जब इंदिरा सरकार ने किशोर कुमार के गानों पर लगाया बैन
इमरजेंसी के दौरान क्या हुआ जो प्रसार भारती बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया

गर्मी की दोपहर में सड़कों पर सन्नाटा रहता था, लेकिन इधर-उधर या अपने ही घर से कुछ आवाजें आती थीं....ये है विविध भारती, दिन के डेढ़ बजे हैं और आप सुन रहे हैं मनचाहे गीत... आप सुन रहे हैं फौजी भाइयों का कार्यक्रम जयमाला....आप सुन रहे हैं भूले बिसरे गीत. कुछ ऐसी आवाजें जिन्हें आज जब आप सुनेंगे तो अचानक से जिंदगी का एक पूरा चक्का वापस घूम जाएगा, चेहरे पर एक मुस्कुराहट सी आएगी और आप उस दौर में पहुंच जाएंगे, जहां से वापस लौटने का शायद मन न करे. हमारा भी नहीं कर रहा है. चलिए थोड़ा और इन यादों की गहराई में चलते हैं. ये वो दौर था जब गांव में लाइट महज कुछ घंटे ही आती थी. एक आम आदमी के लिए मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन हुआ करता था ‘रेडियो’. दुकानों से लेकर किसी पेड़ की छांव में चारपाई डालकर लेटे 'चचा' के कानों से भी रेडियो सटा रहता था. खेतों में काम होता था पास में रेडियो बज रहा होता था. लोगों को न्यूज़ का टाइम पता रहता था, जब आने वाली होती मोहल्ले के चार लोग और आ जाते.

कुछ ऐसा था रेडियो का दौर. लेकिन ये दौर आया कैसे यानी रेडियो इस दौर तक पहुंचा कैसे. बात दूरदर्शन की भी करेंगे. और बात ये भी कि रेडियो और टीवी की बढ़ती ताकत का इमरजेंसी के समय कैसे जमकर दुरूपयोग किया गया. कैसे रेडियो और टीवी के कर्मचारियों को कमरे में बंद कर सत्ताधारी पार्टी का काम करवाया जाता था. साथ ही ये भी जानेंगे कि फिर इसे सत्ता के चंगुल से बाहर निकालने के लिए कैसे प्रसार भारती का जन्म हुआ?
जब शुरू हुआ रेडियो और 3 साल में दिवालिया हो गया13 मई 1897 को इटली के वैज्ञानिक गुग्लिल्मो मारकोनी ने खुले पानी में दुनिया का पहला रेडियो संदेश भेजा था. लेकिन, इसके बाद करीब 20 साल तक उन्होंने रिसर्च किया और तब जाकर उन्हें रेडियो का नियमित और व्यावसायिक प्रसारण करवाने में सफलता मिली. ये दिन था 23 फरवरी, 1920 का. इसके क़रीब 2 साल बाद, नवंबर 1922 से रेडियो के रोजाना प्रसारण की व्यवस्था की जा सकी. लगभग उसी समय ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (बीबीसी) की स्थापना हुई, जोकि पूरी तरह से एक व्यापारिक सेवा थी.

बीबीसी की तर्ज पर ही भारत में भी एक ग़ैरसरकारी कंपनी “इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी” शुरू हुई. कंपनी ने सरकार के साथ मिलकर पहले दो प्रसारण केंद्र खोले. 23 जुलाई 1927 को बॉम्बे में और 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता में.
ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन में लंबा समय बिताने वाले गंगाधर शुक्ल अपनी किताब 'वक्त गुजरता है' में लिखते हैं,
'दोनों रेडियो केंद्रों की स्थापना तो हो गई थी, लेकिन दोनों के ही ट्रांसमीटर शक्तिशाली नहीं थे. ये केवल डेढ़ किलोवाट के ही थे. इस वजह से प्रसारण क्षेत्र 30 मील तक ही सीमित था. मुख्य आमदनी का ज़रिया था रेडियो लाइसेंस, शुरुआत में जिनकी संख्या महज 1000 ही पहुंच सकी थी.'
यहां बता दें कि उस समय लोगों को रेडियो सुनने के लिए लाइसेंस बनवाना पड़ता था. बिलकुल वैसे ही जैसे आज के समय में वाहन चलाने के लिए लाइसेंस बनवाना होता है.

