पुतिन अब किस पड़ोसी देश पर हमला करने वाले हैं?
पुतिन के दफ़्तर से लीक हुए दस्तावेज से क्या पता चला है?

रूस अपने एक ख़ास दोस्त की पीठ में छुरा घोंपने की तैयारी कर रहा है. ये हम नहीं कह रहे हैं. बल्कि पुतिन के गुप्त दस्तावेज कह रहे हैं.
वो भी तब, जब ये दोस्त यूक्रेन के ख़िलाफ़ लड़ाई में हर तरह से मदद कर रहा है. उसने यूक्रेन पर हमले के लिए अपनी ज़मीन दे दी. अपनी सेना भी तैयार रखी है. कहा है, हम बस इशारे का इंतज़ार कर रहे हैं. और तो और, उस दोस्त देश का राष्ट्रपति भी पुतिन के इशारे पर चलता है. फिर भी पुतिन उस पर हमला करने की योजना बना रहे हैं. उनका इरादा साम दाम दंड भेद, हर तरीक़े से उस देश पर क़ब्ज़ा करने का है. tओ आइए जानते हैं.
- अब पुतिन किस पड़ोसी देश पर निशाना लगा रहे हैं?
- पुतिन के दफ़्तर से लीक हुए दस्तावेज से क्या पता चला है?
- और, इस दस्तावेज से अमेरिका और यूरोप क्यों परेशान हैं?
पहले एक नक़्शा देखिए.
ये रूस की पश्चिमी सीमा है. इस बॉर्डर पर आपको कुछ देश नज़र आ रहे होंगे. ऊपर की तरफ़ फ़िनलैंड और स्वीडन हैं. जैसे-जैसे आप नीचे चलते हैं, आपको पहले एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया दिखते हैं. उसके बाद आते हैं, बेलारूस और यूक्रेन.
फ़िनलैंड और स्वीडन हमेशा से पश्चिमी देशों के दोस्त रहे हैं. ये दोनों यूरोपियन यूनियन (EU) का हिस्सा हैं. हाल ही में दोनों देशों ने नेटो की सदस्यता के लिए अप्लाई किया है.
एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया एक समय सोवियत संघ का हिस्सा थे. सोवियत संघ के विघटन के बाद तीनों देश आज़ाद हो गए. बाद में तीनों एक साथ EU और नेटो का हिस्सा बन गए. वे उस समय हिस्सा बने, जब रूस उतना ताक़तवर नहीं था.
यूक्रेन ने नेटो और EU की मेंबरशिप लेने की कोशिश की. रूस ने उन्हें धमकाया. फिर हमला कर दिया. अब हमले को एक बरस पूरा हो रहा है. यूक्रेन ने दोनों संगठनों की सदस्यता का ख़याल लगभग छोड़ दिया है. हमने अभी जिन-जिन देशों का नाम बताया, उनके रूस के साथ दोस्ताना संबंध नहीं हैं. वे या तो रूस के विरोधी धड़े का हिस्सा हैं या उनकी तरफ़ झुकाव रखते हैं.
मतलब ये कि रूस की पश्चिमी सीमा दुश्मनों से घिरी हुई है. इन सबके बीच एक देश अपवाद बनकर सामने आता है. बेलारूस. यूक्रेन और लातविया के ठीक बीच में. इस इलाके में बेलारूस, रूस का इकलौता दोस्त है. रूस-यूक्रेन युद्ध में बेलारूस ने अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करने की खुली छूट दी है. रूसी सैनिक बेलारूस की ज़मीन से यूक्रेन पर हमला करते हैं. बेलारूस में रूस के कुछ हथियार भी बनते हैं. यही नहीं, बेलारूस उन चुनिंदा देशों में है, जिन्होंने यूएन में रूस के पक्ष में वोटिंग की है. वो रूस के हमले को भी सही ठहराता है. इतना ही नहीं, बेलारूस ने अपनी आर्मी स्टैंड-बाय पर रखी है. कहा है कि अगर उसके एक भी सैनिक को नुकसान पहुंचा तो वो यूक्रेन पर हमला बोल देगा. जानकारों का मानना है कि बेलारूस एक बहाने का इंतज़ार कर रहा है. वो रूस की तरफ़ से लड़ने के लिए कुलबुला रहा है. एक तरफ़ बेलारूस दोस्ती निभाने की कोशिश कर रहा है, दूसरी तरफ़ रूस उसको हथियाने की साज़िश रच रहा है.
आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि, ये कब और कैसे हुआ?
दरअसल, यूरोप और अमेरिका के कुछ मीडिया संस्थानों ने 17 पन्नों का एक सीक्रेट डॉक्यूमेंट ऊपर किया है. इसमें बेलारूस को रूस का हिस्सा बनाने का पूरा प्लान लिखा है.
रूस का इरादा क्या है?
- 2030 तक बेलारूस की सरकार, सेना और अर्थव्यवस्था पर पूरा कंट्रोल करना है.
- 2030 तक रूस और बेलारूस में एक करेंसी और एक टैक्स सिस्टम चलाना है.
- बेलारूस के सभी मीडिया संस्थानों को अपने नियंत्रण में लाना है.
- बेलारूस की सेना से रूस के अधीन काम करवाना है.
- सेना के साजो-सामान बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों पर क़ब्ज़ा करना है.
- अंतिम लक्ष्य, बेलारूस को रूस के साथ मिलाकर एक यूनियन स्टेट बनाना है. इस यूनियन स्टेट की चाबी रूस के पास रहेगी.
यूक्रेन के मीडिया संस्थान किएव इंडिपेंडेंट ने कुछ खुफिया अधिकारियों से बात की. उनके मुताबिक, ये डॉक्यूमेंट रूस की अलग-अलग एजेंसियों ने मिलकर बनाया है. इसको 2021 में तैयार कर लिया गया था. तब से रूस उसी दिशा में काम कर रहा है.
अब ये जानते हैं कि, डॉक्यूमेंट में क्या है?> पूरा डॉक्यूमेंट दो हिस्सों में है. पहले पार्ट में रूस के मकसद के बारे में लिखा है. इसमें तीन फ़ेज का ज़िक्र है. शॉर्ट-टर्म, मिड-टर्म और लॉन्ग-टर्म.
शॉर्ट-टर्म लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 2022 की डेडलाइन तय की गई थी.
शॉर्ट टर्म में चार बड़े मसलों पर काम करना था.
- नंबर एक. राष्ट्रवादी और प्रो-वेस्टर्न संस्थाओं पर नियंत्रण करने का लक्ष्य रखा गया था. लॉ ट्रेंड नामक मानवाधिकार संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2022 तक बेलारूस में लगभग 12 सौ स्वतंत्र संगठनों पर ताला लगाया जा चुका था. इसके बरक्स प्रो-रशियन संस्थाओं की संख्या बढ़ रही है.
> नंबर दो. रूस ने बेलारूस के संविधान को अपने हिसाब से बदलवाने का लक्ष्य रखा था. फ़रवरी 2022 में विरोध के बावजूद लुकाशेनको सरकार ने संविधान में संशोधन किए.
> तीसरा शॉर्ट-टर्म गोल रूसी सेना को बेलारूस में एंट्री दिलाने का था. ये लक्ष्य भी पूरा हो चुका है. 24 फ़रवरी 2022 को जब पुतिन ने हमले का आदेश दिया, उस समय दो मेन रास्तों से धावा बोला गया था. एक तो यूक्रेन के पूर्व में लुहान्स्क और दोनेश्क से. दूसरा रूट बेलारूस का था. उस रास्ते से रशियन आर्मी चेर्नोबिल तक पहुंची थी. बाद में उन्हें पीछे हटना पड़ा. हालांकि, रूसी सैनिक बेलारूस से नहीं हटे. वे अभी भी वहां से यूक्रेन पर हवाई हमले कर रहे हैं.
> नंबर चार. रूसी कंपनियों को बेलारूस में अनलिमिटेड एक्सेस देना था. इसके लिए बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेनको ने आधिकारिक आदेश जारी किया था.
