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भारत को 8 हजार करोड़ का पड़ेगा ट्रंप का न्यौता, गाजा पीस बोर्ड में शामिल होना महंगा सौदा?

Gaza Peace Board: डॉनल्ड ट्रंप ने गाजा युद्ध के बाद शांति और पुनर्निर्माण के लिए Board of Peace बनाने का प्रस्ताव रखा है, जिसमें भारत और पाकिस्तान को भी न्योता मिला है. इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए करीब 1 अरब डॉलर यानी 8000 करोड़ रुपये देने की शर्त रखी गई है. इसका मकसद गाजा के पुनर्निर्माण का आर्थिक बोझ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांटना है. हालांकि इसे लेकर यह सवाल भी है कि क्या यह शांति का मंच बनेगा या अमेरिका केंद्रित नई व्यवस्था.

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Gaza Peace Board
गाजा पीस बोर्ड में एंट्री के लिए देने होंगे 8 हजार करोड़?
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दिग्विजय सिंह
19 जनवरी 2026 (Updated: 19 जनवरी 2026, 02:33 PM IST)
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यह कहानी भारत और पाकिस्तान के नाम एक साथ आए न्योते से शुरू होती है - जैसे किसी इंटरनेशनल शांति “मिशन” की बड़ी मेज पर दोनों पड़ोसी देशों को आमंत्रण भेजा गया हो. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दुनिया के करीब 60 देशों को एक नए मंच “Board of Peace” का सदस्य बनने का प्रस्ताव भेजा है जिसमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं.

अब हम नीचे पूरे मुद्दे को आसान भाषा में, अलग‑अलग हिस्सों में और विस्तार से समझेंगे - ताकि यह साफ़ हो जाये कि यह बोर्ड क्या है, क्यों सुर्खियों में है, इसके पीछे क्या सोच है और भारत‑पाकिस्तान जैसे बड़े देशों का इसमें क्या रोल हो सकता है.

भारत-पाकिस्तान को एक साथ न्योता

जब दुनिया की बड़ी राजनीति की मेज पर दो ऐसे देशों को एक साथ बुलाया जाता है जिनके रिश्ते अक्सर तनावपूर्ण रहे हैं, तो वह खुद में एक बड़ी खबर बन जाती है. ट्रंप की तरफ़ से भेजा गया आमंत्रण इसी वजह से चर्चा में है - क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों को “गाजा के लिए शांति मंच” में भाग लेने का प्रस्ताव मिला है.

यह पहली बार नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों में भारत को शामिल किया गया है, लेकिन पाकिस्तान का नाम भी साथ होना, और फिर वह नाम गाजा जैसे मुद्दे में, बहुत ध्यान खींच रहा है. इससे लगता है कि अमेरिका इस मंच को एक बड़ा, विश्व‑स्तरीय शांति मंच बनाना चाहता है, जहां तक संभव हो सभी बड़े देशों की भागीदारी हो.

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गाजा के नाम पर ट्रंप का प्लान (फोटो-UN)
“Gaza Board of Peace” क्या है?

“Board of Peace” एक अंतरराष्ट्रीय संगठन या मंच है जिसे अमेरिका ने प्रस्तावित किया है ताकि गाजा में युद्ध के बाद शांति, शासन और पुनर्निर्माण के लिये एक साझा ढांचा बनाया जा सके.

यह कोई पुराना संगठन नहीं है, बल्कि इसे डॉनल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित किया गया है और इसका डिजाइन अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को जोड़ते हुए बनाया गया है. यह कहा जा रहा है कि इसके ज़रिये-

  • गाजा जैसे संघर्ष‑ग्रस्त क्षेत्रों में स्थिरता लाने के लिए नीति बनाई जायेगी
  • शासन और प्रशासन की देख‑रेख होगी
  • पुनर्निर्माण के लिये संसाधन जुटाये जायेंगे
  • वैश्विक शांति प्रयासों में एक साझा मंच मिलेगा

यह बोर्ड फिलहाल गाजा पर केंद्रित है, लेकिन अमेरिकी दस्तावेज़ों से संकेत मिलते हैं कि आगे इसे और विवादों में भी मार्गदर्शन के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है.

ये भी पढ़ें: राफेल घाटे का सौदा, अरबों देकर भी फ्रांस के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा, सरकार क्या मानती है?

बोर्ड की मूल भूमिका क्या होगी?