गंगाधर शुक्ल आगे लिखते हैं,
1936 के बाद रेडियो ने कैसे रफ्तार पकड़ी?'इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी 6 लाख रुपए की लागत से शुरू की गई थी, जिसमें से साढ़े चार लाख रुपए केंद्रों की स्थापना में ही लग गए थे. एक रेडियो लाइसेंस की फीस 10 रुपए रखी गई थी. बहुत कोशिश के बाद भी तीन सालों में 8000 लाइसेंस ही दिए जा सके. भारत की सांस्कृतिक विविधता और बहुलता का अच्छे से प्रसारण करने के लिए एक्सपर्ट रेडियो कर्मचारी चाहिए थे और इसके लिए पैसों की जरूरत थी. अंग्रेजी हुकूमत में ज्यादा पैसा मिल नहीं पा रहा था. आखिर वही हुआ जिसका डर था. कंपनी जल्दी ही यानी 1930 में दिवालिया हो गई और रेडियो प्रसारण केंद्र का प्रयोग असफल रहा.'
अगले करीब 6 सालों तक रेडियो को लेकर कोई प्रगति नहीं हुई. फिर 1 जनवरी 1936 को दिल्ली में रेडियो स्टेशन की स्थापना हुई. इसे “इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस” कहा गया. इसी साल जून महीने में, इसका नाम बदलकर “ऑल इंडिया रेडियो” रखा दिया गया. इसके बाद रेडियो की दिन दूना रात चौगुनी तरक्की हुई. अगले 3 सालों में ही रेडियो सेटों की संख्या 74 हज़ार का आंकड़ा पार कर गई.
इतिहासकारों की मानें तो 1939 से 1945 के बीच रेडियो ने चमत्कारिक रूप से तरक्की की. इसकी वजह था दूसरा विश्व युद्ध जिसने न केवल लोगों को बल्कि सरकारों को भी रेडियो का महत्व समझा दिया था. इसके बाद से ही दुनियाभर की सरकारें खबरों के प्रसारण के साथ-साथ अपना प्रचार करने के लिए भी रेडियो का इस्तेमाल करने लगीं. भारत में भी “ऑल इंडिया रेडियो” के “न्यूज़ सर्विस डिवीजन और एक्सटर्नल ब्रॉडकास्ट ” के असरदार प्रसारण के लिए अलग विभाग बना दिए गए.

आजादी के समय भारत में कुल 9 रेडियो स्टेशन थे, लेकिन पाकिस्तान बना तो 3 रेडियो स्टेशन वहां चले गए. भारत के पास दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली और लखनऊ के स्टेशन बचे. 1956 में ऑल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी नाम दिया गया. इसके अगले ही साल विविध भारती की शुरुआत हुई. 15 सितंबर 1959 को ऑल इंडिया रेडियो ने एक बड़ा मुकाम हासिल किया और दूरदर्शन की शुरुआत कर दी.
दूरदर्शन बनाने में बाहर से मिली बड़ी मदददूरदर्शन की स्थापना में कुछ देशों और वैश्विक संगठनों की भूमिका को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता. दूरदर्शन के लिए यूनेस्को ने भारत को उस समय 20 हजार डॉलर आज के हिसाब से देखें तो करीब 16 लाख रुपए दिए. साथ ही फिलिप्स कंपनी के 180 टीवी सेट भारत भिजवाए. ब्रॉडकास्टिंग में इस्तेमाल होने वाली काफी मशीनरी जर्मनी से मिली.
6 साल बाद अगस्त 1965 में दूरदर्शन पर 5 मिनट का न्यूज़ बुलेटिन शुरू हुआ. प्रतिमा पुरी ने पहली बार दूरदर्शन पर न्यूज़ पढ़ी. 180 टीवी सेट के साथ शुरू हुआ दूरदर्शन का सफर अगले 10 साल में 1250 टीवी सेट तक ही पहुंचा. 1970 में 22 हजार टीवी सेट और 1977 में ये संख्या बढ़कर करीब ढाई लाख हो गई. दूरदर्शन का ग्राफ जब बढ़ा तो 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दूरदर्शन को ऑल इंडिया रेडियो से अलग करने का ऐलान कर दिया.

