चीनी प्रोजेक्ट के कारण इंसानों की खरीद-बिक्री!
साउथ-ईस्ट एशिया के देशों में ऑनलाइन स्कैमिंग और मानव-तस्करी का धंधा फल-फूल क्यों रहा है?

जुलाई 2021 में फ़िलिपींस की एक टीचर को फ़ेसबुक पर कॉल सेंटर की जॉब से जुड़ा एक ऐड दिखा. जॉब कम्बोडिया में था. लिखा था, अंग्रेज़ी बोलने वाले विदेशी नागरिकों की ज़रूरत है. साथ में बढ़िया वेतन और रहने-खाने की टॉप क्लास व्यवस्था.
टीचर की उम्र 26 साल थी. उसके गर्भ में तीन महीने का बच्चा था. पिछले चार महीनों से उसके पास कोई नौकरी नहीं थी. वो अपने भविष्य के बारे में सोच-सोचकर थकने लगी थी. इसी बीच दिखे फ़ेसबुक ऐड ने उसके मन में उम्मीद जगा दी. उसने लिंक खोला. और, दो दिनों के बाद वो नोमपेन्ह एयरपोर्ट पर खड़ी थी. फ़ॉर्म भरते समय उसे बताया गया था कि कॉल सेंटर एयरपोर्ट के पास ही है. लेकिन जब वो वहां पहुंची, तब कहानी कुछ और ही थी. उसे बताया गया कि ऑफ़िस शिफ़्ट हो चुका है. दो सौ किलोमीटर दूर एक गांव में. वहां पहुंचने के बाद टीचर से उसका पासपोर्ट छीन लिया गया. उसे तीन दिनों तक एक कमरे में बंद रखा गया. बिना खाना-पानी के. जब उसने बाहर जाने की बात कही, तब उसे मारा-पीटा गया.
तीन दिनों के बाद टीचर को बाहर निकाला गया. उसे धमकी दी गई कि अगर उसने कहना नहीं माना तो उसको किसी तीसरी पार्टी को बेच दिया जाएगा. तब तक उसकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी. उसने हामी भर दी. फिर उसे पांच फ़ोन और पांच ब्रिटिश सिम कार्ड दिए गए. उसे फ़ेसबुक, टिंडर और वॉट्सऐप पर फ़र्ज़ी अकाउंट बनाने के लिए कहा गया. इनके ज़रिए फ़ॉरेन एक्सचेंज ट्रेडिंग में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को फंसाया जाता था. और, उनसे अलग-अलग तरीकों से पैसे ऐंठे जाते थे.
इन सबके बीच टीचर ने किसी तरह अपने पति से कॉन्टैक्ट किया. उसने लोकेशन साझा की. पति ने कॉल सेंटर के दरवाज़े पर छिपकर पहरा दिया. जब पुलिस से बात नहीं बनी, तब उसने पूरी कहानी फ़ेसबुक पर लिखी. इससे ट्रैफ़िकर्स डर गए. वे पहले एक लाख रुपये मांग रहे थे. लेकिन बाद में पोस्ट डिलीट करने पर टीचर को छोड़ने के लिए राज़ी हो गए.
ये सिर्फ़ एक टीचर की कहानी नहीं है. इसमें नौकरी की लालसा, धोखाधड़ी, किडनैपिंग, ऑनलाइन स्कैम का एक पूरा नेक्सस काम कर रहा है. सितंबर 2021 में थॉमसन रॉयटर्स ने नौ ऐसे लोगों की कहानी पब्लिश की थी, जिन्हें झांसा देकर नौकरी के लिए बुलाया गया. फिर पासपोर्ट छीनकर उनसे ऑनलाइन धोखाधड़ी करवाई गई. कुछ के घरवालों ने उन्हें बाहर निकालने के लिए डेढ़ से दो लाख की फिरौती भी दी.
हालांकि, ये कहानी इस रिपोर्ट तक ही सीमित नहीं है. साउथ-ईस्ट एशिया के देशों में ऐसे गिरोहों की संख्या लगातार बढ़ी है. इन दिनों चीन, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग, वियतनाम और मकाऊ की पुलिस ने ऑपरेशन शुरू किया है. वे अपने नागरिकों को इस दलदल से बाहर निकालने की कवायद में जुटे हैं. पिछले कुछ दिनों में सैकड़ों अपराधियों को अरेस्ट भी किया गया है. हालांकि, इसकी जड़ तक पहुंचने में कितना समय लगेगा, ये देखने वाली बात होगी.
तो, आज हम जानेंगे,
- साउथ-ईस्ट एशिया के देशों में ऑनलाइन स्कैमिंग और मानव-तस्करी का धंधा फल-फूल क्यों रहा है?
