हेती की वो डिश जो उनकी आज़ादी का प्रतीक बन गई
जानिए ‘द सूप ऑफ़ फ़्रीडम’ की रोचक कहानी
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जानिए ‘द सूप ऑफ़ फ़्रीडम’ की रोचक कहानी
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ये कहानी एक पकवान की है. जिसे पकाने वाले भूखे छूट जाते थे. ग़ुलामों को उसे खाने की इजाज़त नहीं थी. फिर एक दिन बग़ावत हो गई. बाग़ियों ने शासकों का बोरिया-बिस्तर बांध दिया. आज़ादी की बेड़ियां टूट चुकीं थी. उन्होंने पहली बार मन से अपना बनाया पकवान चखा. तब जाकर उन्हें उसका स्वाद पता चला. उस पकवान को नाम दिया गया, ‘द सूप ऑफ़ फ़्रीडम’. यानी, आज़ादी का शोरबा. आज जानेंगे, इस शोरबे का इतिहास क्या है? ये बनता कैसे है? और, आज के दिन हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं?
चर्चा छिड़ी तो याद आई किम जोंग-उन की. अपने कुख़्यात कारनामों के लिए चर्चित उत्तर कोरियाई तानाशाह. 17 दिसंबर 2021 को उसने दस साल पूरे कर लिए. सत्ता में. किम जोंग-उन कुर्सी पर कैसे आया? दस सालों के शासन में उसने क्या हासिल किया? और, वो आगे क्या करने वाला है?
दिसंबर 2020 की शुरुआत में हेती उबाल पर था. इसके पीछे की वजह बड़ी दिलचस्प थी. हेती अमूमन आपराधिक वजहों से चर्चा में आता है. लेकिन उस बार कहानी कुछ अलग थी. दरअसल, एक मैगज़ीन ने एक पकवान की रेसिपी में फेरबदल कर दिया था. पकवान का नाम, सूप जमू. आमतौर पर ये कद्दू, केला, मांस, सब्ज़ियों और पारंपरिक मसालों को साथ में उबालकर बनाया जाता है.
लेकिन मैगज़ीन ने पूरी धारा ही पलट दी थी. उन्होंने रेसिपी में नारियल के दूध और चॉकलेट के अलावा कई और दुर्लभ चीज़ों का ज़िक्र किया था. उनमें से कई चीज़ें ऐसी थीं, जो हेती में उपजती ही नहीं हैं.
एक तरह से ये परंपरा का अपमान था. फिर क्या था! जनता ने मैगज़ीन को दौड़ा लिया. सोशल मीडिया पर नेगेटिव रेटिंग होने लगी. लोगों ने बॉयकॉट का ऐलान कर दिया. आख़िरकार, उनको अपनी डिश का नाम बदलना पड़ा. सावर्जनिक तौर पर माफ़ी भी मांगनी पड़ी. बोले कि इतिहास से छेड़छाड़ का कोई मकसद नहीं था. अगर किसी की भावनाएं आहत हुईं है तो हम क्षमा चाहते हैं.
अगर मैगज़ीन ने इतिहास से छेड़छाड़ की तो सही इतिहास क्या था?
कोलंबस भारत खोजने निकला और अमेरिका पहुंच गया. कोलंबस सीधे अमेरिका नहीं पहुंचा था. रास्ते में उसका एक जहाज दुर्घटना का शिकार हो गया. उसे नजदीक के द्वीप पर सारा सामान उतारना पड़ा. कोलंबस ने इस द्वीप को नाम दिया - हिस्पैनियोला. कालांतर में हिस्पैनियोला दो हिस्सों में बंटा. पश्चिमी हिस्सा आया फ़्रांस के पास. जबकि पूर्वी हिस्से पर स्पेन का क़ब्ज़ा रहा. फ़्रांस वाले हिस्से को हेती के नाम से जाना गया. स्पेन वाला हिस्सा कहलाया, डोमिनिकन रिपब्लिक.
हम पहुंचते हैं आज के मुद्दे की तरफ़.