2022 में दोनों देशों के बीच व्यापार चार लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया. 2021 में ये आंकड़ा डेढ़ लाख करोड़ से भी कम का था. यूक्रेन वॉर के बाद पश्चिमी देशों ने रूस के साथ-साथ बेलारूस पर भी आर्थिक प्रतिबंध लगाए. तब से रूस उसका सबसे बड़ा पार्टनर बनकर उभरा है. इस दोस्ती ने बेलारूस को काफ़ी नुकसान भी पहुंचाया है, मगर वो ये जोखिम लेने के लिए तैयार है.
ये तो हुए शॉर्ट-टर्म गोल्स. मिड-टर्म में रूस क्या चाहता है? मिड-टर्म के लिए डेडलाइन 2025 की है. इसमें रूस के तीन बड़े लक्ष्य हैं.
> नंबर एक. बेलारूस के लोगों के लिए रूस का पासपोर्ट हासिल करना आसान बनाना.
> नंबर दो. रूसी मीडिया और दूसरे संगठनों का बेलारूस में प्रभाव बढ़ाना.
> नंबर तीन. बेलारूस के न्युक्लियर प्लांट्स को यूनियन स्टेट के पावर सिस्टम का हिस्सा बनाना.
अब लॉन्ग-टर्म में तय लक्ष्यों के बारे में भी जान लीजिए. लॉन्ग-टर्म के लिए रूस ने 2030 की तारीख़ तय की है. इसमें क्या-क्या लक्ष्य रखे गए हैं?
- नंबर एक. यूनियन स्टेट का निर्माण पूरा करना.
- नंबर दो. बॉर्डर और डिफ़ेंस पॉलिसी को यूनिफ़ाई करना.
- नंबर तीन. दोनों देशों की सेनाओं के लिए एक जैसे नियम बनाना.
- नंबर पांच. रूसी भाषा को तरजीह देना और बेलारूस के सूचना-तंत्र पर नियंत्रण करना.
- नंबर छह. सिंगल करेंसी की व्यवस्था लागू करना.
- नंबर सात. हथियारों की साझा खरीद करना.
- नंबर आठ. बेलारूस के इतिहास को रूस के साथ मिलाना.
दावा किया जा रहा है कि रूस ने इस दिशा में काफ़ी बढ़त बना ली है. बेलारूस के मीडिया-तंत्र पर रूसके भोंपुओं का क़ब्ज़ा है. रूसी संगठनों का दबदबा भी बढ़ा है. बेलारूस के राष्ट्रपति लुकाशेनको 1994 से कुर्सी पर काबिज हैं. उनके ऊपर चुनावों में धांधली के आरोप भी लगते रहे हैं. 2020 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्त प्रोटेस्ट हुए थे. तब रूस ने ही उन्हें बचाया था. और, उस समय से लुकाशेनको, पुतिन के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.
हालांकि, हमेशा से संबंध ऐसे ही नहीं थे. एक समय तक पुतिन और लुकाशेनको एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हुआ करते थे. एक क़िस्सा जुलाई 2013 का है.
पुतिन साइबेरिया में मछली पकड़ने गए हुए थे. यहां उन्होंने 21 किलोग्राम की विशालकाय मछली पकड़ी. तस्वीर छपी और ख़ूब सुर्खियां बनी. फिर कुछ दिन के बाद बेलारूस के स्टेट टेलीविज़न पर एक सरकारी मीटिंग दिखाई गई. उस मीटिंग के बीच में एक व्यक्ति ने अपनी कहानी सुनाई. कहा कि उसने प्रिप्यात नदी से 57 किलो की मछली पकड़ी है. ये दावा करने वाले लुकाशेनको थे. उन्होंने इस कहानी में किसी का नाम तो नहीं लिया लेकिन सब समझ गए कि उनका इशारा किस ओर था.
