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अंग्रेजों को उम्मीद नहीं थी कि जापानी फाइटर प्लेन कलकत्ता पर इतने बम बरसाएंगे

रॉयल एयर फ़ोर्स रात के धोखे में रही और जापानियों ने दिन में ही सैकड़ों जानें ले लीं

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20 दिसंबर 2021 (अपडेटेड: 19 दिसंबर 2021, 02:22 AM IST)
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अंग्रेजों को उम्मीद नहीं थी कि कलकत्ता शहर पर अचानक जापानी हमला कर देंगे
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7 दिसंबर 1941. प्रशांत महासागर के बीच एक द्वीप पर करीब 2 घंटे तक ऐसी बमबारी हुई, जिसने दूसरे विश्व युद्ध का रुख़ मोड़ दिया. ये द्वीप था अमेरिकी नौसेना का अड्डा - पर्ल हार्बर. और बमबारी की थी जापान की इम्पीरियल एयरफ़ोर्स ने. ये दूसरे विश्व-युद्ध का समय था, दुनिया जंग लड़ रही थी लेकिन इस हमले के पहले तक अमेरिका जंग से दूर था. अमेरिका के लिए ये हमला चौंकाने वाला था क्योंकि उस दौरान वॉशिंगटन में जापानी डेलिगेट्स और तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री ‘कॉर्डेल हल’ के बीच जापान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को ख़त्म करने पर बातचीत चल रही थी. जापान के इस हमले में करीब 2400 अमेरिकी सैनिक मारे गए और हमले के बाद विश्वयुद्ध का समीकरण पूरी तरह बदल गया. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ़्रैंकलीन डी रूज़वेल्ट ने जापान के खिलाफ़ सीधे युद्ध की घोषणा कर दी. और फिर अमेरिका भी मित्र राष्ट्रों की तरफ़ से दूसरे विश्व युद्ध में शामिल हो गया. 
आज 20 दिसंबर है. आज की तारीख़ का संबंध द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले कलकत्ता शहर से है. आज ही के दिन जापान ने यहां बमबारी शुरू की थी.
13 फरवरी 1931 को अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली कर दी थी. लेकिन इसके बाद भी कलकत्ता व्यापार का केंद्र बना रहा. और कलकत्ता को सेकंड कैपिटल कहा जाता रहा. इसीलिए दूसरे विश्व युद्ध की फ्रंटलाइन में न होने के बावजूद भी इसे युद्ध का दंश झेलना पड़ा. #कलकत्ता पर हमलों की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध शबाब पर था, लेकिन अंग्रेज़ ये नहीं सोच रहे थे कि इससे कलकत्ता को भी कोई ख़तरा हो सकता है. चीज़ें तब बदलना शुरू हुईं जब जापान ने मई 1942 में बर्मा पर कब्ज़ा कर लिया. जापानी सैनिक, चीनी और भारतीय सैनिकों के अवशेषों का पीछा करते हुए इंडो-बर्मा बॉर्डर तक पहुंच चुके थे. अब कलकत्ता जापानियों की बॉम्बिंग रेंज में था और इस बात से शहर के लोग बहुत डरे हुए थे. कलकत्ता दरअसल अमेरिका और चीन के बीच रसद की सप्लाई लाइन के तौर पर काम कर रहा था. युद्ध के दौरान ज़रूरत की चीज़ें अमेरिका से चीन कलकत्ता होकर ही पहुंचती थीं. जापानियों का प्लान था कि कलकत्ता का हावड़ा ब्रिज गिरा दिया जाए. ताकि रसद की सप्लाई के लिए रास्ता ब्लॉक हो जाए.
हावड़ा ब्रिज (फोटो सोर्स -इंडिया टुडे)
हावड़ा ब्रिज (फोटो सोर्स -इंडिया टुडे)

20 दिसंबर 1942 को जापान की इंपीरियल एयरफ़ोर्स के 8 मित्सुबिशी ‘Ki-21 Type 97’ बमवर्षक विमानों ने रात के वक़्त कलकत्ता शहर पर चौतरफा बम गिराना शुरू कर दिए. मित्र राष्ट्रों ने इन विमानों को 'सैली' नाम दिया था. इनके अलावा भारी बम गिरा सकने वाला डबल इंजन वाला ‘मित्सुबिशी G4M , सिंगल इंजन फाइटर ‘नाकाजीमा Ki-43’ फाइटर प्लेन और लंबी रेंज वाला ‘मित्सुबिशी A6M भी जापानी बेड़े में शामिल थे.