हिस्पेनियोला में सोने की खदानें मिलीं थी. यूरोप के लुटेरे देशों ने इस संपत्ति को लूटने में पूरा ज़ोर लगा दिया. उन्होंने पहले मूलनिवासियों से ग़ुलामी कराई. जब उनकी मौत होने लगी तो नया रास्ता निकाला गया. लुटेरे देश तस्करी करने लगे. इंसानों की. वे अफ़्रीका से अश्वेतों को भरकर ले आए. ये प्रक्रिया सदियों तक चली. अनुमान है कि हिस्पेनियोला में लाखों ग़ुलामों को लाया गया. उनमें से अधिकांश बीमारी और शोषण का शिकार हो गए.
1685 में फ़्रांस ने अपने ग़ुलामों के लिए नियम-कानूनों का एक सेट तैयार किया. इसे ‘ब्लैक कोड’ कहा जाता था. इसमें ग़ुलामों को दी जाने वाली सुविधाओं और सज़ा का ज़िक्र भी था. उनको दिए जाने वाले राशन की बात भी की गई थी. बीमारों और बूढ़ों का ख़याल रखने के लिए भी कहा गया था.
हालांकि, धरातल पर ऐसा कोई इंतज़ाम नहीं था. ग़ुलामों से मरने की हद तक काम लिया जाता था. खाने में सड़ा-गला दिया जाता. बीमार पड़े लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता. टारगेट से कम काम करने पर पूरी तरह टॉर्चर किया जाता. जब कोई सिर उठाकर जवाब देने की कोशिश करता तो उन्हें काल-कोठरी में डाल दिया जाता था.
ग़ुलामों का पूरा जीवन संघर्ष से गढ़ा था. दिनभर मेहनत के बाद मिलने वाले सड़े-गले खाने ने उनका शरीर और मनोबल, दोनों तोड़ दिया था. लेकिन वे हिम्मत नहीं हारे. उन्होंने फिर नया रास्ता निकाला. वे छिपकर खेती करने लगे. जंगली सब्जियां उगाने लगे. वे शिकार भी करने लगे थे.
अफ़्रीकी महाद्वीप में खाने के अलग-अलग सामानों को पानी में उबालकर खाने की परंपरा रही है. ये बनाने में आसान होता है. किफ़ायती के साथ-साथ पौष्टिक भी. हेती के ग़ुलाम अफ़्रीका से ही लाए गए थे. वे इस परंपरा को साथ लेकर आए थे. उन्होंने वो रेसिपी वहां भी उतार दी. वे कद्दू, जंगली मसालों और सड़े-गले मांस को उबालकर पीने लगे.
जल्दी ही ये बात फ़्रेंच शासकों तक पहुंच गई. वे नाराज़ हो गए. उन्होंने ग़ुलामों के सूप पीने पर पाबंदी लगा दी. लेकिन बनाने पर नहीं. उन्हें लगा, अगर सड़े-गले मांस और जंगली सब्जियों से इतना अच्छा सूप बन सकता है तो ताज़े सूप की बात कुछ और ही होगी. फ़्रांस ने सूप बनवाना जारी रखा. ग़ुलाम पूरी मेहनत करके सूप तैयार करते, लेकिन ये उनके नसीब में नहीं था. सूप अब एक संसाधन का रूप ले चुका था. और, संसाधनों की लूट तो यूरोप का पुराना शगल था.
ये धड़ल्ले से चल रहा था. तभी 1789 में फ़्रांस में क्रांति हो गई. स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे वाली. इससे फ़्रांस की सत्ता कमज़ोर पड़ गई. हेती के ग़ुलामों ने इसका फायदा उठाकर विद्रोह कर दिया. हेती में मौज़ूद फ़्रेंच शासकों को बाहर से सपोर्ट नहीं मिला. नतीजा, वे लड़ाई हार गए. हेती की क्रांति सफ़ल हो चुकी थी.
एक जनवरी 1804 को हेती दुनिया का पहला अश्वेत गणतंत्र बना. पहले सम्राट बने, जीन जैक डेसली. डेसली को हेती का राष्ट्रपिता भी कहा जाता है.
