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राष्ट्रपति बनने पर क्या होगा रामनाथ कोविंद का पहला काम

जिसे आज तक लोगों से छिपाया गया उसे कर सकते हैं सार्वजनिक

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22 जून 2017 (Updated: 22 जून 2017, 10:23 IST)
Updated: 22 जून 2017 10:23 IST
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# आज तक किसी भी सरकार ने हैंडरसन- ब्रुक्स रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया.

# नेहरू और तब के आर्मी चीफ के मामले में रिपोर्ट चुप है.

# सभी ने अनुमान लगाया कि था कि चीन आक्रमण नहीं करेगा.

# नेहरू द्वारा अपनाई गई फॉरवर्ड पॉलिसी को माना जाता है इसके लिए ज़िम्मेदार

एनडीए के राष्ट्रपति पर के कैंडिडेट घोषित किए जाने के साथ ही रामनाथ कोविंद सुर्खियों में आ गए हैं. तमाम लोग इस बात के भी कयास लगा रहे हैं कि एक राष्ट्रपति के रूप में आखिर उनका पहला काम क्या होगा. दावे से तो नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बात का अनुमान लगाया जा सकता है.

बात 1997 की है. संयुक्त मोर्चा की सरकार थी और मुलायम सिंह रक्षा मंत्री थे. उस समय रामनाथ कोविंद राज्यसभा से सांसद थे. कोविंद ने राज्य सभा में मांग की कि हैंडरसन-ब्रुक्स रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, ताकि 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की हार के कारणों का पता चले. लेकिन मुलायम सिंह यादव ने यह कह कर रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना कर दिया कि यह बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है.

क्या है हैंडरसन-ब्रुक्स रिपोर्टः

1962 में भारत चीन युद्ध में भारत को मुंह की खानी पड़ी थी. युद्ध खत्म होने के बाद भारत सरकार ने एक रिपोर्ट तैयार करवाई. लेकिन रिपोर्ट आने के बाद उसे रक्षा मंत्रालय ने क्लासीफाइड कह के आलमारी में बंद कर दिया और सार्वजनिक नहीं किया. कारण बताया गया कि ये काफी संवेदनशील मुद्दा है. तब से लेकर अब तक तमाम सरकारें बनती रहीं, चाहे वो बीजेपी रही हो या कांग्रेस लेकिन किसी ने भी इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया.

इस रिपोर्ट को इंडियन आर्मी के दो अधिकारियों लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रुक्स और ब्रिगेडियर जनरल परमिंदर सिंह भगत ने तैयार किया इसीलिए इसे हेंडरसन ब्रू्क्स-भगत रिपोर्ट भी कहते हैं.

एक ऑस्ट्रेलियन लेखक और पत्रकार नेविल मैक्सवेल के हाथ मार्च 2014 में इस रिपोर्ट का कुछ अंश लग गए. मैक्सवेल उस वक्त ''द टाइम्स ऑफ लंदन'' के लिए काम करते थे और वॉर के समय दिल्ली में रहकर इन्होंने रिपोर्टिंग की थी. इसके बाद 1970 में मैक्सवेल ने ''इंडियाज़ चायना वॉर'' के नाम से एक किताब भी लिखी जिसने भारत सरकार को काफी नाराज़ किया क्योंकि उस किताब में लिखा गया था कि सरकार के गलत फैसलों के कारण ही भारत, चीन से हार गया. खैर, इस रिपोर्ट को बाद में उन्होंने अपनी वेबसाइट पर इसे अपलोड कर दिया. उनकी मानें तो इंडिया की ''फॉरवर्ड पॉलिसी' के कारण चीन ने चिढ़ के भारत पर आक्रमण किया और पुरानी हो चुकी इंटेलिजेंस इस बात का पता नहीं लगा पाई. जब भी दो देशों के बीच बॉर्डर डिस्प्यूट होता है और कोई एक देश विवादित एरिया में अंदर घुसने की या उसे हड़पने की कोशिश करता है तो इसे ''फॉरवर्ड पॉलिसी'' कहते हैं. किसी भी नेता, यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को भी इस बात का अनुमान नहीं था कि चीन भारत पर आक्रमण कर देगा. इस युद्ध में करीब 2000 भारतीय सैनिक मारे गए और 4000 लोगों को कैद कर लिया गया था.

किन लोगों को ठहराया गया है दोषी?

इस रिपोर्ट के जारी कुछ अंशों के आधार पर इन लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है-

1.कृष्णा मेनन, रक्षा मंत्रीः

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रिपोर्ट के अनुसार उस वक्त के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने सेना के अधिकारियों के साथ जितनी भी बैठकें कीं उसमें जिन भी बिंदुओं पर चर्चा हुई उसका रिकॉर्ड अपने पास नहीं रखा. इसके बहुत भयंकर परिणाम हुए क्योंकि युद्ध के दौरान जो भी निर्णय लिए गए उसके लिए पूरी तरह से किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सका. उत्तरदायित्व न सिद्ध होने के कारण जो भी फैसले लिए गए वो सभी उतनी गंभीरता से नहीं लिए गए जितनी ज़रूरत थी.

