The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • What propaganda was spread through radio channels during the Rwanda Genocide?

'रेडियो रवांडा' बनाने वाले के साथ अब क्या हुआ?

'रेडियो रवांडा' की पूरी कहानी क्या है?

Advertisement
'रेडियो रवांडा' की पूरी कहानी क्या है?
'रेडियो रवांडा' की पूरी कहानी क्या है?
pic
अभिषेक
30 सितंबर 2022 (Updated: 30 सितंबर 2022, 10:35 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

1990 के दशक की शुरुआत में रवांडा में एक साथ कई ऐतिहासिक भूमिकाएं तैयार हो रहीं थी. मसलन, सत्ताधारी नेशनल रिपब्लिकन मूवमेंट फ़ॉर डेमोक्रेसी एंड डेवलपमेंट (MRND) ने अपना यूथ विंग शुरू किया. इंटराहाम्वे के नाम से. इसका शाब्दिक अर्थ है, साथ मिलकर लड़ने वाले लोग. उसी दौर में कंगूरा नाम से एक मैगज़ीन हुई. ये दो महीने में एक बार छपती थी. जल्दी ही ये आबादी के एक हिस्से के बीच पॉपुलर हो चुकी थी. फिर जुलाई 1993 में एक रेडियो चैनल आया. रेडियो टेलीविजन लिब्र देस मिल कोलिन्स (RTLM). अंग्रेज़ी में इसका मतलब निकलता है, फ़्री रेडियो एंड टेलीविज़न ऑफ़ द लैंड ऑफ़ थाउजेन्ड हिल्स. रवांडा को कई दफा ‘द लैंड ऑफ़ थाउजेन्ड हिल्स’ भी कहा जाता है. नए चैनल को इसी पहचान के साथ जोड़ा गया था.

पहली नज़र में ये घटनाएं विकास का मानक लगतीं है. राजनीति में युवाओं को मौका मिल रहा था. एक पिछड़े देश में मैगज़ीन और रेडियो स्टेशन शुरू हो रहे थे. लोगों को सूचना क्रांति से जोड़ा जा रहा था. लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी था. बेहद स्याह. वो ये कि इन सबके जरिए 20वीं सदी की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक की नींव खोदी जा रही थी. उस घटना को इतिहास में रवांडा जनसंहार के नाम से जाना गया.

इस नींव में ईंट-गारा बनाने वाला शख़्स उस दौर में रवांडा का सबसे अमीर आदमी था. उसका नाम था, फ़ेलिसन कबूगा. उसी ने इंटराहाम्वे, कंगूरा और रेडियो चैनल में पैसा लगाया था. इसके अलावा, उसने एक और चीज पर पैसे लुटाए थे. हथियारों पर. दरअसल, जनसंहार से दो महीने पहले उसने कनाडा की एक कंपनी से सौदा किया था. उसने छह लाख किलो वजन के चाकू, कुल्हाड़ी, खंज़र खरीदे. कैलकुलेशन ये थी कि हर एक घंटे में कम-से-कम तीन हज़ार दुश्मनों की हत्या की जा सके. उसके दुश्मन कौन थे? वे थे तुत्सी. कबूगा हुतू था. रवांडा में हुतू और तुत्सी दशकों से साथ रहते आए थे. उनके बीच थोड़ा बहुत तनाव हमेशा रहता था. लेकिन कबूगा के प्रोपेगैंडा ने उस मनमुटाव को अस्तित्व की लड़ाई में बदल दिया.

कबूगा को अक्सर रवांडा जनसंहार का फ़ाइनेंशर कहा जाता है. वो लाखों बेगुनाह लोगों की हत्या के सबसे बड़े आरोपियों में से एक था. लेकिन न्याय होता, उससे पहले ही वो देश छोड़कर भाग चुका था. देश से निकलते ही वो गायब हो गया. मोस्ट वॉन्टेड होने के बावजूद कबूगा अलग-अलग जगहों पर अपना साम्राज्य चलाता रहा. उसके ऊपर 40 करोड़ रुपये का इनाम रखा गया. दुनिया की कई जांच एजेंसियों ने मिलकर उसका पीछा किया. मगर उसको पकड़ने में 26 साल लग गए. 2020 में जब उसे गिरफ़्तार किया गया, तब तक उसकी उम्र ढल चुकी थी. फिर भी भरोसा ये कि कम से कम अब उसके गुनाहों का हिसाब हो सकेगा.