डेसली की पत्नी थीं, मेरी-क्लेरी हेरोज फ़ेलिसी. वो पहली महारानी बनीं. उन्होंने सूप जमू की रेसिपी बाहर निकाली. फिर नए सिरे से उसे अपडेट किया. महारानी फ़ेलिसी ने अपने हिसाब से मसाले और सब्जियां चुनी. कुम्हड़ को खासतौर पर इसका हिस्सा बनाया गया. क्योंकि फ़्रांसीसियों ने छिपकर खेती करने वाले ग़ुलामों को इसे खाने से रोक दिया था. अब ये उनकी आज़ादी का प्रतीक बन चुका था. अब वे जो चाहे खा और पी सकते थे. कोई उनकी अभिव्यक्ति पर चाबुक नहीं चला सकता था.
महारानी फ़ेलिसी ने सूप बनवाकर एक हफ़्ते तक बांटा. देशभर में. जब तक वो ज़िंदा रहीं, उन्होंने इस परंपरा को कायम रखा. हेती में एक कहावत चलती है, When one person eats, we all eat. ये हेती के लोगों को जोड़े रखने का प्रतीक बन गया.
आज भी ये परंपरा चल रही है. हेती के लोग एक जनवरी को जहां भी, जिस भी हालत में हों, वे सूप जमू ज़रूर बनाते और पीते हैं. ये उनकी आज़ादी और एकता का सजीव प्रतीक है.
आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं?
दरअसल, यूनेस्को ने सूप जमू को दुनिया के सांस्कृतिक विरासतों की लिस्ट में शामिल किया है. सूप जमू इस लिस्ट में हेती की पहली एंट्री है. इस मौके पर यूनेस्को की डायरेक्टर-जनरल ऑड्रे अज़ुले ने कहा,
‘सूप जमू किसी पकवान से आगे की चीज़ है. ये हेती की आज़ादी के नायक-नायिकाओं और मानवाधिकारों के लिए उनके संघर्ष की कहानी है.’हेती लंबे समय से अलग-अलग आपदाओं से जूझ रहा है. इसी साल जुलाई में राष्ट्रपति जुवेनाइल मोइस की उनके घर में घुसकर हत्या कर दी गई थी. अगस्त 2021 में आए भूकंप ने दो हज़ार से अधिक लोगों की जान ली थी. इसके अलावा, क्रिमिनल गैंग्स का कहर तो ज़ारी ही है. इस अंधकार भरे समय में वैश्विक स्तर पर मिली पहचान हेती को नई उम्मीद देगी, यही आशा है. यही हमारी कामना भी है. अब ये जान लेते हैं कि यूनेस्को कल्चरल हेरिटेज क्या है? यूनेस्को, यूनाइटेड नेशंस से जुड़ी एजेंसी है. इसकी स्थापना नवंबर 1945 में की गई थी. यूनेस्को का हेडक़्वार्टर फ़्रांस की राजधानी पैरिस में है. यूनेस्को का मकसद विश्व शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना है. सांस्कृतिक विरासत वाली लिस्ट की शुरुआत 2008 में हुई थी. यूनेस्को मानता है कि सांस्कृतिक विरासत स्मारकों और चीज़ों के कलेक्शन तक ही सीमित नहीं है. बल्कि, इसमें पूर्वजों से हासिल किया गया ज्ञान, जैसे कि मौखिक परंपराएं, प्रदर्शन की कला, सामाजिक प्रथाएं, त्यौहार, रीति-रिवाज, हस्तकला और प्रकृति के संरक्षण से जुड़ी विधाएं भी शामिल हैं. 2021 में यूनेस्को ने कुल 46 चीज़ों को कल्चरल हेरिटेज की लिस्ट में शामिल किया. इसमें भारत से कोलकाता के दुर्गापूजा को जगह मिली है. हेती और यूनेस्को के चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं नॉर्थ कोरिया. सितंबर 1948 में कोरियन पेनिनसुला दो हिस्सों में बंटा. नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया. साउथ कोरिया में कुछ समय के लिए सैन्य तानाशाही रही. फिर वहां लोकतंत्र आ गया. लेकिन नॉर्थ कोरिया में अच्छे दिन नहीं आए. नॉर्थ कोरिया के इतिहास में अभी तक तीन शासक हुए हैं. तीनों में कई समानताएं रहीं. तीनों के नाम की शुरुआत किम से होती है. तीनों एक ही खानदान से हैं. और, तीनों एक नंबर के धूर्त तानाशाह. उनके नाम जान लीजिए. किम इल-सुंग. उसने 1948 से 1994 तक शासन किया. जब उसकी मौत हुई तो उसके बेटे किम जोंग-इल ने गद्दी संभाली. 