देखा जाए तो दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो ने इंदिरा गांधी के समय में खूब नाम कमाया. लेकिन, इसी दौरान इन संस्थानों के कामकाज पर जमकर सवाल भी उठे. इंदिरा गांधी के दौर में दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो दोनों ही सरकार और कांग्रेस पार्टी की तारीफ में लगे रहते थे.
इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी जब महज युवा कांग्रेस की कार्यकारी समिति के सदस्य भर थे, तब ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली स्टेशन से ही एक साल में उन पर 192 खबरें चलाई गईं. इसी दौरान दूरदर्शन ने संजय गांधी पर 265 खबरें चलाईं.

इमरजेंसी का दौर आया इन दो संस्थानों का और भी बुरा हाल हो गया. प्रसार भारती के पूर्व चेयरमैन ए.सूर्य प्रकाश ने इमरजेंसी के दौरान के कई किस्से लिखे हैं. एक घटना का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं कि इमरजेंसी लगने के बाद जनवरी 1976 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने आपातकाल की और इंदिरा गांधी के ट्वेंटी-पॉइंट्स कार्यक्रम की प्रशंसा के लिए फिल्म स्टार्स की मदद लेने का फैसला किया. तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला के आदेश पर मंत्रालय की एक टीम फिल्म जगत की हस्तियों से बात करने बॉम्बे गई.

मंत्रालय की टीम ने जीपी सिप्पी, बीआर चोपड़ा, सुबोध मुखर्जी और श्रीराम वोहरा जैसे नामी फिल्म निर्माताओं के साथ बैठक की. उस बैठक में सिप्पी ने कहा कि गायक और एक्टर किशोर कुमार किसी भी तरह से सरकार की इस पहल से जुड़ने को तैयार नहीं हैं. सिप्पी ने अधिकारियों को किशोर कुमार से सीधे संपर्क करने को कहा. मंत्रालय में संयुक्त सचिव सीबी जैन ने किशोर कुमार से बात की और उन्हें बताया कि सरकार उनसे क्या चाहती है. जैन ने कहा कि मंत्रालय की टीम कुमार से उनके आवास पर मिलकर उन्हें सबकुछ समझा देगी. लेकिन, किशोर कुमार ने मंत्रालय के अधिकारियों से मिलने से साफ़ इनकार कर दिया. उन्होंने जैन से कहा कि वे स्टेज शो नहीं कर सकते, क्योंकि उनके 'दिल में कुछ परेशानी' है. वह इस समय किसी भी सूरत में रेडियो या टीवी के लिए गाना नहीं गा सकते.
दिल्ली लौटने पर सीबी जैन ने मंत्रालय के सचिव सैयद मुजफ्फर हुसैन बर्नी से कहा कि बाकी सब तो ठीक है, लेकिन किशोर कुमार ने सहयोग करने से न केवल इनकार कर दिया, बल्कि उन्होंने अधिकारियों के साथ बेहद गलत व्यवहार भी किया. यह सुनते ही मुजफ्फर हुसैन बर्नी ने किशोर कुमार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दे दिया. किशोर कुमार के सभी गीतों को तुरंत ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर बैन कर दिया गया. जिन फिल्मों में किशोर कुमार ने अभिनय किया था, उन पर भी रोक लगा दी गई.

