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पाकिस्तान में रेप से जुड़े कानूनों का इतिहास क्या रहा है?

अमीर और प्रभावशाली लोग कैसे इसका फायदा उठाते हैं?

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2 जनवरी 2023 (अपडेटेड: 2 जनवरी 2023, 08:59 PM IST)
People carry signs against a gang rape that occurred along a highway, during a protest in Karachi, Pakistan September 12. (Photo:Reuters)
12 सितंबर को पाकिस्तान के कराची में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान सामूहिक बलात्कार के विरोध में तख्तियां लिए लोग. (फोटो: रॉयटर्स)
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जब 2022 अपना पिटारा बंद कर रहा था, उसी समय पाकिस्तान में एक रेप सर्वाइवर महिला के ज़ख्म कुरेदे जा रहे थे. 26 दिसंबर को पेशावर की एक अदालत ने रेप के एक दोषी को जेल से रिहा कर दिया. उसको जेल से इसलिए नहीं छोड़ा गया था, क्योंकि वो निर्दोष साबित हो गया था. उसे इसलिए छोड़ा गया, क्योंकि उसने रेप सर्वाइवर से निक़ाह का प्रस्ताव दिया था. इस प्रस्ताव पर पहले जिरगा यानी गांव की पंचायत ने मुहर लगाई. फिर अदालत ने भी हामी भर दी. दिलचस्प ये कि इसमें पीड़ित महिला की राय तक नहीं ली गई.

पाकिस्तान में रेप के मामलों में अदालती कार्रवाई की दर तीन प्रतिशत से भी कम है. यानी, अगर 100 रेप के केस दर्ज होते हैं तो उसमें से तीन मामले ही अदालत तक पहुंच पाते हैं. ये आंकड़ा बताने का हमारा मकसद ये साबित करना नहीं है कि पाकिस्तान महिलाओं के लिए सबसे बुरा देश है. हमारा मकसद ये बताना है कि, अगर दुनिया में कहीं भी किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ कुछ भी अनैतिक होता है तो वो पूरी मानवता के ख़िलाफ़ अपराध है. ये सबकी ज़िम्मेदारी है. पाकिस्तान एक उदाहरण मात्र है.

तो आइए जानते हैं,

- पाकिस्तान में रेप को लेकर क्या कानून है?

- अमीर और प्रभावशाली लोग कैसे इसका फायदा उठाते हैं?

- और, महिलाओं की दुर्दशा के पीछे कट्टर इस्लाम की क्या भूमिका रही है?

पहले कुछ चर्चित घटनाओं की कहानियां सुन लीजिए.

क़िस्सा नंबर एक.

वो 2002 का साल था. पाकिस्तानी पंजाब के मीरवाला में जून महीने में गर्मी चरम पर पहुंच जाती थी. इसके बावजूद उस रोज़ जिरगा के लिए तीन सौ से ज़्यादा लोग जमा हुए थे. मीरवाला में मस्तोई और गूजर तबके के लोग रहते थे. मस्तोई ख़ुद को ऊंची जाति का मानते थे. गांव की ज़्यादातर ज़मीन पर उनका मालिकाना हक़ था. इसलिए, दोनों जातियों में लंबे समय से संघर्ष चलता आ रहा था. उस रोज़ की जिरगा में एक गूजर लड़के शक़ूर को कटघरे में खड़ा किया जा रहा था. मस्तोई लोगों का आरोप था कि शक़ूर ने उनकी जाति की एक महिला का यौन शोषण किया है. ये आरोप फर्ज़ी था. लेकिन कोई उनकी मुख़ालफत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. 

जिरगा ने फ़ैसला पहले से ही तय कर रखा था. शक़ूर को सबके सामने बुरी तरह पीटा गया. फिर जिरगा ने आंख के बदले आंख का फ़ैसला सुनाया. उनका कहना था कि, जिस तरह शक़ूर ने मस्तोई महिला के साथ संबंध बनाए, उसी तरह मस्तोई जाति के पुरुष उसकी बहन के साथ संबंध बनाएंगे. यही हुआ भी. भरी जिरगा में चार मस्तोई पुरुषों ने शक़ूर की बहन मुख़्तारन के कपड़े फाड़े और उसका सामूहिक बलात्कार किया. इस दौरान तीन सौ लोगों की भीड़ हंसी-ठिठोली करती रही. किसी ने भी उस कुकृत्य को रोकने की कोशिश नहीं की. बलात्कार के बाद मुख़्तारन को तड़पने के लिए छोड़ दिया गया. उसे सबके सामने बिना कपड़ों के चलने के लिए मजबूर किया गया.

