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जमशेदजी टाटा ने कैसे लिया था अपनी बेज्जती का बदला?

टाटा औद्योगिक घराने के पितामह जमशेदजी टाटा की पूरी कहानी

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19 मई 2022 (अपडेटेड: 19 मई 2022, 10:05 AM IST)
Jamshedji Tata
जमशेदजी टाटा भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति तथा औद्योगिक घराने टाटा समूह के संस्थापक थे (तस्वीर: Tatatrusts.org)
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साल 2021 में एडेलगिव फ़ाउंडेशन ने पिछली सदी के सबसे परोपकारी लोगों की सूची निकाली तो उसमें सबसे पहला नाम जमशेदजी टाटा का था. बिल गेटस और वॉरन बफे जैसे नामों से भी ऊपर. कमाल की बात ये है कि जमशेदजी को गुज़रे एक सदी से भी ऊपर हो चुका है. और इस सब उन्होंने तब किया था जब भारत एक ग़ुलाम देश था.

साल 1858. बम्बई के एलफिंस्टोन कॉलेज से एक 19 साल का लड़का ग्रैजुएट होकर निकलता है. और अपने पिता के धंधे में हाथ बंटाने लगता है. ये अफ़ीम के धंधे का दौर था. नुसीरवानजी अपने बेटे को चीन भेजते हैं. ताकि वहां से वो धंधे के गुर सीखकर लौटे. बेटा लौटा तो उसने एक नया इरादा पिता के सामने रखा, अफ़ीम के दिन लदने वाले थे. अगला दौर कपास का था. ब्रिटेन में बड़ी बड़ी मिल तैयार हो रही थीं. और भारत में कपास की क्रांति आने वाली थी.

दो क्रांतियां

जमशेदजी का जन्म 3 मार्च 1839 को सूरत के पास नवसारी में हुआ था. एक पारसी परिवार में. उनके पूर्वज पारसी पुजारी हुआ करते थे.  उनके पिता अपने परिवार में पहले थे जिन्होंने व्यापार में हाथ आज़माया था. पिता के साथ कुछ साल काम करके उन्होंने बिज़नेस करना सीखा और आगे जाकर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घराने को जन्म दिया.

जमशेदजी 1858 में ‘ग्रीन स्कॉलर’ (स्नातक स्तर की डिग्री) के रूप में उत्तीर्ण हुए और पिता के व्यवसाय में पूरी तरह लग गए (तस्वीर: www.tatatrusts.org)

उन्होंने शुरुआत की कपास के धंधे से. और इसका कारण थीं दो क्रांतियां. पहली 1857 की क्रांति, जिसके बाद भारत की बागडोर ब्रिटिश इंडिया कम्पनी से ब्रिटिश राज के हाथ में चली गई थी. और ट्रेड पर उनकी मोनोपॉली हो गई थी. अब तक अंग्रेज भारत से मसाले आदि ले ज़ाया करते थे. लेकिन जल्द ही ये सब कुछ बदलने वाला था.

इस बदलाव का कारण था एक दूसरी क्रांति जो सुदूर अमेरिका में घट रही थी. लंदन में कपास की मिल दिन-रात चल रही थी. जिसके लिए कच्चा माल आता था अमेरिका से. अमेरिका में अश्वेतों को ग़ुलाम बनाकर खेती करवाई जाती थी. जिसके चलते अमेरिका सबसे सस्ता कपास निर्यात करता था. लेकिन फिर 1860 में अमेरिका में गृहयुद्ध छिड़ गया और कपास की कमी होने लगी. तब ब्रिटिश राज की नज़र भारत पर पड़ी.

यहां उपजाऊ ज़मीन थी. और सामान ले जाने लिए बड़े-बड़े बंदरगाह थे. ब्रिटिश राज यहां कारोबार पर मोनोपॉली रखता था. इसलिए उन्होंने भारत से कपास लंदन निर्यात करना शुरू कर दिया. जिसके चलते भारत में कपास की मांग में भारी इज़ाफ़ा हुआ. 1860 तक आते-आते भारत ब्रिटेन के कुल कपास का 90% निर्यात करने लगा था. जब तक अमेरीकी गृह युद्ध शांत हुआ, इस मात्रा में थोड़ी कमी आई लेकिन फिर भी भारत कपास का एक बड़ा निर्यातक बना रहा.

