनाया गया दबाव. अब  द्विवेदी के करियर के आखिरी 10 महीने बचे हैं. जनवरी 2019 में वो रिटायर होंगे. 2019 में ही लोकसभा चुनाव होंगे. तो क्या द्विवेदी को DGP बनाना असल में ध्रुवीकरण की कोशिश है. हालांकि ये भी तथ्य है कि द्विवेदी को DGP बनाने में नियमों की अनदेखी नहीं की गई है. जो हुआ है, कानूनी तरीके से हुआ है. द्विवेदी वरिष्ठ अधिकारी हैं. इस पद के लिए उनकी योग्यता किसी से कम नहीं. लेकिन ये उनका अतीत है जिसकी वजह से उनकी नियुक्ति पर सवाल उठ रहे हैं.

कई लोगों के लिए ‘हिंदू हृदय सम्राट’ हैं के एस द्विवेदी
हो सकता है द्विवेदी अपने इस कार्यकाल में कुछ भी विवादित न करें. सब कुछ बहुत अच्छा-अच्छा हो. अपराध भी कम हो जाए. मगर तब भी क्या उनका भागलपुर दंगों से जुड़ा अतीत नजरंदाज किया जा सकेगा. एक उदाहरण देते हैं आपको. द्विवेदी की तारीफ करने वाले कहते हैं कि वो न होते, तो बहुत हिंदू मारे जाते. द्विवेदी की आलोचना करने वाले कहते हैं कि अगर वो न होते, तो कई मुसलमानों की जान बच जाती. इस उदाहरण से आपको मालूम चल जाएगा कि द्विवेदी की छवि कैसी है और इसके राजनैतिक फायदे किस ओर जा सकते हैं.

नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के बाद भागलपुर दंगे से जुड़े 27 केसों की फाइल खुलवाई. एक जांच आयोग भी बनाया.
नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के बाद भागलपुर दंगे से जुड़े 27 केसों की फाइल खुलवाई. एक जांच आयोग भी बनाया. नीतीश ने हमेशा ही एक सेक्युलर नेता की छवि बनाने पर फोकस किया. इसके बावजूद मुसलमान वोट उनके साथ नहीं आए.

बिहार बदलाव के वक्त द्विवेदी को क्यों नहीं लाए नीतीश?
बाकी एक सवाल मन में आता है. 2005-10 के दौरान जब नीतीश सत्ता में थे, तो उनका वो दौर गवर्नेंस का था. इसमें कोई शक नहीं. इस दौर के पहले बिहार ने वो दौर भी देखा था जब अपराधियों के डर से शाम 7 बजे के बाद शहर में कर्फ्यू सा लग जाता था. सरेआम अपहरण होते थे. लड़कियां मारे डर के कर कॉरस्पॉन्डेंस कोर्स में दाखिला लेती थीं. क्योंकि स्कूल-कॉलेज जाती लड़कियां दिन-दहाड़े उठा ली जाती थीं. नीतीश आए और उन्होंने कानून का राज बनाने पर खूब काम किया. पुलिस को खुला हाथ दिया. टारगेट बस एक था. अपराध रोको. रिटायर्ड आर्मी अधिकारियों की भी सेवाएं ली गईं. ऐसे वक्त में जब कि बिहार इतना बड़ा हवन कर रहा था, तब भी के एस द्विवेदी किसी गुमनाम पोस्टिंग पर खप रहे थे. उन्हें सरकार ने इस लायक नहीं समझा कि उनकी काबिलियत का फायदा उठाए. सरकार भी किसकी. नीतीश कुमार की. वो ही नीतीश कुमार  अब भी हैं. तो फिर द्विवेदी को बिहार पुलिस के सबसे बड़े पद पर बिठाने का फैसला अब क्यों?

हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण हुआ, तो फायदे में रहेगी बीजेपी
द्विवेदी के खिलाफ बोलने से विपक्षी पार्टियां भी बच रही हैं. उन्होंने बयान दिए हैं, मगर सख्त बयान नहीं दिए हैं. राजद को पता है कि अगर ध्रुवीकरण हुआ, तो उसे नुकसान होगा. जाति का गणित नहीं चलेगा. धर्म हावी हो जाएगा. और जब मुकाबला हिंदू वोटों और मुसलमान वोटों में हो, तो मुसलमान वोट जिताएंगे कैसे? जैसे मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, वैसे ही तो वोट भी होंगे. माइनॉरि़टी. सो राजद ये जोखिम नहीं लेना चाहती. वैसे भी भागलपुर दंगों में हिंदुओं की ओर से जो ग्रुप सबसे ज्यादा सक्रिय था, वो सवर्ण नहीं था. यादव और पासवान थे आगे. यादव तो बेस है राजद का. इसी मारे तो लालू खुद को मुसलमानों का हिमायती बताने के बावजूद भागलपुर दंगा पीड़ितों के लिए कुछ भी करने की हिम्मत नहीं जुटा सके.


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