- लॉ एजेंसियां इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए क्या कदम उठा रहीं है?
- और, इन सबके बीच चीन और ताइवान आपस में क्यों उलझ गए हैं?
पहले इतिहास समझ लेते हैं.
साल 1955 की बात है. इंडो-चाइना से फ़्रांस की वापसी हो चुकी थी. कम्बोडिया, वियतनाम और लाओस आज़ाद हो चुके थे. उन्हें अपनी नियति तय करने का अधिकार मिला था. आज़ादी के साथ-साथ कई चुनौतियां भी थीं. मसलन, उन्हें अपने नागरिकों को बेहतर जीवन देना था. इकोनॉमी ठीक करनी थी. इसका बड़ा दारोमदार अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर टिका था. फ़्रांस के शासन के समय पूरा व्यापार मेकोंग डेल्टा से होता था. फ़्रांस के जाने के बाद मेकोंग डेल्टा वियतनाम के पास चला गया. कम्बोडिया के पास अपना पोर्ट नहीं था. ऐसे में उन्होंने दक्षिण में एक नया पोर्ट बनाने का प्लान बनाया. इसके लिए कम्पोंग सोम को चुना गया. 1960 में पोर्ट बनकर तैयार हो गया. पोर्ट बनाने आए मज़दूरों के लिए कच्चे घर बने थे. धीरे-धीरे वहां बस्ती बस गई. और, आगे चलकर ये शहर बन गया.
जिस समय ये शहर विकसित हो रहा था, उस समय कम्बोडिया के राजा थे, नॉरडम सिहानुक. उन्हीं के सम्मान में कम्पोंग सोम का नाम बदलकर सिहानुकविल कर दिया गया. वियतनाम वॉर के दौरान सिहानुकविल पोर्ट से हथियारों की सप्लाई हुआ करती थी.
फिर आया 1975 का साल. 30 अप्रैल को साउथ वियतनाम की राजधानी साइगॉन पर नॉर्थ के सैनिकों ने क़ब्ज़ा कर लिया. इसी के साथ वियतनाम युद्ध खत्म हो गया. अमेरिकी सैनिक किसी तरह साइगॉन से बाहर निकल गए. लेकिन उनका एक जहाज कम्बोडिया के तट पर फंस गया. अप्रैल 1975 में कम्बोडिया में ख़मेर रूज़ का कंट्रोल हो चुका था. उन्होंने अमेरिका के कंटेनर जहाज SS मायागुएज़ पर क़ब्ज़ा कर लिया. जहाज के कप्तान और दूसरे स्टाफ़्स को बंधक बना लिया गया. फिर अमेरिका ने ऑपरेशन चलाकर उन्हें छुड़ा लिया. इस घटना को वियतनाम वॉर का अंतिम संघर्ष माना जाता है.
ख़मेर रूज का शासन 1979 तक चला. उनके शासन में कम्बोडिया का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग कट चुका था. ख़मेर रूज़ के हटने के बाद लगभग एक दशक तक वियत सैनिकों ने शांति व्यवस्था बनाने में मदद की. 1992-93 में यूनाइटेड नेशंस की निगरानी में कम्बोडिया में चुनाव कराए गए. इस दौरान यूएन के सैनिकों को सिहानुकविल में ही ठहराया गया था. चुनाव के बाद अमेरिका ने सिहानुकविल से राजधानी नोमपेन्ह के बीच सड़क बनाने के लिए मदद दी.
राजधानी से कनेक्टिविटी होने के बाद ये शहर टूरिस्टों को रास आने लगा. उनकी संख्या बढ़ी तो होटल, कैसिनो और दूसरे धंधे भी शुरू हो गए. इस तरह के धंधों में अधिकतर चीन के लोग आते थे. चीन में सख़्ती के कारण उनका वहां काम करना मुश्किल हो रहा था. इसकी बजाय सिहानुकविल उनके लिए सेफ़ था. यहां प्रशासन लचीला था. उनके ऊपर किसी तरह की निगरानी नहीं थी.