बहती हवा का रुख़

जमशेदजी बहती हवाओं का रुख़ पहचान गए थे इसलिए उन्होंने ठाना कि अफ़ीम को छोड़कर कपास के धंधे में हाथ आज़माएंगे. इसके लिए उन्होंने लंदन जाकर लैंकशायर कॉटन मिल्स में हो रहे काम को देखा मार्केट को स्टडी किया. इस दौरान उनके दिमाग़ में स्वदेशी का विचार भी उपजा. उन्होंने देखा कि पश्चिम में औद्योगिक क्रांति भारत से 100 साल आगे थी.

जमशेदजी ने भारत में उन्नत तकनीकों वाली पहली कपास की मिल स्थापित की (तस्वीर: tatatrusts.org)

उन्होंने देखा कि भारत भी कपास के खेल में बड़ा प्लेयर बन सकता है. यहां बिजली पैदा करने के लिए कोयला था. काम करने वाली बड़ी जनसंख्या यानी लेबर मार्केट था. कपास की भरपूर उपज थी और बड़े बंदरगाह थे.

1869 में जब जमशेदजी दुनिया भर का दौरा कर मार्केट को समझ रहे थे. तब एक घटना और हुई. सुएज कैनाल का निर्माण होने से एशिया और यूरोप की दूरी में 7 हज़ार किलोमीटर का अंतर आ गया था. इससे पहले एशिया से यूरोप जाने के लिए अफ्रीकी महाद्वीप से घूमकर जाना पड़ता था. सुएज कैनाल बन जाने से भारत के बंदरगाह व्यापारियों के लिए बड़े काम के हो गए थे.

जमशेदजी भारत में कपास की इंडस्ट्री खोलना चाहते थे. ऐसा नहीं कि यहां कपास की मिल नहीं थी. सिर्फ़ बम्बई में ही कपास की 15 मिल चल रही थीं. लेकिन उनके साथ दिक्कत थी कि वो अभी भी उनमें बाबा आदम के जमाने के हिसाब से काम होता था. पुरानी मशीनों और तकनीकों के सहारे चल रही ये मिलें यूरोप और अमेरिका से कम्पीट नहीं कर सकती थीं.

नागपुर में पहली मिल

6 साल तक विदेशों में कपास के मार्केट को स्टडी करने के बाद उन्होंने भारत में एक मिल डालने की सोची. तब इसके लिए मुम्बई सबसे मुफ़ीद जगह मानी जाती थी. लेकिन जमशेदजी ने मुम्बई के बजाय नागपुर को चुना. जब बाकी व्यापारियों को पता चला तो उन्होंने जमशेदजी का मज़ाक़ उड़ाया. बम्बई व्यापार का क़ेंद्र था. और यहां बंदरगाह भी था. इसलिए नागपुर में मिल खोलने की बात किसी हो हज़म नहीं हुई.

टाटा स्टील (तस्वीर: Tatastrusts.org)

नागपुर में मिल खोलने के पीछे जमशेदजी की दूरदृष्टि थी. नागपुर में कपास की अच्छी उपज थी. सस्ता लेबर था. साथ ही कोयल मंगाना भी यहां से नज़दीक पड़ता था. लेकिन जिसे बिजनेस में गेम चेंजर कहते हैं, वो चीज़ थी रेलवे. भारत में रेल नेटवर्क फैलता जा रहा था. और जमशेद ज़ी ने ब्रिटेन में देखा था कि रेलवे ने व्यापार में कैसा असर डाला था. पूरे यूरोप में ट्रेड के लिए रेलवे से माल ढोया जाता था. जो कच्चा माल लाने और फ़िनिश्ड प्रोडेक्ट ढोने के लिए सबसे एफ़िशिएंट ज़रिया था.

नागपुर जल्द ही रेलवे का क़ेंद्र बनने वाला था. और इसी सोच के चलते साल  1877 में जमशेदजी ने नागपुर में एम्प्रेस मिल की शुरुआत की. उन्होंने ब्रिटेन से तब की सबसे उन्नत तकनीक की मशीनरी मंगाई. और नागपुर में काम की शुरुआत हुई. मिल में काम करने वाले कर्मचारियों को उन्होंने प्रॉविडेंट फंड, साल में नियत छुट्टी, 8 घंटे काम और मेडिकल इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं दीं. तब के हिसाब से ये क्रांतिकारी विचार था. ब्रिटेन में तक कर्मचारियों को ये सुविधाएं नहीं दी जाती थीं.मिल में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ रिश्तों पर ज़ोर देकर उन्होंने एक नए वर्क कल्चर की शुरुआत की जो आगे जाकर टाटा इंडस्ट्रीज़ की पहचान बना.