ब्रिटेन की रॉयल एयर फ़ोर्स जब तक अपने हरीकेन और स्पिटफायर जहाजों को तैयार करती, बहुत देर हो चुकी थी. अंडमान आईलैंड से उड़े जापानी जहाज कलकत्ता के तटों पर मंडरा रहे थे. रॉयल एयरफ़ोर्स के उस वक़्त के रडार इतने सक्षम नहीं थे कि जापानियों के फाइटर प्लेन्स के मूवमेंट की सही जानकारी दे सकें. तय करना मुश्किल था कि जहाज चिटगोंग की तरफ़ जा रहे हैं या कलकत्ता की तरफ़ आ रहे हैं.
दूसरा ब्रिटेन की रॉयल एयर फ़ोर्स के हरीकेन फाइटर प्लेन जापानी फाइटर प्लेन के आगे बहुत कमज़ोर थे. रात को जापान की तरफ़ से बमबारी शुरू होने के बाद बहुत कम वक़्त में जापानियों ने रॉयल एयर फ़ोर्स के 9 हरीकेन विमान मार गिराए. जबकि सिर्फ एक मित्सुबिशी ‘Ki-21 जापानी जहाज हल्का डैमेज हुआ था. #पहली बमबारी 20 दिसंबर को गिराए गए बमों ने बज-बज के आयल प्लांट को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. एक चश्मदीद ने पुलिस को बताया कि ग्रेट ईस्टर्न होटल के सामने सड़क पर भी एक बम गिरा है. हजारों लोग जो आसपास के गांवों से काम के सिलसिले में आए थे, शहर छोडकर भागने लगे. कचरे और मलबे के टीले लग गए थे. इसके बाद अगले 4 दिनों में जापानी बमवर्षक विमान हर रोज रात को आते. ख़ासतौर पर 24 दिसंबर की रात को. इस बार 10 सैली विमान थे. जिन्होंने सेंट्रल कोलकाता के डलहौजी स्क्वायर इलाके में बम गिराए जिसमें कई लोगों की जानें चली गईं.
उस वक़्त हिन्दुस्तान के पास रात के वक़्त एयर स्ट्राइक से निपटने के लिए कोई डिफेंस सिस्टम नहीं था. ब्रिटेन का फोकस इस वक़्त यूरोप और मिडिल ईस्ट पर था. और 1941 तक हिंदुस्तान को अपनी एयरफ़ोर्स का इस्तेमाल करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी थी. ऐसे में अचानक शुरू हुए इन हमलों से निपटने के लिए भारत तैयार नहीं था.
जापान की हवाई ताकत को खारिज करने वाले लोग पर्ल हार्बर के हमले और अब कोलकाता पर हो रही बमबारी के बाद समझ चुके थे कि जापानी जहाज़ों ने ब्रिटेन या किसी और पश्चिमी देश के जहाज़ों की नक़ल नहीं की है, बल्कि उनके पास अपना खुद का एयरक्राफ्ट डिजाइन है और उनके पायलट भी कम नहीं हैं, बल्कि पूरी कुशलता के साथ हमले कर रहे हैं. विशेष रूप से, इंपीरियल जापानी नेवल एयर सर्विस (IJNAS) के पायलट्स द्वारा उड़ाया गया Mitsubishi A6M Type 0 यानी  'Zero' fighter एक उत्कृष्ट विमान साबित हुआ. इसके अलावा जापानी एयरफ़ोर्स का इसके ही जैसा दूसरा विमान Nakajima Ki-43 Hayabusa. दोनों  ने मिलकर एशियाई आसमान लगभग साफ़ कर दिया था. इन दोनों को सिर्फ एक अमेरिकी विमान Chennault American Voluteer Group यानी AVG से थोड़ी बहुत टक्कर मिली थी. बाकी कोई इनके सामने नहीं टिक सका.
