स्कूल के दिनों में हम में से कइयों ने एक निबंध लिखा और पढ़ा है, ‛विज्ञान वरदान याअभिशाप’. कोरोना महामारी के इस न्यू नॉर्मल दौर में इस शीर्षक को बदल कर‛टेलीमेडिसिन’ कर देते हैं. क्योंकि रहन-सहन, नौकरी, दफ्तर और पढ़ाई के साथ यह हेल्थकेयर सिस्टम में भी परिवर्तन का दौर है. कोविड-19 महामारी के दौरान इस एक शब्द कीकाफी चर्चा हुई है- टेलीमेडिसिन. तो टेलीमेडिसिन क्या है, बदलते हेल्थकेयर सिस्टममें इसकी भूमिका कितनी प्रभावी है, आइए समझते हैं. साथ ही इसके नफ़ा नफा-नुकसान कोभी टटोलते हैं. पहले बात टेलीहेल्थ की? टेलीमेडिसिन पर बात करने से पहले टेलीहेल्थके बारे में जान लेते हैं, क्योंकि ‛टेलीमेडिसिन’ और ‛टेलीहेल्थ’ अक्सर एक दूसरे कीजगह इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन दोनों में अंतर है. हम समझाते हैं. ऐसे समझिए कि‛टेलीहेल्थ’ एक पेड़ है जिसकी कई शाखाएं हैं. टेलीमेडिसिन उसी एक शाखा का नाम है.टेलीहेल्थ माने सम्पूर्ण प्रणाली. उसी का एक पार्ट है टेलीमेडिसिन. ‛टेलीहेल्थ’ कीव्यापक परिभाषा में क्लिनिकल सेवाओं के अलावा रिमोट एरियाज़ में नॉन-क्लिनिकल सेवाएंभी समाहित हैं. मसलन, प्रोवाइडर की ट्रेनिंग, प्रशासनिक बैठक और मेडिकल एजुकेशनउपलब्ध कराना. विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिखित ब्यौरे के अनुसार टेलीहेल्थसर्विलांस, हेल्थकेयर प्रमोशन और पब्लिक हेल्थ केयर मॉडल को टेलीकम्युनिकेशन केजरिये दुरुस्त रखने के सिस्टम का नाम है. अब बात टेलीमेडिसिन की ‛टेलीमेडिसिन’ग्रीक शब्द ‛टेली’ और लैटिन शब्द ‛मेडेरी’ से मिल कर बना है. टेली का अर्थ ‘दूरी’और ‛मेडेरी’ का अर्थ है हीलिंग. माने दूरदराज में रह रहे रोगियों और चिकित्सकों केबीच की दूरी को पाट कर उन तक स्वास्थ्य सुविधाओं को वर्चुअली सुलभ बनाना. इसव्यवस्था में स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याएं होने पर मरीज डॉक्टर के सामने फिजिकलीअपीयर होने के बजाय वीडियो कॉल, फोन कॉल, चैटिंग और ईमेल के जरिये सलाह लेता है.टाइम मैगजीन ने इसे ‛हीलिंग बाई वायर’ (healing by wire) का नाम दिया है. तो आधीबात तो यहीं समझ गए होंगे. अब थोड़ा इसका इतिहास जान लेते हैं. वैसे तो टेलीमेडिसिनका उदय इंटरनेट के दौर से पहले हो गया था, लेकिन इस विधा को असल विस्तार इंटरनेटयुग में ही मिला. इसने रोगियों को घर बैठे स्वास्थ्य सेवा देने की तमाम सम्भावनाओंको खोल दिया और टेलीमेडिसिन की विधा में कई परिवर्तन भी किए. टेलीमेडिसिन को शुरूकिया था अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA ने. 1960 के दशक में स्पेस में जाने वाले अपनेअंतरिक्ष यात्रियों और स्पेसक्रॉफ्ट के हेल्थ का हाल-चाल जानने के लिए. बाद मेंग्रामीण इलाकों में इसे उपयोगी बनाने के लिए 1971 में नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिनद्वारा अलास्का के 26 गांवों में इसे टेस्ट किया गया. उसके बाद NASA ने बकायदाकम्प्यूटर, इंटरनेट समेत तमाम तकनीकी सुविधाओं के साथ 1989 में आर्मेनिया केयेरेवान शहर में एक टेलीमेडिसिन सेंटर को ऑफिशियली स्थापित किया. वहीं भारत मेंइसकी शुरूआत अपनी स्पेस एजेंसी इसरो ने 2001 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर की.प्रोजेक्ट की सफलता के बाद भारत सरकार ने 2005 में राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन टास्कफोर्स का गठन किया और इससे संबंधित गाइडलाइंस भी जारी कीं. कोरोना वायरस से महामारीफैलने के दौरान टेलिकन्सल्टेशन की बढ़ती मांग को देखते हुए 25 मार्च 2020 को केंद्रसरकार ने टेलीमेडिसिन की गाइडलाइंस में कई बदलाव किए और टेलीमेडिसिन का एकव्यवस्थित रोडमैप तैयार कर रोगियों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरीप्रोटोकॉल तय किया. फायदे COVID-19 महामारी के दौरान टेलीमेडिसिन को सामाजिक दूरीके साथ प्रभावी उपचार देने वाला सबसे सुरक्षित संवाद प्रणाली माना गया. अस्पताल केचक्कर काटने में पूरा दिन खर्च कर देने की तुलना में यह टाइम फ्लेक्सिबल है. साथ हीअस्पताल