बेज्जती का बदला

इसके बाद उन्होंने बम्बई में स्वदेशी मिल नाम से एक और मिल खोली. स्वदेशी का विचार तब तक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उतरा नहीं था. भारतीय को औद्योगिक शक्ति बनाने के लिए जमशेद जी ने चार सपने देखे थे. स्टील इंडस्ट्री की शुरुआत, हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर की शुरुआत, एक रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना  और एक होटल खोलना, जो दुनिया में सबसे बेहतरीन सुविधाओं वाला हो. रिसर्च इंस्टिट्यूट खोलने का विचार उन्हें स्वामी विवेकानंद के साथ एक मुलाक़ात के दौरान आया था.

जमशेदजी टाटा ने 19 मई को जर्मनी के बादनौहाइम में अपने जीवन की अंतिम साँसें लीं (तस्वीर: tatatrusts.org)

यहां पढ़ें- विवेकानंद और टेस्ला: एक सन्यासी और वैज्ञानिक की मुलाक़ात

जमशेदजी के जीते जी उनका सिर्फ़ एक सपना पूरा हो पाया. मुम्बई के ताज होटल के रूप में. कहानी यूं है कि एक बार जमशेदजी मुंबई के काला घोड़ा इलाके में मौजूद एक में होटल गए. लेकिन वहां घुसने से उन्हें ये कहते हुए रोक दिया गया कि इस होटल में सिर्फ गोरे लोग ही आ सकते हैं. इसके बाद जमशेदजी टाटा ने मुंबई में एक भव्य होटल बनाने का फैसला लिया, जिसमें सभी लोग आ जा सकेंगे.

साल 1898 में ताज होटल की नींव रखी गई. इसे बनने में चार साल का वक्त लगा और 16 दिसंबर 1902 को पहली बार ताज होटल आम जनता के लिए खोला गया. ये शहर का पहला होटल था जिसमें बिजली, अमेरिकन पंखे, जर्मन लिफ़्ट और अंग्रेज़ी बावर्ची थे.

जमशेदपुर टाउनशिप

लेकिन अपने बाकी सपने पूरे कर पाते, इससे पहले ही साल 1904 में आज ही के दिन यानी 19 मई को उनका निधन हो गया. उनकी मृत्यु के सिर्फ़ 7 साल के अंदर बाकी तीन काम भी पूरे हो चुके थे. साल 1907 में टाटा आइरन एंड स्टील वर्क्स की शुरुआत हुई. जो पूरे एशिया में स्टील बनाने वाली पहली कंपनी थी. 1910 में IISC की शुरुआत हुई और 1911 में टाटा पावर की शुरुआत भी हो गई. ये चारों संस्थान (ताज होटल को मिलाकर) भारत की औद्योगिक क्रांति के चार पिलर साबित हुए.

होटल ताज (तस्वीर: getty)

स्टील कंपनी खोलने के साथ साथ जमशेदजी एक आधुनिक शहर भी बनाना चाहते थे. जिसमें कर्मचारियों के आवास आदि सभी सुविधाएं हों. जमशेदपुर टाउनशिप की परिकल्पना करते हुए उन्होंने अपने बेटे दोआब को लिखा था,

“ध्यान रखना वहां बहुत सारे पेड़ हों. लॉन और गार्डन के लिए खूब सारी जगह हो. पार्क और खेलने के मैदान हों. मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारे हों जहां लोग पूजा कर सकें”

2021 में एडेलगिव फ़ाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार जमशेदजी ने कल्याणकारी कामों के लिए जितनी सम्पत्ति दान की, उसकी क़ीमत आज के हिसाब से 103 बिलियन डॉलर होती है. बेंगलुरू में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की स्थापना के लिए उन्होंने अपनी आधी से अधिक संपत्ति दान में दे दी थी. और इसी परम्परा को टाटा ग्रुप आज भी आगे बढ़ा रहा है.

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