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विवेकानंद और टेस्ला: एक सन्यासी और वैज्ञानिक की मुलाक़ात!

महान व्यक्ति कौन है?

इसके कई माप और परिमाण हो सकते हैं. लेकिन एक चीज़ जो प्रामाणिक रूप से कही जा सकती है. वो ये देखना है कि अमुक व्यक्ति का उसके आसपास के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा. 1984 में भारत सरकार ने निर्णय लिया कि 12 जनवरी को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा. कारण कि इसी दिन 1863 में स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था. इस अवसर पर हम आपको विवेकानंद के जीवन के तीन क़िस्सों से रूबरू कराना चाहते हैं. उनके जीवन की तीन मुलाक़ातों से.

पहली मुलाक़ात

1893 की बात है. विवेकानंद अमेरिका जाने के लिए एक शिप ‘एस.एस. इम्प्रेस ऑफ इंडिया’ से यात्रा कर रहे थे. तब पानी के जहाज़ से चलना ही लंबी दूरी की यात्रा का एकमात्र साधन हुआ करता था. शिप का रूट जापान से कनाडा तक था. और स्वामी विवेकानंद के साथ एक और व्यक्ति इस शिप पर सवार था, जमशेदजी टाटा. टाटा सिल्क के कारोबार के लिए जापान पहुंचे थे. और वहां से आगे कारोबार के ही सिलसिले में शिकागो जा रहे थे.

30 साल के विवेकानंद और 54 साल के जमशेदजी ने इस यात्रा में क़रीब 20 दिन का सफ़र साथ गुज़ारा. हालांकि तब स्वामी विवेकानंद उस तरह फ़ेमस नहीं हुए थे. बल्कि जमशेदजी भी उन्हें सिर्फ़ एक सन्यासी के तौर पर जानते थे. इस यात्रा के दौरान जमशेदजी ने विवेकानंद को बताया कि वो भारत में स्टील इंडस्ट्री लाना चाहते हैं. तब स्वामी विवेकानंद ने जमशेदजी से कहा कि रॉ मटेरियल के धंधे से वो पैसा तो कमा लेंगे. लेकिन इससे देश का भला नहीं होगा. उन्होंने सुझाव दिया कि भारत में उत्पादन की टेक्नोलॉजी आनी चाहिए. ताकि भारत दूसरों पर निर्भर न रहे.

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स्टीमर एस॰एस॰ एम्प्रेस (तस्वीर: Vivekananda Abroad Collection)

इस बात का ज़िक्र टाटा बिजनेस घराने से जुड़ी वेबसाइट पर दिया गया है. इस दौरान दोनों के बीच एक रिसर्च इंस्टिट्यूट खोलने को लेकर भी चर्चा हुई. इसके बाद दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए. 1897 में जब विवेकानंद भारत लौटे तब तक उनका बहुत नाम हो चुका था. टाटा अब तक एक रिसर्च इंस्टिट्यूट खोलने का मन बना चुके थे. उन्होंने 23 नवंबर 1898 को स्वामी विवेकानंद के नाम एक पत्र लिखा. शिप पर हुई मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए टाटा ने उन्हें रिसर्च इंटिट्यूट की याद दिलाई. जिसके बारे में दोनों के बीच चर्चा हुई थी. टाटा ने इस मामले में उनका समर्थन मांगा. और उनसे निवेदन किया कि वो युवाओं को इस मुहिम में जोड़ने के लिए एक पैम्फ़्लेट छापें. जिसका पूरा खर्च टाटा उठाएंगे.

IISC बैंगलोर की स्थापना

विवेकानंद इन दिनों रामकृष्ण मिशन के काम में बिज़ी थे. इसलिए पैम्फ़्लेट तो नहीं छप पाया. लेकिन उन्होंने अपनी शिष्या सिस्टर निवेदिता को जमशेदजी से मिलने भेजा. और रामकृष्ण मिशन के अंग्रेजी अखबार ‘प्रबुद्ध भारत’ के ज़रिए इस इंस्टिट्यूट के लिए समर्थन इकट्ठा किया.

