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इस शीतकालीन सत्र में सरकार और विपक्ष ने किन मुद्दों पर गंभीरता से बात की?

अजय मिश्रा पर ससंद में क्या कहा गया?

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22 दिसंबर 2021 (अपडेटेड: 22 दिसंबर 2021, 06:13 PM IST)
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अजय मिश्रा पर ससंद में क्या कहा गया?
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2021 के लिए संसद का आखिरी सत्र आज खत्म हो गया. तो आज शीत सत्र के मूल्यांकन का दिन है. ये समझने का दिन, कि आपके पैसे से, और आपके भरोसे पर चलने वाली संसद ने कैसा काम किया? मोदी सरकार दावा कर रही है कि उसने दोनों सदनों से 11 बिल पास करवा दिए. इसीलिए इस सत्र को सफल माना जाए. वहीं विपक्ष शिकायत कर रहा है कि उसे बोलने का मौका ही नहीं दिया गया. ये दोनों तरफ के नेताओं के दावे हैं. अब इन दोनों में से किसे सही माना जाए? आप फैसला कर सकें, इसीलिए दी लल्लनटॉप ने शीत सत्र की कुछ झलकियों का संकलन किया है. जो आपको बताएंगी कि इस सत्र में कार्यवाही के नाम पर क्या हुआ और क्या होने नहीं दिया गया. सत्र से पहले जो कैलेंडर प्रेस को मिला था, उसके मुताबिक संसद को 29 नवंबर से लेकर 23 दिसंबर तक काम करना था. एक दिन बाकी होने के बावजूद दोनों सदन 22 दिसंबर को ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिए गए. आइए पहले दिन से संसद की कार्यवाही पर गौर करें. सबसे बड़ा धमाका तो सत्र के पहले दिन ही हो गया था. राज्यसभा के सभापति वैंकैया नायडू ने कहा कि वो मॉनसून सत्र के आखिरी रोज़ सदन में हुए बलवे से व्यथित हैं. नायडू ने कहा कि उम्मीद कर रहे थे कि सदन के वरिष्ठ सदस्य इस घटना पर खेद प्रकट करेंगे और फिर उस घटना का दोहराव टालने के लिए कदम उठाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यहीं से लग गया था कि मॉनसून सत्र के आखिरी रोज़ विपक्षी सांसदों का बलवा भुलाया नहीं गया है. इसके बाद सदन में इन सांसदों के निलंबन के लिए एक प्रस्ताव आया, जो कि पास भी हो गया. यहां सदन के प्रस्ताव को आप सरकार का प्रस्ताव भी पढ़ सकते हैं. क्योंकि सबसे ज़्यादा सांसद राज्यसभा में सरकार के पास ही हैं. यहां एक बिंदु पर गौर किया जाना ज़रूरी है. सदन की गरिमा बनी रहे, इसमें कोई संदेह नहीं. इसीलिए बलवे में शामिल लोगों पर कार्रवाई तो होनी ही चाहिए थी. खासकर तब, जब सभापति कह रहे थे कि सांसद उनकी उम्मीद पर खरे नहीं उतरे. लेकिन क्या पिछले सत्र के लिए इस सत्र में पूरे वक्त के लिए 12 सांसदों को निलंबित करना न्यायोचित है? इसका फैसला दर्शक करें. फिर हमारे सामने आरोपों की वो सूचि आती है, जिनके लिए 12 सांसदों को निलंबित किया गया. ये सारे आरोप सही जान पड़ते हैं. और इन्हीं आरोपों में से एक था - सदन की कार्यवाही का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालना. अब सवाल ये उठता है कि अगर सदन की कार्यवाही का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालना वाकई गलत है, तो फिर मॉनसून सत्र के आखिरी दिन की सिक्योरिटी फुटेज प्रेस को लीक कैसे हो गई. लीक किसने की, और इसके लिए किसे सज़ा हुई? सदन की कार्यवाही से बाहर के वीडियो अमूमन प्रेस नहीं चलाती है. चलाती है तो इन्हें हटवाया जाता है. लेकिन इस फुटेज को समाचार चैनलों से हटाने के लिए राज्यसभा सचिवालय ने क्या प्रयास किये, हमें ज्ञात नहीं है. इस सवाल के बाद अब निलंबन पर विपक्ष के रवैये की समीक्षा करते हैं. सरकार लगातार कहती रही कि निलंबित सांसद खेद प्रकट करें और अपने किये के लिए माफी मांग लें, तो सरकार निलंबन वापस करवा लेगी. संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इसपर कहा -
हम भी यही कह रहे हैं कि सुरक्षाकर्मियों पर हमला करने के लिए माफ़ी मांगिए. उनके पास मुद्दा नहीं है. ना ही वह महंगाई पर बात करते.