Board of Trustees की भूमिकाएं मुख्य रूप से तीन बड़ी चीज़ों पर केंद्रित हैं:

गाजा में नियमन और शांति की दिशा

यह बोर्ड निर्णय लेने में एक मार्गदर्शक भूमिका निभायेगा कि युद्ध के बाद गाजा को कैसे स्थिर रखा जाये, किस तरह के प्रशासन लागू किये जायें, और वहां के नागरिक जीवन को कैसे दोबारा पटरी पर लाया जाये.

पुनर्निर्माण और निवेश की योजना बनाना

गाजा में सड़कें, इमारतें, अस्पताल, स्कूल और रोज़मर्रा के कामों को फिर से शुरू करने के लिये बड़े निवेश की ज़रूरत होगी. इस बोर्ड का काम यह सुनिश्चित करना है कि संसाधन जुटायें जायें और योजनाएं क्रियान्वित हों.

वैश्विक सहयोग और रणनीति साझा करना

शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिये कई देशों और संगठनों का समर्थन और सामंजस्य बेहद ज़रूरी है. यही इस बोर्ड की एक मुख्य भूमिका होगी — एक साझा मंच बनाना.

सिर्फ़ गाजा की शांति तक सीमित नहीं?

दरअसल, ट्रंप की योजना में यह बोर्ड केवल गाजा के लिये ही नहीं ठहर सकता. इससे जुड़ा ड्राफ्ट चार्टर दर्शाता है कि यह मंच आगे वैश्विक संघर्षों के समाधान में भी भाग ले सकता है, या कम से कम अमेरिका इसे उसी तरह विकसित करना चाहता है.

यानी यह कोई छोटा‑मोटा प्रशासनिक निकाय नहीं है, बल्कि एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय मंच है जिसका दायरा बड़ा हो सकता है - यही वजह है कि मीडिया में इसे कभी “यूएन का विकल्प” भी कहा जा रहा है.

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गाजा पीस बोर्ड का क्षेत्र बड़ा विस्तृत होगा (फोटो- AP)
सदस्यता शुल्क का खेल

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक यह खबर दुनिया भर में इसलिए भी सुर्खियों में है क्योंकि स्थायी सदस्यता के लिये लगभग 1 अरब डॉलर (करीब 8000 करोड़ रुपये) का योगदान मांगा जा रहा है. यह रकम देखने में काफी बड़ी लगती है और इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं.

यहां कुछ महत्वपूर्ण बातें साफ़ हैं:

  1. तीन साल की सामान्य सदस्यता के लिये कोई तत्काल पैसा देने की ज़रूरत नहीं है
  2. लेकिन अगर कोई देश स्थायी रूप से सदस्य बनना चाहता है, तो उसे करीब 1 अरब डॉलर का योगदान करना होगा
  3. यह पैसा घोषित रूप से गाजा के पुनर्निर्माण और शांति प्रयास में उपयोग होगा

इसका मतलब यह है कि दुनिया के बड़े देशों को सच में बड़ी प्रतिबद्धता दिखानी पड़ेगी अगर वे दीर्घकालिक भूमिका चाहते हैं.

सदस्यता लेने की शर्त क्या है?

ड्राफ्ट चार्टर में लिखा है कि हर सदस्य पहले तीन साल के लिये बोर्ड में शामिल हो सकता है बिना बड़ी राशि दिये. लेकिन अगर देश चाहता है कि उसकी भागीदारी तीन साल से आगे चलती रहे, तो प्रस्ताव के मुताबिक उसे इसकी कीमत अदा करनी होगी.

यह मॉडल इसलिए रखी गयी है ताकि बड़े देशों को शुरुआत में हिस्सा लेने का मौका मिले, लेकिन स्थायी भूमिका के लिये एक आर्थिक और राजनैतिक प्रतिबद्धता दिखायी जाये. इससे अमेरिका यह संदेश भी देता है कि यह मंच गम्भीर और संसाधन‑समर्थ है.

भारत की भूमिका कैसी हो सकती है?