मुख़्तारन ने बाद में अपनी किताब ‘इन द नेम ऑफ़ ऑनर’ में बताया है,

‘वे जिबह करने वाले बकरे की तरह ढ़केलकर मुझे कोठरी में ले गए. मैं चिल्लाती रही कि क़ुरान पाक के वास्ते मुझे छोड़ दो, ख़ुदा के वास्ते मुझे छोड़ दो. मगर उनसे छूट कर भागने की कोशिश बेकार थी, दुआएं भी बेमानी थीं. बाहर का अंधेरा मेरे भीतर उतरता गया. मेरे दिमाग़ में धुंध छा गई थी. मैं बेसुध हो गई. मुझे याद नहीं कि वे चारों जानवर घंटों या पूरी रात मेरे शरीर पर ज़ुल्म ढाते रहे. बाहर आते ही मैंने अपने वालिद को पुकारा और उन्होंने झट से मेरे ऊपर शॉल फेंक दी. उस हालत में सारे गांव वालों की निगाहों के सामने से ख़ुद को घसीटती हुई किसी तरह मैं घर पहुंची और निढाल होकर खाट पड़ गई. तब मन में एक ही ख़्याल आया कि अब मुझे जान दे देनी चाहिए. आख़िर वे लोग भी तो यह बात जानते थे कि इस बेहुरमती के बाद एक औरत ख़ुदकशी के सिवाय और क्या करेगी?’

जिस इलाके की ये घटना थी, उसमें रेप पीड़िताओं का एक ही भविष्य तय था. माना जाता था कि रेप होने के बाद लड़कियां आत्महत्या कर अपना जीवन समाप्त कर लेंगी. लेकिन मुख़्तारन अलग थी. उसने लड़ने की ठानी. मुख़्तारन ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. चार आरोपियों को गिरफ़्तार भी किया गया. पाकिस्तान में कई जगहों पर प्रोटेस्ट होने लगे. फिर जुलाई 2002 में इंटरनैशनल मीडिया भी इसमें दिलचस्पी लेने लगी. मुख़्तारन बीबी को मुख़्तार माई का नाम मिला. इसके बाद पाकिस्तान सरकार भी हरक़त में आई. उस दौर में परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तान के राष्ट्रपति हुआ करते थे. उन्होंने 8,300 डॉलर (लगभग सात लाख रुपये) की मदद दी. इस पैसे से मुख़्तार माई ने स्कूल बनवा दिया. 

परवेज़ मुशर्रफ़ 

कुछ समय तक तो सब ठीक चला. मगर जब मुख़्तार माई की ख़बर पूरी दुनिया में फैली और, दुनियाभर में पाकिस्तान सरकार की लानत-मलानत हुई, तब मुशर्रफ़ को कोफ़्त होने लगी. जून 2005 में मुख़्तार माई को एमनेस्टी इंटरनैशनल ने एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने बुलाया. फ़्लाइट से पहले ही मुशर्रफ़ सरकार ने मुख़्तार माई को एग्जिट कंट्रोल लिस्ट में डलवा दिया. उन्हें नज़रबंद करके रखा गया. उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया. पाकिस्तान सरकार ने पहले तो ये कहा कि मुख़्तार माई ने अपनी मर्ज़ी से लंदन जाने से मना किया था. बाद में मुशर्रफ़ ने बताया कि उनके आदेश पर मुख़्तार को बाहर जाने से रोका गया था. उनके मुताबिक, मुख़्तार माई की वजह से पाकिस्तान की छवि ख़राब हो रही थी.