सिस्टर निवेदिता और जमशेदजी ने मिलकर एक रिसर्च इंस्टिट्यूट का खाका तैयार किया. टाटा ने पूरे तीस लाख रुपए देने का ऐलान किया और सरकार के पास प्रस्ताव भेजा. लेकिन वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने इस प्लान को रद्द कर दिया. इसके बाद सिस्टर निवेदिता 1901 में लंदन गईं. और वहां जाकर इंस्टिट्यूट के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की. उन्होंने वहां एजुकेशन डिपार्टमेंट के सर जॉर्ज बिरवुड से मुलाक़ात की. बिरवुड ने कलकत्ता और बॉम्बे यूनिवर्सिटी की बदहाली का हवाला दिया. और मदद से इनकार कर दिया. तब सिस्टर निवेदिता ने पैट्रिक गेडेस से मदद मांगी. गेडेस तब जाने-माने समाजशास्त्री और बायलॉजिस्ट थे.

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जमशेदज़ी टाटा और स्वामी विवेकानंद को लिखा उनका पत्र (तस्वीर: Tata.com)

गेडेस खुद भी विवेकानंद से मिल चुके थे. दोनों की मुलाक़ात साल 1900 में पेरिस में हुई थी. गेडेस की एक आंख में कुछ दिक़्क़त थी. जिसके चलते वो हमेशा परेशान रहते थे. जब इस बारे में उन्होंने विवेकानंद को बताया तो विवेकानंद ने जवाब दिया,

“Professor, be mind-minded, not eye (I)-minded.” यानी “प्रोफ़ेसर, दिमाग़ पर ध्यान दीजिए, आंख या अहम पर नहीं.”

गेडेस विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे. इसलिए सिस्टर निवेदिता के कहने पर उन्होंने रिसर्च इंस्टिट्यूट के लिए सरकार में पैरवी की. साल 1902 में स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गई. 1904 में जमशेदजी भी चल बसे. लेकिन इसके बाद भी सिस्टर निवेदिता रिसर्च इंस्टिट्यूट के लिए लगातार कोशिश करती रहीं. आख़िरकार साल 1907 में सरकार ने इस प्रस्ताव को हरी झंडी दी. सरकार चाहती थी इंस्टिट्यूट बॉम्बे में खुले. लेकिन टाटा ने 1898 में ही मैसूर में ज़मीन हासिल कर ली थी. मैसूर के महाराजा कृष्णाजी वाडियार इंस्टिट्यूट के लिए 372 एकड़ ज़मीन देने को तैयार हो गए थे. जिसके बाद 1909 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलौर अस्तित्व में आया. और आने वाले सालों में भारत का प्रीमियर शिक्षा संस्थान बना.

दूसरी मुलाक़ात

30 जुलाई 1893 को स्वामी विवेकानंद अमेरिका पहुंचे. वहां शिकागो में धर्म संसद का आयोजन होना था. अमेरिका प्रवास के दौरान एक फ़्रेंच सिंगर एमा काल्वे उनकी शिष्या बनी. एमा काल्वे ने अपनी दोस्त को विवेकानंद और रॉकफ़ेलर की मुलाक़ात का किस्सा सुनाया था. रॉकफ़ेलर कौन? पहले ये जान लेते हैं.

 

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जॉन डी रॉकफ़ेलर (तस्वीर: commons)

पूरा नाम जॉन डी रॉकफ़ेलर. एक अमरीकी बिजनेसमैन हुआ करते थे. क़तई रईस. शायद आधुनिक इतिहास के सबसे ज़्यादा रईस व्यक्ति. रेफेरेंस के लिए समझिए कि अमेरिका में तेल का धंधा शुरू करने वाले पहले व्यक्ति थे. उन्होंने स्टैंडर्ड ऑयल नाम की एक कम्पनी बनाई. जो अमेरिका का 90% ऑयल ट्रेड चलाती थी. बाद में स्टैंडर्ड ऑयल ही टूटकर एक्सॉन-मोबिल और शेवरन जैसी बड़ी तेल कम्पनियां बनीं.

1937 में जब रॉकफ़ेलर की मृत्यु हुई. तब उनकी दौलत थी 140 करोड़ अमेरिकी डॉलर. तब अमेरिका की GDP थी, 9200 बिलियन डॉलर. यानी रॉकफ़ेलर की कुल दौलत अमेरिकी GDP का लगभग डेढ़ प्रतिशत हुआ करती थी. रॉकफ़ेलर और विवेकानंद की मुलाक़ात अप्रैल 1894 में हुई. धर्म संसद में अपनी स्पीच के बाद विवेकानंद मशहूर हो चुके थे. जॉन रॉकफ़ेलर तब मानसिक अवसाद से गुजर रहे थे. ऐसे में उनके दोस्तों ने उन्हें भारत से आए इस स्वामी से मिलने की सलाह थी. विवेकानंद अपने एक सहयोगी के यहां ठहरे हुए थे. जो रॉकफ़ेलर का दोस्त हुआ करता था.