फिर 2013 मे चीन ने वन बेल्ट वन रोड (OBOR) प्रोग्राम लॉन्च किया. कम्बोडिया भी इसका हिस्सा था. सिहानुकविल पोर्ट को इस योजना में शामिल किया गया था. OBOR लॉन्च होने के बाद कम्बोडिया आने वाले चीनी आप्रवासियों की संख्या अचानक से बढ़ गई. डिप्लोमेट की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में कम्बोडिया में तकरीबन 80 हज़ार चीनी नागरिक थे. 2019 में ये संख्या ढाई लाख तक पहुंच चुकी थी. इनमें से दो लाख लोग सिर्फ सिहानुकविल में रह रहे थे. लोगों की बढ़ोत्तरी के साथ-साथ अपराधों की संख्या भी बढ़ने लगी थी. अधिकतर मामले ऑनलाइन स्कैम, किडनैपिंग, डिटेंशन और जबरन मज़दूरी से जुड़े होते थे. इन मामलों में अधिकतर आरोपी चीनी नागरिक होते थे. अकेले 2019 में कम्बोडिया में 744 चीनी नागरिकों को गिरफ़्तार कर देश से बाहर भेजा गया.
अपराध बढ़े तो पुलिस भी सख़्त हुई. कार्रवाई तेज़ की गई. मार्च 2022 में इंडोनेशिया के तीस नागरिकों को क्रिमिनल गैंग्स के चंगुल से छुड़ाया गया. अप्रैल में 66 थाई नागरिकों को बचाकर निकाला गया. अभी तक पुलिस थाईलैंड के तीन हज़ार से अधिक नागरिकों को सुरक्षित निकाल चुकी है. हालांकि, अभी भी एक हज़ार से अधिक थाई नागरिक सिहानुकविल में फंसे हुए हैं.
मामला थाई नागरिकों तक ही सीमित नहीं है. 08 अगस्त की फ़ोकस ताइवान की रिपोर्ट के अनुसार, ताइवान के दो हज़ार से अधिक नागरिक कम्बोडिया में फंसे हैं. ये आंकड़ा ट्रैवल रिकॉर्ड्स पर आधारित है. आशंका जताई जा रही है कि असल संख्या पांच हज़ार के आस-पास हो सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रैफ़िकर्स लोगों को घुमाकर भी कम्बोडिया ले जाते हैं. तीसरे देश के रास्ते. ऐसे समझिए कि अगर कम्बोडिया ले जाना हो तो पहले वियतनाम या किसी और देश ले जाते हैं. फिर वहां से उन्हें कम्बोडिया में एंट्री करवाते हैं. आपराधिक गिरोह जांच से बचने के लिए ज़मीनी बॉर्डर्स का इस्तेमाल भी करते हैं. ट्रैवल रिकॉर्ड्स में इनका आंकड़ा दर्ज़ नहीं होता.
अब सवाल ये उठता है कि सिहानुकविल इस तरह के अपराधों का गढ़ कैसे बना?चीन में सरकारी लॉटरी के अलावा किसी भी तरह की जुएबाजी गैर-कानूनी है. जब चीन में छिपकर ऑनलाइन गैम्बलिंग और कैसिनो चलाना मुश्किल होने लगा, तब उन्होंने फ़िलिपींस का रास्ता लिया. जब फ़िलिपींस में भी प्रशासन सख़्त हुआ, तब वे अपना पूरा सिस्टम लेकर सिहानुकविल पहुंच गए. यहां पर टैक्स कम लगता था. नियम-कानून भी लचीले थे. जल्दी ही शहर में कैसिनोज़ की भरमार हो गई. उनके लिए ज़मीन और नई इमारतों की ज़रूरत थी. ऐसे में ज़मीन के दाम बढ़ने लगे. गैम्बलिंग के धंधे में आपराधिक गिरोह भी शामिल होने लगे. उनके बीच वर्चस्व को लेकर लड़ाईयां होने लगी. बीच सड़क पर मर्डर और लूटपाट की घटनाएं आम हो चुकीं थी.
इसको आधार बनाकर कम्बोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने ऑनलाइन गैम्बलिंग पर बैन लगा दिया. ये फ़ैसला चीन के दबाव में लिया गया था. लीगल गैम्बलिंग पर बैन के बावजूद कम्बोडिया में गैम्बलिंग का धंधा चलता रहा. बस इतना हुआ है कि इन कंपनियों ने कमाई का रास्ता बदल दिया है. कैसिनोज़ की आड़ में ऑनलाइन फ़्रॉड चलाया जाने लगा.