भारत को इस बोर्ड में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया गया है. यह निमंत्रण संकेत देता है कि,

  • भारत की वैश्विक कूटनीति और भूमिका को अमेरिका ने महत्वपूर्ण माना है
  • भारत का अनुभव बड़े विकास और पुनर्निर्माण प्रोजेक्ट में मददगार हो सकता है
  • भारत को मध्य पूर्व में स्थिरता प्रयासों में एक सकारात्मक भागीदार के रूप में देखा जा रहा है

यह आमंत्रण भारत‑पाकिस्तान की तुलना में अलग स्तर पर देखा जा रहा है: यानी यह लड़ाई का हिस्सा नहीं, बल्कि शांति प्रयास में सहयोग का प्रस्ताव है. भारत को तीन साल की सामान्य सदस्यता के लिये अभी कोई बहुत बड़ा खर्च नहीं करना है अगर वह स्थायी भूमिका का चुनाव नहीं करता.

फिलहाल फिलिस्तीन को कितनी मदद?

भारत की तरफ से फिलिस्तीन को दी जाने वाली सहायता में मानवीय और डेवलपमेंट दोनों तरह की मदद शामिल है. पिछले कई वर्षों में भारत ने लगभग 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 700 करोड़ रुपये) की विकास-और सहायता दी है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत सेवाओं और शरणार्थियों के कल्याण के लिये योगदान शामिल है; साथ ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी (UNRWA) को नियमित रूप से लगभग हर साल 5 मिलियन डॉलर (लगभग 40 करोड़ रुपये) की राशि दी है. इसके अलावा भारत ने चिकित्सा आपूर्ति, राहत सामग्री और खाद्य सामान भेज कर भी मानवीय सहायता प्रदान की है.

पाकिस्तान को आमंत्रण क्यों मिला?

पाकिस्तान को भी इसी मंच में शामिल होने का आमंत्रण मिला है. इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयास से जुड़े कुछ हिस्सों में पाकिस्तान को भी भागीदार माना जा रहा है. 

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया में भी यह बयान आया है कि वे गाजा में शांति और सुरक्षा के लिये सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार हैं. यानि यह एक राजनैतिक निर्णय है जिसके पीछे बड़ी उद्देश्य‑पूर्ण सोच है.

ये भी पढ़ें: पाकिस्तान ने Tejas के बाद बनाना शुरू किया था JF-17, फिर एक्सपोर्ट भारत से पहले कैसे?

इससे क्या वास्तव में संघर्ष का बोझ कम होगा?

यह बहुत बड़ा सवाल है. बोर्ड के प्रस्ताव के आधार पर- 

  • अगर दुनिया के कई देश मिलकर संसाधन जुटाते हैं, तो गाजा के पुनर्निर्माण की लागत कई हाथों में बंट सकती है
  • इससे इजरायल‑फिलिस्तीनी संघर्ष के बाद का आर्थिक बोझ कुछ हद तक साझा होगा
  • लेकिन इसे सीधे युद्ध के मूल कारणों का समाधान नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसके लिये बहुत अधिक राजनीतिक बातचीत और समझौता चाहिए होंगे

यह एक आर्थिक सहयोग का प्रयास है, न कि लड़ाई को तुरंत समाप्त करने वाला कोई जादुई फार्मूला.

आलोचना और सवाल

इस योजना पर कई देशों ने सावधान प्रतिक्रिया भी व्यक्त की है. कुछ के मन में सवाल हैं कि क्या यह बोर्ड-

  • वाकई शांति लाने में प्रभावी होगा?
  • क्या यह यूएन जैसे संस्थानों के विकल्प के रूप में अमेरिका‑केंद्रित मंच बन जायेगा?
  • क्या 1 अरब डॉलर जैसा शुल्क कुछ देशों को बाहर रख देगा या भूमिका सीमित कर देगा?

इन विचारों के बावजूद, यह मंच अभी नया है और इसके बारे में आगे होने वाले निर्णय और भागीदारों की प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण होंगी.

सौ बात की एक बात

तो कुल मिला कर, ट्रंप का “Board of Peace” एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच है जिसका उद्देश्य है युद्ध‑ग्रस्त क्षेत्रों में शांति, शासन और पुनर्निर्माण के लिये साझा दिशा और संसाधन जुटाना. भारत और पाकिस्तान दोनों को इसमें आमंत्रित किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह पहल वैश्विक कूटनीति का एक नया अध्याय बन सकती है. स्थायी सदस्यता के लिये 1 अरब डॉलर की मांग इसे एक गंभीर और संसाधन‑समर्थ मंच बनाती है, लेकिन इसके फायदे और सीमाएं समय के साथ ही दिखेंगी. 

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