लुकाशेनको और पुतिन के बीच ऐसी नोक-झोंक का मीडिया में आना उन दिनों कोई नई बात नहीं थी. अक्सर दोनों नेता एक दूसरे के ख़िलाफ़ खुन्नस निकाला करते थे. 2014 में जब रूस ने क्रीमिया पर कब्ज़ा किया तब बेलारूस, रूस से खफ़ा हो गया था. लुकाशेनको ने रूस की आलोचना की थी. इसके बदले यूरोप ने बेलारूस को ख़ूब सारी छूट दी.
फिर 2015 में हुए चुनाव में लुकाशेनको आसानी से जीत गए. अंदरखाने धांधली के आऱोप लगें, मगर इस पर यूरोप आंखें मूंदे रहा. अब अगला दांव पुतिन ने चला. रूस ने तेल और नेचुरल गैस की बेलारूस को होने वाली आपूर्ति बंद कर दी. लेकिन समय हमेशा एक सा कब रहता है. साल बदले और दोनों देशों के बीच के रिश्ते भी. यूरोपीय संघ, यूक्रेन और पोलेंड जैसे देशों से कश्मकश ने पुतिन और लुकाशेनको को नजदीक ला दिया.
बेलारूस की आबादी लगभग 95 लाख. यहां दो भाषाएं बोली जाती हैं. रूसी और बेलारूसी. हालांकि, दिनचर्या में बेलारूसी का इस्तेमाल करने वालों की संख्या कम है.
अब बेलारूस का इतिहास भी जान लीजिए.
1918 से पहले बेलारूस नाम का कोई देश अस्तित्व में नहीं था. जिस इलाके में बेलारूस है, वो इलाका अलग-अलग साम्राज्यों का हिस्सा था. पहले विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्य टूटे. उसी कड़ी में बेलारूस पहचान को मानने वालों ने आज़ाद मुल्क की घोषणा कर दी. नया नवेला बेलारूस अभी अपने पांव में खड़ा भी नहीं हुआ था कि लेनिन की रेड आर्मी ने उस पर हमला कर दिया. फिर बेलारूस में कम्युनिस्ट शासन आ गया. उसे सोवियत संघ का हिस्सा बना दिया गया. साल 1930 में जोसेफ स्टालिन अपने उरूज पर था. स्टालिन ने बेलारूस में विरोधियों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया. इस अभियान में अकेले बेलारूस में 1 लाख से ज़्यादा लोग मारे गए थे और हजारों को लेबर कैंप्स में भेजा गया था.
फिर 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया. इस दौरान जर्मनी ने बेलारूस पर क़ब़्ज़ा कर लिया. 1944 आते-आते रेड आर्मी ने नाज़ियों को खदेड़ दिया. युद्ध खत्म हुआ. अब बेलारूस पर एक छत्र सोवियत संघ का राज था.
1980 में सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने उदारीकरण की नीति अपनाई. बेलारूस को अपनी भाषा संस्कृति अपनाने का स्पेस दिया. 1990 में बेलारूसी भाषा देश की आधिकारिक राज्य भाषा बनी.
1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया. बाकियों की देखा-देखी बेलारूस भी आज़ाद हुआ. लेकिन अब देश बेलगाम था. उसे चलाने वाला कोई नहीं था. फिर साल 1994 में बेलारूस में पहले चुनाव हुए. बेलारूस में अभी भी सोवियत संघ और रूस से चाहत वाला एलिमेंट जिंदा था. अलेक्जेंडर लुकाशेनको ने इसी को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा. वो जीत गए. लुकाशेनको चुनाव जीत गए. इसके बाद तो उनकी जीत परंपरा बनकर रह गई. लुकाशेनको हर तिकड़म अपनाकर चुनाव जीत रहे थे. रूस का हित लुकाशेनको से पूरा हो रहा था. इसलिए उसने उनका समर्थन जारी रखा. उस वक्त ये आरोप भी लगे कि रूस लुकाशेनको को जिताने के लिए चुनाव प्रभावित कर रहा है. पश्चिमी देशों ने इसकी आलोचना की. EU समेत कई देशों ने लुकाशेनको और उनके मत्रियों पर प्रतिबंध लगाए. वहीं दूसरी तरफ बेलारूस का पक्का यार माने रूस अब उससे खफ़ा रहने लगा था, क्योंकि बेलारूस, रूस से ख़रीदी गैस का पैसा नहीं चुका पा रहा था. पैसा न मिलने की वजह से रूस ने भी कह दिया कि हम बेलारूस को गैस की सप्लाई आधी कर देंगे.