बम गिराते जापानी फाइटर प्लेन्स
बम गिराते जापानी फाइटर प्लेन्स
#रॉयल एयरफ़ोर्स का एक्शन भारत के एयरडिफेंस को मजबूत करने के लिए, ख़ास तौर पर कलकत्ता के आसपास, कई एयरक्राफ्ट्स को एक्टिव किया गया. पूरा कलकत्ता शहर एयरफील्ड बन चुका था. चौरंगी और मैदान नाम के इलाके के बीच रेड रोड को हवाई पट्टी बना दिया गया. शहर के बीचों-बीच इमारतों से घिरे इस एयरफील्ड से ऑपरेट करना आसान तो नहीं था, लेकिन एक बात अच्छी थी, शहर के लोगों का मनोबल अब कुछ ठीक हो रहा था. हालांकि भारतीय एयरफ़ोर्स के लोग डरे हुए थे. 250,000 टन सामान लादे एक मर्चेंट शिप कलकत्ता बंदरगाह पर खड़ा था,  जो बर्मा में जापानी एयरफील्ड की रेंज में आ रहा था. मार्च 1942 में जापानी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर भी कब्जा कर चुके थे. पोर्ट ब्लेयर पर भी लम्बी दूरी तय कर सकने वाली जापानी बोट्स तैनात थीं. इसलिए अंग्रेज़ी एयरफ़ोर्स को समझ आ गया था कि अब अच्छे फाइटर प्लेन्स जुटाकर हवा में मज़बूत जवाबी कार्रवाई करने का वक़्त आ गया है.
165 हरीकेन विंग के कमांडिंग ऑफिसर टोनी ओ'नील ने 23 दिसंबर को एक जापानी जहाज को क्षतिग्रस्त करने का दावा किया, और अगली रात एक और जापानी जहाज को गिरा दिया. लेकिन अभी भी रात के वक़्त कलकत्ता के पास कोई डिफेंस नहीं था. यानी इसके लिए कुछ सोचने की ज़रूरत थी.
ब्रिटेन के पास रात में एयर स्ट्राइक करने के लिए एक फाइटर प्लेन था. रडार गाइडेड और स्क्रीन पर दुश्मन के जहाज को देख सकने में सक्षम. इसके अलावा ये विमान लैस था, चार 20 मिमी की मिसाइल्स और छह .303 मशीन-गन्स से. 1500hp ब्रिस्टल हरक्यूलिस इंजन वाले ‘ब्यूफाइटर’ नाम के इन जंगी विमानों को आनन-फानन में लाया गया और रात के वक़्त एयर स्ट्राइक के लिए लगा दिया गया. कहीं आठ ब्यूफाइटर्स का ज़िक्र है और कहीं 5 का. कहा जाता है इन्हीं ने कोलकाता को बचाया. इसके अलावा मार्क 1F और मार्क 6F  जहाज भी शामिल किये गए. और इन सबकी मदद से कोलकाता पर जापान की बमबारी के खिलाफ़ पहले फेस का डिफेंस 12 जनवरी 1943 को पहुंचा. 24 दिसंबर 1942 के बाद से 12 जनवरी 1943 तक कलकत्ता की सडकें और इमारतें जापानी बमों से बची रहीं. और 14 जनवरी को एक नई रॉयल एयर फोर्स यूनिट, नंबर 176 स्क्वाड्रन को भी लगा दिया गया. उस वक़्त इन जहाज़ों का स्लोगन था- 'वी कीप द नाइट वॉच.'
ब्रिस्टल हरक्यूलिस इंजन वाले ‘ब्यूफाइटर’
ब्रिस्टल हरक्यूलिस इंजन वाले ‘ब्यूफाइटर’

176 स्क्वाड्रन को दमदम के पास खड़ा किया गया था, इसका प्रमुख कार्य कलकत्ता की सुरक्षा थी, इसने केवल साउथ ईस्ट एशिया में अपनी सर्विस दी. और मई 1946 में इसे भंग कर दिया गया. इसीलिये इसे कई जगह ‘कलकत्ता स्क्वाड्रन’ भी कहा जाता है.