जून 2005 में पाकिस्तानी अख़बार डेली टाइम्स के लिए ख़ालिद हसन ने लिखा,

‘मुख़्तार माई ने मुशर्रफ़ सरकार को ख़ुद को सुधारने का मौका दिया था. लेकिन सरकार ऐसा करने में नाकाम रही. राष्ट्रपति के आदेश पर पूरी दुनिया में पाकिस्तान की सॉफ़्ट छवि बेचने की कोशिश हो रही है. इसके लिए ख़ूब सारा खर्चा भी किया जा रहा है. विडंबना देखिए, जब सरकार को ख़ुद को उदार और समझदार दिखाने का अवसर मिला, उसने इसे हवा में उड़ा दिया.’

कुछ समय बाद पाकिस्तान सरकार को मुख़्तार माई को एग्जिट कंट्रोल लिस्ट से हटाना पड़ा. उनका पासपोर्ट लौटा दिया गया. उनके दोषियों को सज़ा भी हुई. हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 6 में से 5 को रिहा कर दिया. मुख़्तार माई का केस पाकिस्तान के इतिहास में एक उदाहरण की तरह दर्ज हुआ. हालांकि, इससे कोई सबक नहीं लिया गया.

दूसरा मामला डॉ शाज़िया खालिद का है. शाज़िया पाकिस्तान पेट्रोलियम (PPL) के बलोचिस्तान ब्रांच के अस्पताल में डॉक्टर थीं. जनवरी 2005 में उनका उनके घर के अंदर बलात्कार हुआ. शाज़िया के पति खालिद उस समय लीबिया में थे. उनके वापस लौटने के बाद शाज़िया ने पूरी कहानी बताई. पति के सपोर्ट से शाज़िया ने शिकायत दर्ज कराई. रेप का आरोप एक आर्मी अफ़सर पर था. सरकार ने अफ़सर पर कार्रवाई करने की बजाय शाज़िया को नज़रबंद कर दिया. उसको और उसके पति को मुंह बंद रखने के लिए धमकाया गया. आख़िरकार, मार्च 2005 में शाज़िया और खालिद पाकिस्तान छोड़कर लंदन चले गए. उस समय के राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने टीवी पर आकर कहा कि आरोप कैप्टन हम्माद दोषी नहीं है. इसका भारी विरोध हुआ. लेकिन इससे साफ हो चुका था कि रेप के आरोपी को सरकार संरक्षण दे रही है. ऐसे में न्याय की उम्मीद बेमानी थी. यही हुआ भी. पीड़िता को देश छोड़कर जाना पड़ा. जबकि आरोपी अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीता रहा.

तीसरा क़िस्सा कायनात सूमरो का है. कायनात 2007 में तेरह साल की थी. उसे सिंध में स्कूल से लौटते वक़्त किडनैप किया गया था. कायनात का ड्रग्स खिलाकर गैंगरेप किया गया. जब वो किसी तरह भागकर घर आई, तब उसने चार लोगों का नाम लिया. कायनात का साथ देने की बजाय गांव के जाने-माने लोगों ने एक अजीब सलाह दी. उन्होंने उसके घरवालों को कहा कि इस लड़की को जान से मार दो. तुम्हारी इज्ज़त बच जाएगी.

मगर कायनात के घरवाले राज़ी नहीं हुए. वे बच्ची को लेकर कराची भाग गए. उन्होंने केस लड़ा. मई 2010 में कायनात के भाई की हत्या कर दी गई. ख़ुद कायनात के ऊपर दो बार हमला हुआ. 2010 में ही सिटी कोर्ट ने आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया. इसको लेकर सिंध में प्रोटेस्ट भी हुए. मामला सिंध हाईकोर्ट तक पहुंचा. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. कायनात को आज तक न्याय नहीं मिल सका है.

आज हम ये सब कहानियां क्यों सुना रहे हैं?

दरअसल, पाकिस्तान में रेप के आरोपियों को सज़ा मिलने की घटनाएं दुर्लभ हैं. अगर सज़ा मिल भी जाए तो किसी ऊपरी अदालत में जाकर मामला बदल जाता है. अगर वो बाधा भी पार हो जाए तो दोषी और भी रास्ते निकाल लाते हैं. वे अदालत में रेप पीड़िता का मैरिज सर्टिफ़िकेट ले आते हैं. दोषी ख़ुद को पीड़िता का पति साबित कर देते हैं. ऐसे में रेप का आरोप अपने आप खारिज हो जाता है.