धन्यवाद तुम्हें मेरा करना चाहिए

एक दिन जब रोककफ़ेलर अपने दोस्त से मिलने पहुंचे. तो पता चला विवेकानंद यहीं ठहरे हुए हैं. रॉकफ़ेलर सीधे उनके कमरे में घुसे. तब रॉकफ़ेलर की हैसियत ऐसी थी कि राष्ट्रपति भी उनको नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकता था. विवेकानंद किताब पढ़ रहे थे. उन्होंने रॉकफ़ेलर की तरफ़ ध्यान नहीं दिया. अंत में जब ध्यान दिया तो दोनों में बात शुरू हुई. विवेकानंद को अहसास हुआ कि रॉकफ़ेलर अकूत धन सम्पत्ति के मालिक हैं. लेकिन फिर भी दुखी और निराश है. विवेकानंद से उनसे कहा,

तुम्हारे पास इतना पैसा है तो क्या इसका मतलब ये है कि तुम दूसरों से ज़्यादा बुद्धिमान हो?

हां, बिलकुल, रॉकफ़ेलर ने जवाब दिया. विवेकानंद ने तब उनसे कहा, तुम एक आम आदमी से 10 गुना समझदार हो सकते हो. लेकिन तुम्हारी दौलत उससे हज़ार गुना है. साथ ही सुझाव देते हुए कहा, क्यों ना तुम इस पैसे का इस्तेमाल, लोगों की मदद के लिए करो?

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स्वामी विवेकानंद कथन

रॉक फ़ेलर को लगा, क्या बकवास कर रहा है ये आदमी. औरों को पैसे देने से मेरी क्या मदद होगी. रॉकफ़ेलर उठे और चलते बने. एक हफ़्ता गुजरा. रॉकफ़ेलर ने दुबारा विवेकानंद से मिलने का निश्चय किया. कमरे में दाखिल होते ही उन्होंने विवेकानंद की टेबल में एक काग़ज़ का टुकड़ा रखा. उसमें वो रक़म थी जो रॉकफ़ेलर ने चैरिटी के लिए दान की थी. बोले,

“ये रहा. अब तो तुम संतुष्ट हो गए होगे. अब इसके लिए तुम मुझे धन्यवाद कह सकते हो.”

स्वामी विवेकानंद ने टुकड़ा उठाया, बोले, “धन्यवाद तुम्हें मेरा करना चाहिए”. बाद में रॉकफ़ेलर ने रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन नाम की एक चैरिटी संस्था की स्थापना की. और अमेरिका के सबसे बड़े जनहितैषी के तौर पर जाने गए. 1950 में रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन की मदद से पुणे में वाइरस रिसर्च लैब की स्थापना हुई. और फ़ाउंडेशन ने भारत में एग्रीकल्चर रिसर्च के लिए मदद देने का काम भी किया. ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि रॉकफ़ेलर की चैरिटी का समस्त श्रेय स्वामी विवेकानंद को मिलता है. लेकिन इतना ज़रूर है कि विवेकानंद से मुलाक़ात का उनकी सोच पर गहरा असर पड़ा था.

तीसरी मुलाक़ात

1896 में अमेरिका में एक नाटक मशहूर हुआ. नाटक का नाम था इजिएल. सैरा बर्नहार्ट नाम की एक एक्ट्रेस मुख्य भूमिका में थी. और फ़्रेंच भाषा के इस नाटक की विषयवस्तु थी बुद्ध का जीवन. नाटक में बुद्ध जब ध्यान में मग्न थे. तब इजिएल नाम की एक लड़की बुद्ध को रिझाने की कोशिश करती है.

फरवरी 1896 में स्वामी विवेकानंद इस नाटक को देखने पहुंचे. धर्म संसद में अपने भाषण से वो काफ़ी लोकप्रिय हो चुके थे. सैरा बर्नहार्ट ने दर्शक दीर्घा में स्वामी विवेकानंद को बैठे देखा. नाटक ख़त्म होने के बाद उन्हें मुलाक़ात के लिए बुलाया. इत्तेफ़ाक ये कि इस दौरान मशहूर वैज्ञानिक और इनोवेटर निकोला टेस्ला भी यहां मौजूद थे. यहीं पर टेस्ला और स्वामी विवेकानंद की पहली मुलाक़ात हुई. 39 साल के टेस्ला तब तक AC मोटर का आविष्कार कर चुके थे. और निकोला टेस्ला कम्पनी भी खोल चुके थे.