पटेल और सरकार के दीगर मंत्रियों ने ये बयान दसियों बार दिया. यहीं से गेंद विपक्ष के पाले में चली गई थी. अगर खुद को जनता की आवाज़ कहने वाले विपक्ष ने पिछले सात सालों से ज़रा भी सीख ली थी, तो उसे तुरंत समझ जाना चाहिए था कि बिन माफी मांगे वो निलंबन वापिस लेने के लिए दबाव बना नहीं पाएगा. और आखिर में वही हुआ भी. जो बात एक संक्षिप्त माफी से खत्म हो जाती, उसे विपक्ष ने अहम का मुद्दा बनाकर इतना खींचा, वॉकआउट किए, शोर मचाया. लेकिन हासिल क्या हुआ? निलंबन बना रहा. सदन के अंदर विपक्ष का संख्याबल कमज़ोर हुआ और सरकार की राह और आसान. राजनीति में कभी-कभी आगे जाने के लिए एक कदम पीछे खींचना पड़ता है. इतनी साधारण सी बात की अनदेखी करके विपक्ष ने न सिर्फ अपना, बल्कि जनता का भी नुकसान किया. प्रेस के कैमरों के सामने उसने जनता के मुद्दे उठाने का जो वादा किया था, उसपर वो खरा नहीं उतरा. निलंबन के बाद राज्यसभा में एक दिन ऐसा नहीं बीता, जब इस बात पर हंगामा न हुआ हो. और सदन हंगामें के चलते स्थगित नहीं हुआ हो. विपक्ष की कोशिश रहती कि सदन में नंबर चाहे जिस विषय का आए, वो बस वही बात बोले, जो बोलने आया है. कभी कभी तो हमें अपने दर्शकों से ये तक कहना पड़ा कि हम आपको बताएं क्या? क्योंकि बताने लायक तो संसद में कुछ हुआ ही नहीं. कमोबेश यही सब लोकसभा में हुआ. लेकिन लोकसभा राज्यसभा की तुलना में ज़्यादा चली. सत्र के पहले दिन का हासिल बस ये रहा कि सरकार ने अपने वादे के मुताबिक तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए एक विधेयक दोनों सदनों से पास करवा लिया. लेकिन ठीक उसी तरह, जैसे ये कानून पिछले साल पास कराए गए थे - बिना चर्चा. सत्र के दूसरे दिन माने 30 नवंबर को दोनों सदनों में काम नहीं हो पाया. लोकसभा सिर्फ 25 मिनट चली. कमोबेश यही हाल राज्यसभा का रहा. बस एक चीज़ नोटिस की गई. कि विपक्ष निलंबन के लिए जो बैठकें और वॉकआउट कर रहा था, तृणमूल कांग्रेस उसमें शामिल नहीं हुई. मॉनसून सत्र की ही तरह, शीत सत्र में भी तृणमूल ने कांग्रेस की जगह खुद को प्रमुख विपक्षी दल की तरह स्थापित करने की कोशिश की. और इन कोशिशों ने ध्यान भी खींचा. इसके बाद आया 1 दिसंबर का दिन. मॉनसून सत्र में जिस सरकार ने ये कहा था कि उसके पास ऑक्सीजन की कमी से मरने वाले कोरोना पेशेंट्स की जानकारी नहीं है. उसने शीत सत्र में ये कह दिया कि उसे नहीं मालूम कि किसान आंदोलन के दौरान कितने किसानों की जान गई है. सरकार ने बस इतना बताया कि पुलिस कार्रवाई में किसी किसान की जान नहीं गई. इसी तरह 3 दिसंबर को सरकार ने ये भी कह दिया कि ऑक्सीजन से कमी की मौत के मामले में पंजाब सरकार से जानकारी मिली