तो, आज हम जानेंगे,

- फ़ेलिसन कबूगा की पूरी कहानी क्या है?
- रवांडा जनसंहार में उसकी भूमिका क्या थी?
- कबूगा 26 सालों तक कानून की नज़र से कैसे बचता रहा?
- और, आज हम उसकी कहानी क्यों सुना रहे हैं?

पहले रवांडा का भूगोल और इतिहास समझ लेते हैं. ब्रीफ़ में.

भारत से रवांडा पहुंचने के दो रास्ते हैं. समंदर से जाएंगे तो तंज़ानिया को पार करके जाना होगा. इस रास्ते से दूरी पांच हज़ार किलोमीटर के आसपास पड़ेगी. हवाई रास्ते की बात करें तो नई दिल्ली से किगाली के बीच की दूरी लगभग 62 सौ किलोमीटर है.

किगाली रवांडा की राजधानी है. पूरा रवांडा ज़मीन से घिरा हुआ है. उसके पड़ोसी हैं - युगांडा, बुरुण्डी, तंज़ानिया और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो.

साइज़ में ये भारत के मेघालय से थोड़ा बड़ा है.
देश की आबादी लगभग 1 करोड़ तीस लाख है.

तीन मुख्य जातियां हैं - हुतू, तुत्सी और त्वा. इनमें से त्वा को रवांडा का मूलनिवासी कहा जाता है. हुतू और तुत्सी के ओरिजिन को लेकर मतभेद हैं. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि दोनों अलग-अलग जगहों से रवांडा आए थे. कुछ का मानना है कि हुतू और तुत्सी एक ही पेड़ की दो शाखाएं हैं. समयांतर के साथ उनके रहन-सहन और मान्यताएं बदलीं.
रवांडा में 94 प्रतिशत लोग ईसाई धर्म को मानते हैं. दो फीसदी लोग मुस्लिम हैं. तीन प्रतिशत लोग किसी धर्म को नहीं मानते. बाकी एक फीसदी में अलग-अलग धर्मों का मिश्रण है.

अब पोलिटिकल सिस्टम के बारे में जान लेते हैं.

रवांडा की संसद के दो सदन हैं. ऊपरी सदन का नाम सेनेट है. जबकि निचले सदन को चैम्बर ऑफ़ डेप्युटीज़ के नाम से जाना जाता है. निचले सदन के सदस्य सीधे जनता के वोट से चुने जाते हैं. रवांडा दुनिया के उन चुनिंदा तीन देशों में से है, जहां की संसद में महिलाएं बहुमत में हैं. बाकी के दो देश हैं - क्यूबा और बोलीविया.

रवांडा में प्रेसिडेंशियल सिस्टम वाली व्यवस्था है. यानी, राष्ट्रपति ही देश और सरकार, दोनों का मुखिया है. सेना राष्ट्रपति के आदेश पर ही काम करती है. राष्ट्रपति के पास युद्ध शुरू करने, आपातकाल लगाने, प्रधानमंत्री और मंत्रियों को नियुक्त करने जैसी कई शक्तियां हैं. फिलहाल, पॉल कगामी देश के राष्ट्रपति हैं.

रवांडा में राष्ट्रपति का कार्यकाल सात बरस का होता है. 2015 से पहले तक राष्ट्रपति के लिए दो टर्म फ़िक्स था. कगामी पहली बार साल 2000 में राष्ट्रपति बने थे. 2003 के संविधान में लिमिट तय की गई. वो लगातार दो चुनाव जीते. इस लिहाज से उनका कार्यकाल 2017 में खत्म हो जाता. लेकिन उससे पहले ही उन्होंने संसद से नया कानून पास करवा दिया. इसमें तय हुआ कि कगामी तीन कार्यकाल और ले सकते हैं. 2017 के चुनाव में कगामी को लगभग 99 प्रतिशत वोट मिले. 2024 के बाद राष्ट्रपति का कार्यकाल सात से घटाकर पांच बरस कर दिया जाएगा. इस तरह पॉल कगामी 2034 तक रवांडा के राष्ट्रपति बने रह सकते हैं. पश्चिमी देश कगामी को तानाशाह और लोकतंत्र-विरोधी बताकर उनकी आलोचना करते हैं. उनपर चुनावों में धांधली करने और विरोध को दबाने के आरोप भी लगते हैं. इसका एक दूसरा पहलू भी है. कगामी, जनसंहार के बाद ध्वस्त हुए देश को विकास की तरफ़ लेकर गए. इसकी बदौलत रवांडा, अफ़्रीका में सबसे तेज़ी से आगे बढ़ते देशों में गिना जाता है.