2.बी.एम.मलिक, डायरेक्टर इंटेलीजेंस ब्यूरोः

रिपोर्ट में मलिक औऱ इंटेलीजेंस के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उस दौरान जो सूचनाएं इंटेलीजेंस ने जुटाईं वो बहुत ही कामचलाऊ तरीके से जुटाई गईं और इनका सूचनाओं का विश्लेषण भी ठीक ढंग से नहीं किया गया. इंटेलीजेंस ब्यूरो को लग रहा था कि भारतीय सेना द्वारा सीमा-पार नये-नये पोस्ट बनाए जाने के बावजूद चीन किसी भी हालत में भारत पर हमला नहीं करेगा. इस मामले में डायरेक्टर जनरल ऑफ इंटेलीजेंस ने मौखिक रूप से जो अनुमान लगाए उसी पर विश्वास कर लिया गया.

3.लेफ्टिनेंट जनरल बी.एम. कौल, चीफ ऑफ जनरल स्टाफः

रिपोर्ट, पूर्वी क्षेत्र में भारतीय सेना की बुरी हार के लिए लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल को अप्रत्यक्ष रूप से ज़िम्मेदार मानती है. कौल को इस मामले में बरी नहीं किया जा सकता क्योंकि वो उस समय चीफ ऑफ स्टाफ थे और उन्होंने युद्ध के समय सेना के लिए जिस तरह के लक्ष्य निर्धारित किए थे उसे पूरा कर पाना लगभग असंभव था. जनरल कौल भी सरकार की इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि चीनी सेना आक्रमण नहीं करेगी. उस दौरान NEFA यानी नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (अभी के अरुणांचल प्रदेश) के एरिया के लिए 4 सैन्य टुकड़ियां बनाई गई थीं जिसकी कमान कौल को दी गई और चीफ ऑफ स्टाफ का पद खाली हो गया. इस 4 सैन्य टुकड़ियों को बनाने के पीछे उद्देश्य था कि युद्ध से संबंधित मामलों में ज़ल्दी निर्णय लिया जा सके और तेज़ी से ऑपरेशन किया जा सके. हालांकि जिसकी भी सेना के ऑपरेशन के तौर तरीकों के बारे में थोड़ी भी जानकारी है वो इस फैसले को सही नहीं ठहरायेगा.

4.एम.जे. देसाई, विदेश सचिवः

22 सितंबर 1962 को रक्षा मंत्री के साथ मीटिंग में एम.जे. देसाई ने भी यही बात कही कि चीन कभी हमला नहीं करेगा, ज़्यादा से ज़्यादा वो एक या दो पोस्ट को कैप्चर कर सकता है.

5.ब्रिगेडियर डी.के. पालित, डायरेक्टर मिलिट्री ऑपरेशनः


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ब्रिगेडियर डी.के. पालित

अगस्त 1962 में मिलिट्री ऑपरेशन के डायरेक्टर ब्रिगेडियर डी.के.पालित ने कहा कि चीन भारत की फॉरवर्ड पॉलिसी पर प्रतिक्रिया नहीं करेगा. उनका अनुमान था कि चीन इस स्थिति में नहीं है कि वो भारत से युद्ध कर सके.

6. जवाहर लाल नेहरू, प्रधानमंत्री-

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रिपोर्ट वैसे तो नेहरू के बारे में कुछ नहीं कहती लेकिन नेहरू की फॉरवर्ड पॉलिसी पर सवालिया निशान लगाती है, जिसकी वजह से भारतीय सेना ने इंडिया-चीन को अलग करने वाली रेखा मैकमोहन लाइन से पार चीन की ओर काफी तक अंदर कई पोस्ट बना लिया था.

7. जनरल वी.एम. थापर, चीफ ऑफ जनरल स्टाफ-

आर्मी चीफ का ज़िक्र रिपोर्ट में सिर्फ एक जगह है जहां वो रक्षामंत्री कृष्णा मेनन की ऑफिस में हुई मीटिंग में शरीक होते हैं. जनरल थापर इस मीटिंग में कहते हैं कि चीन भारत द्वारा अपनाई जाने वाली फॉरवर्ड पॉलिसी पर लद्दाख में प्रतिक्रिया कर सकता है और गलवान वैली को कैप्चर करके 1960  की क्लेम लाइन तक पहुंच सकता हैं. 1960 में चीन ने भारत के सामने प्रस्ताव रखा था कि भारत अक्साई चिन एरिया को चीन का हिस्सा मान ले बदले में चीन अरुणांचल प्रदेश को भारत का हिस्सा मान लेगा.

प्रधानमंत्री और आर्मी चीफ की भूमिका पर चुप है रिपोर्टः

रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और आर्मी चीफ जनरल वी.एम. थापर की भूमिका के बारे में कोई ज़िक्र नहीं है. हालांकि इस घटना से नेहरू और थापर को काफी झटका लगा. जिस दिन चीन ने युद्ध के समाप्ति की घोषणा की उसके अगले दिन थापर ने 22 नवंबर 1962 को त्यागपत्र दे दिया और इस घटना के दो साल नेहरू की मृत्यु हो गई.

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खैर, अब अगर रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति बनते हैं तो राष्ट्रपति बनने के साथ ही वो तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर भी बन जायेंगे जिससे वो इस रिपोर्ट को मंगवाकर पढ़ भी सकते हैं और सार्वजनिक भी कर सकते हैं.



वीडियो भी देखें- 

https://www.youtube.com/watch?v=pbbI6e9hUXs
https://www.youtube.com/watch?v=QfvdYOzUoQs

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