है. आंकड़ा है - 04. ऑक्सीजन की कमी और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर सरकार सदन में खड़े होकर जो कह पा रही है, उससे आपको उसके दुस्साहस का अंदाज़ा भी लग सकता है. और उस भरोसा का भी, जो वो आपकी माने, नागरिकों की बुद्धि पर करती है. ऐसी ही कई और चौंकाने वाले जवाब सरकार पूरे सत्र के दौरान देती रही. खासतौर पर लिखित सवालों के जवाब में. मिसाल के लिए गृह मंत्रालय ने ये बताया कि राष्ट्रव्यापी एनआरसी पर फैसला नहीं हुआ है. ये भी बताया कि अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद कश्मीर में किसी बाहरी व्यक्ति ने भूमि नहीं खरीदी है. ये भी बताया कि महाराष्ट्र से अलग विदर्भ राज्य बनाने पर भी कोई विचार नहीं हो रहा है. ऐसा ही एक जवाब गृह मंत्रालय ने 21 दिसंबर को भी दिया. लोकसभा में असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल किया कि संविधान में ''एंटी नेशनल'' की परिभाषा क्या दी गई है. मंत्री जी कह रहे हैं कि एंटी नेशनल शब्द की कोई परिभाषा संविधान में है ही नहीं. देश की एकता और अखंडता के खिलाफ काम करने वालों पर कार्रवाई के लिए दूसरे प्रावधान हैं. अब इस जवाब की तुलना उस फ्रीक्वेंसी से कीजिए, जिसपर सरकार एंटी नेशनल और राष्ट्रविरोधी के टैग का इस्तेमाल करती रहती है. सरकार और विपक्ष के बीच सवाल जवाब का एक दिलचस्प वाकया फिर एक बार 21 दिसंबर को ही लोकसभा में घटा. ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह से रोज़गार पर सवाल किया गया. सवाल करने वाले भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी. मतलब दोनों एक ही टीम के खिलाड़ी. लेकिन सवाल जवाब हुआ तो आमने सामने हो गए लेकिन इस तरह की चर्चा और सवाल जवाब, जिसके लिए संसद की स्थापना हुई थी, इस बार कम ही देखने को मिले. इस बार संसद के दोनों सदन, संसद के बाहर की घटनाओं से बहुत प्रभावित हुए. कुछ मिसालों पर गौर कीजिए 4 दिसंबर को नागालैंड के मोन ज़िले में सेना के ऑपरेशन में कुल 13 लोगों की जान चली गई. एक सैनिक भी वीरगति को प्राप्त हुआ. दिक्कत ये थी, कि ये लोग उग्रवादी नहीं थे, आम नागरिक थे. नागा शांति समझौता अब बस होने ही वाला था. लेकिन इस घटना ने उसपर सवालिया निशान लगा दिए. मौके की नज़ाकत को देखते हुए गृहमंत्री ने संसद में बयान दिया –
भारतीय सेना को नागालैंड के मोन ज़िले में तिरु गांव के पास उग्रवादियों की आवाजाही की सूचना मिली थी. इसके आधार पर सेना के 21 पैरा कमांडो के एक दस्ते ने संदिग्ध क्षेत्र में ऐमबुश लगाया था. उसी दौरान एक वाहन आया जिसके बाद सेना को उसमें विद्रोहियों के जाने की शंका हुई, इसलिए वाहन पर गोलियां चलाई गई.