आने-जाने के खर्चों को कम करने और वहां के बीमारू संक्रामक माहौल से लेकरमानसिक रूप से बीमार करने वाली हेल्थ गॉसिपिंग से भी दूर रखता है. जो मरीज अस्पतालजाने में असहज महसूस करते हैं, उनके लिए यह प्रणाली रामबाण साबित हुई. कुछ विशेषआपातकालीन स्थितियों में भी टेलीमेडिसिन मददगार साबित हुई और डिजिटल निगरानी सेमरीज के स्वास्थ्य देखभाल की लागत भी कम हुई है. लॉकडाउन में घरों में कैद रहने केकारण लोगों में डिप्रेशन के मामले बढ़े हैं. उन मरीज़ों के लिए टेली काउंसलिंग खूबकारगर साबित हुई है. कोरोना महामारी के दौर में जब अधिकांश अस्पताल मरीजों से ठसाठसभरे हुए थे, तब लाखों लोग टेलीमेडिसिन के सहारे स्वस्थ हुए. कुलमिलाकर टेलीमेडिसिनने दुनियाभर के डॉक्टरों और मरीज़ों के बीच के ट्रैवल डिस्टेंस को समाप्त कर इलाज केनए अवसर खोले. चुनौतियां इतिहास-भूगोल और नियम कानून तो आपने समझ लिए. अब समझते हैंटेलीमेडिसिन की चुनौतियों को. इससे जुड़े जोखिमों और इसकी बाधाओं को. सबसे पहले यहसमझना होगा कि टेलीमेडिसिन हर व्यक्ति या स्थिति के लिए अनुकूल नहीं है. ट्रेडिशनलदेखभाल की विधियों में टेलीमेडिसिन उपयोग करने के कुछ संभावित नुकसान भी हैं. जिनरिमोट एरियाज़ में रह रहे मरीजों के लिए यह सबसे कारगर बताई जा रही है, वहां कमइंटरनेट स्पीड या सर्वर की समस्या के कारण वर्चुअल कम्युनिकेशन को जोड़ने में इसप्रणाली को जूझना पड़ रहा है. इसके साथ ही मरीज बढ़ते साइबर अपराध के कारण अपनीगोपनीयता को लेकर आशंकित भी हैं. कई लोग टेलीमेडिसिन पर पूरी तरह निर्भर हो रहेहैं, ऐसे में किसी व्यक्ति को यदि आपातकालीन देखभाल की आवश्यकता होती है तो अस्पतालपहुंचने के बजाय पहले टेलीमेडिसिन का रुख करना घातक हो सकता है. टेलीमेडिसिन मेंमरीज की हेल्थ हिस्ट्री की जानकारी जुटाने में डॉक्टरों को काफी मशक्कत करनी पड़तीहै. डॉक्टर मरीज के बताए लक्षणों के आधार पर ही जांच और दवाएं सुनिश्चित करता है.डॉक्टर के सामने होने पर मरीज अगर अपने लक्षणों को ठीक ढंग से नहीं बता पाता है तोडॉक्टर फिजिकल एग्जामिनेशन के जरिये बीमारी को समझने की कोशिश करता है. दूसरी तरफटेलीमेडिसिन में यदि कोई रोगी एक भी महत्वपूर्ण लक्षण छोड़ देता है तो पूरा इलाजकोम्प्रोमाइज़ होने का खतरा रहता है. वर्चुअल कम्युनिकेशन में डॉक्टर आपके दिल कीधड़कन या सांस को सुनने के लिए स्टेथोस्कोप का उपयोग नहीं कर सकते. आपका बीपी याशुगर नहीं जांच सकते. इसके लिए उन्हें विजुअल असेसमेंट पर निर्भर रहना पड़ता है.उदाहरण के तौर पर, अगर आपको आंखों में परेशानी है तो वह टॉर्च जलाकर नहीं देख सकता.आपके बताए लक्षणों पर ही उपचार शुरू करना पड़ता है. दूसरी समस्या भाषा और तकनीकी कीहै. भारत में कम पढ़े-लिखे लोग आज भी अपने लक्षणों को सही भाषा और सटीक शब्दावली मेंनहीं समझा पाते. इस सेवा का लाभ लेने के लिए भारत के ग्रामीण क्षेत्रों मेंनेटवर्क, कम्प्यूटर या मोबाइल के कुशल जानकारों जरूरत है. जिसकी भारी कमी है.टेलीमेडिसिन प्रोवाइडर्स को कैसे खोजें? यह इतना सरल है कि एक गूगल सर्च पर उपलब्धहै. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ई-संजीवनी के नाम से निःशुल्क राष्ट्रीयटेलीमेडिसिन सेवा की शुरुआत की है. यह सेवा ई-संजीवनी मोबाइल एप्लिकेशन, और वेबसाइटके रूप में उपलब्ध है. इसके अलावा कुछ पेड ऐप भी हैं जिनका इस्तेमाल भारत मेंप्रमुखता से किया जा रहा है. Practo, 1 mg, Apollo 24/7, Docs App, Tata health औरLybrate जैसे एप्लीकेशन्स का इस्तेमाल लोग ई-ओपीडी के लिए कर रहे हैं. टेलीफोनिककन्सल्टेशन के लिए मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल द्वारा हेल्पलाइन नम्बर भी जारीकिए जा रहे हैं. आमतौर पर यह कॉन्टैक्ट नम्बर्स जिला प्रशासन की वेबसाइट पर मिलजाते हैं. इसके साथ ही कई प्रदेशों में राज्य सरकारों द्वारा ग्रामीण इलाकों मेंटेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र भी स्थापित किए गए हैं. आप वहां जाकर भी इस सुविधा कालाभ ले सकते हैं.(ये स्टोरी हमारे साथी अतुल ने लिखी है.)