ऑनलाइन फ़्रॉड में मानव-तस्करी का पुट कहां से आया?ये समझने के लिए आपको फ़्रॉड का पूरा साइकल समझना होगा. एक कॉल सेंटर बनता है. वहां काम कर रहे लोग किसी की समस्या नहीं सुलझाते. उनका काम फ़र्ज़ी पहचान के ज़रिए लोगों को शीशे में उतारना होता है. आमतौर पर सुंदर महिला या पुरुष की तस्वीर के सहारे दोस्ती गांठी जाती है. फिर वे आपस में पर्सनल चीज़ें शेयर करते हैं. इसके बाद फ़र्ज़ी कॉलर किसी बड़ी समस्या का ज़िक्र लाती है. दोस्ती का हवाला देकर मदद के नाम पर पैसे लिए जाते हैं. फिर एक दिन अचानक से संपर्क तोड़ लिया जाता है. ये फ़्रॉड का एक तरीका है. स्कैमर्स रोज़ाना नई-नई स्कीम्स के ज़रिए पूरी दुनिया में लोगों को फांसते हैं और उनका अकाउंट खाली करते हैं. लूट का अधिकांश हिस्सा सरगना ले जाते हैं. कॉल करने वाले बस मोहरे की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं.
इस काम में बहुत कम लोग अपनी मर्ज़ी से शामिल होते हैं. उन्हें कानूनी पचड़े में फंसने का डर होता है. कई लोग नैतिकता के आधार पर भी इससे इनकार करते हैं. कम्बोडिया में कम्बोडिया के नागरिकों को इस काम में शामिल करना मुश्किल है. क्योंकि उनके पास कानूनी अधिकार हैं. शोषण होने पर पुलिस बुला सकते हैं. इससे स्कैमर्स को पूरा धंधा चौपट होने का डर होता है.
इसलिए, वे थाईलैंड, म्यांमार, चीन, ताइवान जैसे इलाकों से ज़रूरतमंद लोगों को निशाना बनाते हैं. वहां उनके एजेंट जाकर अमीर बनने का सपना दिखाते हैं. बहुत ज़्यादा सैलरी का ऑफ़र देते हैं. उनसे किसी तरह की क़्वालिफ़िकेशन भी नहीं मांगी जाती. नौकरी और पैसे के लालच में लोग तुरंत फंस जाते हैं. फिर उन्हें बहला-फुसलाकर बाहर निकाला जाता है. जैसे ही वे गिरोह के पास पहुंचते हैं, उनका पासपोर्ट छीन लिया जाता है. इसके बाद उन्हें धमकी दी जाती है. पासपोर्ट वापस करने के लिए दस-दस लाख रुपये तक की रकम मांगी जाती है. बहुत कम परिवार अपने घरवालों के लिए इतनी रकम चुका पाते हैं. जो नहीं चुका पाते, उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है. इन लोगों का ना तो कोई रिकॉर्ड होता है और ना ही उनके बारे में कोई जानता है. ऐसे लोगों को ज़बरदस्ती ऑनलाइन फ़्रॉड से लेकर यौन दासता तक कराई जाती है.
अब सवाल आता है कि पीड़ितों को बचाने के लिए सरकारें क्या कर रहीं है?11 अगस्त को ताइवान ने कम्बोडिया में फंसे पीड़ितों को बचाने के लिए एक टास्क फ़ोर्स की स्थापना की. 17 अगस्त को एक रिंगलीडर को हिरासत में लिया गया. महिला पर संदेह था कि वो ताइवान में लोगों को झांसे में फंसाने का काम करती थी. एक व्यक्ति की तस्करी के एवज में उसको लगभग ढाई लाख रुपये मिलते थे. शुरुआती जांच में पता चला कि वो 50 लोगों को झांसा देकर कम्बोडिया भेज चुकी है. ताइवान पुलिस ने अभी तक कुल 67 लोगों को गिरफ़्तार किया है. आगे और भी अरेस्ट होने की संभावना है.
ताइवान सरकार अपने यहां तो गैंग्स पर कार्रवाई कर रही है, लेकिन कम्बोडिया से अपने लोगों को लाने में उसे मुश्किल आ रही है. दरअसल, ताइवान और कम्बोडिया के बीच किसी तरह का कूटनीतिक संबंध नहीं है. कम्बोडिया ताइवान को अलग देश नहीं मानता. वो वन चाइना पॉलिसी का समर्थक है.
19 अगस्त को कम्बोडिया में चीन के दूतावास ने ताइवानी पीड़ितों की मदद करने का दावा किया. उनके बयान में कहा गया कि वे चीनी नागरिक हैं. ताइवान ने इसपर नाराज़गी जताई है. उसने कहा है कि हम अपना ध्यान ख़ुद रख सकते हैं. चीन को परेशान होने का दिखावा करने की ज़रूरत नहीं है.
और भी देश अपने नागरिकों को बचाने के लिए कोशिशें कर रहे हैं. कम्बोडिया सरकार ने उनकी मदद का वादा किया है. लेकिन ये गठजोड़ इस अपराध को कम करेगा या नहीं, ये देखने वाली बात होगी.
चीन के कर्ज़ के जाल में फंसे लाओस की कहानी