इसके अलावा किशोर कुमार के गीतों के ग्रामोफोन रिकॉर्ड की बिक्री भी रुकवा दी गई. सूचना और प्रसारण मंत्रालय का मानना था कि किशोर कुमार पर इतनी सख्त कार्रवाई हो, जो पूरे फिल्म जगत के लिए मिसाल बन जाए. मंत्रालय ने पॉलिडोर और एचएमवी जैसी म्यूजिक कंपनियों से भी संपर्क किया, ताकि किशोर कुमार के रिकॉर्ड की बिक्री पर पूरी तरह शिकंजा कसा जा सके. पॉलिडोर नहीं मानी, लेकिन एचएमवी ने कुछ समय के लिए किशोर कुमार से रिकॉर्डिंग करवानी बंद कर दी.
रेडियो के 22 कर्मचारियों को जब एक हाल में बंद कर दिया गया!प्रसार भारती के पूर्व चेयरमैन ए.सूर्य प्रकाश एक और किस्से का जिक्र करते हुए लिखते हैं,
इंदिरा सरकार उस समय नाजियों के स्टाइल में काम करती थी. 7 फरवरी 1977 को अचानक ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े 22 कर्मचारियों को एक अलग काम के लिए कहा गया. उनसे कहा गया कि एक बेहद महत्वपूर्ण असाइनमेंट के लिए उन्हें चुना गया है. ऑफिस के बाहर गाड़ियों का काफिला आया और सभी 22 कर्मचारियों को उनमें बिठाकर दिल्ली के चाणक्यपुरी में स्थित विश्व युवा केंद्र में ले जाया गया. उन्हें एक हॉल में बिठा दिया गया और दरवाजे लॉक कर दिए गए. एक 18 पन्नों का अंग्रेजी में लिखा दस्तावेज़ उनके आगे बढ़ाया गया और कहा गया कि इसका 10 भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना है. जब तक ये काम खत्म नहीं होगा तब तक कोई हॉल से बाहर नहीं जाएगा. ये दस्तावेज कुछ और नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी का घोषणा पत्र था, जिसे मार्च 1977 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए तैयार करवाया जा रहा था.

दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो का ये हाल देखकर ही देश में इन संस्थानों की आजादी को लेकर आवाज उठी. 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की गठबंधन सरकार बनी और सूचना प्रसारण मंत्री बने लाल कृष्ण आडवाणी. आडवाणी ने संसद में प्रसार भारती विधेयक पेश किया, जिसमें दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो को स्वायत्तता प्रदान करने की बात कही गई. लेकिन, ये बिल पास नहीं हो सका.
वीपी सिंह की सरकार ने पास कराया प्रसार भारती बिलसाल 1989 में तीसरे मोर्चे की सरकार बनी और पीएम बने वीपी सिंह. इसके बाद आज ही के दिन 06 सितंबर 1990 को प्रसार भारती विधेयक संसद में पारित किया गया. लेकिन इसी साल नवंबर में वीपी सिंह की सरकार गिर जाने के चलते अधिसूचना टाल दी गई. और बिल पास होने बाद भी लागू होने से रह गया. फिर इसके ठीक 7 साल बाद 15 सितंबर 1997 को प्रसार भारती एक्ट लागू किया गया.

प्रसार भारती एक्ट 1990 के अनुसार, रेडियो और दूरदर्शन की जिम्मेदारी एक स्वतंत्र विभाग को दी गई. जिसे एक 15 सदस्यीय बोर्ड द्वारा चलाया जाता है. बोर्ड में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाता है. प्रसार भारती के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति सीधे देश के राष्ट्रपति करते हैं. प्रसार भारती एक्ट में इसके बोर्ड को सीधे संसद के प्रति उत्तरदायी बनाया गया. बोर्ड को हर साल अपनी रिपोर्ट संसद में ही पेश करनी होती है. प्रसार भारती को चलाने के लिए फंड सूचना और प्रसारण मंत्रालय से आता है.

जब ये एक्ट बना तो लगा कि प्रसार भारती पूरी तरह आजाद हो गया. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. सूचना और प्रसारण मंत्रालय और प्रसार भारती के बीच 1997 के बाद से अब तक कई बार विवाद की स्थिति बनी है. जिनसे साफ़ पता लगता है कि प्रसार भारती को पूरी से आजादी दिलाने में थोड़ी कसर बाकी रह गई.
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