ये बहस तो लंबी चलती रहेगी. हम कगामी की तरफ चलते हैं. उनकी कहानी क्या है?

पॉल कगामी अल्पसंख्यक तुत्सी परिवार में पैदा हुए थे. 1957 के साल में. उस समय रवांडा ग़ुलाम था. बेल्जियम के शासन के दौरान तुत्सी कम संख्या में होने के बावजूद प्रभावशाली थे. सरकार से लेकर समाज तक, तुत्सियों का कंट्रोल था. राजा भी तुत्सी समुदाय से था. जर्मनी और बेल्जियम ने राजा को कठपुतली बनाकर शासन किया था. इसलिए, उनकी नीतियां भी तुत्सियों के पक्ष में होतीं थी. इससे हुतू नाराज़ रहते थे. इसी को लेकर नवंबर 1959 में दंगा शुरू हुआ. दंगे के बीच कगामी के घरवाले युगांडा भाग गए. कगामी का शुरुआती जीवन वहीं गुजरा. कुछ समय तक उन्होंने युगांडा की विद्रोही सेना के लिए भी काम किया.

पॉल कगामी 

उधर रवांडा में सत्ता हुतू लोगों के हाथ में आ गई थी. वे तुत्सियों से बदला लेने लगे थे. इससे उनमें गुस्सा पनपा. फिर 1987 में रवांडा पैट्रिऑटिक फ़्रंट (RPF) की स्थापना हुई. इसका मकसद लड़कर अपने लोगों को हक़ दिलाना था. कगामी ने RPF को जॉइन कर लिया. 1990 में फ़्रंट की कमान उनके हाथों में आ गई. 1994 के जनसंहार में RPF ने हुतू हमलावरों का सामना किया. उन्होंने उनके ख़िलाफ़ हमले किए. RPF विजयी साबित हुई. हुतू हमलावर भाग गए. सत्ता RPF के पास आ गई. कगामी पहले उप-राष्ट्रपति और फिर साल 2000 में देश के राष्ट्रपति बने. तब से अब तक उनकी पार्टी और वो सत्ता में बने हुए हैं.

ये तो हुआ रवांडा का इतिहास और भूगोल. अब इंडिया कनेक्शन भी जान लेते हैं.

रवांडा में भारतीय मूल के लोग दशकों से रहते आए हैं. 1962 में रवांडा को आज़ादी मिली. वहां पर बेल्जियम का औपनिवेशिक शासन हुआ करता था. आज़ादी के बाद भारतीयों का दखल व्यापार, मैन्युफ़ेक्चरिंग और आयात-निर्यात तक सीमित रहा. उनका स्थानीय लोगों से अच्छा संबंध था. यही वजह रही कि नरसंहार के दोरान एक भी भारतीय शख़्स को नुकसान नहीं पहुंचाया गया. उन्हें सुरक्षित निकाल लिया गया था. दोनों देशों के बीच डिप्लोमैटिक रिश्ते की शुरुआत 1999 में हुई. भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रवांडा जाने वाले पहले भारतीय पीएम बने. वो जुलाई 2018 में रवांडा गए थे.

अब अपने विषय की तरफ़ लौटते हैं. मोस्ट वॉन्टेड फ़ेलिसन कबूगा की ओर.