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निकोला टेस्ला और स्वामी विवेकानंद (तस्वीर: Alamy)

इत्तेफ़ाक था कि इससे कुछ दिन पहले ही स्वामी विवेकानंद ने एक पत्र लिखा था. जिसमें उन्होंने टेस्ला का ज़िक्र किया था. विवेकानंद रचनावली, वॉल्यूम – फ़ाइव में इस पत्र का ज़िक्र है.
विवेकानंद लिखते हैं,

“मिस्टर टेस्ला सोचते हैं कि वे मैथ्स की इक्वेशन से बल और पदार्थ का ऊर्जा में ट्रांसफ़ॉर्मेशन साबित कर सकते हैं. मैं अगले हफ्ते उनसे मिलकर उनका यह नया गणितीय प्रयोग देखना चाहता हूं.”

इसी पत्र में वो आगे कहते हैं कि टेस्ला का यह प्रयोग वेदांत की साइंटिफिक रूट्स को साबित कर देगा. जिसके मुताबिक़ यह पूरा विश्व अनंत ऊर्जा का ही रूपांतरण है. दोनों के बीच ठीक-ठीक क्या बात हुई. ये किसी जगह पर दर्ज़ नहीं है. लेकिन बाद में टेस्ला के लेखन और रिसर्च पर इस मुलाक़ात का प्रभाव दिखता है. 1907 में टेस्ला ने ‘मैन्स ग्रेटेस्ट अचीवमेंट’ शीर्षक के साथ एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने ‘आकाश’ और ‘प्राण’ जैसे संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है. टेस्ला लिखते हैं,

‘सभी पदार्थ मूल रूप से एक ही तत्व से निकले हैं. और इस तत्व की कोई शुरुआत नहीं है. सम्पूर्ण आकाश में यही फैला हुआ है. और ये तत्व जीवन देने वाले प्राण या रचनात्मक ऊर्जा से प्रभावित होता है’

वेदांत और विज्ञान

इसके अलावा अतर्राष्ट्रीय टेस्ला सोसायटी के अध्यक्ष रहे टॉबी ग्रोट्ज का एक आलेख है. जिसमें ग्रोट्ज, टेस्ला और विवेकानंद की मुलाक़ात का ज़िक्र करते हैं. हालांकि टेस्ला पदार्थ और ऊर्जा के संबंध को स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पाए थे. लेकिन वेदांत दर्शन के प्रभाव के चलते इस पर उनका पक्का भरोसा था. बाद में वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने पदार्थ-ऊर्जा संबंध समीकरण को साबित किया था.

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1898 में सिस्टर निवेदिता भारत आ गयीं और स्वामी विवेकानंद ने उन्हें 25 मार्च 1898 को दीक्षा दी (तस्वीर: Commons)

1897 में भारत लौटकर स्वामी विवेकानंद के लेक्चर्स में भी टेस्ला का ज़िक्र मिलता है. एक जगह वो कहते हैं,

“वर्तमान के कुछ सबसे बुद्धिमान वैज्ञानिकों ने वेदांत के विज्ञान सम्मत होने को स्वीकार किया है. इनमें से एक को मैं निजी तौर पर जानता हूं. यह व्यक्ति दिन रात अपनी लैब में ही लगा रहता है. इसके पास खाने का वक्त भी नहीं है. लेकिन मेरे द्वारा दिए गए वेदांत के लेक्चर को अटेंड करने के लिए वो घंटों खड़ा रह सकता है. उसके अनुसार ये इतने विज्ञान सम्मत हैं कि विज्ञान आज जिन निष्कर्षों पर पहुंच रहा है. ये उनसे पूरी तरह मेल खाते हैं ”

स्वामी विवेकानंद को जानने के लिए उनके बारे में पढ़ा जाना ज़रूरी है. लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि हम उनके लिखे, उनके कहे को भी पढ़ें. इसी उम्मीद के साथ कि आप मन से सदा युवा बने रहेंगे, लल्लनटॉप परिवार की ओर से आप सभी को राष्ट्रीय युवा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.


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