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यहां लाइन जियो सिम या कैश के लिए नहीं, किसानों से फ्री सब्जियां लेने के लिए है

मेहनत और रकम खर्च करके उगाई सब्जी का दाम नहीं मिल रहा. फेंक नहीं सकते.

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3 जनवरी 2016 (अपडेटेड: 3 जनवरी 2017, 10:33 AM IST)
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ये सीन देखिए. लंबी लाइन लगी दिखेगी. वैसे लाइनें देखने की आदत आपको पड़ चुकी होगी. जियो सिम के लिए या राशन के लिए या कैश के लिए. लेकिन ये लाइन बड़ी दर्दनाक है. कोई उद्योगपति सिम नहीं बांट रहा. किसान हैं. जो मेहनत मजदूरी करके तैयार किया माल फोकट में बांट रहे हैं. दाम नहीं मिल रहे इसलिए बेच नहीं सकते. मेहनत लगी है इसलिए फेंकने में दर्द होता है.
https://www.youtube.com/watch?v=6T73c7yezNI
एक-दो दिन पहले मैं आलू के पराठे खा रहा था. एकाएक दुकान वाले ने पूछा, क्यों भाई मीठा तो नहीं लग रहा? मैंने सवाल वाली शक्ल बना कर उसकी तरफ देखा. आलू का पराठा मीठा कहां होता है! उसने मेरे सवाल को भांप लिया. फिर समझाते हुए कहा, पहाड़ी आलू है न, इसलिए पूछा. पहाड़ी आलू पराठे के लिए बढ़िया होता है. मैदान के आलू में ज़रा मीठापन होता है. आपको मीठा लगे तो बताओ, आलू का कट्टा वापस कर दूंगा.
मुझे ये जानकारी नई लगी. आलू भी मीठा-फीका होता है, मुझे मालूम नहीं था. खाते हुए भी मैं तय नहीं कर पाया, कि आलू मीठा लग रहा है कि नहीं. लेकिन पराठे वाला मेरा मुंह देख रहा था तो मैंने कह दिया कि सब ठीक है. वो दोबारा आलू मसलने में लग गया.
फिर कुछ देर से मैंने ही बात बढ़ाने के लिए पूछ लिया कि आलू क्या भाव लिए. उसने कहा 350. मैं दोबारा वही सवाल वाला चेहरा बनाता उस से पहले ही उसने जवाब दे दिया - भरती  का रेट है भैया जी. भरती माने 50 किलो. बारीक वज़न नहीं लिया जाता. तीन-चार किलो ऊपर-नीचे हो जाता है. वैसे ज्यादा ही मिलता है.
थोड़ी देर बाद समझ आया कि वो बिलकुल बढ़िया आलू 7 रुपए किलो के भाव से ले आया था! या उस से भी कम में. उसकी दुकान में पीछे तक आलू और प्याज़ भरा हुआ था.
दिल्ली के महंगे इलाकों तक में सब्जी 'फ्लैट-रेट' पर मिल रही है. दस रुपए किलो. आलू, प्याज, मटर, गोभी. सब कुछ. घर पर खेती होती है, इसलिए इस 'लूट' पर खुश होने का मन बिलकुल नहीं किया. क्योंकि इकोनॉमिक्स में बिना पीएचडी के ये समझा जा सकता है कि 10 रुपए में जब रेहड़ी पर सब्जी मिल रही है, तो उस से कम में अाज़ादपुर मंडी में मिल रही होगी. उस से और कम में वहां माल लाने वाले व्यापारी ने उसे बेचा होगा. और फिर और कम में उस व्यापारी ने सब्जी किसान से खरीदी होगी ,क्योंकि उसे मंडी तक ढुलाई का खर्च निकालना पड़ता है.
10 रुपट्टी  से इतना पीछे जाते-जाते क्या बचा होगा, सोचिए.
और फिर ये सोचिए कि जो कुछ बचा हुआ किसान को मिला भी होगा, उसमें से उसे बीज का, बुवाई का, गुड़ाई का, यूरिया का, कीटनाशक का और माल तुड़वाई का खर्च निकलना है. ध्यान रहे, अभी इसमें किसान की मेहनत का मोल नहीं जोड़ा गया है. मेहनत का पैसा तो वो कब का लेना छोड़ चुका है. अब सारी कवायद खर्चा निकालने की ही है. आपके 'सेंटीमेंट्स' से नहीं खेलना चाहता, इसलिए दवाखाना, शादी-ब्याह, तीजा-तेरवी वगैरह नहीं लिख रहा.