अमित शाह बतौर देश के गृहमंत्री सदन में खड़े होकर जो कह रहे थे, उसे ही सरकार का आधिकारिक रुख माना जाएगा. इसीलिए ये बहुत चिंताजनक था कि गृहमंत्री के बयान और घटनास्थल से आ रही रिपोर्ट्स में ज़मीन आसमान का फर्क था. खासकर पहली गोली चलने को लेकर. 9 दिसंबर को अधीररंजन चौधरी ने अमित शाह के बयान पर आपत्तियां लीं. अगर विपक्ष की आपत्ति को एक तरफ रख भी दें, तब भी हमारे सामने 20 दिसंबर को नागलैंड विधानसभा में पारित प्रस्ताव आ ही जाता है. इस दिन विधानसभा ने अपने विशेष सत्र के बाद पांच बिंदुओं का प्रस्ताव अपनाया. इस प्रस्ताव में AFSPA वापस लिए जाने की मांग के साथ एक appropriate authority से माफी की मांग नत्थी थी. अब यहां ये सवाल लाज़मी है कि देश के गृहमंत्री के सदन में बयान के बाद भी देश की ही एक विधानसभा ये क्यों कह रही है कि वो माफी मांगे जाने के इंतज़ार में है. क्या गृहमंत्री का बयान पूरा नहीं था? या वो उन लोगों को पूरा नहीं लगा, जिनके लिए वो दिया जा रहा था? सरकार को इस सवाल का जवाब खोजना चाहिए. मोन कांड के बाद दूसरी बड़ी घटना जिसकी छाप शीत सत्र पर देखी गई, वो थी CDS बिपिन रावत समेत 13 लोगों की एक हेलिकॉप्टर क्रैश में मृत्यु. 8 दिसंबर को जैसे ही कुन्नूर में हेलिकॉप्टर क्रैश की खबर आई. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह हरकत में दिखे. अपनी तय बैठकों और संसद की कार्यवाही को छोड़ सीधे साउथ ब्लॉक चले गए. ये देश के लिए दुख की घड़ी थी. तो 8 और 9 दिसंबर को विपक्ष ने अपने तेवर कुछ नर्म किए. हो हल्ला नहीं हुआ. लेकिन 9 दिसंबर को जब राज्यसभा में CDS को श्रद्धांजली के बाद कार्यवाही शुरू होने को थी, तो विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने मांग कर दी कि सभी को श्रद्धांजली के लिए 2-2 मिनिट दिए जाएं. जब सभापति ने इसकी अनुमति नहीं दी, तो विपक्षी सांसद सदन से बाहर चले गए और गांधी प्रतिमा पर श्रद्धांजली दी. हम अपनी तरफ से ये कहना चाहेंगे कि कम से कम इस दिन विपक्ष इस ज़िद को छोड़ देता. तो हम दुख की घड़ी में देश को साथ खड़ा देखते. तीसरी घटना जिसने शीत सत्र को प्रभावित किया, वो थी लखीमपुर खीरी मामले पर UP एसआईटी का न्यायालय को दिया गया एक आवेदन. इसमें लिखा गया था कि लखीमपुर खीरी में 4 किसानों और एक पत्रकार पर गाड़ी एक सोची समझी साज़िश के तहत चढ़ाई गई थी. और मकसद जान से मारना था. इस मामले में मुख्य आरोपी है आशीष मिश्रा उर्फ मोनू मिश्रा. ये केंद्रीय गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का बेटा है. इस बात पर विपक्ष ने कम से कम तीन दिन लगातार संसद के दोनों सदनों में हंगामा किया. चर्चा की मांग की विपक्ष लगातार स्थगन प्रस्ताव देता रहा, लेकिन वो मंज़ूर नहीं हुआ. सरकार का जवाब बस एक लाइन का - चर्चा नहीं हो सकती, क्योंकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है. इसी तरह एक और घटना से संसद में हंगामा हो सकता था. लेकिन वो होता, उससे पहले ही सदन स्थगित हो गया. उसपर हम तब आएंगे, जब 22 दिसंबर की कार्यवाही के बारे में बात करेंगे. अब आते हैं उन बयानों पर, जिनकी चर्चा सदन के अंदर और सदन के बाहर खूब हुई. सबसे पहला नंबर सरकार का. सरकार के मंत्री जी का. सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने 15 दिसंबर को कह दिया कि तीन साल में भारत की सड़कें अमरीका माफिक हो जाएंगी. उन्होंने कहा -
हिन्दुतान के बैंकों को हमने 3 लाख करोड़ के NPA से बचाया. सदन को बताते हुए मुझे खुशी हो रही है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा रोड का निर्माण हमारे देश में हो रहा है.