कबूगा का बचपन मुफलिसी में गुजर रहा था. उसके पिता खेतिहर किसान थे. लेकिन कबूगा को ये काम पसंद नहीं था. वो बहुत आगे की सोच रहा था. उसकी आंखों के सामने पैसा और पॉवर नाच रहे थे. इसी दौर में उसकी मुलाक़ात एशिया के कुछ व्यापारियों से हुई. उसने उनसे बिजनेस के गुर सीखे और फिर अपनी दुकान शुरू कर दी. उसकी दुकान में हर छोटी-मोटी ज़रूरत की चीज मिलती थी. इस धंधे में उसको मुनाफा मिलने लगा था. उसे लगा कि गांव में रहकर कमाई सीमित रह जाएगी. अब राजधानी चलना चाहिए. यही सोचकर वो किगाली आ गया. यहां किस्मत ने उसका साथ दिया. उसका धंधा लगातार बढ़ता गया. इसी मुनाफ़े से उसने और भी दूसरी चीज़ों में हाथ आजमाया. वो जिस जगह हाथ लगाता, वहां से आमद शुरू हो जाती.

फ़ेलिसन कबूगा

1970 के दशक में रवांडा में जुवेनल हाबेयारिमाना का शासन आ चुका था. जुवेनल हुतू थे. कबूगा ने उनसे हाथ मिला लिया. एक समय था, जब दोनों गांव में साथ बैठकर लोकल शराब पिया करते थे. राष्ट्रपति के साथ कबूगा की दोस्ती चरम पर थी. इससे दोनों को फायदा हो रहा था. कबूगा का बिजनेस बढ़ रहा था. जबकि जुवेनल की पार्टी को फ़ंड मिल रहा था. फिर दोनों ने इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल गई. कबूगा ने अपनी दो बेटियों की शादी राष्ट्रपति के बेटे के साथ की थी. अब रवांडा की सत्ता के केंद्र तक उसकी पहुंच हो थी. मंत्री और विदेशी अफ़सर उससे बिजनेस की सलाहें लिया करते थे.

फिर 1990 का दशक शुरू हुआ. हुतू लोगों पर तुत्सी-बाहुल्य RPF का हमला बढ़ा. कबूगा हुतू था. उसने तुत्सियों को सबक सिखाने का फ़ैसला किया. वो उन्हें रवांडा से हमेशा के लिए मिटाना चाहता था. ये काम एक झटके में संभव नहीं था. ये एक सिस्टम के तहत किया जाना था. तब कबूगा ने हिटलर वाला रास्ता चुना. जैसा कि हिटलर ने जर्मनी में किया था. उसने यहूदियों को अछूत साबित कर दिया. उसने लोगों के मन में ये भर दिया कि यहूदी रहेंगे तो जर्मनी का सर्वनाश हो जाएगा. जर्मनी की सारी समस्याओं का भार उनके ऊपर थोप दिया गया. फिर एक दिन ऐसा आया कि एक आम जर्मन नागरिक भी अपने यहूदी पड़ोसी के ख़िलाफ़ हो गया. उसने यहूदी दुकानदार से सामान लेना बंद कर दिया. उनसे बात करने में कोफ़्त होने लगी. वो उन्हें अपना दुश्मन मानने लगा. नतीजतन, जब गैस चैंबर्स में लाखों यहूदियों को मारा गया, तब जर्मन नागरिक उसे सही ठहराते रहे. जो थोड़े कम कट्टर थे, उन्होंने होलोकॉस्ट को मानने से इनकार कर दिया था.

कबूगा यही काम रवांडा में करना चाहता था. इसका पहला चरण प्रोपेगैंडा था. इसके लिए उसे अख़बार और रेडियो की ज़रूरत थी. ताकि उसका मेसेज लोगों तक पहुंचता रहे. इसके लिए उसने कंगूरा मैगज़ीन और रेडियो ऑफ़ द थाउजेन्ड हिल्स में निवेश किया.
कंगूरा में लगातार लोगों को उकसाया गया. हुतू लोगों से कहा जाता कि वे तुत्सियों से हर तरह का रिश्ता तोड़ दें. ये मैगज़ीन उस रवांडा की तस्वीर लोगों के मन में भर रही थी, जहां कथित शुद्ध नस्ल के लोग रहें. इस समाज में तुत्सियों के लिए कोई जगह नहीं थी. उन्हें अशुद्ध बताया जाता था. ये सोच धीरे-धीरे विकसित होती चली गई. रवांडा की हुतू आबादी का बड़ा हिस्सा इसे सच मानने लगा. जो हुतू इस प्रोपेगैंडा को समझते थे और उसका विरोध करते थे, उन्हें भी दुश्मन बताया जाने लगा.