17 दिसंबर 2011 को किम जोंग-इल की मौत हो गई. किम जोंग-इल की मौत के बाद ये चर्चा चली कि अगला कौन? जब किम इल-सुंग मरा था, तब तय था कि सत्ता किम जोंग-इल के पास आएगी. लेकिन इस दफ़ा ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया था. दो दिनों तक तो मौत की ख़बर छिपाकर रखी गई. आशंका जताई गई कि लीडरशिप को लेकर झगड़ा शुरू हो चुका है. लेकिन जब ख़बर बाहर आई और किम जोंग-इल की शवयात्रा निकली, तब धुंध साफ़ होने लगी थी. शवयात्रा वाली गाड़ी को पकड़े एक 27 साल का नौजवान चल रहा था. उसका चेहरा शांत था. सिर झुका हुआ. चाल में सादगी थी. उसका नाम था किम जोंग-उन. किम जोंग-इल का सबसे छोटा बेटा. नॉर्थ कोरिया पर नज़र रखने वाले जानकारों ने तस्वीर और नौजवान के अनुभव का आकलन किया. फिर उन्होंने लिखा - किम जोंग उन नौजवान है. उसका अनुभव सत्ता में बरकरार रहने के लिए काफ़ी नहीं है. हो सकता है कि मिलिटरी उसके ख़िलाफ़ विद्रोह कर दे. व्हाइट हाउस के एक पूर्व अधिकारी ने कहा,
किम जोंग-इल की मौत के बाद तानाशाही बिखर जाएगी. ये कुछ हफ़्तों में हो या कुछ महीनों में. लेकिन ये होगा ज़रूर.किम जोंग-उन की पढ़ाई-लिखाई स्विट्ज़रलैंड में हुई थी. वो बॉस्केटबॉल लीग का दीवाना था. कुछ लोगों ने उम्मीद जताई कि नॉर्थ कोरिया का चाल और चरित्र बदलने वाला है. अब वहां भी आधुनिकता आएगी. शांति का साम्राज्य होगा. लोकतंत्र की स्थापना होगी. और भी बड़ी-बड़ी बातें. इन आकलनों को दस साल बीत चुके हैं. नॉर्थ कोरिया में क्या हुआ? किम जोंग-उन की सत्ता को दस साल पूरे हो चुके हैं. अंदर चुनौती देने वाला कोई नहीं है. वो अपने विरोधियों को मरवाने के लिए कुख़्यात है. इसमें उसके अपने चाचा भी शामिल हैं. इसके अलावा, पिछले दस सालों में नॉर्थ कोरिया चार परमाणु और सौ से अधिक बैलिस्टिक मिसाइल्स का परीक्षण भी कर चुका है. इसी बरस सितंबर में उसने हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण किया था. किम जोंग-उन का नॉर्थ कोरिया जब चाहे तब अमेरिका से बात भी करता है, और धमका भी देता है. ये सब कैसे हुआ? किम ने सबसे पहले उन लोगों को रास्ते से हटाना शुरू किया, जो उसकी सत्ता के लिए चुनौती बन सकते थे. ये तानाशाही का सबसे ज़रूरी पहलू है. विरोध को कुचलना. इसका पहला नज़ारा दिखा, दिसंबर 2013 में. जब नॉर्थ कोरियन न्यूज़ एजेंसी KCNA ने किम के चाचा जेंग सोंग-थाएक की ख़बर चलाई. रिपोर्ट कुछ यूं थी. जेंग गद्दार है. वो कुत्ते से भी बदतर है. उसने तख़्तापलट की साज़िश रची. दशकों तक घोटाला किया. अब उसका पाप बाहर आ चुका है. उसने मिलिटरी कोर्ट के सामने अपना अपराध स्वीकार किया. जेंग को मौत की सज़ा दी गई. जेंग सोंग-थाएक एक समय तक नॉर्थ कोरिया का सबसे ताक़तवर लोगों में से एक था. उसकी शादी किम जोंग-उन की एक बुआ से हुई थी. कहा जाता था कि उसे कोई छू नहीं सकता. लेकिन जब किम को ख़तरा महसूस हुआ, उसने उसको ठिकाने लगाने में तनिक भी देर नहीं लगाई. दूसरा उदाहरण किम जोंग-नेम का है. वो किम जोंग-उन का बड़ा भाई था. एक समय तक उसे नॉर्थ कोरिया का अगला तानाशाह माना जाता था. लेकिन 2001 में पिता से झगड़ा हुआ. 2003 में उसे नॉर्थ कोरिया से निष्काषित कर दिया गया. निर्वासन में रहने के दौरान वो आलोचक बन गया. 