नितिन गडकरी का इतना कहना था कि इंटरनेट के मीमबाज़ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का ये बयान खोद लाए जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य प्रदेश की सड़कें अमेरिका की सड़कों से बेहतर हैं. चर्चा में 20 दिसंबर के रोज़ जया बच्चन का शाप भी था. आप भी सुन लीजिए कि उन्हें शाप देने की ज़रूरत क्यों पड़ी? जया बच्चन ने कहा
हमारे पास अभी इतने बड़े मुद्दों पर चर्चा करना बाकी है. लेकिन हमने समय बर्बाद कर दिया. आप लोग बीन किसके आगे बजा रहे हैं? आपके बुरे दिन बहुत जल्द आने वाले हैं
हल्की फुल्की टिप्पणियों के बाद अब एक गंभीर बयान पर आते हैं. ये हमने सुना 21 दिसंबर को. राज्यसभा में केरल से सांसद जॉन ब्रिटास ने न्यायपालिका में हो रही नियुक्तियों को लेकर सुनिए कहा क्या दुनिया में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कोई व्यवस्था है जो पूरी तरह से रहस्य, अंधेरे में डूबी हुई है? केवल भारत में है. इसपर कानून मंत्री इस प्रणाली के मूक दर्शक बने हुए हैं. इस प्रणाली के बारे में उनका कोई दृष्टिकोण नहीं है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बिगाड़ रहा है. सांसदों के बयानों के बाद अब एक मज़ेदार टिप्पणी लोकसभा स्पीकर की तरफ से भी आई. उन्होंने हंगामे के बीच किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए कह दिया कि भैया टूट फूट की जवाबदेही आपकी होगी. इन्हीं सारे पड़ावों से होते हुए हम पहुंचे 22 दिसंबर के दिन तक. आज संसद के शीतकालीन सत्र का 18वां दिन था. वैसे तो आज संसद के एजेंडे में बहुत-सी चर्चाएं और सवाल-जवाब होने थे. लेकिन लोकसभा और राज्यसभा में कामकाज कायदे से शुरू भी नहीं हो सका. लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला ने अबतक शीतकालीन सत्र में जो-जो हुआ उसके बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने बताया कि इस सत्र के दौरान 18 बैठकें हुईं, सदन में 82 प्रतिशत कामकाज हुआ. और हंगामे की वजह से 18 घंटे, 48 मिनट बर्बाद भी हुए. स्पीकर ने अपने सम्बोधन में आगे बताया कि दो दिसंबर को 204 फीसदी का रिकॉर्ड काम हुआ आइए, आपको दिखाएं कि लोकसभा स्पीकर ने इस मौके पर और क्या-क्या कहा- 91 सवालों की मौखिक उत्तर दिए गए. 20 दिसंबर को 20 सवालों की सूची को कवर किया गया. 344 लोक़हित के विषय संसद के समक्ष किए गये. लोकसभा के बाद, आपको राज्यसभा का हाल बताते हैं. कार्यवाही सुबह 11 बजे शुरू हुई. कार्यवाही शुरू होते ही राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण संबंधी उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद नेताओं और अधिकारियों द्वारा वहां जमीन की खरीददारी का मुद्दा उठाने की कोशिश की. लेकिन सभापति एम वेंकैया नायडू ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी. खड़गे बोलने के लिए खड़े हुए तो सभापति ने उनसे पूछा कि आप कौन सा मुद्दा उठाना चाह रहे हैं? सभापति के ये पूछने पर मल्लिकार्जुन खड़गे ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस उठाकर बोलना शुरू किया. तो नायडू ने उन्हें टोका और पूछा कि पहले आप मुद्दा बताएं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "आपने आज के इंडियन एक्सप्रेस में देखा होगा जिसमें एक रिपोर्ट छपी है कि विधायकों, महापौर, आयुक्त के संबंधी, एसडीएम, डीआईजी और अधिकारियों ने जमीन खरीदें...’’ नायडू ने कहा कि वह अखबार ना पढ़ें. उन्होंने कहा कि किसी भी मामले को उठाने के लिए नोटिस देना पड़ता है. इस बातचीत के बाद सभापति ने एक छोटा-सा सम्बोधन दिया, बंदे मातरम का धुन बजाया गया और राज्यसभा की कार्यवाही भी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई. तो आपने देखा कि आपकी किस्मत तय करने वाली देश की संसद में इस शीत सत्र में क्या क्या हुआ. इस कार्यवाही से आप कितने संतुष्ट हैं, अब ये आपको तय करना है.

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