मैगज़ीन दो महीने में एक बार आती थी. कबूगा को लगा कि इससे प्रोपेगैंडा ज़्यादा समय तक नहीं ठहर पाएगा. उसने रेडियो को हथियार बनाने का फ़ैसला किया. फिर RTLM शुरू हुआ. इसके लिए सबसे ज़्यादा पैसा कबूगा ने ही दिया था. इस चैनल से लगातार तुत्सियों के ख़िलाफ़ भड़काऊ ख़बरें फैलाईं जाने लगीं. ऐसी-ऐसी बातें, जिन्हें कोई भी सभ्य और उदार समाज स्वीकार नहीं कर सकता था. लेकिन वो रवांडा था. सरकार प्रोपेगैंडा फैलाने वालों से मिली हुई थी. उसने लगभग अनसुना कर दिया. मगर एक शख़्स था, जिसने चुप रहना स्वीकार नहीं किया. वो थे, सूचना मंत्री फ़ॉस्टिन रुकोगोज़ा. उन्होंने कबूगा के चैनल को बंद करने की चेतावनी दी. रुकोगोज़ा को जनसंहार के पहले ही दिन गिरफ़्तार किया गया. फिर उनकी हत्या कर दी गई.

कबूगा का रेडियो चैनल कितना ख़तरनाक था? इसके लिए आपको कुछ पंक्तियां सुनाता हूं.
नंबर एक.

“कोई भी तुत्सी, कबूगा जितना अमीर नहीं है. इसलिए, कुछ भी बोलना बंद कर दो. मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूं. तुम सब मारे जाओगे. आइए, हम सब मिलकर तुत्सियों को जड़ से मिटाने की शपथ लें. ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों को कभी ‘तुत्सी’ शब्द का सामना ना करना पड़े.”

नंबर दो.

“तिलचट्टे विरोध करते हैं. वे घिन पैदा करते हैं, क्योंकि हमें उन्हें बार-बार मारना पड़ता है. हमे उन्हें कुचलना पड़ता है, क्योंकि उन्हें हमेशा के लिए खत्म करना नामुमकिन है.”

नंबर तीन.

“तुत्सियों के बच्चे भी तुम्हारे दुश्मन हैं. बड़े होकर वे तुम्हारा ही ख़ून पिएंगे.”

ये बातें एक पब्लिक रेडियो चैनल से ऑन एयर होतीं थी. कबूगा हमेशा RTLM के दफ़्तर में दिखता था. वो तय करता था कि क्या बोलना है और क्या नहीं.

इस प्रोपेगैंडा का असर धरातल पर दिखने लगा था. आम हुतू और तुत्सी नागरिक एक-दूसरे को नफ़रत की नज़र से देख रहे थे. कहीं-कहीं पर छिटपुट झड़प की ख़बरें भी आने लगीं थी. तब कबूगा ने पांच लाख खंजर और दूसरे हथियारों का ऑर्डर दिया. इन हथियारों को उसने अपने घर पर छिपाया. फिर उसी ने इंटराहाम्वे के लड़ाकों की ट्रेनिंग करवाई. इसके बाद वो चुपचाप बैठकर मौके का इंतज़ार करने लगा.

उसे ये मौका मिला, अप्रैल 1994 में. छह तारीख़ को राष्ट्रपति हाबेयारिमाना के प्लेन पर हमला हुआ. इसमें उनकी मौत हो गई. रेडियो स्टेशनों से प्रचार किया गया कि ये हमला RPF ने कराया है. इस हत्या के लिए तुत्सी ज़िम्मेदार हैं. हथियार बांटे गए. पुलिस और सेना ने हिंसा फैलाने वालों को खुला छोड़ दिया गया. अगले सौ दिनों में दस लाख से अधिक लोगों की हत्या हुई. इनमें से आठ लाख से अधिक तुत्सी थे.