दोनों देश के बीच नोंक झोंक होने लगी. 2010 के चुनाव में लुकाशेनको फिर से जीते. मगर बिना रूस के समर्थन के.
फिर आया 2014 का साल. नेटो ने बाल्टिक देशों में अपनी सेना बढ़ा दी. इससे बेलारूस को खतरा पैदा हुआ. इसी ख़तरे के चलते उसने रूस से मदद की गुहार लगाई. कुछ समय बाद रूस ने क्रीमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया. तब बेलारूस ने पलती मार ली और रूस की निंदा करते हुए यूरोप के खेमे में शामिल हुआ. इससे रूस और तिलमिला गया.
मगर यूरोप और बेलारूस की दोस्ती लंबी नहीं चल पाई. खटपट हुई तो पश्चिमी देशों ने बेलारूस पर प्रतिबंध बढ़ा दिए. इस बार लुकाशेनको को समझ आया कि पश्चिमी दुनिया से उसकी ज्यादा दिनों तक नहीं बन पाएगी. इसलिए रूस से दोस्ती रखने में ही समझदारी है. दोनों देश के बीच फिर रिश्ते सामान्य होने लगे. भले ही रूस ऊपरी तौर पर बेलारूस को दोस्त का दर्जा दे रहा था, मगर भितरखाने में वो उसकी लंका लगाने मे जुटा था. लीक्ड डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, रूस पहले बेस तैयार करना चाहता था. उसके बाद ज़रूरत पड़ने पर वो सेना उतारने के लिए भी तैयार था. ये सब चुपके-चुपके होना था. दस्तावेज सामने आने के बाद इस प्लान के भविष्य पर सवालिया निशान लग गए हैं.
फिलहाल, हम समझ लेते हैं कि रूस का बेलारूस में क्या लालच है?
- नंबर एक. सोवियत कनेक्शन. बेलारूस लंबे समय तक सोवियत संघ का हिस्सा रहा है. अलग होने के बावजूद वहां की एक बड़ी आबादी रूस का समर्थन करती है. कई ग्रुप्स हैं, जो रूस को अपने ओरिजिन से जोड़कर देखते हैं.
- नंबर दो. बफ़र ज़ोन. बेलारूस की सीमा नेटो के तीन देशों से लगती है. ये हैं लातविया, लिथुआनिया और पॉलैंड. ये तीनों देश कभी सोवियत संघ का हिस्सा थे. अगर बेलारूस को रूस में मिला लिया गया तो रूस अपनी सेना नेटो के बगल में तैनात कर सकता है. वो बेलारूस की धरती को बफ़र ज़ोन भी बना सकता है. जैसा उसका इरादा यूक्रेन में था.
- नंबर तीन.रूस के लिए रणनीतिक रूप से बेलारूस महत्वपूर्ण है. बेलारूस यूक्रेन के साथ लगभग 12 सौ किलोमीटर लंबी की सीमा साझा करता है.
- नंबर चार. प्राकृतिक संशाधन और नोवोरशिया. रूस की नज़र बेलारूस के प्राकृतिक संसाधनों पर भी है. इसके अलावा, पुतिन जिस नए रूस का सपना देख रहे हैं, उसमें सोवियत संघ के सभी देश शामिल हैं. मौजूदा स्थिति में अधिकतर देश रूस से छिटक चुके हैं. बेलारूस इकलौता बचा है, जहां पुतिन अपनी मर्ज़ी चला सकते हैं.
इस डॉक्यूमेंट पर रूस या बेलारूस का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. हालांकि, इसने यूरोप और अमेरिका में खलबली ज़रूर पैदा कर दी है. हालांकि, उससे पहले सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि, क्या लुकाशेनको अपनी संप्रभुता खोने के लिए तैयार हैं?
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