176 स्क्वाड्रन भले नया बना हो, लेकिन इसके पायलट्स पुराने और अनुभवी थे. जिनमें से कलकत्ता पर जापानी बमबारी से निपटने के लिए सबसे ख़ास नाम लिया जाता है-आर्थर मौरिस ओवर्स प्रिंग का. वर्ल्ड वॉर फर्स्ट के दौरान फ्रांस से एक शब्द चला था –Ace यानी इक्का. ये उनके लिए इस्तेमाल किया जाता था जो उस दौर के सबसे बेहतरीन पायलट्स होते थे. और यही –Ace यानी इक्का मौरिस प्रिंग का भी पर्यायवाची बन गया था.
हालांकि कलकत्ता पर जापान की बमबारी अगले दो साल तक जारी रही, लेकिन 20 दिसंबर से शुरू हुए ये हवाई हमले मौरिस की अगुवाई में 14 जनवरी 1943 तक थाम लिए गए थे. इसके बाद दोबारा जापान की तरफ़ से 15 जनवरी 1943 को भी एक बार कलकत्ता पर बमबारी की गई. इस बार भी कई लोगों की जानें गईं. #किद्दरपोर डॉक यार्ड पर बमबारी इसके बाद 5 दिसंबर 1943 को जापान की तरफ़ से सबसे भयंकर बमबारी की गई. अलग-अलग सूत्रों के मुताबिक इसमें कम से कम 350 से 500 लोग मारे गए. मारे जाने वाले लोगों में सबसे ज्यादा मजदूर और सामान ढोने वाले कुली थे. पिछले सभी हमलों के उलट ये रात की बजाय दिन में किया गया हमला था. कहा जाता है ब्रितानिया एयरफ़ोर्स को दिन के वक़्त हमले की उम्मीद नहीं थी, जिसके चलते वो इस एयर स्ट्राइक को वक़्त रहते नहीं रोक सके.
24 दिसंबर 1944 को जापानियों ने कलकत्ता पर आख़िरी बार बमबारी की. इसके बाद उनका फोकस बर्मा और इंडिया की बजाय चीन और पेसिफिक रीजन की तरफ़ शिफ्ट हो गया.
1942 से 1944 तक, करीब दो साल से ज्यादा चले इन हमलों में कलकत्ता शहर की कई ख़ास इमारतें और इलाके तबाह हो गए. मसलन सेंट्रल टेलीग्राफ ऑफिस, मैंगो लेन के इलाके में मैकेंजी ल्याल कंपनी (MacKenzie Lyall & Co) , इस्माइली जमात खाना, बेंटिक स्ट्रीट में एसी मोहम्मद एंड कंपनी (A C Mohammed and Co ) की इमारत, ग्रेट ईस्टर्न होटल का इलाका और उत्तरी कलकत्ता की सब्जी मंडी.
6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर दुनिया का पहला परमाणु बम हमला कर दिया. कहा गया कि ये पर्ल हार्बर का बदला है. इसके तीन दिन बाद जापान के ही नागासाकी शहर पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया. दोनों शहर लगभग पूरी तरह तबाह हो गए. डेढ लाख से अधिक लोगों की पल भर में जान चली गई और जो बच गए वो अपंगता के शिकार हो गए. और ये अपंगता जापान की पीढ़ियों में रह गई.
न्यूक्लियर अटैक के बाद जापान के हिरोशिमा शहर में बचे हुए लोग भी रेडिएशन के चलते जान गंवा रहे थे
न्यूक्लियर अटैक के बाद जापान के हिरोशिमा शहर में बचे हुए लोग भी रेडिएशन के चलते जान गंवा रहे थे

जापान की एयरस्ट्राइक्स ने उसके लिए बहुत कुछ बदतर कर दिया था. इसीलिए कई इतिहासकारों ने उसकी एयरस्ट्राइक्स को मूर्खता करार दिया है.

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