RPF की जीत के बाद जनसंहार खत्म हुआ. इसके बाद हुतू नेता और हमलावर रवांडा छोड़कर भागने लगे. इनमें से एक फ़ेलिसन कबूगा भी था. उसने अपने घरवालों को पहले ही यूरोप भेज दिया था. कबूगा स्विट्जरलैंड पहुंचा. लेकिन उसे वहां से निकलना पड़ा. वो केन्या आ गया. 1997 में इंटरनैशनल क्रिमिनल ट्रायब्यूनल फ़ॉर रवांडा (ICTR) ने उसके ऊपर आरोप तय किए. फिर केन्या सरकार पर दबाव पड़ा, तब कबूगा को अरेस्ट किया गया. लेकिन फिर उसे जल्दी ही छोड़ भी दिया गया. उसको रिहा करने वाले पुलिस अफ़सर ने कहा था कि ऊपर से ऑर्डर आया था.

इसी ऊपर के ऑर्डर की बदौलत उसने केन्या में अपना बिजनेस एम्पायर फैलाता रहा. जब केन्या में सरकार बदली, तब वो जर्मनी चला गया. अमेरिका ने उसकी पहचान बताने वाले के लिए 40 करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया. इंटरपोल ने उसके ख़िलाफ़ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया. अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस समेत कई देशों की एजेंसियां उसके पीछे लगी रहीं. इसके बावजूद वो 26 बरस तक अलग-अलग नाम और पहचान के साथ छिपने में कामयाब रहा.

मई 2020 में पूरी दुनिया में कोविड लॉकडाउन लगा था. कबूगा के लिए कहीं बाहर आना-जाना मुश्किल  हो चुका था. उसी दौरान फ़्रेंच पुलिस को उसके बारे में टिप मिली. छापेमारी हुई और वहां कबूगा पकड़ा गया. उस समय वो पेरिस में एंटोनियो टोंगा के नाम से रह रहा था. पुलिस की पूछताछ में उसने अपनी असली पहचान कबूल ली.

फ़्रांस से उसको प्रत्यर्पित कर हेग लाया गया. उसने फ़्रांस की कोर्ट में कभी अपना अपराध नहीं कबूला. उसने बार-बार ये कहा कि उसे झूठे केस में फंसाया जा रहा है.
आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं?
दरअसल, गिरफ़्तारी के दो बरस बाद फ़ेलिसन कबूगा के केस की सुनवाई शुरू हो गई है. 29 सितंबर को हेग में ट्रायल का पहला दिन था. इसमें कबूगा ने आने से मना कर दिया. वो वीडियो लिंक से भी नहीं जुड़ा. हालांकि, जजों ने कहा है कि इसके बावजूद मुकदमा जारी रहेगा.

कबूगा पर जनसंहार, मानवता के ख़िलाफ़ अपराध, अपने रेडियो चैनल के ज़रिए नफ़रत फैलाने और हुतू लड़ाकों को हथियार देने के आरोप लगाए गए हैं.
यूएन के वकील राशिद रशीद ने मुकदमे की शुरुआत में कहा,

‘जनसंहार के लिए कबूगा को ख़ुद से राइफ़ल या खंज़र उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ी. इसकी बजाय उसने थोकभाव में हथियारों की सप्लाई की और इंटराहाम्वे को प्रशिक्षण दिया. उसने अपने मन का अपराध प्रोपेगैंडा से अभिभूत हुतू लड़ाकों से कराया.'

कबूगा को माइक लेकर जनसंहार की अपील करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी. उसने ये काम एक प्रोपेगैंडा वाला रेडियो स्टेशन बनाकर कर दिया था.”

फ़ेलिसन कबूगा की उम्र लगभग 90 साल की है. बहुत संभावना है कि उसके जीवनकाल में कोर्ट का फ़ैसला ना आए. एक पंक्ति ध्यान आती है, Innocent until proven guilty. दोषी साबित होने तक आरोपी बेगुनाह होता है. ये पंक्ति कबूगा पर भी लागू होगी. लेकिन इतना तो तय है कि उसका मुकदमा नफ़रत और प्रोपेगैंडा का कारोबार कर रहे राजनेताओं और कथित पत्रकारों के लिए एक ज़रूरी सबक साबित होगा. देखने वाली बात होगी, इस सबक से सीखता कौन है?

एस जयशंकर ने अमेरिका दौरे में क्या कमाल किया?

Advertisement

Advertisement

()