13 फ़रवरी 2017 की बात है. किम जोंग-नेम मलेशिया के कुआलालमपुर एयरपोर्ट पर फ़्लाइट का इंतज़ार कर रहा था. इतने में एक महिला आई और उसके चेहरे पर तेल जैसा कुछ मल दिया. वो बेचैन हो गया. इतने में दूसरी महिला आई और उसने चेहरा पोंछने का नाटक किया. फिर दोनों चुपचाप निकल गए. बीस मिनट बाद ही जोंग-नेम की मौत हो गई. कहा जाता है कि जोंग-नेम की हत्या का आदेश उसके छोटे भाई किम जोंग-उन ने दिया था. उसने दो बार पहले भी हत्यारे भेजे थे. लेकिन तब प्लान सफ़ल नहीं हो पाया था. जेंग और जोंग-नेम की घटना परिवार के भीतर की थी. इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया था कि नॉर्थ कोरिया का विरोध किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. कूटनीतिक मोर्चे पर भी किम जोंग-उन ने अपना दांव चला. उसने 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाक़ात की. इसमें परमाणु हथियारों को लेकर बढ़ रहे तनाव को कम करने की सहमति भी बनी. लेकिन नॉर्थ कोरिया ने उन शर्तों का पालन नहीं किया. किम ने साउथ कोरिया के साथ चल रहे झगड़े को खत्म करने की पहल भी की. इसके अलावा, उसने रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी कई मुलाक़ातें कीं है. जानकारों का मानना है कि ये सब बाहरी शक्तियों को संतुलन में रखने की तरकीब भर है. हालांकि, वो इसमें काफ़ी हद तक कामयाब रहा है. किम के सामने चुनौतियां क्या हैं? पहली चुनौती है, किम की हेल्थ. इंटरनैशनल मीडिया में ये ख़बर दर्ज़नों बार चल चुकी होगी कि किम जोंग-उन की मौत हो चुकी है. इस साल ये अफ़वाह जून में उड़ी थी. तब कहा गया कि किम को कोरोना हो गया है. करीब तीन हफ़्ते तक स्टेट मीडिया ने उसकी चर्चा नहीं की. तीन हफ़्ते बाद जब वो बाहर आया तो उसका शरीर पतला हो चुका था. उसका वजन काफ़ी घट गया था. जानकार बताते हैं कि किम को कोई गंभीर बीमारी है. हेल्थ के बाद दूसरी चुनौती घरेलू मोर्चे पर है. नॉर्थ कोरिया पिछले एक साल में बाढ़ और ख़तरनाक तूफ़ानों से परेशान है. ग़रीबी और भुखमरी चरम पर है. कोरोना के चलते नॉर्थ कोरिया ने अपनी सीमाएं भी बंद कर रखीं थी. इस वजह से चीन से राहत का सामान भी नहीं आ रहा था. एक कार्यक्रम ने किम ने माफ़ी भी मांगी थी. तीसरी चुनौती विदेशी मोर्चे पर है. हमने पहले भी बताया है कि नॉर्थ कोरिया हथियारों का परीक्षण इसलिए करता है ताकि वो बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें थोप सके. अभी तक उसकी धमकियां बहुत कारगर नहीं रही है. क्या आगे ऐसा होगा, बहुत भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता. भले ही किम जोंग-उन के सामने चुनौतियों की कमी नहीं है. लेकिन क्या इससे उसकी सत्ता पर असर पड़ेगा? शायद हां. शायद नहीं. लेकिन इतना ज़रूर तय है कि नॉर्थ कोरिया की जनता हमेशा की तरह बाकी दुनिया से कटी रहेगी. उसका शोषण बरकरार रहेगा. ये किम जोंग-उन की तानाशाही की सफ़लता ही है. ये दुखद है, किंतु सत्य यही है.