दूसरा खेल ये होता है कि गांव की जिरगा आपस में बैठकर पीड़िता का भविष्य तय कर देती है. ऐसे मामलों में अदालतों के आदेश को दरकिनार कर पैसों के लेन-देन से मामला सुलटा लिया जाता है. जिरगा को पाकिस्तान में संवैधानिक अधिकार नहीं मिला है. यानी, उनके द्वारा जारी आदेशों को कानूनी मान्यता नहीं है. इसके बावजूद अदालत उन्हें चुनौती देने से बचती हैं. इसका एक उदाहरण दिसंबर 2022 में पेशावर में दिखा. जहां हाईकोर्ट की एक बेंच ने रेप के दोषी को सज़ा से बरी कर दिया.

ये मामला क्या है?

ये पूरा मामला अगस्त 2020 में शुरू हुआ था. ख़ैबर-पख़्तूनख्वा के बुनेर ज़िले में एक लड़की को अस्पताल ले जाया गया. इलाज के दौरान पता चला कि वो प्रेग्नेंट है. लड़की जन्म से ही बोलने और सुनने के काबिल नहीं थी. उसने इशारों से बताया कि एक पड़ोसी दौलत ख़ान ने उसके साथ बार-बार ज़बरदस्ती की है. मामला जिरगा में पहुंचा. जब वहां बात नहीं बनी, तब पुलिस में शिकायत हुई. इस बीच लड़की ने एक बच्चे को भी जन्म दिया. डीएनए टेस्ट से पता चला कि बच्चा दौलत ख़ान का ही है.

मई 2022 में बुनेर के डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट ने दौलत ख़ान को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई. उसके ऊपर ज़ुर्माना भी लगाया गया. कायदे से दौलत ख़ान को 25 साल तक जेल में रहना था. लेकिन वो 25 महीने तक भी जेल में नहीं रहा. उसने अदालत से बाहर लड़की के पिता के साथ समझौता कर लिया. इसके तहत, दौलत ख़ान रेप सर्वाइवर से शादी करेगा और उसे लगभग ढाई लाख रुपये भी देगा. गांव की जिरगा ने इस प्रस्ताव को ओके कर दिया. फिर मामला पेशावर हाईकोर्ट की बेंच के पास पहुंचा. बेंच ने जिरगा के फ़ैसले को कानूनी मान्यता दे दी. बेंच ने कहा कि ये समझौता दोनों पक्षों के हित में है.

इस फ़ैसले का पाकिस्तान और पाकिस्तान के बाहर विरोध हो रहा है. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ये फ़ैसला महिलाओं के अधिकारों पर तमाचे की तरह है. ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान (HRCP) ने भी इसकी निंदा की है.

पाकिस्तान में 2006 के बाद से रेप से जुड़े कानूनों में बदलाव हुए हैं. कानूनों को महिलाओं के लिए आसान बनाया गया. इसके बावजूद गिनती के मामलों में शिकायत हो पाती है. इसकी चार बड़ी वजहें हैं,

- नंबर एक. सामाजिक बहिष्कार. समाज रेप पीड़ितों को अछूत की तरह देखता है. उन्हें स्वीकार्यता नहीं मिल पाती.

- नंबर दो. शिथिल जांच. पुलिस रेप के मामलों में सावधानी नहीं बरतती. पुलिस सिस्टम पर पुरुषवादी मानसिकता हावी है. महिला रेप सर्वाइवर्स के लिए पर्याप्त महिला पुलिस नहीं है. जांच में संवेदनशीलता नहीं बरती जाती.

- नंबर तीन. महंगी और लंबी कानूनी प्रक्रिया. केस की तारीख़ें बढ़ती रहती है. आरोपियों के पास अक्सर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाने का विकल्प होता है. रेप सर्वाइवर्स के लिए उन्हें फ़ॉलो कर पाना मुश्किल है. रेप की शिकार महिलाएं अक्सर गरीब और अशिक्षित होतीं है. उन्हें पूरी कानूनी प्रक्रिया भी पता नहीं. अगर सरकार या कोई संस्था उन्हें सपोर्ट ना दें तो वे आधे में ही हिम्मत हार जातीं है.