यहां तक आते-आते आपने 'ख्वाहिश' शब्द की गैरमौजूदगी महसूस की?


A vendor reads a newspaper at his vegetable shop as he waits for customers in Kolkata, September 12, 2016. REUTERS/Rupak De Chowdhuri
पिक्चर: Reuters

रेहड़ी पर करीने से लगी सब्जी देख कर इस बात का ख़याल कम आता है, कि ये सब्जी जब खेत में थी, तब कोई इसे पानी देने इस मौसम में सुबह साढ़े तीन बजे गया होगा, क्योंकि लाईट तभी आती है. पानी देते वक़्त उसकी एड़ी में पड़ी बिवाई से खून निकलने लगा होगा. लेकिन उसने परवाह नहीं की होगी. ये सोच के, कि जब बिवाई में मिट्टी धंस जाएगी, तब खून बंद हो ही जाएगा.

पानी देना ज़रूरी है. लाईट जाने से पहले.

ये बात सही है कि ठंड के मौसम में सब्जियों के दाम कम होते हैं लेकिन इस बार जिस किस्म की लूट मची है, उसका कारण अकेले ठंड या बंपर फसल नहीं है. दरअसल जब से डीमॉनिटाइज़ेशन के तहत 1000 और 500 के नोट बंद हुए हैं, तभी से देश की कमोबेश सभी मंडियों में थोक भाव में ज़बरदस्त गिरावट हुई है. थोक मंडियां लगभग पूरी तरह कैश में लेन-देन करती हैं और बाज़ार में कैश नहीं है. पॉइंट ऑफ़ सेल मशीन (POS) बहुत कम व्यापारियों के पास है. इसलिए मंडियों में मांग टूट गई है. बिना मांग के सब्जियां मिट्टी के मोल बिक रही हैं. किसानों के पास कोई चारा नहीं है. कोल्ड स्टोरेज में जगह नहीं है, और सारी सब्जियां कोल्ड स्टोरेज में रखी भी नहीं जातीं.
न देश में, न बाहर भेज सकते हैं माल: ट्रांसपोर्टर माल बाहर की मंडियों तक नहीं ले जा रहे क्योंकि उनके पास टोल देने के लिए नोट नहीं है. टोल कार्ड से दे भी दें, तो घूस देने के लिए तो नोट ही चाहिए न! मजाल है, कि बिना 'चढ़ावा' चढ़ाए कोई ट्रक 100 किलोमीटर चल ले. इसलिए किसान को माल जहां का तहां बेचना पड़ रहा है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार ने आलू पर 'मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस' ख़त्म कर दिया है.
मध्यप्रदेश के नीमच में प्याज़ 80 फीसद के नुकसान पर बेची जा रही हैं. आंध्रप्रदेश में किसान बीस-बीस क्विंटल टमाटर अपने खर्च पर तुड़वा कर फिंकवा रहे हैं. बावजूद इसके पाकिस्तान को टमाटर एक्सपोर्ट नहीं किया जा रहा. इंडियन होटल्स एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के प्रमुख आदर्श शेट्टी कह रहे हैं कि उन्हें पहले से आधे दाम में सब्जियां मिल रही हैं. लेकिन वो ज़्यादा नहीं खरीद सकते क्योंकि स्टॉक पड़ा हुआ है.
'किसान और बेबस एक दूसरे के पर्यायवाची हो गए हैं' टाइप की लाइनें घस चुकी हैं. इसलिए ज़्यादा नहीं लिखा. बस ये सोच ये कॉपी लिखते वक़्त मैं एक 'क्लाइमेट कंट्रोल' वाली इमारत में बैठा हूं. और एक अजीब से अपराधबोध से भरा गया, कि मैं पौने बारह करोड़ लोगों की कमर तोड़ देने वाली मुसीबत से इतना अछूता क्यों हूं. मैं अपने हिस्से की शर्म महसूस कर पा रह हूं, आप भी कीजिए.


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