- नंबर चार. कोर्ट से बाहर होने वाले समझौते. जैसा कि दौलत ख़ान के केस में हुआ, जिरगा पैसे और निक़ाह का हवाला देकर रेप जैसे अपराध को जस्टिफ़ाई कर देतीं है. जिरगा दावा करती रहीं है कि उनके फ़ैसले शरिया कानून के तहत होते हैं. हालांकि, उनके फ़ैसलों को किसी तरह की कानूनी मान्यता नहीं है. यानी, अदालतें जिरगा के फ़ैसले को आसानी से नकार सकतीं है. मगर अदालतों में बैठे अधिकतर जजों की मानसिकता अभी तक नहीं बदली है. इसलिए, वे भी कट्टरपंथ के आगे हाथ खड़े कर देतीं है.

इससे निपटने का रास्ता क्या है?

जानकारों का कहना है कि रेप के मामलों में सरकार को पार्टी बनना होगा. यानी, उन्हें पीड़ितों की तरफ़ से केस लड़ना होगा.

दूसरा रास्ता ये है कि रेप सर्वाइवर्स को पर्याप्त सुरक्षा और उन्हें न्याय का भरोसा दिलाया जाए.

तीसरी चीज ये करनी होगी कि सबूत जुटाने का भार पीड़ितों पर से उतारा जाए.

इसके अलावा, फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था भी बढ़ानी होगी.

इन सबसे अधिक ज़रूरी ये है कि समाज पीड़ितों और दोषियों में अंतर करना सीखे. जब तक पीड़ितों को दोषी समझा जाता रहेगा, तब तक किसी भी कानून से बराबरी की दुनिया बनाने की कल्पना नामुमकिन है.

HRCP की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में हर दिन रेप की 11 घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज होती है. 2015 से 2021 के बीच 22 हज़ार से अधिक रेप के मामले सामने आए. इनमें से सिर्फ 77 दोषियों को सज़ा हो पाई. ये 0.3 प्रतिशत से भी कम है. ये पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति का एक दुखद सबूत है.

ये तो हुआ पाकिस्तान में रेप से जुड़े मामलों की कहानी. अब रेप से जुड़े कानूनों का इतिहास भी जान लेते हैं.

पाकिस्तान में रेप से जुड़े कानूनों में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं. मिलिटरी डिक्टेटर जनरल ज़िया उल-हक़ ने 1979 में हुदूद कानून लागू किया. जनरल ज़िया पाकिस्तान का इस्लामीकरण करना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए जमात-ए-इस्लामी के फ़ाउंडर अबुल अला मौदुदी से हाथ मिलाया. मौदुदी महिलाओं को दोयम दर्जे का मानते थे. इसकी झलक हुदूद लॉ में भी दिखी. इसके तहत रेप के मामलों में सबूत जुटाने का दारोमदार महिलाओं पर होता था. महिला को दोष साबित करने के लिए चार पुरुषों की गवाही लानी पड़ती थी. जो रेप पीड़िताएं दोष साबित नहीं कर पातीं थी, उन्हें जेल में डाल दिया जाता था. जेल के अंदर उन्हें फिर से यौन शोषण झेलना पड़ता था.

ज़िया उल हक़ 

हुदूद कानून 2006 तक लागू रहे. फिर वीमेंस प्रोटेक्शन बिल लाया गया. इसमें रेप के मामलों में फ़ोरेंसिक और ज़मीनी सबूतों को तरजीह दी जाने लगी. इसके बावजूद सुधार की गुंजाइश बची रही. जानकारों की मानें तो असली दिक्क़त मानसिकता की है. जब तक समाज ख़ुद को बदलने के लिए तैयार नहीं होगा, रेप जैसे जघन्य अपराध के दोषी खुले में घूमते रहेंगे. ये समाज के साथ-साथ मानवता के माथे पर भी कलंक है.

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